शान्ति पर्व · अध्याय 321
याज्ञवल्क्य का जनक को योग का उपदेश
सांख्य का वर्णन पूरा करके याज्ञवल्क्य योग का उपदेश आरम्भ करते हैं और राजा जनक से कहते हैं कि सांख्य और योग वस्तुतः एक ही हैं। वे योग-साधना के दो रूप—मन की धारणा और प्राणायाम—बताते हैं, और समझाते हैं कि योगी इन्द्रियों को मन में, मन को अहंकार में, अहंकार को बुद्धि में और बुद्धि को प्रकृति में लीन करके शुद्ध पुरुष का ध्यान करता है। फिर वे योगयुक्त पुरुष के लक्षण बताते हैं—निश्चल दीपक, वर्षा की बूँदों से अविचल चट्टान और तेल से भरा पात्र लेकर सीढ़ी चढ़ता मनुष्य—और कहते हैं कि ऐसा पुरुष महान् अन्धकार के पार प्रकाशमान ब्रह्म को देखता है।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 1 (12.321.1)
साङ्ख्यज्ञानं मया प्रोक्तं योगज्ञानं निबोध मे । यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्त्वेन नृपसत्तम ॥
sāṅkhyajñānaṃ mayā proktaṃ yogajñānaṃ nibodha me | yathāśrutaṃ yathādṛṣṭaṃ tattvena nṛpasattama
मैंने तुम्हें सांख्य का ज्ञान बता दिया; अब मुझसे योग का ज्ञान सुनो, हे नृपश्रेष्ठ, जैसा मैंने सुना है और जैसा देखा है, ठीक वैसा ही यथार्थ रूप में।
श्लोक 2 (12.321.2)
नास्ति साङ्ख्यसमं ज्ञानं नास्ति योगसमं बलम् । तावुभावेकचर्यौ तावुभावनिधनौ स्मृतौ ॥
nāsti sāṅkhyasamaṃ jñānaṃ nāsti yogasamaṃ balam | tāvubhāvekacaryau tāvubhāvanidhanau smṛtau
सांख्य के समान कोई ज्ञान नहीं और योग के समान कोई बल नहीं। दोनों एक ही मार्ग पर चलनेवाले हैं और दोनों अनन्त माने गए हैं।
श्लोक 3 (12.321.3)
पृथक्पृथक्प्रपश्यन्ति येऽप्यबुद्धिरता नराः । वयं तु राजन्पश्याम एकमेव तु निश्चयात् ॥
pṛthakpṛthakprapaśyanti ye'pyabuddhiratā narāḥ | vayaṃ tu rājanpaśyāma ekameva tu niścayāt
जो मनुष्य सच्ची समझ से विमुख रहते हैं, वे दोनों को अलग-अलग देखते हैं; पर हम तो, हे राजन्, दृढ़ निश्चय के साथ दोनों को एक ही देखते हैं।
श्लोक 4 (12.321.4)
यदेव योगाः पश्यन्ति तत्साङ्ख्यैरपि दृश्यते । एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥
yadeva yogāḥ paśyanti tatsāṅkhyairapi dṛśyate | ekaṃ sāṅkhyaṃ ca yogaṃ ca yaḥ paśyati sa tattvavit
योगी जिसे देखते हैं, सांख्य को माननेवाले भी उसी को देखते हैं। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही तत्त्व को जाननेवाला है।
श्लोक 5 (12.321.5)
रुद्रप्रधानानपरान्विद्धि योगानरिंदम् । तेनैव चाथ देहेन विचरन्ति दिशो दश ॥
rudrapradhānānaparānviddhi yogānariṃdam | tenaiva cātha dehena vicaranti diśo daśa
हे शत्रुदमन, जान लो कि रुद्र को प्रधान माननेवाले दूसरे योग भी हैं; उन्हीं के द्वारा योगी लोग उसी शरीर से दसों दिशाओं में विचरते हैं।
श्लोक 6 (12.321.6)
यावद्धि प्रलयस्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन ह । योगेन लोकान्विचरन्सुखं संन्यस्य चानघ ॥
yāvaddhi pralayastāta sūkṣmeṇāṣṭaguṇena ha | yogena lokānvicaransukhaṃ saṃnyasya cānagha
हे तात, हे निष्पाप, प्रलय के समय तक वह सूक्ष्म अष्टगुणयुक्त योग से, सुख का त्याग करके, लोकों में विचरता रहता है।
श्लोक 7 (12.321.7)
तावदेवाष्टगुणिनं योगं प्राहुर्मनीषिणः । सूक्ष्ममष्टगुणं प्राहुर्नेतरं नृपसत्तम ॥
tāvadevāṣṭaguṇinaṃ yogaṃ prāhurmanīṣiṇaḥ | sūkṣmamaṣṭaguṇaṃ prāhurnetaraṃ nṛpasattama
उतने ही समय तक के लिए मनीषी लोग अष्टगुण योग की बात कहते हैं; हे नृपश्रेष्ठ, वे सूक्ष्म को ही अष्टगुणयुक्त कहते हैं, दूसरे को नहीं।
श्लोक 8 (12.321.8)
द्विगुणं योगकृत्यं तु योगानां प्राहुरुत्तमम् । सगुणं निर्गुणं चैव यथाशास्त्रनिदर्शनम् ॥
dviguṇaṃ yogakṛtyaṃ tu yogānāṃ prāhuruttamam | saguṇaṃ nirguṇaṃ caiva yathāśāstranidarśanam
योगों में योग-साधना दो प्रकार की और सर्वोत्तम कही गई है—सगुण और निर्गुण, जैसा शास्त्रों में दिखाया गया है।
श्लोक 9 (12.321.9)
धारणं चैव मनसः प्राणायामश्च पार्थिव । एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च ॥
dhāraṇaṃ caiva manasaḥ prāṇāyāmaśca pārthiva | ekāgratā ca manasaḥ prāṇāyāmastathaiva ca
हे राजन्, मन को स्थिर करना और प्राणायाम; मन की एकाग्रता और उसी प्रकार प्राणायाम।
श्लोक 10 (12.321.10)
प्राणायामो हि सगुणो निर्गुणं धारयेन्मनः । यद्यदृश्यति मुञ्चन्वै प्राणान्मैथिलसत्तम । वाताधिक्यं भवत्येव तस्मात्तं न समाचरेत् ॥
prāṇāyāmo hi saguṇo nirguṇaṃ dhārayenmanaḥ | yadyadṛśyati muñcanvai prāṇānmaithilasattama | vātādhikyaṃ bhavatyeva tasmāttaṃ na samācaret
प्राणायाम सगुण है, और मन को स्थिर करना निर्गुण है। हे मिथिलापति, यदि प्राणों को छोड़ते समय ऐसा दिखाई दे, तो वायु का प्रकोप अवश्य होता है; इसलिए उसका आचरण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 11 (12.321.11)
निशायाः प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृताः । मध्ये स्वप्नात्परे यामे द्वादशैव तु चोदनाः ॥
niśāyāḥ prathame yāme codanā dvādaśa smṛtāḥ | madhye svapnātpare yāme dvādaśaiva tu codanāḥ
रात के पहले प्रहर में बारह चोदनाएँ (साधन-प्रयत्न) बताई गई हैं; बीच में सोने के बाद अन्तिम प्रहर में फिर बारह चोदनाएँ हैं।
श्लोक 12 (12.321.12)
तदेवमुपशान्तेन दान्तेनैकान्तशीलिना । आत्मारामेण बुद्धेन योक्तव्योऽऽत्मा न संशयः ॥
tadevamupaśāntena dāntenaikāntaśīlinā | ātmārāmeṇa buddhena yoktavyo''tmā na saṃśayaḥ
इस प्रकार शान्त, संयमी, एकान्तप्रिय, आत्मा में रमनेवाले और जागृत पुरुष को आत्मा को योग में लगाना चाहिए; इसमें संशय नहीं।
श्लोक 13 (12.321.13)
पञ्चानामिन्द्रियाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा । शब्दं रूपं तथा स्पर्शं रसं गन्धं तथैव च ॥
pañcānāmindriyāṇāṃ tu doṣānākṣipya pañcadhā | śabdaṃ rūpaṃ tathā sparśaṃ rasaṃ gandhaṃ tathaiva ca
पाँचों इन्द्रियों के दोषों को पाँच प्रकार से हटाकर, अर्थात् शब्द, रूप, स्पर्श, रस और गन्ध के दोषों को,
श्लोक 14 (12.321.14)
प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल । इन्द्रियग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह ॥
pratibhāmapavargaṃ ca pratisaṃhṛtya maithila | indriyagrāmamakhilaṃ manasyabhiniveśya ha
हे मिथिलापति, प्रतिभा और अपवर्ग को भी समेटकर और इन्द्रियों के सारे समूह को मन में स्थापित करके,
श्लोक 15 (12.321.15)
मनस्तथैवाहंकारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप । अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिं च प्रकृतावपि ॥
manastathaivāhaṃkāre pratiṣṭhāpya narādhipa | ahaṃkāraṃ tathā buddhau buddhiṃ ca prakṛtāvapi
हे नरेश्वर, फिर मन को अहंकार में स्थापित करके, अहंकार को बुद्धि में और बुद्धि को प्रकृति में भी स्थापित करके,
श्लोक 16 (12.321.16)
एवं हि परिसंख्याय ततो ध्यायन्ति केवलम् । विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ॥
evaṃ hi parisaṃkhyāya tato dhyāyanti kevalam | virajaskamalaṃ nityamanantaṃ śuddhamavraṇam
इस प्रकार सबकी गणना कर लेने के बाद वे उस एक अकेले का ध्यान करते हैं, जो रजोगुण और मल से रहित, नित्य, अनन्त, शुद्ध और निर्दोष है,
श्लोक 17 (12.321.17)
तस्थुषं पुरुषं नित्यमभेद्यमजरामरम् । शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं ब्रह्म चाव्ययम् ॥
tasthuṣaṃ puruṣaṃ nityamabhedyamajarāmaram | śāśvataṃ cāvyayaṃ caiva īśānaṃ brahma cāvyayam
उस स्थित पुरुष का, जो नित्य, अभेद्य, अजर-अमर, शाश्वत और अविनाशी है, जो ईश्वर है और अव्यय ब्रह्म है।
श्लोक 18 (12.321.18)
युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारयेत् । लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ॥
yuktasya tu mahārāja lakṣaṇānyupadhārayet | lakṣaṇaṃ tu prasādasya yathā tṛptaḥ sukhaṃ svapet
हे महाराज, अब योगयुक्त पुरुष के लक्षणों को समझो। उसकी प्रसन्नता का लक्षण यह है कि वह तृप्त मनुष्य की भाँति सुख से सोता है।
श्लोक 19 (12.321.19)
निर्वाते तु यथा दीपो ज्वलेत्स्नेहसमन्वितः । निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद्युक्तमाहुर्मनीषिणः ॥
nirvāte tu yathā dīpo jvaletsnehasamanvitaḥ | niścalordhvaśikhastadvadyuktamāhurmanīṣiṇaḥ
जैसे तेल से भरा दीपक वायुरहित स्थान में स्थिर और ऊपर की ओर सीधी लौ के साथ जलता है, वैसा ही योगयुक्त पुरुष को मनीषी लोग कहते हैं।
श्लोक 20 (12.321.20)
पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा बिन्दुभिराहतः । नालं चालयितुं शक्यस्तथा युक्तस्य लक्षणम् ॥
pāṣāṇa iva meghotthairyathā bindubhirāhataḥ | nālaṃ cālayituṃ śakyastathā yuktasya lakṣaṇam
जैसे मेघों से गिरी बूँदों से आहत होने पर भी चट्टान को हिलाया नहीं जा सकता, वैसा ही योगयुक्त पुरुष का लक्षण है।
श्लोक 21 (12.321.21)
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विविधैर्गीतवादितैः । क्रियमाणैर्न कम्पेत युक्तस्यैतन्निदर्शनम् ॥
śaṅkhadundubhinirghoṣairvividhairgītavāditaiḥ | kriyamāṇairna kampeta yuktasyaitannidarśanam
शंख, दुन्दुभि और अनेक प्रकार के गीत-वाद्य उसके पास बजाए जाएँ, तो भी वह काँपता नहीं; यह योगयुक्त पुरुष का लक्षण है।
श्लोक 22 (12.321.22)
तैलपात्रं यथा पूर्णं कराभ्यां गृह्य पूरुषः । सोपानमारुहेद्भीतस्तर्ज्यमानोऽसिपाणिभिः ॥
tailapātraṃ yathā pūrṇaṃ karābhyāṃ gṛhya pūruṣaḥ | sopānamāruhedbhītastarjyamāno'sipāṇibhiḥ
जैसे कोई मनुष्य तेल से भरा पात्र दोनों हाथों में लेकर सीढ़ी पर चढ़ता है, और हाथों में तलवार लिए लोग उसे धमकाते हैं, जिससे वह भयभीत है,
श्लोक 23 (12.321.23)
संयतात्मा भयात्तेषां न पात्राद्बिन्दुमुत्सृजेत् । तथैवोत्तरमागम्य एकाग्रमनसस्तथा ॥
saṃyatātmā bhayātteṣāṃ na pātrādbindumutsṛjet | tathaivottaramāgamya ekāgramanasastathā
और उनके भय से संयत चित्त होकर पात्र से एक बूँद भी गिरने नहीं देता; वैसे ही ऊपर की सीढ़ियों पर पहुँचकर भी एकाग्र मन से (वह सावधान रहता है),
श्लोक 24 (12.321.24)
स्थिरत्वादिन्द्रियाणां तु निश्चलस्तथैव च । एवं युक्तस्य तु मुनेर्लक्षणान्युपलक्षयेत् ॥
sthiratvādindriyāṇāṃ tu niścalastathaiva ca | evaṃ yuktasya tu munerlakṣaṇānyupalakṣayet
इन्द्रियों की स्थिरता के कारण वह स्थिर और अचल रहता है। इस प्रकार योगयुक्त मुनि के लक्षणों को पहचानना चाहिए।
श्लोक 25 (12.321.25)
स्वयुक्तः पश्यते ब्रह्म यत्तत्परममव्ययम् । महतस्तमसो मध्ये स्थितं ज्वलनसंनिभम् ॥
svayuktaḥ paśyate brahma yattatparamamavyayam | mahatastamaso madhye sthitaṃ jvalanasaṃnibham
स्वयं योगयुक्त हुआ पुरुष उस परम अविनाशी ब्रह्म को देखता है, जो महान् अन्धकार के बीच स्थित है और अग्नि के समान प्रकाशमान है।
श्लोक 26 (12.321.26)
एतेन केवलं याति त्यक्त्वा देहमसाक्षिकम् । कालेन महता राजञ्श्रुतिरेषा सनातनी ॥
etena kevalaṃ yāti tyaktvā dehamasākṣikam | kālena mahatā rājañśrutireṣā sanātanī
इसी से वह, हे राजन्, दीर्घ काल के बाद साक्षीरहित देह को त्यागकर कैवल्य को प्राप्त होता है; यह सनातन श्रुति है।
श्लोक 27 (12.321.27)
एतद्धि योगं योगानां किमन्यद्योगलक्षणम् । विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥
etaddhi yogaṃ yogānāṃ kimanyadyogalakṣaṇam | vijñāya taddhi manyante kṛtakṛtyā manīṣiṇaḥ
यही योगों का योग है; योग का और कौन-सा लक्षण हो सकता है? इसे जानकर मनीषी लोग स्वयं को कृतकृत्य मानते हैं।