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शान्ति पर्व · अध्याय 319

तीनों गुणों की गतियाँ; जनक का मोक्ष के विषय में प्रश्न

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि प्रधान के तीनों गुण सारे जगत् में रहते हैं, और सात्त्विक, राजस तथा तामस के स्थान क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम हैं। वे प्रत्येक गुण या उनके मेल से युक्त जीवों की गतियाँ और पुण्य-पाप से मुक्त लोगों की निर्मल अवस्था बताते हैं। तब जनक पूछते हैं कि दो अनादि तत्त्वों में एक अचेतन और दूसरा चेतन कैसे है, और वे साङ्ख्य, योग तथा मृत्यु-लक्षणों सहित मोक्ष-धर्म का पूरा उपदेश माँगते हैं।

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याज्ञवल्क्य उवाच

श्लोक 1 (12.319.1)

एते प्रधानस्य गुणास्त्रयः पुरुषसत्तम । कृत्स्नस्य चैव जगतस्तिष्ठन्त्यनपगाः सदा ॥

ete pradhānasya guṇāstrayaḥ puruṣasattama | kṛtsnasya caiva jagatastiṣṭhantyanapagāḥ sadā

हे पुरुषश्रेष्ठ, प्रधान के ये तीन गुण सारे जगत् में सदा अविछिन्न रूप से रहते हैं।

श्लोक 2 (12.319.2)

अव्यक्तरूपो भगवाञ्शतधा च सहस्रधा । शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥

avyaktarūpo bhagavāñśatadhā ca sahasradhā | śatadhā sahasradhā caiva tathā śatasahasradhā

अव्यक्त रूप वाला भगवान् सौ प्रकार से और हज़ार प्रकार से; सौ, हज़ार और लाख प्रकार से—

श्लोक 3 (12.319.3)

कोटिशश्च करोत्येव प्रकृत्याऽऽत्मानमात्मना । सात्विकस्योत्तमं स्थानं राजसस्येह मध्यमम् ॥

koṭiśaśca karotyeva prakṛtyā''tmānamātmanā | sātvikasyottamaṃ sthānaṃ rājasasyeha madhyamam

करोड़ों प्रकार से वह स्वयं अपने को प्रकृति के द्वारा रचता है। सात्त्विक का स्थान उत्तम है, यहाँ राजस का मध्यम,

श्लोक 4 (12.319.4)

तामसस्याधमं स्थानं प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः । केवलेनेह पुण्येन गतिमूर्ध्वामवाप्नुयात् ॥

tāmasasyādhamaṃ sthānaṃ prāhuradhyātmacintakāḥ | kevaleneha puṇyena gatimūrdhvāmavāpnuyāt

और तामस का स्थान अधम है, ऐसा अध्यात्म का चिन्तन करने वाले कहते हैं। केवल पुण्य से ही मनुष्य ऊर्ध्व गति पाता है;

श्लोक 5 (12.319.5)

पुण्यपापेन मानुष्यमधर्मेणाप्यधोगतिम् । द्वन्द्वमेषां त्रयाणां तु सन्निपातं च तत्वतः ॥

puṇyapāpena mānuṣyamadharmeṇāpyadhogatim | dvandvameṣāṃ trayāṇāṃ tu sannipātaṃ ca tatvataḥ

पुण्य और पाप के मेल से मनुष्य-योनि मिलती है; अधर्म से अधोगति। और इन तीनों के जोड़ों तथा उनके संयोग को, यथार्थ रूप में—

श्लोक 6 (12.319.6)

सत्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे । सत्वस्य तु रजो दृष्टं रजसश्च तमस्तथा ॥

satvasya rajasaścaiva tamasaśca śṛṇuṣva me | satvasya tu rajo dṛṣṭaṃ rajasaśca tamastathā

सत्त्व, रज और तम के—मुझसे सुनो। सत्त्व के बाद रज देखा जाता है और रज के बाद तम;

श्लोक 7 (12.319.7)

तमसश्च तथा सत्वं सत्वस्याव्यक्तमेव च । अव्यक्तः सत्वसंयुक्तो देवलोकमवाप्नुयात् ॥

tamasaśca tathā satvaṃ satvasyāvyaktameva ca | avyaktaḥ satvasaṃyukto devalokamavāpnuyāt

और वैसे ही तम के बाद सत्त्व, और सत्त्व के बाद अव्यक्त। सत्त्व से युक्त अव्यक्त स्वरूप जीव देवलोक को प्राप्त करता है;

श्लोक 8 (12.319.8)

रजःसत्वसमायुक्तो मानुषेषु प्रपद्यते । रजस्तमोभ्यां संयुक्तस्तिर्यग्योनिषु जायते ॥

rajaḥsatvasamāyukto mānuṣeṣu prapadyate | rajastamobhyāṃ saṃyuktastiryagyoniṣu jāyate

रज और सत्त्व से युक्त होकर वह मनुष्यों में जन्म लेता है; रज और तम से युक्त होकर पशु-योनियों में उत्पन्न होता है;

श्लोक 9 (12.319.9)

राजसैस्तामसैः सत्वैर्युक्तो मानुषमाप्नुयात् । पुण्यपापवियुक्तानां स्थानमाहुर्महात्मनाम् ॥

rājasaistāmasaiḥ satvairyukto mānuṣamāpnuyāt | puṇyapāpaviyuktānāṃ sthānamāhurmahātmanām

राजस, तामस और सात्त्विक तीनों से युक्त होकर वह मनुष्य-योनि पाता है। जो पुण्य और पाप से मुक्त हैं उन महात्माओं के लिए वे एक स्थान बताते हैं—

श्लोक 10 (12.319.10)

शाश्वतं चाव्ययं चैवमक्षयं चामृतं च तत् । ज्ञानिनां संभवं श्रेष्ठं स्थानमव्रणमच्युतम् । अतीन्द्रियमबीजं च जन्ममृत्युतमोनुदम् ॥

śāśvataṃ cāvyayaṃ caivamakṣayaṃ cāmṛtaṃ ca tat | jñānināṃ saṃbhavaṃ śreṣṭhaṃ sthānamavraṇamacyutam | atīndriyamabījaṃ ca janmamṛtyutamonudam

वह शाश्वत, अविकारी, अक्षय और अमृत है, ज्ञानियों का परम उद्गम, निर्दोष और अपतनशील स्थान, इन्द्रियों से परे, बीज से रहित, जो जन्म और मृत्यु के अन्धकार को दूर करने वाला है।

श्लोक 11 (12.319.11)

अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप । स एव प्रकृतिस्थो हि तत्स्थ इत्यभिधीयते ॥

avyaktasthaṃ paraṃ yattatpṛṣṭaste'haṃ narādhipa | sa eva prakṛtistho hi tatstha ityabhidhīyate

जो परम तत्त्व अव्यक्त में स्थित है—हे नराधिप, उसी के विषय में तुमने मुझसे पूछा है। वही प्रकृति में स्थित होकर "तत्स्थ" कहा जाता है।

श्लोक 12 (12.319.12)

अचेतना चैव मता प्रकृतिश्चापि पार्थिव । एतेनाधिष्ठिता चैव सृजते संहरत्यपि ॥

acetanā caiva matā prakṛtiścāpi pārthiva | etenādhiṣṭhitā caiva sṛjate saṃharatyapi

हे राजन्, प्रकृति भी अचेतन मानी गई है, और उससे अधिष्ठित होकर वह सृष्टि भी करती है और संहार भी।

जनक उवाच

श्लोक 13 (12.319.13)

अनादिनिधनावेतावुभावेव महामते । अमूर्तिमन्तावचलावप्रकम्प्यगुणागुणौ ॥

anādinidhanāvetāvubhāveva mahāmate | amūrtimantāvacalāvaprakampyaguṇāguṇau

हे महामति, ये दोनों ही अनादि और अनन्त हैं—अमूर्त, अचल, अकम्प्य, गुणवान् भी और गुणहीन भी।

श्लोक 14 (12.319.14)

अग्राह्यावृषिशार्दूल कथमेको ह्यचेतनः । चेतनावांस्तथा चैकः क्षेत्रज्ञ इति भाषितः ॥

agrāhyāvṛṣiśārdūla kathameko hyacetanaḥ | cetanāvāṃstathā caikaḥ kṣetrajña iti bhāṣitaḥ

हे ऋषिश्रेष्ठ, दोनों अग्राह्य हैं; फिर उनमें एक अचेतन कैसे है, और दूसरा चेतनावान् और क्षेत्रज्ञ कैसे कहा गया है?

श्लोक 15 (12.319.15)

त्वं हि विप्रेन्द्र कार्त्स्न्येन मोक्षधर्ममुपाससे । साकल्यं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

tvaṃ hi viprendra kārtsnyena mokṣadharmamupāsase | sākalyaṃ mokṣadharmasya śrotumicchāmi tattvataḥ

हे विप्रेन्द्र, आप सम्पूर्ण रूप से मोक्षधर्म का अनुसरण करते हैं। मैं मोक्षधर्म का सम्पूर्ण उपदेश यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 16 (12.319.16)

निस्तत्वं केवलत्वं च विनाभावं तथैव च । दैवतानि च मे ब्रूहि देहं यान्याश्रितानि वै ॥

nistatvaṃ kevalatvaṃ ca vinābhāvaṃ tathaiva ca | daivatāni ca me brūhi dehaṃ yānyāśritāni vai

तत्त्वहीनता, केवलत्व और वियोग के विषय में मुझे बताइए, तथा उन देवताओं के विषय में भी जो शरीर में आश्रित हैं।

श्लोक 17 (12.319.17)

तथैवोत्क्रमणस्थानं देहिनो वै विपद्यतः । कालेन यद्धि प्राप्नोति स्थानं तत्प्रब्रवीहि मे ॥

tathaivotkramaṇasthānaṃ dehino vai vipadyataḥ | kālena yaddhi prāpnoti sthānaṃ tatprabravīhi me

और वैसे ही मरते हुए देहधारी के प्रस्थान का स्थान भी—जिस स्थान को वह काल के अनुसार प्राप्त करता है, वह मुझे बताइए।

श्लोक 18 (12.319.18)

साङ्ख्यज्ञानं च तत्त्वेन पृथग्योगं तथैव च । अरिष्टानि च तत्त्वानि वक्तुमर्हसि सत्तम । विदितं सर्वमेतत्ते पाणावामलकं यथा ॥

sāṅkhyajñānaṃ ca tattvena pṛthagyogaṃ tathaiva ca | ariṣṭāni ca tattvāni vaktumarhasi sattama | viditaṃ sarvametatte pāṇāvāmalakaṃ yathā

साङ्ख्य का ज्ञान यथार्थ रूप में, और योग को पृथक् मार्ग के रूप में, तथा अरिष्टों (मृत्यु-लक्षणों) को उनके सच्चे स्वरूप में—हे सत्तम, आप इन्हें बताने में समर्थ हैं। यह सब आपको हथेली पर रखे आँवले के समान ज्ञात है।

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