शान्ति पर्व · अध्याय 317
जगत् का प्रलय
याज्ञवल्क्य सृष्टि से प्रलय की ओर आते हैं। अव्यक्त के दिन के अन्त में बारह रूप धारण किया हुआ सूर्य सब प्राणियों को जला डालता है; पृथ्वी कछुए की पीठ के समान हो जाती है और जल से भर जाती है, जिसे अग्नि पी लेती है, वायु भक्षण करता है, आकाश निगल लेता है, और फिर मन, अहंकार तथा अन्त में सर्वव्यापी परमेश्वर क्रम से उन्हें अपने में समेट लेते हैं। अन्त में वे अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत के उपदेश की घोषणा करते हैं।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 1 (12.317.1)
तत्त्वानां सर्गसङ्ख्या च कालसङ्ख्या तथैव च । मया प्रोक्ताऽनुपूर्वेण संहारमपि मे शृणु ॥
tattvānāṃ sargasaṅkhyā ca kālasaṅkhyā tathaiva ca | mayā proktā'nupūrveṇa saṃhāramapi me śṛṇu
तत्त्वों के सर्गों की संख्या और काल की गणना मैंने तुम्हें क्रम से बता दी। अब मुझसे संहार के विषय में भी सुनो,
श्लोक 2 (12.317.2)
यथा संहरते जन्तून्ससर्ज च पुनः पुनः । अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च ॥
yathā saṃharate jantūnsasarja ca punaḥ punaḥ | anādinidhano brahmā nityaścākṣara eva ca
कि आदि और अन्त से रहित, नित्य और अविनाशी ब्रह्मा किस प्रकार प्राणियों का संहार करता है और बार-बार फिर उनकी सृष्टि करता है।
श्लोक 3 (12.317.3)
अहःक्षयमथो बुद्ध्वा निशि स्वप्नमनास्तथा । चोदयामास भगवानव्यक्तोऽहंकृतं नरम् ॥
ahaḥkṣayamatho buddhvā niśi svapnamanāstathā | codayāmāsa bhagavānavyakto'haṃkṛtaṃ naram
दिन का अन्त जानकर और रात में सोने की ओर मन लगाकर भगवान् अव्यक्त अहंकार से बने पुरुष को प्रेरित करता है।
श्लोक 4 (12.317.4)
ततः शतसहस्रांशुरव्यक्तेनाभिचोदितः । कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानमादित्यो ज्वलदग्निवत् ॥
tataḥ śatasahasrāṃśuravyaktenābhicoditaḥ | kṛtvā dvādaśadhā''tmānamādityo jvaladagnivat
तब वह लाख किरणों वाला आदित्य, अव्यक्त से प्रेरित होकर, अपने को बारह रूपों में करके, जलती अग्नि के समान,
श्लोक 5 (12.317.5)
चतुर्विधं प्रजाजातं निर्दहत्याशु तेजसा । जराय्वण्डस्वेदजातमुद्भिज्जं च नराधिप ॥
caturvidhaṃ prajājātaṃ nirdahatyāśu tejasā | jarāyvaṇḍasvedajātamudbhijjaṃ ca narādhipa
हे नराधिप, अपने तेज से चार प्रकार के प्राणिसमूह को शीघ्र जला देता है—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज को।
श्लोक 6 (12.317.6)
एतदुन्मेषमात्रेण विनष्टं स्थाणुजङ्गमम् । कूर्मपृष्ठसमा भूमिर्भवत्यथ समन्ततः ॥
etadunmeṣamātreṇa vinaṣṭaṃ sthāṇujaṅgamam | kūrmapṛṣṭhasamā bhūmirbhavatyatha samantataḥ
पलक झपकते ही यह सारा स्थावर-जङ्गम नष्ट हो जाता है और पृथ्वी चारों ओर कछुए की पीठ के समान हो जाती है।
श्लोक 7 (12.317.7)
जगद्दग्ध्वाऽमितबलः केवलां जगतीं ततः । अम्भसा बलिना क्षिप्रमापूरयति सर्वशः ॥
jagaddagdhvā'mitabalaḥ kevalāṃ jagatīṃ tataḥ | ambhasā balinā kṣipramāpūrayati sarvaśaḥ
जगत् को जलाकर वह अपार बलशाली फिर उस सूनी पृथ्वी को सब ओर से प्रबल जल से शीघ्र भर देता है।
श्लोक 8 (12.317.8)
ततः कालाग्निमासाद्य तदम्भो याति संक्षयम् । विनष्टेऽम्भसि राजेन्द्र जाज्वलत्यनलो महान् ॥
tataḥ kālāgnimāsādya tadambho yāti saṃkṣayam | vinaṣṭe'mbhasi rājendra jājvalatyanalo mahān
तब वह जल कालाग्नि को पाकर नष्ट हो जाता है। हे राजेन्द्र, जल के नष्ट हो जाने पर महान् अग्नि प्रज्वलित हो उठती है।
श्लोक 9 (12.317.9)
तमप्रमेयातिबलं ज्वलमानं विभावसुम् । ऊष्माणं सर्वभूतानां सप्तार्चिषमथाञ्जसा ॥
tamaprameyātibalaṃ jvalamānaṃ vibhāvasum | ūṣmāṇaṃ sarvabhūtānāṃ saptārciṣamathāñjasā
उस अप्रमेय, अत्यन्त बलवान्, जलती हुई, सब प्राणियों की ऊष्मा-रूप, सात ज्वालाओं वाली अग्नि को
श्लोक 10 (12.317.10)
भक्षयामास भगवान्वायुरष्टात्मको बली । विचरन्नमितप्राणस्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ॥
bhakṣayāmāsa bhagavānvāyuraṣṭātmako balī | vicarannamitaprāṇastiryagūrdhvamadhastathā
आठ रूपों वाला बलवान् भगवान् वायु खा जाता है, जो अपरिमित वेग से तिरछे, ऊपर और नीचे विचरता है।
श्लोक 11 (12.317.11)
तमप्रतिबलं भीममाकाशं ग्रसते पुनः । आकाशमप्यभिनदन्मनो ग्रसति चारिकम् ॥
tamapratibalaṃ bhīmamākāśaṃ grasate punaḥ | ākāśamapyabhinadanmano grasati cārikam
उस अप्रतिम बलशाली भयंकर वायु को फिर आकाश निगल लेता है; और विचरने वाला मन उस गूँजते हुए आकाश को भी निगल लेता है।
श्लोक 12 (12.317.12)
मनो ग्रसति सर्वात्मा सोहंकारः प्रजापतिः । अहंकारो महानात्मा भूतभव्यभविष्यवित् ॥
mano grasati sarvātmā sohaṃkāraḥ prajāpatiḥ | ahaṃkāro mahānātmā bhūtabhavyabhaviṣyavit
सबका आत्मा—वह अहंकार, प्रजापति—मन को निगल लेता है। और अहंकार वह महान् आत्मा है जो भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाला है।
श्लोक 13 (12.317.13)
तमप्यनुपमात्मानं विश्वं शंभुः प्रजापतिः । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥
tamapyanupamātmānaṃ viśvaṃ śaṃbhuḥ prajāpatiḥ | aṇimā laghimā prāptirīśāno jyotiravyayaḥ
और उस अनुपम आत्मा को भी, जो विश्व है, शम्भु और प्रजापति है, जो अणिमा, लघिमा और प्राप्ति है, ईशान और अव्यय ज्योति है—
श्लोक 14 (12.317.14)
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvatokṣiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati
जिसके हाथ-पैर सब ओर हैं, जिसके नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं, जिसके कान लोक में सब ओर हैं, वह सबको व्याप्त करके स्थित है।
श्लोक 15 (12.317.15)
हृदयं सर्वभूतानां पर्वणाऽङ्गुष्ठमात्रकः । अणुग्रसत्यनन्तो हि महात्मा विश्वमीश्वरः ॥
hṛdayaṃ sarvabhūtānāṃ parvaṇā'ṅguṣṭhamātrakaḥ | aṇugrasatyananto hi mahātmā viśvamīśvaraḥ
वह सब प्राणियों के हृदय में पर्व पर अँगूठे के बराबर होकर रहता है। सूक्ष्म होकर भी अनन्त वह महात्मा ईश्वर विश्व को निगल लेता है।
श्लोक 16 (12.317.16)
ततः समभवत्सर्वमक्षयाव्ययमव्रणम् । भूतभव्यभविष्याणां स्रष्टारमनघं तथा ॥
tataḥ samabhavatsarvamakṣayāvyayamavraṇam | bhūtabhavyabhaviṣyāṇāṃ sraṣṭāramanaghaṃ tathā
तब सब कुछ हुआ—अक्षय, अव्यय और निर्दोष—और वैसे ही भूत, वर्तमान तथा भविष्य के निष्पाप स्रष्टा भी।
श्लोक 17 (12.317.17)
एषोप्ययस्ते राजेन्द्र यथावत्समुदाहृतः । अध्यात्ममधिभूतं च श्रूयतां चाधिदैवतम् ॥
eṣopyayaste rājendra yathāvatsamudāhṛtaḥ | adhyātmamadhibhūtaṃ ca śrūyatāṃ cādhidaivatam
हे राजेन्द्र, इस प्रकार संहार का यथावत् वर्णन तुमसे किया गया। अब अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत को सुनो।