शान्ति पर्व · अध्याय 316
अव्यक्त तथा सृष्ट प्राणियों के दिन और रात
याज्ञवल्क्य जनक को दिए अपने उत्तर में काल की गणना आगे बढ़ाते हैं। वे अव्यक्त के दिन-रात का परिमाण बताते हैं, कि वह पहले ओषधियों को, फिर स्वर्णाण्ड और ब्रह्मा को रचता है, जो द्युलोक और पृथ्वी के बीच आकाश बनाते हैं; फिर अहंकार, पितरों, देवों और पाँच भूतों की सृष्टियों का वर्णन करते हैं, जिनमें से प्रत्येक के दिन और रात अलग हैं। अन्त में वे मन की चर्चा करते हैं, जो इन्द्रियों के द्वारा देखता है और सबका स्वामी है।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 1 (12.316.1)
अव्यक्तस्य नरश्रेष्ठ कालसङ्ख्यां निबोध मे । पञ्चकल्पसहस्राणि द्विगुणान्यहरुच्यते ॥
avyaktasya naraśreṣṭha kālasaṅkhyāṃ nibodha me | pañcakalpasahasrāṇi dviguṇānyaharucyate
हे नरश्रेष्ठ, अव्यक्त की कालगणना मुझसे सुनो—पाँच हज़ार कल्प, दुगुने किए हुए, उसका एक दिन कहा जाता है।
श्लोक 2 (12.316.2)
रात्रिरेतावती चास्य प्रतिबुद्धो नराधिप । सृजत्योषधिमेवाग्रे जीवनं सर्वदेहिनाम् ॥
rātriretāvatī cāsya pratibuddho narādhipa | sṛjatyoṣadhimevāgre jīvanaṃ sarvadehinām
उसकी रात भी उतनी ही लम्बी है। हे नराधिप, जागने पर वह सबसे पहले ओषधियों को रचता है, जो सब देहधारियों का जीवन हैं।
श्लोक 3 (12.316.3)
ततो ब्रह्माणमसृजद्धैरण्याण्डसमुद्भवम् । सा मूर्तिः सर्वभूतानामित्येवमनुशुश्रुम ॥
tato brahmāṇamasṛjaddhairaṇyāṇḍasamudbhavam | sā mūrtiḥ sarvabhūtānāmityevamanuśuśruma
तब उसने हिरण्य-अण्ड से उत्पन्न ब्रह्मा को रचा। वही सब प्राणियों की मूर्ति है—ऐसा हमने परम्परा से सुना है।
श्लोक 4 (12.316.4)
संवत्सरमुषित्वाण्डे निष्क्रम्य च महामुनिः । संदधेऽर्धं महीं कृत्स्नां दिवमर्धं प्रजापतिः ॥
saṃvatsaramuṣitvāṇḍe niṣkramya ca mahāmuniḥ | saṃdadhe'rdhaṃ mahīṃ kṛtsnāṃ divamardhaṃ prajāpatiḥ
एक वर्ष अण्ड में रहकर वह महामुनि प्रजापति बाहर निकला और उसने आधे को सारी पृथ्वी तथा आधे को द्युलोक के रूप में स्थापित किया।
श्लोक 5 (12.316.5)
द्यावापृथिव्योरित्येष राजन्वेदेषु पठ्यते । तयोः शकलयोर्मध्यमाकाशमकरोत्प्रभुः ॥
dyāvāpṛthivyorityeṣa rājanvedeṣu paṭhyate | tayoḥ śakalayormadhyamākāśamakarotprabhuḥ
हे राजन्, वेदों में "द्यावापृथिवी" का यही पाठ होता है। उन दोनों खण्डों के बीच प्रभु ने आकाश बनाया।
श्लोक 6 (12.316.6)
एतस्यापि च सङ्ख्यानं वेदवेदाङ्गपारगैः । दशकल्पसहस्राणि पादोनान्यहरुच्यते ॥
etasyāpi ca saṅkhyānaṃ vedavedāṅgapāragaiḥ | daśakalpasahasrāṇi pādonānyaharucyate
वेद और वेदाङ्गों के पारगामी इसकी भी गणना बताते हैं—इसका दिन दस हज़ार कल्पों में एक चौथाई कम कहा जाता है।
श्लोक 7 (12.316.7)
रात्रिमेतावतीं चास्य प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः । सृजत्यहंकारमृषिर्भूतं दिव्यात्मकं तथा ॥
rātrimetāvatīṃ cāsya prāhuradhyātmacintakāḥ | sṛjatyahaṃkāramṛṣirbhūtaṃ divyātmakaṃ tathā
आत्मचिन्तक कहते हैं कि इसकी रात भी उतनी ही है। ऋषि अहंकार की सृष्टि करता है, और वैसे ही एक दिव्य स्वभाव वाले भूत की भी।
श्लोक 8 (12.316.8)
चतुरश्चापरान्पुत्रान्देहात्पूर्वं महानृषिः । ते वै पितृभ्यः पितरः श्रूयन्ते राजसत्तम ॥
caturaścāparānputrāndehātpūrvaṃ mahānṛṣiḥ | te vai pitṛbhyaḥ pitaraḥ śrūyante rājasattama
देह के प्रकट होने से पहले उस महान् ऋषि ने चार और पुत्र रचे। हे राजसत्तम, वे पितरों के भी पितर सुने जाते हैं।
श्लोक 9 (12.316.9)
देवाः पितॄणां च सुता देवैर्लोकाः समावृताः । चराचरा नरश्रेष्ठ इत्येवमनुशुश्रुम ॥
devāḥ pitṝṇāṃ ca sutā devairlokāḥ samāvṛtāḥ | carācarā naraśreṣṭha ityevamanuśuśruma
देवता पितरों के पुत्र हैं और चर-अचर लोक देवताओं से व्याप्त हैं, हे नरश्रेष्ठ—ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 10 (12.316.10)
परमेष्ठी त्वहंकारोऽसृजद्भूतानि पञ्चधा । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥
parameṣṭhī tvahaṃkāro'sṛjadbhūtāni pañcadhā | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam
परमेष्ठी अहंकार ने भूतों को पाँच प्रकार से रचा—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ ज्योति।
श्लोक 11 (12.316.11)
एतस्यापि निशामाहुस्तृतीयमथ कुर्वतः । पञ्च कल्पसहस्राणि तावदेवाहरुच्यते ॥
etasyāpi niśāmāhustṛtīyamatha kurvataḥ | pañca kalpasahasrāṇi tāvadevāharucyate
इसके लिए भी, जब वह तीसरी सृष्टि करता है, रात का परिमाण बताया जाता है; पाँच हज़ार कल्प, और उतना ही उसका दिन कहा जाता है।
श्लोक 12 (12.316.12)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु ॥
śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhaśca pañcamaḥ | ete viśeṣā rājendra mahābhūteṣu pañcasu
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—हे राजेन्द्र, ये पाँच महाभूतों के विशेष गुण हैं,
श्लोक 13 (12.316.13)
यैराविष्टानि भूतानि अहन्यहनि पार्थिव । अन्योन्यं स्पृहयन्त्येते अन्योन्यस्याहिते रताः ॥
yairāviṣṭāni bhūtāni ahanyahani pārthiva | anyonyaṃ spṛhayantyete anyonyasyāhite ratāḥ
जिनसे आविष्ट होकर प्राणी, हे राजन्, प्रतिदिन एक-दूसरे की लालसा करते हैं और एक-दूसरे के अहित में लगे रहते हैं।
श्लोक 14 (12.316.14)
अन्योन्यमतिवर्तन्ते अन्योन्यस्पर्धिनस्तथा । ते वध्यमाना ह्यन्योन्यं गुणैर्हारिभिरव्ययाः ॥
anyonyamativartante anyonyaspardhinastathā | te vadhyamānā hyanyonyaṃ guṇairhāribhiravyayāḥ
वे एक-दूसरे का अतिक्रमण करते हैं और एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं। अपने मनोहर गुणों द्वारा एक-दूसरे को पीड़ित करते हुए, अविनाशी स्वभाव वाले होकर भी,
श्लोक 15 (12.316.15)
इहैव परिवर्तन्ते तिर्यग्योनिप्रवेशिनः । त्रीणि कल्पसहस्राणि एतेषामहरुच्यते ॥
ihaiva parivartante tiryagyonipraveśinaḥ | trīṇi kalpasahasrāṇi eteṣāmaharucyate
वे यहीं घूमते रहते हैं और पशु-योनियों में प्रवेश करते हैं। इनका दिन तीन हज़ार कल्प का कहा जाता है;
श्लोक 16 (12.316.16)
रात्रिरेतावती चैव मनसश्च नराधिप । मनश्चरति राजेन्द्र चरितं सर्वमिन्द्रियैः ॥
rātriretāvatī caiva manasaśca narādhipa | manaścarati rājendra caritaṃ sarvamindriyaiḥ
और उनकी रात भी उतनी ही है, और मन की भी, हे नराधिप। हे राजेन्द्र, मन विचरता है, और जो कुछ विचरा जाता है वह सब इन्द्रियों के द्वारा होता है।
श्लोक 17 (12.316.17)
न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति । चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा ॥
na cendriyāṇi paśyanti mana evātra paśyati | cakṣuḥ paśyati rūpāṇi manasā tu na cakṣuṣā
इन्द्रियाँ नहीं देखतीं; यहाँ मन ही देखता है। नेत्र रूपों को देखता है—परन्तु मन से, नेत्र से नहीं।
श्लोक 18 (12.316.18)
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति । अथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ॥
manasi vyākule cakṣuḥ paśyannapi na paśyati | athendriyāṇi sarvāṇi paśyantītyabhicakṣate
मन के व्याकुल होने पर नेत्र देखते हुए भी नहीं देखता। इसी प्रकार सब इन्द्रियों के विषय में कहा जाता है कि वे देखती हैं।
श्लोक 19 (12.316.19)
मनस्युपरते राजन्निन्द्रियोपरमो भवेत् ॥
manasyuparate rājannindriyoparamo bhavet
हे राजन्, मन के शान्त होने पर इन्द्रियाँ भी शान्त हो जाती हैं।
श्लोक 20 (12.316.20)
न चेन्द्रियव्युपरमे मनस्युपरमो भवेत् । एवं मनः प्रधानानि इन्द्रियाणि प्रभावयेत् ॥
na cendriyavyuparame manasyuparamo bhavet | evaṃ manaḥ pradhānāni indriyāṇi prabhāvayet
परन्तु इन्द्रियों के शान्त होने पर मन का शान्त होना आवश्यक नहीं। इस प्रकार इन्द्रियों को मन-प्रधान समझना चाहिए।
श्लोक 21 (12.316.21)
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते । एतद्विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महायशः ॥
indriyāṇāṃ tu sarveṣāmīśvaraṃ mana ucyate | etadviśanti bhūtāni sarvāṇīha mahāyaśaḥ
मन को सब इन्द्रियों का स्वामी कहा जाता है। हे महायशस्वी, सब प्राणी यहाँ इसी में प्रवेश करते हैं।