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शान्ति पर्व · अध्याय 320

याज्ञवल्क्य का साङ्ख्य-उपदेश: अव्यक्त और पुरुष

याज्ञवल्क्य समझाते हैं कि निर्गुण को सगुण कैसे कहा जाता है: अव्यक्त गुणों के बीच क्रिया करता है और अज्ञान के कारण स्वयं को सर्वोच्च मानता है, जबकि पुरुष वस्तुतः उससे भिन्न है। वे इस भेद को मुञ्ज और सींक, मच्छर और गूलर, मछली और जल, अग्नि और उसके पात्र, तथा कमल और जल के उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं। जो इसे देख लेते हैं वे कैवल्य को प्राप्त होते हैं, और याज्ञवल्क्य आगे योग का उपदेश देने की घोषणा करते हैं।

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याज्ञवल्क्य उवाच

श्लोक 1 (12.320.1)

न शक्यो निर्गुणस्तात गुणीकर्तुं विशांपते । गुणवांश्चाप्यगुणवान्यथातत्त्वं निबोध मे ॥

na śakyo nirguṇastāta guṇīkartuṃ viśāṃpate | guṇavāṃścāpyaguṇavānyathātattvaṃ nibodha me

हे तात, हे विशाम्पते, जो निर्गुण है उसे गुणवान् नहीं बनाया जा सकता। वह गुणवान् भी कैसे है और गुणहीन भी, यह मुझसे यथार्थ रूप में सुनो।

श्लोक 2 (12.320.2)

गुणैर्हि गुणवानेव निर्गुणश्चागुणस्तथा । प्राहुरेवं महात्मानो मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥

guṇairhi guṇavāneva nirguṇaścāguṇastathā | prāhurevaṃ mahātmāno munayastattvadarśinaḥ

गुणों के कारण ही कोई गुणवान् होता है, और उसी प्रकार निर्गुण तथा गुणहीन भी कहा जाता है। तत्त्व को देखने वाले महात्मा मुनि ऐसा कहते हैं।

श्लोक 3 (12.320.3)

गुणस्वभावस्त्वव्यक्तो गुणानेवाभिवर्तते । उपयुङ्क्ते च तानेव स चैवाज्ञः स्वभावतः ॥

guṇasvabhāvastvavyakto guṇānevābhivartate | upayuṅkte ca tāneva sa caivājñaḥ svabhāvataḥ

अव्यक्त, जिसका स्वभाव गुणमय है, गुणों के बीच ही विचरता है और उन्हीं का उपयोग करता है; और वह स्वभाव से ही अज्ञ है।

श्लोक 4 (12.320.4)

अव्यक्तस्तु न जानीते पुरुषोऽज्ञः स्वभावतः । न मत्तः परमोस्तीति नित्यमेवाभिमन्यते ॥

avyaktastu na jānīte puruṣo'jñaḥ svabhāvataḥ | na mattaḥ paramostīti nityamevābhimanyate

पर अव्यक्त नहीं जानता; पुरुष स्वभाव से अज्ञ है और सदा यही मानता है कि "मुझसे बढ़कर कोई नहीं है।"

श्लोक 5 (12.320.5)

अनेन कारणेनैतदव्यक्तं स्यादचेतनम् । नित्यत्वाच्चाक्षरत्वाच्च क्षरत्वान्न तदन्यथा ॥

anena kāraṇenaitadavyaktaṃ syādacetanam | nityatvāccākṣaratvācca kṣaratvānna tadanyathā

इसी कारण यह अव्यक्त अचेतन होना चाहिए—नित्य और अक्षर होने से, और क्षरणशील होने से भी; यह अन्यथा नहीं है।

श्लोक 6 (12.320.6)

यदाऽज्ञानेन कुर्वीत गुणसर्गं पुनःपुनः । यदात्मानं न जानीते तदाऽऽत्मापि न मुच्यते ॥

yadā'jñānena kurvīta guṇasargaṃ punaḥpunaḥ | yadātmānaṃ na jānīte tadā''tmāpi na mucyate

जब अज्ञान से मनुष्य बार-बार गुणों की सृष्टि करता है और जब वह आत्मा को नहीं जानता, तब आत्मा भी मुक्त नहीं होता।

श्लोक 7 (12.320.7)

कर्तृत्वाच्चापि सर्गाणां सर्गधर्मा तथोच्यते । कर्तृत्वाच्चापि योगानां योगधर्मा तथोच्यते ॥

kartṛtvāccāpi sargāṇāṃ sargadharmā tathocyate | kartṛtvāccāpi yogānāṃ yogadharmā tathocyate

सर्गों का कर्ता होने से इसे सर्गधर्मा कहा जाता है; और योगों का कर्ता होने से इसी प्रकार योगधर्मा कहा जाता है।

श्लोक 8 (12.320.8)

कर्तृत्वात्प्रकृतीनां च तथा प्रकृतिधर्मिता ॥

kartṛtvātprakṛtīnāṃ ca tathā prakṛtidharmitā

प्रकृतियों का कर्ता होने से यह उसी प्रकार प्रकृति-धर्म वाला भी है।

श्लोक 9 (12.320.9)

कर्तृत्वाच्चापि बीजानां बीजधर्मा तथोच्यते । गुणानां प्रसवत्वाच्च प्रलयत्वात्तथैव च ॥

kartṛtvāccāpi bījānāṃ bījadharmā tathocyate | guṇānāṃ prasavatvācca pralayatvāttathaiva ca

बीजों का कर्ता होने से इसे बीजधर्मा कहा जाता है; गुणों का प्रसव होने से और वैसे ही प्रलय होने से भी,

श्लोक 10 (12.320.10)

कर्तृत्वात्प्रलयानां तु तथा प्रलयधर्मि च । कर्तृत्वात्प्रभवाणां च तथा प्रभवधर्मि च ॥

kartṛtvātpralayānāṃ tu tathā pralayadharmi ca | kartṛtvātprabhavāṇāṃ ca tathā prabhavadharmi ca

प्रलयों का कर्ता होने से यह प्रलयधर्मा है, और उद्भवों का कर्ता होने से उसी प्रकार प्रभवधर्मा भी;

श्लोक 11 (12.320.11)

बीजत्वात्प्रकृतित्वाच्च प्रलयत्वात्तथैव च । उपेक्षत्वादनन्यत्वादभिमानाच्च केवलम् ॥

bījatvātprakṛtitvācca pralayatvāttathaiva ca | upekṣatvādananyatvādabhimānācca kevalam

बीज होने से, प्रकृति होने से और वैसे ही प्रलय होने से; उपेक्षक होने से, अन्य न होने से, और केवल अभिमान से भी—

श्लोक 12 (12.320.12)

मन्यन्ते यतयः सिद्धा अध्यात्मज्ञा गतज्वराः । अनित्यं नित्यमव्यक्तं व्यक्तमेतद्धि शुश्रुम ॥

manyante yatayaḥ siddhā adhyātmajñā gatajvarāḥ | anityaṃ nityamavyaktaṃ vyaktametaddhi śuśruma

ऐसा प्रयत्नशील यति, सिद्ध, अध्यात्म के ज्ञाता और ताप से मुक्त लोग मानते हैं। और हमने सुना है कि यह अनित्य भी है और नित्य भी, अव्यक्त भी और व्यक्त भी।

श्लोक 13 (12.320.13)

अव्यक्तैकत्वमित्याहुर्नानात्वं पुरुषास्तथा । सर्वभूतदयावन्तः केवलं ज्ञानमास्थिताः ॥

avyaktaikatvamityāhurnānātvaṃ puruṣāstathā | sarvabhūtadayāvantaḥ kevalaṃ jñānamāsthitāḥ

सब प्राणियों पर दया करने वाले और केवल ज्ञान में स्थित लोग अव्यक्त की एकता और पुरुषों की अनेकता बताते हैं।

श्लोक 14 (12.320.14)

अन्यः स पुरुषोऽव्यक्तस्त्वध्रुवो ध्रुवसंज्ञकः । यथा मुञ्ज इषीकाणां तथैवैतद्धि जायते । न चैव मुञ्जसंयोगादिषीका तत्र बुध्यते ॥

anyaḥ sa puruṣo'vyaktastvadhruvo dhruvasaṃjñakaḥ | yathā muñja iṣīkāṇāṃ tathaivaitaddhi jāyate | na caiva muñjasaṃyogādiṣīkā tatra budhyate

वह पुरुष अव्यक्त से भिन्न है, जो अस्थिर होकर भी स्थिर नाम से कहा जाता है। जैसे मुञ्ज और उसकी सींक होती है, वैसे ही यह उत्पन्न होता है; और वहाँ सींक को मुञ्ज के संयोग का बोध नहीं होता।

श्लोक 15 (12.320.15)

अन्यच्च मशकं विद्यादन्यच्चोदुम्बरं तथा । न चोदुम्बरसंयोगैर्मशकस्तत्र लिप्यते ॥

anyacca maśakaṃ vidyādanyaccodumbaraṃ tathā | na codumbarasaṃyogairmaśakastatra lipyate

मच्छर को एक वस्तु जानो और गूलर को दूसरी; और वहाँ रहने वाला मच्छर गूलर के संसर्ग से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 16 (12.320.16)

अन्य एव तथा मत्स्यस्तदन्यदुदकं स्मृतम् । न चोदकस्य स्पर्शेन मत्स्यो लिप्यति सर्वशः ॥

anya eva tathā matsyastadanyadudakaṃ smṛtam | na codakasya sparśena matsyo lipyati sarvaśaḥ

मछली एक वस्तु है और जल दूसरा माना गया है; और जल के स्पर्श से मछली किसी प्रकार लिप्त नहीं होती।

श्लोक 17 (12.320.17)

अन्यो ह्यग्निरुखाऽप्यन्या नित्यमेवमवेहि भोः । न चोपलिप्यते सोऽग्निरुखासंस्पर्शनेन वै ॥

anyo hyagnirukhā'pyanyā nityamevamavehi bhoḥ | na copalipyate so'gnirukhāsaṃsparśanena vai

अग्नि एक वस्तु है और पात्र दूसरा—हे भद्र, इसे सदा ऐसा जानो। और वह अग्नि पात्र के संसर्ग से लिप्त नहीं होती।

श्लोक 18 (12.320.18)

पुष्करं त्वन्यदेवात्र तथाऽन्यदुदकं स्मृतम् । न चोदकस्य स्पर्शेन लिप्यते तत्र पुष्करम् ॥

puṣkaraṃ tvanyadevātra tathā'nyadudakaṃ smṛtam | na codakasya sparśena lipyate tatra puṣkaram

यहाँ कमल एक वस्तु है और जल दूसरा माना गया है; और जल के स्पर्श से कमल लिप्त नहीं होता।

श्लोक 19 (12.320.19)

एतेषां सहवासं च निवासं चैव नित्यशः । याथातथ्येन पश्यन्ति न नित्यं प्राकृता जनाः ॥

eteṣāṃ sahavāsaṃ ca nivāsaṃ caiva nityaśaḥ | yāthātathyena paśyanti na nityaṃ prākṛtā janāḥ

साधारण लोग इनके सहवास और निवास को सदा उसके यथार्थ रूप में नहीं देखते।

श्लोक 20 (12.320.20)

ये त्वन्यथैव पश्यन्ति न सम्यक्तेषु दर्शनम् । ते व्यक्तं निरयं घोरं प्रविशन्ति पुनः पुनः ॥

ye tvanyathaiva paśyanti na samyakteṣu darśanam | te vyaktaṃ nirayaṃ ghoraṃ praviśanti punaḥ punaḥ

जो इससे भिन्न रूप में देखते हैं उनकी दृष्टि सही नहीं है; वे बार-बार प्रत्यक्ष घोर नरक में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 21 (12.320.21)

साङ्ख्यदर्शनमेतत्ते परिसङ्ख्यानमुत्तमम् । एवं हि परिसंख्याय साङ्ख्याः केवलतां गताः ॥

sāṅkhyadarśanametatte parisaṅkhyānamuttamam | evaṃ hi parisaṃkhyāya sāṅkhyāḥ kevalatāṃ gatāḥ

यह साङ्ख्य-दर्शन मैंने तुम्हारे सामने रखा—परम गणना। इस प्रकार गणना करके साङ्ख्यवादी कैवल्य को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 22 (12.320.22)

ये त्वन्ये तत्त्वकुशलास्तेषामेतन्निदर्शनम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि योगानामनुदर्शनम् ॥

ye tvanye tattvakuśalāsteṣāmetannidarśanam | ataḥ paraṃ pravakṣyāmi yogānāmanudarśanam

जो अन्य लोग तत्त्वों में कुशल हैं, उनके लिए यह उदाहरण है। इसके आगे मैं योगों के दर्शन का उपदेश करूँगा।

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