शान्ति पर्व · अध्याय 322
प्राणों के उत्क्रमण के स्थान और मृत्यु के पूर्व-लक्षण
याज्ञवल्क्य जनक को बताते हैं कि प्राण शरीर के जिस अंग से निकलता है, उसके अनुसार वह किस लोक को पहुँचता है—पैरों से निकले तो विष्णु के स्थान को, और मस्तक से निकले तो ब्रह्मा को। फिर वे उन अरिष्ट-लक्षणों को गिनाते हैं जो एक वर्ष, छह महीने, सात रात या तुरन्त होनेवाली मृत्यु की सूचना देते हैं। ऐसे लक्षण देखनेवाले को परमात्मा में चित्त लगाना चाहिए; और जो अधिक जीना चाहे, वह गन्धों और रसों को धारण करे और सांख्य की धारणा को जानकर योग से मृत्यु को जीतकर उस शाश्वत, अचल स्थान को पहुँचे।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 1 (12.322.1)
तथैवोत्क्रमतां स्थानं शृणुष्वावहितो नृप । पद्भ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते ॥
tathaivotkramatāṃ sthānaṃ śṛṇuṣvāvahito nṛpa | padbhyāmutkramamāṇasya vaiṣṇavaṃ sthānamucyate
हे राजन्, अब ध्यान से सुनो कि प्राण किन-किन स्थानों से निकलते हैं और कहाँ पहुँचते हैं। जो पैरों से निकलता है, उसके लिए विष्णु का स्थान कहा गया है।
श्लोक 2 (12.322.2)
जङ्घाभ्यां तु वसून्देवानाप्नुयादिति नः श्रुतम् । जानुभ्यां च महाभागान्साध्यान्देवानवाप्नुयात् ॥
jaṅghābhyāṃ tu vasūndevānāpnuyāditi naḥ śrutam | jānubhyāṃ ca mahābhāgānsādhyāndevānavāpnuyāt
पिंडलियों से निकलनेवाला वसु देवताओं को प्राप्त होता है, ऐसा हमने सुना है। घुटनों से निकलनेवाला महाभाग साध्य देवताओं को प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (12.322.3)
पायुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुयात् । पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां च प्रजापतिम् ॥
pāyunotkramamāṇastu maitraṃ sthānamavāpnuyāt | pṛthivīṃ jaghanenātha ūrubhyāṃ ca prajāpatim
गुदा से निकलनेवाला मित्र के स्थान को प्राप्त होता है; जघन-प्रदेश (कटि) से पृथ्वी को, और जाँघों से प्रजापति को।
श्लोक 4 (12.322.4)
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान्नासाभ्यामिन्दुमेव च । बाहुभ्यामिन्द्रमित्याहुरुरसा रुद्रमेव च ॥
pārśvābhyāṃ maruto devānnāsābhyāmindumeva ca | bāhubhyāmindramityāhururasā rudrameva ca
दोनों पार्श्वों से निकलनेवाला मरुद्गण देवताओं को, नासिकाओं से चन्द्रमा को, भुजाओं से, कहते हैं, इन्द्र को, और छाती से रुद्र को प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (12.322.5)
ग्रीवया तु मुनिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम् । विश्वेदेवान्मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुयात् ॥
grīvayā tu muniśreṣṭhaṃ naramāpnotyanuttamam | viśvedevānmukhenātha diśaḥ śrotreṇa cāpnuyāt
गर्दन से निकलनेवाला मुनियों में श्रेष्ठ, अनुपम नर को प्राप्त होता है; मुख से विश्वेदेवों को और कान से दिशाओं को प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (12.322.6)
घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यां सूर्यमेव च । भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ॥
ghrāṇena gandhavahanaṃ netrābhyāṃ sūryameva ca | bhrūbhyāṃ caivāśvinau devau lalāṭena pitṝnatha
नाक से निकलनेवाला गन्ध को वहन करनेवाले वायु को, नेत्रों से सूर्य को, भौंहों से दोनों अश्विनीकुमारों को और ललाट से पितरों को प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (12.322.7)
ब्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा । एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर ॥
brahmāṇamāpnoti vibhuṃ mūrdhnā devāgrajaṃ tathā | etānyutkramaṇasthānānyuktāni mithileśvara
मस्तक के ऊपरी भाग से निकलनेवाला सर्वव्यापी ब्रह्मा को, देवताओं के अग्रज को, प्राप्त होता है। हे मिथिलेश्वर, उत्क्रमण के ये स्थान मैंने बता दिए।
श्लोक 8 (12.322.8)
अरिष्टानि प्रवक्ष्यामि विहितानि मनीषिभिः । संवत्सराद्धिमोक्षस्तु संभवेत शरीरिणः ॥
ariṣṭāni pravakṣyāmi vihitāni manīṣibhiḥ | saṃvatsarāddhimokṣastu saṃbhaveta śarīriṇaḥ
अब मैं उन अरिष्ट-लक्षणों को बताऊँगा जो मनीषियों ने निर्धारित किए हैं और जिनसे देहधारियों की जीवन से मुक्ति एक वर्ष के भीतर हो सकती है।
श्लोक 9 (12.322.9)
योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वां कदाचन । तथैव ध्रुवमित्याहुः पूर्णेन्दुं दीपमेव च ॥
yo'rundhatīṃ na paśyeta dṛṣṭapūrvāṃ kadācana | tathaiva dhruvamityāhuḥ pūrṇenduṃ dīpameva ca
जो पहले देखी हुई अरुन्धती को नहीं देख पाता, और इसी प्रकार, कहते हैं, ध्रुव तारे को, पूर्ण चन्द्रमा को और दीपक को नहीं देख पाता,
श्लोक 10 (12.322.10)
खण्डाभासं दक्षिणतस्तेऽपि संवत्सरायुषः । परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव ॥
khaṇḍābhāsaṃ dakṣiṇataste'pi saṃvatsarāyuṣaḥ | paracakṣuṣi cātmānaṃ ye na paśyanti pārthiva
या जो उसे दक्षिण की ओर खण्डित-सा देखता है, उसकी भी आयु एक वर्ष की है। और जो, हे राजन्, दूसरे की आँख में अपना प्रतिबिम्ब नहीं देखते,
श्लोक 11 (12.322.11)
आत्मच्छायाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सरायुषः । अतिद्युतिरतिप्रज्ञा अप्रज्ञा चाद्युतिस्तथा ॥
ātmacchāyākṛtībhūtaṃ te'pi saṃvatsarāyuṣaḥ | atidyutiratiprajñā aprajñā cādyutistathā
या अपनी छाया को आकार लेते नहीं देखते, उनकी भी आयु एक वर्ष की है। अत्यधिक तेज, अत्यधिक प्रज्ञा, अथवा प्रज्ञा का अभाव और तेज का अभाव भी:
श्लोक 12 (12.322.12)
प्रकृतेर्विक्रियापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । दैवतान्यवजानाति ब्राह्मणैश्च विरुध्यते ॥
prakṛtervikriyāpattiḥ ṣaṇmāsānmṛtyulakṣaṇam | daivatānyavajānāti brāhmaṇaiśca virudhyate
प्रकृति में ऐसा विकार छह महीने में मृत्यु का लक्षण है। ऐसा मनुष्य देवताओं का अनादर करता है और ब्राह्मणों से विरोध करता है;
श्लोक 13 (12.322.13)
कृष्णश्यावच्छविच्छायः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । शीर्णनाभिं यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति ॥
kṛṣṇaśyāvacchavicchāyaḥ ṣaṇmāsānmṛtyulakṣaṇam | śīrṇanābhiṃ yathā cakraṃ chidraṃ somaṃ prapaśyati
उसकी कान्ति और छाया काली और मटमैली पड़ जाती है—यह छह महीने में मृत्यु का लक्षण है। वह चन्द्रमा को छिद्रों से भरा देखता है, जैसे टूटी नाभि (धुरी-केन्द्र) वाला पहिया,
श्लोक 14 (12.322.14)
तथैव च सहस्रांशुं सप्तरात्रेण मृत्युभाक् । शवगन्धमुपाघ्राति सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ॥
tathaiva ca sahasrāṃśuṃ saptarātreṇa mṛtyubhāk | śavagandhamupāghrāti saptarātreṇa mṛtyubhāk
और सूर्य को भी वैसा ही देखता है; ऐसा मनुष्य सात रात में मृत्यु को प्राप्त होता है। जो शव की गन्ध सूँघता है, वह भी सात रात में मृत्यु को प्राप्त होता है।
श्लोक 15 (12.322.15)
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता ॥
karṇanāsāvanamanaṃ dantadṛṣṭivirāgitā
कानों और नाक का झुक जाना, तथा दाँतों और आँखों का रंग उड़ जाना;
श्लोक 16 (12.322.16)
संज्ञालोपो निरूष्मत्वं सद्योमृत्युनिदर्शनम् । अकस्माच्च स्रवेद्यस्य वाममक्षि नराधिप ॥
saṃjñālopo nirūṣmatvaṃ sadyomṛtyunidarśanam | akasmācca sravedyasya vāmamakṣi narādhipa
चेतना का लोप और शरीर की गर्मी का जाता रहना तत्काल मृत्यु के लक्षण हैं। हे नराधिप, यदि किसी की बायीं आँख अचानक बहने लगे,
श्लोक 17 (12.322.17)
मूर्धतश्चोत्पतेद्धूमः सद्योमृत्युनिदर्शनम् । एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽऽत्मवान् ॥
mūrdhataścotpateddhūmaḥ sadyomṛtyunidarśanam | etāvanti tvariṣṭāni viditvā mānavo''tmavān
या सिर से धुआँ उठे, तो ये तत्काल मृत्यु के लक्षण हैं। इतने अरिष्टों को जानकर आत्मवान् मनुष्य को चाहिए कि
श्लोक 18 (12.322.18)
निशि चाहनि चात्मानं योजयेत्परमात्मनि । प्रतीक्षमाणस्तत्कालं यः कालः प्रकृतो भवेत् ॥
niśi cāhani cātmānaṃ yojayetparamātmani | pratīkṣamāṇastatkālaṃ yaḥ kālaḥ prakṛto bhavet
वह रात और दिन अपने को परमात्मा में लगाए रखे और उस समय की प्रतीक्षा करे जो उसके लिए नियत है।
श्लोक 19 (12.322.19)
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रियाम् । सर्वगन्धान्रसांश्चैव धारयीत समाहितः ॥
athāsya neṣṭaṃ maraṇaṃ sthātumicchedimāṃ kriyām | sarvagandhānrasāṃścaiva dhārayīta samāhitaḥ
किन्तु यदि उसे मृत्यु इष्ट न हो और वह रुकना चाहे, तो इस क्रिया का अभ्यास करे: समाहित होकर वह सब गन्धों और रसों को धारण करे,
श्लोक 20 (12.322.20)
तथा मृत्युमुपादाय तत्परेणान्तरात्मना । स साङ्ख्यधारणं चैव विदित्वा मनुजर्षभ । जयेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना ॥
tathā mṛtyumupādāya tatpareṇāntarātmanā | sa sāṅkhyadhāraṇaṃ caiva viditvā manujarṣabha | jayecca mṛtyuṃ yogena tatpareṇāntarātmanā
इस प्रकार अन्तरात्मा को उसी में तन्मय करके मृत्यु को वश में करके, और सांख्य की धारणा को भी जानकर, हे नरश्रेष्ठ, वह अपनी अन्तरात्मा को उसी में लगाए हुए योग से मृत्यु को जीत ले।
श्लोक 21 (12.322.21)
गच्छेत्प्राप्याक्षयं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम् । शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥
gacchetprāpyākṣayaṃ kṛtsnamajanma śivamavyayam | śāśvataṃ sthānamacalaṃ duṣprāpamakṛtātmabhiḥ
वह उस अक्षय, पूर्ण, अजन्मा, कल्याणमय और अविनाशी को पाकर उस शाश्वत, अचल स्थान को जाता है, जो अशुद्ध अन्तःकरणवालों के लिए दुष्प्राप्य है।