शान्ति पर्व · अध्याय 323
याज्ञवल्क्य और विश्वावसु: पच्चीसवाँ और छब्बीसवाँ तत्त्व
भीष्म मिथिला के राजा जनक को दिया गया याज्ञवल्क्य का उपदेश सुनाते हैं। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि सूर्य ने सरस्वती के द्वारा उन्हें यजुर्मन्त्र कैसे दिए, उन्होंने शतपथ की रचना कैसे की और जनक के पिता के यज्ञ में मामा से कैसे विवाद हुआ, और फिर गन्धर्व विश्वावसु ने उनसे पच्चीस प्रश्न कैसे पूछे। वे प्रकृति और पुरुष के जोड़ों के द्वारा उत्तर देते हैं, पच्चीसवें और छब्बीसवें तत्त्व का भेद बताते हैं, और सिखाते हैं कि मोक्ष ज्ञान से मिलता है, केवल अध्ययन या कर्मकाण्ड से नहीं। अन्त में भीष्म बताते हैं कि जनक ने अपना धन दान किया, पुत्र को राज्य सौंपा और संन्यासी का जीवन अपनाया।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 1 (12.323.1)
अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप । परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ॥
avyaktasthaṃ paraṃ yattatpṛṣṭaste'haṃ narādhipa | paraṃ guhyamimaṃ praśnaṃ śṛṇuṣvāvahito nṛpa
हे नराधिप, तुमने जो पूछा है कि अव्यक्त में स्थित परम तत्त्व क्या है, उसका उत्तर मैं देता हूँ। हे राजन्, इस अत्यन्त गोपनीय प्रश्न को ध्यान से सुनो।
श्लोक 2 (12.323.2)
यथार्षेणेह विधिना चरताऽवमतेन ह । मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ॥
yathārṣeṇeha vidhinā caratā'vamatena ha | mayā''dityādavāptāni yajūṃṣi mithilādhipa
हे मिथिलाधिप, ऋषियों की बताई विधि से तप करते हुए, अपमान सहकर भी, मैंने आदित्य से यजुर्वेद के मन्त्र प्राप्त किए।
श्लोक 3 (12.323.3)
महता तपसा देवस्तपिष्णुः सेवितो मया । प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदाऽनघ ॥
mahatā tapasā devastapiṣṇuḥ sevito mayā | prītena cāhaṃ vibhunā sūryeṇoktastadā'nagha
मैंने बड़े तप से उन तपते हुए देवता की सेवा की। तब, हे अनघ, प्रसन्न होकर सर्वव्यापी सूर्य ने मुझसे कहा।
श्लोक 4 (12.323.4)
वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् । तं ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥
varaṃ vṛṇīṣva viprarṣe yadiṣṭaṃ te sudurlabham | taṃ te dāsyāmi prītātmā matprasādo hi durlabhaḥ
"हे विप्रर्षे, वर माँगो; जो भी तुम चाहते हो, चाहे वह अत्यन्त दुर्लभ हो, मैं प्रसन्न मन से तुम्हें दूँगा; क्योंकि मेरी कृपा बड़ी दुर्लभ है।"
श्लोक 5 (12.323.5)
ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतांवरः । यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥
tataḥ praṇamya śirasā mayoktastapatāṃvaraḥ | yajūṃṣi nopayuktāni kṣipramicchāmi veditum
तब सिर झुकाकर मैंने तपने वालों में श्रेष्ठ उन देव से कहा, "जो यजुर्मन्त्र मेरे उपयोग में नहीं आए हैं, उन्हें मैं शीघ्र जानना चाहता हूँ।"
श्लोक 6 (12.323.6)
ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज । सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ॥
tato māṃ bhagavānāha vitariṣyāmi te dvija | sarasvatīha vāgbhūtā śarīraṃ te pravekṣyati
तब भगवान् ने मुझसे कहा, "हे द्विज, मैं तुम्हें वे दूँगा। वाणी बनी हुई सरस्वती तुम्हारे शरीर में प्रवेश करेगी।"
श्लोक 7 (12.323.7)
ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु । विवृतं च ततो मेऽऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ॥
tato māmāha bhagavānāsyaṃ svaṃ vivṛtaṃ kuru | vivṛtaṃ ca tato me''syaṃ praviṣṭā ca sarasvatī
फिर भगवान् ने मुझसे कहा, "अपना मुख खोलो।" मेरे मुख खोलते ही सरस्वती उसमें प्रविष्ट हो गईं।
श्लोक 8 (12.323.8)
ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदाऽनघ । अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ॥
tato vidahyamāno'haṃ praviṣṭo'mbhastadā'nagha | avijñānādamarṣācca bhāskarasya mahātmanaḥ
तब, हे अनघ, भीतर से जलता हुआ मैं अज्ञान और महात्मा सूर्य के प्रति क्रोध के कारण जल में कूद पड़ा।
श्लोक 9 (12.323.9)
ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान्रविः । मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ॥
tato vidahyamānaṃ māmuvāca bhagavānraviḥ | muhūrtaṃ sahyatāṃ dāhastataḥ śītībhaviṣyati
मुझे जलता देख भगवान् रवि ने कहा, "थोड़ी देर यह दाह सह लो; फिर तुम शीतल हो जाओगे।"
श्लोक 10 (12.323.10)
शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः । प्रतिभास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ॥
śītībhūtaṃ ca māṃ dṛṣṭvā bhagavānāha bhāskaraḥ | pratibhāsyati te vedaḥ sakhilaḥ sottaro dvija
मुझे शीतल हुआ देखकर भगवान् भास्कर ने कहा, "हे द्विज, सम्पूर्ण खिल और उत्तरभाग सहित वेद तुम्हारे भीतर प्रकाशित होगा।"
श्लोक 11 (12.323.11)
कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ । तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ॥
kṛtsnaṃ śatapathaṃ caiva praṇeṣyasi dvijarṣabha | tasyānte cāpunarbhāve buddhistava bhaviṣyati
"हे द्विजश्रेष्ठ, तुम सम्पूर्ण शतपथ को प्रकट करोगे, और उसके अन्त में तुम्हारी बुद्धि उस अवस्था की ओर जाएगी जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।"
श्लोक 12 (12.323.12)
प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत्साङ्ख्ययोगेप्सितं पदम् । एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ॥
prāpsyase ca yadiṣṭaṃ tatsāṅkhyayogepsitaṃ padam | etāvaduktvā bhagavānastamevābhyavartata
"जिस पद को तुम चाहते हो, जो साङ्ख्य और योग का अभीष्ट है, उसे भी तुम प्राप्त करोगे।" इतना कहकर भगवान् अस्ताचल की ओर चल पड़े।
श्लोक 13 (12.323.13)
ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ । गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ॥
tato'nuvyāhṛtaṃ śrutvā gate deve vibhāvasau | gṛhamāgatya saṃhṛṣṭo'cintayaṃ vai sarasvatīm
इस प्रकार कहकर जब देव विभावसु चले गए, तब मैं प्रसन्न होकर घर लौटा और सरस्वती का स्मरण किया।
श्लोक 14 (12.323.14)
ततः प्रवृत्ताऽतिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता । ओंकारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥
tataḥ pravṛttā'tiśubhā svaravyañjanabhūṣitā | oṃkāramāditaḥ kṛtvā mama devī sarasvatī
तब ओंकार से आरम्भ करती हुई, स्वर और व्यञ्जनों से सजी, अत्यन्त शुभ देवी सरस्वती मेरे भीतर प्रकट हुईं।
श्लोक 15 (12.323.15)
ततोऽहमर्ध्यं विधिवत्सरस्वत्यै न्यवेदयम् । परं यत्नमवाप्यैव निषण्णस्तत्परायणः ॥
tato'hamardhyaṃ vidhivatsarasvatyai nyavedayam | paraṃ yatnamavāpyaiva niṣaṇṇastatparāyaṇaḥ
तब मैंने विधिपूर्वक सरस्वती को अर्घ्य निवेदन किया, और परम प्रयत्न करके उन्हीं में तत्पर होकर बैठ गया।
श्लोक 16 (12.323.16)
ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥
tataḥ śatapathaṃ kṛtsnaṃ sarahasyaṃ sasaṃgraham | cakre sapariśeṣaṃ ca harṣeṇa parameṇa ha
तब मैंने परम हर्ष के साथ रहस्य, संग्रह और परिशिष्ट सहित सम्पूर्ण शतपथ की रचना की।
श्लोक 17 (12.323.17)
कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् । विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥
kṛtvā cādhyayanaṃ teṣāṃ śiṣyāṇāṃ śatamuttamam | vipriyārthaṃ saśiṣyasya mātulasya mahātmanaḥ
अपने महात्मा मामा और उनके शिष्यों को अप्रिय लगे, इसी उद्देश्य से मैंने सौ उत्तम शिष्यों को उसका अध्ययन कराया।
श्लोक 18 (12.323.18)
ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः । व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥
tataḥ saśiṣyeṇa mayā sūryeṇeva gabhastibhiḥ | vyasto yajño mahārāja pitustava mahātmanaḥ
हे महाराज, तब जैसे सूर्य अपनी किरणों से सब कुछ बिखेर देता है, वैसे ही मेरे और मेरे शिष्यों के हाथों आपके महात्मा पिता का यज्ञ टुकड़ों में बँट गया।
श्लोक 19 (12.323.19)
मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवान्वसु । स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥
miṣato devalasyāpi tato'rdhaṃ hṛtavānvasu | svavedadakṣiṇāyārthe vimarde mātulena ha
देवल के देखते-देखते मैं उसमें से आधा धन ले गया; यह अपने वेद की दक्षिणा के लिए मामा के साथ हुई खींचतान में हुआ।
श्लोक 20 (12.323.20)
सुमन्तुनाऽथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै । पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥
sumantunā'tha pailena tathā jaimininā ca vai | pitrā te munibhiścaiva tato'hamanumānitaḥ
तब सुमन्तु, पैल, जैमिनि, आपके पिता और मुनियों ने मेरा सम्मान किया।
श्लोक 21 (12.323.21)
दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयाऽनघ । तथैव रोमहर्षेण पुराणमवधारितम् ॥
daśa pañca ca prāptāni yajūṃṣyarkānmayā'nagha | tathaiva romaharṣeṇa purāṇamavadhāritam
हे अनघ, मैंने सूर्य से यजुर्वेद की पन्द्रह शाखाएँ पाईं, और रोमहर्षण से पुराण भी धारण किया।
श्लोक 22 (12.323.22)
बीजमेतत्पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् । सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥
bījametatpuraskṛtya devīṃ caiva sarasvatīm | sūryasya cānubhāvena pravṛtto'haṃ narādhipa
हे नराधिप, इसी को बीज बनाकर, देवी सरस्वती को आगे रखकर और सूर्य की कृपा से मैं कार्य में प्रवृत्त हुआ,
श्लोक 23 (12.323.23)
कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया । यथाभिलपितं मार्गं तथा तच्चोपपादितम् ॥
kartuṃ śatapathaṃ cedamapūrvaṃ ca kṛtaṃ mayā | yathābhilapitaṃ mārgaṃ tathā taccopapāditam
इस शतपथ की रचना करने के लिए। जो मैंने बनाया वह अपूर्व था, और जैसा मैं चाहता था वैसा ही मार्ग उसमें बना दिया गया।
श्लोक 24 (12.323.24)
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससंग्रहम् । सर्वे च शिष्याः शुचयो गताः परमहर्षिताः ॥
śiṣyāṇāmakhilaṃ kṛtsnamanujñātaṃ sasaṃgraham | sarve ca śiṣyāḥ śucayo gatāḥ paramaharṣitāḥ
संग्रह सहित वह सम्पूर्ण ग्रन्थ शिष्यों को सौंप दिया गया, और सब शिष्य पवित्र और अत्यन्त प्रसन्न होकर चले गए।
श्लोक 25 (12.323.25)
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदर्शिता । प्रतिष्ठाप्य यथाकामं वेद्यं तदनुचिन्तयम् ॥
śākhāḥ pañcadaśemāstu vidyā bhāskaradarśitā | pratiṣṭhāpya yathākāmaṃ vedyaṃ tadanucintayam
ये पन्द्रह शाखाएँ भास्कर की दिखाई हुई विद्या हैं। इन्हें इच्छानुसार स्थापित करके मैं जानने योग्य तत्त्व पर विचार करने लगा।
श्लोक 26 (12.323.26)
किमत्र ब्रह्मण्यमृतं किंच वेद्यमनुत्तमम् । चिन्तयंस्तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ॥
kimatra brahmaṇyamṛtaṃ kiṃca vedyamanuttamam | cintayaṃstatra cāgatya gandharvo māmapṛcchata
"यहाँ ब्राह्मणों का हितकारी सत्य क्या है, और सबसे उत्तम जानने योग्य वस्तु क्या है?" मैं यही सोच रहा था कि वहाँ एक गन्धर्व आया और उसने मुझसे प्रश्न किया।
श्लोक 27 (12.323.27)
विश्वावसुस्ततो राजन्वेदान्तज्ञानकोविदः । चतुर्विंशांस्ततोऽपृच्छत्प्रश्नान्वेदस्य पार्थिव ॥
viśvāvasustato rājanvedāntajñānakovidaḥ | caturviṃśāṃstato'pṛcchatpraśnānvedasya pārthiva
हे राजन्, तब वेदान्त-ज्ञान में निपुण विश्वावसु ने मुझसे वेद सम्बन्धी चौबीस प्रश्न पूछे।
श्लोक 28 (12.323.28)
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तदा । तथैव पुरुषव्याघ्र मित्रं वरुणमेव च ॥
pañcaviṃśatimaṃ praśnaṃ papracchānvīkṣikīṃ tadā | tathaiva puruṣavyāghra mitraṃ varuṇameva ca
फिर उसने पच्चीसवाँ प्रश्न तर्कविद्या (आन्वीक्षिकी) के विषय में पूछा, और हे पुरुषव्याघ्र, वैसे ही मित्र और वरुण के विषय में भी।
श्लोक 29 (12.323.29)
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञोऽज्ञः कस्तपा अतपास्तथा । सूर्यातिसूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ॥
jñānaṃ jñeyaṃ tathā jño'jñaḥ kastapā atapāstathā | sūryātisūrya iti ca vidyāvidye tathaiva ca
ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञ और अज्ञ, तप कौन है और अतप कौन, सूर्य और अतिसूर्य, विद्या और अविद्या,
श्लोक 30 (12.323.30)
वेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च । अव्ययं चाक्षरं क्षेम्यमेतत्प्रश्नमनुत्तमम् ॥
vedyāvedyaṃ tathā rājannacalaṃ calameva ca | avyayaṃ cākṣaraṃ kṣemyametatpraśnamanuttamam
वेद्य और अवेद्य, अचल और चल, अव्यय, अक्षर और क्षेम्य: यह वह अनुपम प्रश्न-समूह था।
श्लोक 31 (12.323.31)
अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः । पृष्टवानानुपूर्व्येण प्रश्नमर्थवदुत्तमम् ॥
athoktaśca mahārāja rājā gandharvasattamaḥ | pṛṣṭavānānupūrvyeṇa praśnamarthavaduttamam
तब, हे महाराज, गन्धर्वों में श्रेष्ठ उस राजा से बात हुई, और उसने क्रम से अपना उत्तम और अर्थपूर्ण प्रश्न पूछा।
श्लोक 32 (12.323.32)
मुहूर्तमुष्यतां तावद्यावदेनं विचिन्तये । बाढमित्येव कृत्वा स तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥
muhūrtamuṣyatāṃ tāvadyāvadenaṃ vicintaye | bāḍhamityeva kṛtvā sa tūṣṇīṃ gandharva āsthitaḥ
मैंने कहा, "थोड़ी देर ठहरो, जब तक मैं इस पर विचार करूँ।" "ठीक है," कहकर वह गन्धर्व चुप बैठा रहा।
श्लोक 33 (12.323.33)
ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् । मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतः ॥
tato'nucintayamahaṃ bhūyo devīṃ sarasvatīm | manasā sa ca me praśno dadhno ghṛtamivoddhṛtaḥ
तब मैंने मन से फिर देवी सरस्वती का स्मरण किया, और वह प्रश्न दही से निकले मक्खन की तरह मेरे सामने निकल आया।
श्लोक 34 (12.323.34)
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव । मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥
tatropaniṣadaṃ caiva pariśeṣaṃ ca pārthiva | mathnāmi manasā tāta dṛṣṭvā cānvīkṣikīṃ parām
वहाँ, हे राजन्, मैं मन से उपनिषद् और उसके शेष भाग का मन्थन करने लगा, हे तात, परम आन्वीक्षिकी विद्या को देखकर।
श्लोक 35 (12.323.35)
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा सांपरायिकी । उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशाऽधितिष्ठता ॥
caturthī rājaśārdūla vidyaiṣā sāṃparāyikī | udīritā mayā tubhyaṃ pañcaviṃśā'dhitiṣṭhatā
हे राजशार्दूल, यह चौथी विद्या है, जो परलोक से सम्बन्ध रखती है; पच्चीसवें तत्त्व पर स्थित रहकर मैंने इसे तुम्हें बताया है।
श्लोक 36 (12.323.36)
अथोक्तस्तु मया राजन्राजा विश्वावसुस्तदा । श्रूयतां यद्भवानस्मान्प्रश्नं संपृष्टवानिह ॥
athoktastu mayā rājanrājā viśvāvasustadā | śrūyatāṃ yadbhavānasmānpraśnaṃ saṃpṛṣṭavāniha
हे राजन्, तब मैंने राजा विश्वावसु से कहा, "तुमने यहाँ हमसे जो प्रश्न पूछा है, उसका उत्तर सुनो।"
श्लोक 37 (12.323.37)
विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि । विश्वाव्यक्तं परं विद्याद्भूतभव्यभयंकरम् ॥
viśvāviśveti yadidaṃ gandharvendrānupṛcchasi | viśvāvyaktaṃ paraṃ vidyādbhūtabhavyabhayaṃkaram
"हे गन्धर्वेन्द्र, यह जो तुम 'विश्व-अविश्व' के विषय में पूछते हो, उसमें विश्व को परम अव्यक्त जानो, जो भूत और भविष्य के लिए भयंकर है।"
श्लोक 38 (12.323.38)
त्रिगुणं गुणकर्तृत्वाद्विश्वान्यो निष्कलस्तथा । विश्वाविश्वेति मिथुनमेवमेवानुदृश्यते ॥
triguṇaṃ guṇakartṛtvādviśvānyo niṣkalastathā | viśvāviśveti mithunamevamevānudṛśyate
"गुणों का कर्ता होने से वह त्रिगुणमय है; दूसरा निष्कल है। इसी प्रकार 'विश्व और अविश्व' का यह जोड़ा देखा जाता है।"
श्लोक 39 (12.323.39)
अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् । तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ॥
avyaktaṃ prakṛtiṃ prāhuḥ puruṣeti ca nirguṇam | tathaiva mitraṃ puruṣaṃ varuṇaṃ prakṛtiṃ tathā
"अव्यक्त को वे प्रकृति कहते हैं और निर्गुण को पुरुष। वैसे ही मित्र पुरुष है और वरुण प्रकृति।"
श्लोक 40 (12.323.40)
ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेयं पुरुषमेव च । अज्ञमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञस्तु निष्कल उच्यते ॥
jñānaṃ tu prakṛtiṃ prāhurjñeyaṃ puruṣameva ca | ajñamavyaktamityuktaṃ jñastu niṣkala ucyate
"ज्ञान को वे प्रकृति कहते हैं और ज्ञेय को पुरुष। अज्ञ अव्यक्त कहा गया है, और ज्ञ निष्कल कहा जाता है।"
श्लोक 41 (12.323.41)
कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोसौ पुरुष उच्यते । तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कलः स्मृतः ॥
kastapā atapāḥ proktaḥ kosau puruṣa ucyate | tapāstu prakṛtiṃ prāhuratapā niṣkalaḥ smṛtaḥ
"तप कौन है, अतप किसे कहा गया, और पुरुष किसे कहते हैं? तप को वे प्रकृति कहते हैं; अतप निष्कल माना गया है।"
श्लोक 42 (12.323.42)
सूर्यमव्यक्तमित्युक्तमतिसूर्यस्तु निष्कलः । अविद्या प्रोक्तमव्यक्तं विद्या पुरुष उच्यते ॥
sūryamavyaktamityuktamatisūryastu niṣkalaḥ | avidyā proktamavyaktaṃ vidyā puruṣa ucyate
"सूर्य को अव्यक्त कहा गया है और अतिसूर्य निष्कल है। अविद्या अव्यक्त कही गई है और विद्या पुरुष कहलाती है।"
श्लोक 43 (12.323.43)
तथैवावेद्यमव्यक्तं वेद्यः पुरुष उच्यते । चलाचलमिति प्रोक्तं त्वया तदपि मे शृणु ॥
tathaivāvedyamavyaktaṃ vedyaḥ puruṣa ucyate | calācalamiti proktaṃ tvayā tadapi me śṛṇu
"वैसे ही अवेद्य अव्यक्त है और वेद्य पुरुष कहलाता है। तुमने चल और अचल की भी बात कही थी; उसे भी मुझसे सुनो।"
श्लोक 44 (12.323.44)
चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षेपसर्गयोः । अक्षेपसर्गयोः कर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ॥
calāṃ tu prakṛtiṃ prāhuḥ kāraṇaṃ kṣepasargayoḥ | akṣepasargayoḥ kartā niścalaḥ puruṣaḥ smṛtaḥ
"चल को वे प्रकृति कहते हैं, जो क्षेप और सर्ग का कारण है। निश्चल पुरुष अक्षेप और असर्ग का कर्ता माना गया है।"
श्लोक 45 (12.323.45)
अजावुभौ ध्रुवौ चैव अक्षयौ चाप्युभावपि ॥
ajāvubhau dhruvau caiva akṣayau cāpyubhāvapi
"दोनों अज हैं, दोनों ध्रुव हैं, और दोनों ही अक्षय भी हैं।"
श्लोक 46 (12.323.46)
अजौ नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चयाः । अक्षयत्वात्प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् । अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते ॥
ajau nityāvubhau prāhuradhyātmagatiniścayāḥ | akṣayatvātprajanane ajamatrāhuravyayam | akṣayaṃ puruṣaṃ prāhuḥ kṣayo hyasya na vidyate
"अध्यात्म की गति का निश्चय रखने वाले दोनों को अज और नित्य कहते हैं। प्रजनन में क्षय न होने के कारण यहाँ अज को अव्यय कहते हैं; और पुरुष को अक्षय कहते हैं, क्योंकि उसका क्षय नहीं होता।"
श्लोक 47 (12.323.47)
गुणक्षयत्वात्प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षयं बुधाः । एषा तेऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी सांपरायिकी ॥
guṇakṣayatvātprakṛtiḥ kartṛtvādakṣayaṃ budhāḥ | eṣā te'nvīkṣikī vidyā caturthī sāṃparāyikī
"गुणों के क्षीण होने से प्रकृति क्षयशील है, और कर्ता होने से ज्ञानी लोग पुरुष को अक्षय कहते हैं। यही तुम्हारी चौथी आन्वीक्षिकी विद्या है, जो परलोक की ओर ले जाती है।"
श्लोक 48 (12.323.48)
विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि । एकान्तदर्शना वेदाः सर्वे विश्वावसो स्मृताः ॥
vidyopetaṃ dhanaṃ kṛtvā karmaṇā nityakarmaṇi | ekāntadarśanā vedāḥ sarve viśvāvaso smṛtāḥ
"नित्य कर्म में कर्म द्वारा विद्या से युक्त धन बनाकर, हे विश्वावसु, सभी वेद एक ही अन्तिम सत्य का दर्शन कराने वाले माने गए हैं।"
श्लोक 49 (12.323.49)
जायन्ते च म्रियन्ते च यस्मिन्नेते यतश्च्युताः । वेदार्थं ये न जानीते वेद्यं गन्धर्वसत्तम ॥
jāyante ca mriyante ca yasminnete yataścyutāḥ | vedārthaṃ ye na jānīte vedyaṃ gandharvasattama
"हे गन्धर्वश्रेष्ठ, जो लोग वेद का वह अर्थ नहीं जानते, वह जानने योग्य तत्त्व जिसमें ये प्राणी जन्म लेते और मरते हैं और जिससे ये च्युत हुए हैं,"
श्लोक 50 (12.323.50)
साङ्गोपाङ्गानपि यदि पञ्च वेदानधीयते । वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः ॥
sāṅgopāṅgānapi yadi pañca vedānadhīyate | vedavedyaṃ na jānīte vedabhāravaho hi saḥ
"चाहे वे अंगों और उपांगों सहित पाँचों वेदों का अध्ययन कर लें, फिर भी यदि वेद के जानने योग्य तत्त्व को नहीं जानते, तो वे केवल वेद का बोझ ढोने वाले हैं।"
श्लोक 51 (12.323.51)
यो घृतार्थी खराक्षीरं मथेद्गन्धर्वसत्तम । विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम् ॥
yo ghṛtārthī kharākṣīraṃ mathedgandharvasattama | viṣṭhāṃ tatrānupaśyeta na maṇḍaṃ na ca vai ghṛtam
"हे गन्धर्वश्रेष्ठ, जो घी चाहने वाला गधी का दूध मथे, वह वहाँ मल ही देखेगा, न मलाई, न घी।"
श्लोक 52 (12.323.52)
तथा वेद्यमवेद्यं च वेदविद्यो न विन्दति । स केवलं मूढमतिर्वेदभारवहः स्मृतः ॥
tathā vedyamavedyaṃ ca vedavidyo na vindati | sa kevalaṃ mūḍhamatirvedabhāravahaḥ smṛtaḥ
"इसी प्रकार वेद का विद्वान् जो वेद्य और अवेद्य को नहीं पाता, वह मूढ़बुद्धि केवल वेद का बोझ ढोने वाला कहा गया है।"
श्लोक 53 (12.323.53)
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना । यथाऽस्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ॥
draṣṭavyau nityamevaitau tatpareṇāntarātmanā | yathā'sya janmanidhane na bhavetāṃ punaḥ punaḥ
"इन दोनों को सदा तत्पर अन्तरात्मा से देखना चाहिए, जिससे इसके जन्म और मृत्यु बार-बार न हों।"
श्लोक 54 (12.323.54)
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम् । परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थितः ॥
ajasraṃ janmanidhanaṃ cintayitvā trayīmimām | parityajya kṣayamiha akṣayaṃ dharmamāsthitaḥ
"इस त्रयी में जन्म-मरण के निरन्तर चक्र का चिन्तन करके और यहाँ के नश्वर को त्यागकर वह अक्षय धर्म में स्थित हो गया है।"
श्लोक 55 (12.323.55)
यदाऽनुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप । तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ॥
yadā'nupaśyate'tyantamahanyahani kāśyapa | tadā sa kevalībhūtaḥ ṣaḍviṃśamanupaśyati
"हे काश्यप, जब वह दिन-प्रतिदिन उसे पूरी तरह देखता है, तब केवल (कैवल्य को प्राप्त) होकर वह छब्बीसवें तत्त्व को देखता है।"
श्लोक 56 (12.323.56)
अन्यश्च शाश्वतो व्यक्तस्तथाऽन्यः पञ्चविंशकः । तत्स्थं समनुपश्यन्ति तमेकमिति साधवः ॥
anyaśca śāśvato vyaktastathā'nyaḥ pañcaviṃśakaḥ | tatsthaṃ samanupaśyanti tamekamiti sādhavaḥ
"एक शाश्वत व्यक्त है, और दूसरा पच्चीसवाँ है। साधु लोग उसमें स्थित को देखकर उसे एक ही मानते हैं।"
श्लोक 57 (12.323.57)
तेनैतं नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् । जन्ममृत्युभयाद्योगाः सांख्याश्च परमैषिणः ॥
tenaitaṃ nābhinandanti pañcaviṃśakamacyutam | janmamṛtyubhayādyogāḥ sāṃkhyāśca paramaiṣiṇaḥ
"इसी कारण परम पद की इच्छा रखने वाले, जन्म और मृत्यु के भय से डरे हुए योगी और साङ्ख्य इस पच्चीसवें, अच्युत तत्त्व से सन्तुष्ट नहीं होते।"
विश्वावसुरुवाच
श्लोक 58 (12.323.58)
पञ्चविंशं यदेतत्ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम । तदहं न तथा वेद्मि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
pañcaviṃśaṃ yadetatte proktaṃ brāhmaṇasattama | tadahaṃ na tathā vedmi tadbhavānvaktumarhati
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आपने जो यह पच्चीसवाँ तत्त्व बताया है, उसे मैं उस प्रकार नहीं समझता। आप ही इसे समझाने योग्य हैं।
श्लोक 59 (12.323.59)
जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य मया श्रुतम् । पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ॥
jaigīṣavyasyāsitasya devalasya mayā śrutam | parāśarasya viprarṣervārṣagaṇyasya dhīmataḥ
मैंने इसे जैगीषव्य, असित, देवल, ऋषि पराशर और बुद्धिमान् वार्षगण्य से सुना है,
श्लोक 60 (12.323.60)
भिक्षोः पञ्चशिखस्यास्य कपिलस्य शुकस्य च । गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ॥
bhikṣoḥ pañcaśikhasyāsya kapilasya śukasya ca | gautamasyārṣṭiṣeṇasya gargasya ca mahātmanaḥ
भिक्षु पञ्चशिख, कपिल और शुक, गौतम, आर्ष्टिषेण और महात्मा गर्ग से,
श्लोक 61 (12.323.61)
नारदस्यासुरेश्चैव पुलस्त्यस्य च धीमतः । सनत्कुमारस्य ततः शुक्रस्य च महात्मनः ॥
nāradasyāsureścaiva pulastyasya ca dhīmataḥ | sanatkumārasya tataḥ śukrasya ca mahātmanaḥ
नारद, आसुरि, बुद्धिमान् पुलस्त्य, फिर सनत्कुमार और महात्मा शुक्र से,
श्लोक 62 (12.323.62)
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मया श्रुतम् । तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ॥
kaśyapasya pituścaiva pūrvameva mayā śrutam | tadanantaraṃ ca rudrasya viśvarūpasya dhīmataḥ
और कश्यप तथा अपने पिता से भी। इन्हें मैंने पहले सुना था, और उनके बाद रुद्र तथा बुद्धिमान् विश्वरूप से,
श्लोक 63 (12.323.63)
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैतेयेभ्यस्ततस्ततः । प्राप्तमेतन्मया कृत्स्नं वेद्यं नित्यं वदन्त्युत ॥
daivatebhyaḥ pitṛbhyaśca daiteyebhyastatastataḥ | prāptametanmayā kṛtsnaṃ vedyaṃ nityaṃ vadantyuta
और देवताओं, पितरों तथा दैत्यों से यहाँ-वहाँ। यह सब मैंने पाया है; वे इसे नित्य जानने योग्य तत्त्व कहते हैं।
श्लोक 64 (12.323.64)
तस्मात्तद्वै भवद्बुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि ब्राह्मण । भवान्प्रबर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिबुद्धिमान् ॥
tasmāttadvai bhavadbuddhyā śrotumicchāmi brāhmaṇa | bhavānprabarhaḥ śāstrāṇāṃ pragalbhaścātibuddhimān
इसलिए, हे ब्राह्मण, मैं उसे आपकी बुद्धि से सुनना चाहता हूँ। आप शास्त्रों के प्रधान हैं, प्रगल्भ और अत्यन्त बुद्धिमान् हैं।
श्लोक 65 (12.323.65)
न तवाविदितं किंचिद्भवाञ्श्रुतिनिधिः स्मृतः । कथ्यसे देवलोके च पितृलोके च ब्राह्मण ॥
na tavāviditaṃ kiṃcidbhavāñśrutinidhiḥ smṛtaḥ | kathyase devaloke ca pitṛloke ca brāhmaṇa
आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है; आप श्रुति के भण्डार माने गए हैं। हे ब्राह्मण, देवलोक और पितृलोक में आपकी चर्चा होती है,
श्लोक 66 (12.323.66)
ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः । पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥
brahmalokagatāścaiva kathayanti maharṣayaḥ | patiśca tapatāṃ śaśvadādityastava bhāṣitā
और ब्रह्मलोक को गए महर्षि भी आपकी चर्चा करते हैं। तपने वालों के स्वामी आदित्य सदा आपसे बात करने वाले हैं।
श्लोक 67 (12.323.67)
साङ्ख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च । तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥
sāṅkhyajñānaṃ tvayā brahmannavāptaṃ kṛtsnameva ca | tathaiva yogaśāstraṃ ca yājñavalkya viśeṣataḥ
हे ब्रह्मन्, आपने साङ्ख्य का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया है, और वैसे ही, हे याज्ञवल्क्य, योगशास्त्र भी विशेष रूप से।
श्लोक 68 (12.323.68)
निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् । श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥
niḥsaṃdigdhaṃ prabuddhastvaṃ budhyamānaścarācaram | śrotumicchāmi tajjñānaṃ ghṛtaṃ maṇḍamayaṃ yathā
आप पूर्ण जागृत हैं, संशयरहित हैं, और चराचर को जानते हैं। मैं उस ज्ञान को सुनना चाहता हूँ, जैसे मलाई का सार घी चाहा जाता है।
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 69 (12.323.69)
कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम । जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥
kṛtsnadhāriṇameva tvāṃ manye gandharvasattama | jijñāsase ca māṃ rājaṃstannibodha yathāśrutam
हे गन्धर्वश्रेष्ठ, मैं तुम्हें सब कुछ धारण करने वाला मानता हूँ। और हे राजन्, तुम मुझसे जानना चाहते हो, तो जैसा सुना गया है वैसा सुनो।
श्लोक 70 (12.323.70)
बुध्यमानो हि प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः । न तु बुध्यति गन्धर्वप्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥
budhyamāno hi prakṛtiṃ budhyate pañcaviṃśakaḥ | na tu budhyati gandharvaprakṛtiḥ pañcaviṃśakam
पच्चीसवाँ तत्त्व जागृत होकर प्रकृति को जानता है; किन्तु हे गन्धर्व, प्रकृति पच्चीसवें को नहीं जानती।
श्लोक 71 (12.323.71)
अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् । साङ्ख्ययोगार्थतत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥
anena pratibodhena pradhānaṃ pravadanti tat | sāṅkhyayogārthatattvajñā yathāśrutinidarśanāt
इसी बोध के कारण साङ्ख्य और योग के तत्त्व को जानने वाले, श्रुति के निर्देश के अनुसार, उसे प्रधान कहते हैं।
श्लोक 72 (12.323.72)
पश्यंस्तथैव चापश्यन्पश्यत्यन्यः सदाऽनघ । षड्विंशं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च पश्यति ॥
paśyaṃstathaiva cāpaśyanpaśyatyanyaḥ sadā'nagha | ṣaḍviṃśaṃ pañcaviṃśaṃ ca caturviṃśaṃ ca paśyati
देखता हुआ भी न देखने वाला एक है, और एक दूसरा सदा देखता है, हे अनघ। छब्बीसवाँ पच्चीसवें और चौबीसवें को देखता है।
श्लोक 73 (12.323.73)
न तु पश्यति पश्यंस्तु यश्चैनमनुपश्यति । पञ्चविंशोऽभिमन्येत नान्योऽस्ति परतो मम ॥
na tu paśyati paśyaṃstu yaścainamanupaśyati | pañcaviṃśo'bhimanyeta nānyo'sti parato mama
फिर भी देखने वाला उसे नहीं देखता जो उसे देख रहा है; पच्चीसवाँ यही मानता है, "मुझसे परे कोई दूसरा नहीं है।"
श्लोक 74 (12.323.74)
न चतुर्विंशको ग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभिः । मत्स्यो वोदकमन्वेति प्रवर्तेत प्रवर्तनात् ॥
na caturviṃśako grāhyo manujairjñānadarśibhiḥ | matsyo vodakamanveti pravarteta pravartanāt
ज्ञान से देखने वाले मनुष्यों को चौबीसवें को आत्मा नहीं मानना चाहिए। जैसे मछली जल का अनुसरण करती है, वैसे ही वह प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ता रहता है।
श्लोक 75 (12.323.75)
यथैव बुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुबुध्यते । स स्नेहात्सहवासाच्च साभिमानाच्च नित्यशः ॥
yathaiva budhyate matsyastathaiṣo'pyanubudhyate | sa snehātsahavāsācca sābhimānācca nityaśaḥ
जैसे मछली जल को पहचानती है, वैसे ही वह भी स्नेह, साथ रहने और अभिमान के कारण निरन्तर उसे पहचानता है।
श्लोक 76 (12.323.76)
स निमज्जति कालस्य यदैकत्वं न बुध्यते । उन्मज्जति हि कालस्य ममत्वेनाभिसंवृतः ॥
sa nimajjati kālasya yadaikatvaṃ na budhyate | unmajjati hi kālasya mamatvenābhisaṃvṛtaḥ
जब तक वह एकत्व को नहीं समझता, तब तक वह काल में डूबता रहता है। वह ममत्व से घिरा हुआ काल में फिर उभरता है।
श्लोक 77 (12.323.77)
यदा तु मन्यतेऽन्योऽहमन्य एष इति द्विजः । तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ॥
yadā tu manyate'nyo'hamanya eṣa iti dvijaḥ | tadā sa kevalībhūtaḥ ṣaḍviṃśamanupaśyati
किन्तु जब द्विज यह मानता है कि "मैं अन्य हूँ और यह अन्य है," तब वह केवल होकर छब्बीसवें को देखता है।
श्लोक 78 (12.323.78)
अन्यश्च राजन्परमस्तथाऽन्यः पञ्चविंशकः । तत्स्थत्वादनुपश्यन्ति एक एवेति साधवः ॥
anyaśca rājanparamastathā'nyaḥ pañcaviṃśakaḥ | tatsthatvādanupaśyanti eka eveti sādhavaḥ
हे राजन्, एक परम है और दूसरा पच्चीसवाँ है। साधु लोग उसमें स्थित होने के कारण दोनों को एक ही देखते हैं।
श्लोक 79 (12.323.79)
तेनैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् । जन्ममृत्युभयाद्भीता योगाः साङ्ख्याश्च काश्यप । षड्विंशमनुपश्यन्तः शुचयस्तत्परायणाः ॥
tenaitannābhinandanti pañcaviṃśakamacyutam | janmamṛtyubhayādbhītā yogāḥ sāṅkhyāśca kāśyapa | ṣaḍviṃśamanupaśyantaḥ śucayastatparāyaṇāḥ
इसलिए, हे काश्यप, जन्म और मृत्यु से डरे हुए योगी और साङ्ख्य इस अच्युत पच्चीसवें को स्वीकार नहीं करते। वे पवित्र होकर, उसी में तत्पर रहकर, छब्बीसवें को देखते हैं।
श्लोक 80 (12.323.80)
यदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति । तदा स सर्वविद्विद्वान्न पुनर्जन्म विन्दति ॥
yadā sa kevalībhūtaḥ ṣaḍviṃśamanupaśyati | tadā sa sarvavidvidvānna punarjanma vindati
जब वह केवल होकर छब्बीसवें को देखता है, तब वह सर्वज्ञ और ज्ञानी हो जाता है और उसे फिर जन्म नहीं मिलता।
श्लोक 81 (12.323.81)
एवमप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ । बुद्धिश्चोक्ता यथातत्त्वं मया श्रुतिनिदर्शनात् ॥
evamapratibuddhaśca budhyamānaśca te'nagha | buddhiścoktā yathātattvaṃ mayā śrutinidarśanāt
इस प्रकार, हे अनघ, मैंने श्रुति के निर्देश के अनुसार अप्रबुद्ध और बुध्यमान का, तथा बुद्धि का, यथार्थ रूप से वर्णन किया।
श्लोक 82 (12.323.82)
पश्यापश्यं यो न पश्येत्क्षेम्यं तत्वं च काश्यप । केवलाकेवलं चान्यत्पञ्चविंशं परं च यत् ॥
paśyāpaśyaṃ yo na paśyetkṣemyaṃ tatvaṃ ca kāśyapa | kevalākevalaṃ cānyatpañcaviṃśaṃ paraṃ ca yat
हे काश्यप, जो देखने और न देखने को, क्षेम और तत्त्व को, केवल और अकेवल को, और उस अन्य को जो पच्चीसवें से परे है, न देखे,
विश्वावसुरुवाच
श्लोक 83 (12.323.83)
तथ्यं शुभं चैतदुक्तं त्वया विभो । सम्यक्क्षेम्यं दैवताद्यं यथावत् । स्वस्त्यक्षयं भवतश्चास्तु नित्यं । बुद्ध्या सदा बुद्धियुक्तं नमस्ये ॥
tathyaṃ śubhaṃ caitaduktaṃ tvayā vibho | samyakkṣemyaṃ daivatādyaṃ yathāvat | svastyakṣayaṃ bhavataścāstu nityaṃ | buddhyā sadā buddhiyuktaṃ namasye
"हे प्रभु, आपने जो कहा वह सत्य और शुभ है, ठीक-ठीक क्षेम देने वाला और देवों से भी पहले का है, जैसा वह है वैसा ही। आपका सदा अक्षय कल्याण हो। बुद्धि से सदा युक्त आपको मैं बुद्धि के साथ प्रणाम करता हूँ।"
याज्ञवल्क्य उवाच
श्लोक 84 (12.323.84)
एवमुक्त्वा संप्रयातो दिवं स । विभ्राजन्वै श्रीमता दर्शनेन । दृष्टश्च तुष्ट्या परयाऽभिनन्द्य । प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ॥
evamuktvā saṃprayāto divaṃ sa | vibhrājanvai śrīmatā darśanena | dṛṣṭaśca tuṣṭyā parayā'bhinandya | pradakṣiṇaṃ mama kṛtvā mahātmā
यह कहकर उस महात्मा ने परम सन्तोष से मेरा अभिनन्दन किया और मेरी प्रदक्षिणा की; फिर वह अपने तेजस्वी रूप से चमकता हुआ आकाश में चला गया।
श्लोक 85 (12.323.85)
ब्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च । ये चाधस्तात्संवसन्ते नरेन्द्र । तत्रैव तद्दर्शनं दर्शयन्वै । सम्यक्क्षेम्यं ये पथं संश्रिता वै ॥
brahmādīnāṃ khecarāṇāṃ kṣitau ca | ye cādhastātsaṃvasante narendra | tatraiva taddarśanaṃ darśayanvai | samyakkṣemyaṃ ye pathaṃ saṃśritā vai
ब्रह्मा आदि आकाशचारियों में, पृथ्वी पर, और जो नीचे रहते हैं उनमें, हे नरेन्द्र, यह दर्शन वहीं उन्हें दिखाया जाता है जिन्होंने क्षेम के मार्ग का भली-भाँति आश्रय लिया है।
श्लोक 86 (12.323.86)
साङ्ख्याः सर्वे साङ्ख्यधर्मे रताश्च । तद्वद्योगा योगधर्मे रताश्च । ये चाप्यन्ये मोक्षकामा मनुष्या । स्तेषामेतद्दर्शनं ज्ञानदृष्टम् ॥
sāṅkhyāḥ sarve sāṅkhyadharme ratāśca | tadvadyogā yogadharme ratāśca | ye cāpyanye mokṣakāmā manuṣyā | steṣāmetaddarśanaṃ jñānadṛṣṭam
साङ्ख्य धर्म में लगे सब साङ्ख्य, वैसे ही योगधर्म में लगे योगी, और मोक्ष चाहने वाले जो भी अन्य मनुष्य हैं, उनके लिए यह दर्शन ज्ञान से देखा गया है।
श्लोक 87 (12.323.87)
ज्ञानान्मोक्षो जायते राजसिंह । नास्त्यज्ञानादेवमाहुर्नरेन्द्र । तस्माज्ज्ञानं तत्त्वतोऽन्वेषितव्यं । येनात्मानं मोक्षयेज्जन्ममृत्योः ॥
jñānānmokṣo jāyate rājasiṃha | nāstyajñānādevamāhurnarendra | tasmājjñānaṃ tattvato'nveṣitavyaṃ | yenātmānaṃ mokṣayejjanmamṛtyoḥ
हे राजसिंह, मोक्ष ज्ञान से उत्पन्न होता है; हे नरेन्द्र, अज्ञान से नहीं, ऐसा वे कहते हैं। इसलिए ज्ञान को यथार्थ रूप से खोजना चाहिए, जिससे मनुष्य जन्म और मृत्यु से अपने को मुक्त कर सके।
श्लोक 88 (12.323.88)
प्राप्य ज्ञानं ब्राह्मणात्क्षत्रियाद्वा । वैश्याच्छूद्रादपि नीचादभीक्ष्णम् । श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं । न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम् ॥
prāpya jñānaṃ brāhmaṇātkṣatriyādvā | vaiśyācchūdrādapi nīcādabhīkṣṇam | śraddhātavyaṃ śraddadhānena nityaṃ | na śraddhinaṃ janmamṛtyū viśetām
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यहाँ तक कि नीच से भी बार-बार ज्ञान पाकर श्रद्धावान् को सदा श्रद्धा रखनी चाहिए। श्रद्धावान् में जन्म और मृत्यु प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 89 (12.323.89)
सर्वे वर्णा ब्राह्मणा ब्रह्मजाश्च । सर्वे नित्यं व्याहरन्ते च ब्रह्म । तत्त्वं शास्त्रं ब्रह्मबुद्ध्या ब्रवीमि । सर्वं विश्वं ब्रह्म चैतत्समस्तम् ॥
sarve varṇā brāhmaṇā brahmajāśca | sarve nityaṃ vyāharante ca brahma | tattvaṃ śāstraṃ brahmabuddhyā bravīmi | sarvaṃ viśvaṃ brahma caitatsamastam
सभी वर्ण ब्राह्मण हैं और ब्रह्म से उत्पन्न हैं; सभी सदा ब्रह्म का उच्चारण करते हैं। मैं ब्रह्मबुद्धि से तत्त्व और शास्त्र का कथन करता हूँ: यह सारा विश्व ब्रह्म ही है, सब कुछ।
श्लोक 90 (12.323.90)
ब्रह्मास्यतो ब्राह्मणाः संप्रसूता । बाहुभ्यां वै क्षत्रियाः संप्रसूताः । नाभ्यां वैश्याः पादतश्चापि शूद्राः । सर्वे वर्णा नान्यथा वेदितव्याः ॥
brahmāsyato brāhmaṇāḥ saṃprasūtā | bāhubhyāṃ vai kṣatriyāḥ saṃprasūtāḥ | nābhyāṃ vaiśyāḥ pādataścāpi śūdrāḥ | sarve varṇā nānyathā veditavyāḥ
ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, भुजाओं से क्षत्रिय, नाभि से वैश्य और चरणों से शूद्र। सभी वर्णों को किसी अन्य प्रकार से नहीं जानना चाहिए।
श्लोक 91 (12.323.91)
अज्ञानतः कर्मयोनिं भजन्ते । तांतां राजंस्ते यथा यान्त्यभावम् । तथा वर्णा ज्ञानहीनाः पतन्ते । घोरादज्ञानात्प्राकृतं योनिजालम् ॥
ajñānataḥ karmayoniṃ bhajante | tāṃtāṃ rājaṃste yathā yāntyabhāvam | tathā varṇā jñānahīnāḥ patante | ghorādajñānātprākṛtaṃ yonijālam
अज्ञान के कारण वे कर्मों से बनी योनियों में बार-बार जन्म लेते हैं; हे राजन्, वे जैसे-जैसे जाते हैं, अभाव को प्राप्त होते हैं। वैसे ही ज्ञानहीन वर्ण भयंकर अज्ञान से स्वाभाविक योनियों के जाल में गिरते हैं।
श्लोक 92 (12.323.92)
तस्माज्ज्ञानं सर्वतो मार्गितव्यं । सर्वत्रस्थं चैतदुक्तं मया ते । तत्स्थो ब्रह्मा तस्थिवांश्चापरो य । स्तस्मै नित्यं मोक्षमाहुर्नरेन्द्र ॥
tasmājjñānaṃ sarvato mārgitavyaṃ | sarvatrasthaṃ caitaduktaṃ mayā te | tatstho brahmā tasthivāṃścāparo ya | stasmai nityaṃ mokṣamāhurnarendra
इसलिए ज्ञान को सब ओर से खोजना चाहिए; जो मैंने तुम्हें कहा वह सर्वत्र स्थित है। उसमें स्थित रहने वाले के लिए, चाहे वह ब्रह्मा हो या कोई और जो वहाँ खड़ा हो, हे नरेन्द्र, वे सदा मोक्ष कहते हैं।
श्लोक 93 (12.323.93)
यत्ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं । याथातथ्यं तद्विशोको भजस्व । राजन्गच्छस्वैतदर्थस्य पारं । सम्यक्प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम् ॥
yatte pṛṣṭaṃ tanmayā copadiṣṭaṃ | yāthātathyaṃ tadviśoko bhajasva | rājangacchasvaitadarthasya pāraṃ | samyakproktaṃ svasti te tvastu nityam
जो तुमने पूछा था वह मैंने ठीक-ठीक बता दिया; शोकरहित होकर उसे अपनाओ। हे राजन्, इस विषय के पार जाओ। यह भली-भाँति कहा गया है; तुम्हारा सदा कल्याण हो।
भीष्म उवाच
श्लोक 94 (12.323.94)
स एवमनुशिष्टस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता । प्रीतिमानभवद्राजा मिथिलाधिपतिस्तदा ॥
sa evamanuśiṣṭastu yājñavalkyena dhīmatā | prītimānabhavadrājā mithilādhipatistadā
बुद्धिमान् याज्ञवल्क्य से इस प्रकार उपदेश पाकर मिथिला के राजा तब प्रसन्न हो गए।
श्लोक 95 (12.323.95)
गते मुनिवरे तस्मिन्कृते चापि प्रदक्षिणम् । दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित् ॥
gate munivare tasminkṛte cāpi pradakṣiṇam | daivarātirnarapatirāsīnastatra mokṣavit
जब श्रेष्ठ मुनि चले गए और प्रदक्षिणा हो चुकी, तब मोक्ष को जानने वाले राजा दैवराति वहीं बैठे रहे।
श्लोक 96 (12.323.96)
गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यस्य तथैव च । रत्नाञ्जलिमथैकैकं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा ॥
gokoṭiṃ sparśayāmāsa hiraṇyasya tathaiva ca | ratnāñjalimathaikaikaṃ brāhmaṇebhyo dadau tadā
उन्होंने एक करोड़ गायें और उतना ही सोना ब्राह्मणों को स्पर्श कराया, और फिर प्रत्येक ब्राह्मण को एक-एक अञ्जलि रत्न दिए।
श्लोक 97 (12.323.97)
विदेहराज्यं च तदा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै । यतिधर्ममुपास्यंश्चाप्यवसन्मिथिलाधिपः ॥
videharājyaṃ ca tadā pratiṣṭhāpya sutasya vai | yatidharmamupāsyaṃścāpyavasanmithilādhipaḥ
विदेह के राज्य पर अपने पुत्र को स्थापित करके मिथिला के स्वामी यति-धर्म का पालन करते हुए रहने लगे,
श्लोक 98 (12.323.98)
साङ्ख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः । धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन् ॥
sāṅkhyajñānamadhīyāno yogaśāstraṃ ca kṛtsnaśaḥ | dharmādharmaṃ ca rājendra prākṛtaṃ parigarhayan
साङ्ख्य ज्ञान और सम्पूर्ण योगशास्त्र का अध्ययन करते हुए और, हे राजेन्द्र, धर्म-अधर्म को प्रकृति का मानकर उसकी निन्दा करते हुए।
श्लोक 99 (12.323.99)
अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च । धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च ॥
ananta iti kṛtvā sa nityaṃ kevalameva ca | dharmādharmau puṇyapāpe satyāsatye tathaiva ca
उसे अनन्त, नित्य और केवल मानकर उन्होंने धर्म और अधर्म, पुण्य और पाप, सत्य और असत्य को,
श्लोक 100 (12.323.100)
जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत् । ब्रह्माव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप ॥
janmamṛtyū ca rājendra prākṛtaṃ tadacintayat | brahmāvyaktasya karmedamiti nityaṃ narādhipa
और हे राजेन्द्र, जन्म और मृत्यु को भी, प्रकृति का माना। हे नराधिप, वे सदा सोचते थे कि "यह अव्यक्त ब्रह्मा का कर्म है।"
श्लोक 101 (12.323.101)
पश्यन्ति योगाः साङ्ख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः । इष्टानिष्टविमुक्तं हि तस्थौ ब्रह्म परात्परम् ॥
paśyanti yogāḥ sāṅkhyāśca svaśāstrakṛtalakṣaṇāḥ | iṣṭāniṣṭavimuktaṃ hi tasthau brahma parātparam
अपने-अपने शास्त्र के लक्षणों वाले योगी और साङ्ख्य देखते हैं कि इष्ट और अनिष्ट से मुक्त ब्रह्म परात्पर रूप में स्थित है।
श्लोक 102 (12.323.102)
नित्यं तदाहुर्विद्वांसः शुचि तस्माच्छुचिर्भव । दीयते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते ॥
nityaṃ tadāhurvidvāṃsaḥ śuci tasmācchucirbhava | dīyate yacca labhate dattaṃ yaccānumanyate
विद्वान् उसे नित्य और शुद्ध कहते हैं; इसलिए तुम शुद्ध बनो। जो दिया जाता है, जो मिलता है, जो दिया गया और जिसका अनुमोदन किया जाता है,
श्लोक 103 (12.323.103)
अव्यक्तेनेति तच्चिन्त्यमन्यथा मा विचिन्तय । ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह । ददात्यव्यक्त इत्येतत्प्रतिगृह्णाति यच्च वै ॥
avyakteneti taccintyamanyathā mā vicintaya | dadāti ca naraśreṣṭha pratigṛhṇāti yacca ha | dadātyavyakta ityetatpratigṛhṇāti yacca vai
"यह अव्यक्त के द्वारा होता है", ऐसा सोचना चाहिए; इसे अन्यथा मत सोचो। हे नरश्रेष्ठ, जो देता है और जो लेता है, दोनों के विषय में यही सोचो कि अव्यक्त ही देता है और अव्यक्त ही लेता भी है।
श्लोक 104 (12.323.104)
आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत् । एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय ॥
ātmā hyevātmano hyekaḥ ko'nyastasmātparo bhavet | evaṃ manyasva satatamanyathā mā vicintaya
आत्मा ही अपना एकमात्र आत्मा है; उससे श्रेष्ठ दूसरा कौन हो सकता है? इसे सदा मानो और इसके विपरीत मत सोचो।
श्लोक 105 (12.323.105)
यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः । तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्या विपश्चिता ॥
yasyāvyaktaṃ na viditaṃ saguṇaṃ nirguṇaṃ punaḥ | tena tīrthāni yajñāśca sevitavyā vipaścitā
जिस बुद्धिमान् ने अव्यक्त को नहीं जाना, चाहे वह सगुण हो या निर्गुण, उसे तीर्थों और यज्ञों का सेवन करना चाहिए।
श्लोक 106 (12.323.106)
न स्वाध्यायैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन । लभतेऽव्यक्तिकं स्थानं ज्ञात्वाऽव्यक्तं महीयते ॥
na svādhyāyaistapobhirvā yajñairvā kurunandana | labhate'vyaktikaṃ sthānaṃ jñātvā'vyaktaṃ mahīyate
हे कुरुनन्दन, स्वाध्याय, तप या यज्ञ से अव्यक्त का स्थान नहीं मिलता; अव्यक्त को जानकर ही मनुष्य महिमा पाता है।
श्लोक 107 (12.323.107)
तथैव महतः स्थानमाहंकारिकमेव च । अहंकारात्परं चापि स्थानानि समवाप्नुयात् ॥
tathaiva mahataḥ sthānamāhaṃkārikameva ca | ahaṃkārātparaṃ cāpi sthānāni samavāpnuyāt
वैसे ही वह महत् के स्थान को, अहंकार के स्थान को, और अहंकार से परे के स्थानों को प्राप्त कर सकता है।
श्लोक 108 (12.323.108)
ये त्वव्यक्तात्परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः । जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं सदसच्च यत् ॥
ye tvavyaktātparaṃ nityaṃ jānate śāstratatparāḥ | janmamṛtyuvimuktaṃ ca vimuktaṃ sadasacca yat
जो शास्त्र में तत्पर लोग अव्यक्त से परे उस नित्य तत्त्व को जानते हैं जो जन्म और मृत्यु से मुक्त है और सत् तथा असत् से भी मुक्त है,
श्लोक 109 (12.323.109)
एतन्मयाऽऽप्तं जनकात्पुरस्ता । त्तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् । ज्ञातं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा । ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ॥
etanmayā''ptaṃ janakātpurastā | ttenāpi cāptaṃ nṛpa yājñavalkyāt | jñātaṃ viśiṣṭaṃ na tathā hi yajñā | jñānena durgaṃ tarate na yajñaiḥ
यह मैंने बहुत पहले जनक से पाया, और हे राजन्, उन्होंने भी इसे याज्ञवल्क्य से पाया। जो जाना गया वही श्रेष्ठ है, यज्ञ वैसे नहीं हैं। ज्ञान से मनुष्य दुर्गम को पार करता है, यज्ञों से नहीं।
श्लोक 110 (12.323.110)
दुर्गं जन्म निधनं चापि राज । न्न भौतिकं ज्ञानविदो वदन्ति । यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्व्रतैश्च । दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ॥
durgaṃ janma nidhanaṃ cāpi rāja | nna bhautikaṃ jñānavido vadanti | yajñaistapobhirniyamairvrataiśca | divaṃ samāsādya patanti bhūmau
हे राजन्, जन्म और मृत्यु ही दुर्गम हैं; ज्ञानी लोग उन्हें भौतिक नहीं कहते। यज्ञ, तप, नियम और व्रतों से लोग स्वर्ग पाकर फिर भूमि पर गिरते हैं।
श्लोक 111 (12.323.111)
तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि । शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् । क्षेत्रं ज्ञात्वा पार्थिव ज्ञानयज्ञ । मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ॥
tasmādupāsasva paraṃ mahacchuci | śivaṃ vimokṣaṃ vimalaṃ pavitram | kṣetraṃ jñātvā pārthiva jñānayajña | mupāsya vai tattvamṛṣirbhaviṣyasi
इसलिए उस परम, महान्, शुद्ध, शिव, विमोक्ष, निर्मल और पवित्र की उपासना करो। हे राजन्, क्षेत्र को जानकर और ज्ञानयज्ञ का सेवन करके तुम तत्त्व के द्रष्टा ऋषि बनोगे।
श्लोक 112 (12.323.112)
यदुपनिषदमुपाकरोत्तथाऽसौ । जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः । यदुपगणितशाश्वताव्ययं त । च्छुभममृतत्वमशोकमृच्छति ॥
yadupaniṣadamupākarottathā'sau | janakanṛpasya purā hi yājñavalkyaḥ | yadupagaṇitaśāśvatāvyayaṃ ta | cchubhamamṛtatvamaśokamṛcchati
जो उपनिषद् याज्ञवल्क्य ने प्राचीन काल में राजा जनक को सुनाई थी, जो नित्य और अविनाशी गिनी जाती है, वह उस शुभ, अमर, शोकरहित अवस्था तक पहुँचाती है।