शान्ति पर्व · अध्याय 325
सुलभा द्वारा राजा जनक की परीक्षा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि गृहस्थ-जीवन छोड़े बिना किस राजा ने सिद्धि पाई, और भीष्म मिथिला के राजा जनक और भिक्षुणी सुलभा का पुराना संवाद सुनाते हैं। जनक सचमुच मुक्त हैं या नहीं, इस संशय से सुलभा सुन्दर रूप धारण करके उनकी सभा में आती है और योग से उनके मन में प्रवेश करती है। जनक उससे प्रश्न करते हैं, पञ्चशिख के शिष्य के रूप में राजा रहते हुए अपने को मुक्त बताते हैं, और फिर वर्णों, आश्रमों और गोत्रों के मेल तथा उसकी गुप्त मंशा के लिए उसे फटकारते हैं। सुलभा पहले यह बताती है कि सुगठित वाणी किसे कहते हैं, और आगे के श्लोकों में समझाती है कि प्राणी तत्त्वों और गुणों का संयोग है, जनक की अनासक्ति के दावों का खण्डन करती है और अपना कुल बताती है। जनक कोई उत्तर नहीं दे पाते।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.325.1)
अपरित्यज्य गार्हस्थ्यं कुरुराजर्षिसत्तम । कः प्राप्तो भूपतिः सिद्धिं मोक्षतत्त्वं वदस्व मे ॥
aparityajya gārhasthyaṃ kururājarṣisattama | kaḥ prāpto bhūpatiḥ siddhiṃ mokṣatattvaṃ vadasva me
हे कुरुवंश के श्रेष्ठ राजर्षि, गृहस्थ-जीवन को छोड़े बिना कौन-सा राजा सिद्धि को प्राप्त हुआ है? मुझे मोक्ष का तत्त्व बताइए।
श्लोक 2 (12.325.2)
संन्यस्यते यथाऽत्माऽयं व्यक्तस्यात्मा यथा च यत् । परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
saṃnyasyate yathā'tmā'yaṃ vyaktasyātmā yathā ca yat | paraṃ mokṣasya yaccāpi tanme brūhi pitāmaha
पितामह, मुझे बताइए कि यह आत्मा किस प्रकार संन्यस्त की जाती है, व्यक्त प्राणी का आत्मा किस प्रकार स्थित रहता है, और मोक्ष की परम अवस्था क्या है।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.325.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । जनकस्य च संवादं सुलभायाश्च भारत ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | janakasya ca saṃvādaṃ sulabhāyāśca bhārata
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: हे भारत, जनक और सुलभा का संवाद।
श्लोक 4 (12.325.4)
संन्यासफलिकः कश्चिद्बभूव नृपतिः पुरा । मैथिलो जनको नाम धर्मध्वज इति श्रुतः ॥
saṃnyāsaphalikaḥ kaścidbabhūva nṛpatiḥ purā | maithilo janako nāma dharmadhvaja iti śrutaḥ
प्राचीन काल में संन्यास का फल पा चुका एक राजा था, मिथिला का जनक, जो धर्मध्वज नाम से प्रसिद्ध था।
श्लोक 5 (12.325.5)
स वेदे मोक्षशास्त्रे च स्वे च शास्त्रे कृतश्रमः । इन्द्रियाणि समाधाय शशास वसुधामिमाम् ॥
sa vede mokṣaśāstre ca sve ca śāstre kṛtaśramaḥ | indriyāṇi samādhāya śaśāsa vasudhāmimām
उसने वेद में, मोक्षशास्त्र में और अपने राजधर्म के शास्त्र में परिश्रम किया था; इन्द्रियों को वश में रखकर वह इस पृथ्वी पर शासन करता था।
श्लोक 6 (12.325.6)
तस्य वेदविदः प्राज्ञाः श्रुत्वा तां साधुवृत्तताम् । लोकेषु स्पृहयन्त्यन्ये पुरुषाः पुरुषेश्वरम् ॥
tasya vedavidaḥ prājñāḥ śrutvā tāṃ sādhuvṛttatām | lokeṣu spṛhayantyanye puruṣāḥ puruṣeśvaram
वेद के जानकार बुद्धिमान लोग उसके सदाचार की बात सुनकर उसकी प्रशंसा करते थे, और संसार के अन्य मनुष्य भी उस नरेश को चाहने लगे थे।
श्लोक 7 (12.325.7)
अथ धर्मयुगे तस्मिन्योगधर्ममनुष्ठिता । महीमनुचचारैका सुलभा नाम भिक्षुकी ॥
atha dharmayuge tasminyogadharmamanuṣṭhitā | mahīmanucacāraikā sulabhā nāma bhikṣukī
तब उस धर्मयुग में योगधर्म का पालन करने वाली सुलभा नाम की एक भिक्षुणी अकेली पृथ्वी पर विचरण करती थी।
श्लोक 8 (12.325.8)
तया जगदिदं कृत्स्नमटन्त्या मिथिलेश्वरः । तत्रतत्र श्रुतो मोक्षे कथ्यमानस्त्रिदण्डिभिः ॥
tayā jagadidaṃ kṛtsnamaṭantyā mithileśvaraḥ | tatratatra śruto mokṣe kathyamānastridaṇḍibhiḥ
इस सारे जगत् में घूमते हुए उसने जगह-जगह त्रिदण्डी संन्यासियों के मुख से मोक्ष के विषय में मिथिलापति की चर्चा सुनी।
श्लोक 9 (12.325.9)
साऽतिसूक्ष्मां कथां श्रुत्वा तथ्यं नेति ससंशया । दर्शने जातसंकल्पा जनकस्य बभूव ह ॥
sā'tisūkṣmāṃ kathāṃ śrutvā tathyaṃ neti sasaṃśayā | darśane jātasaṃkalpā janakasya babhūva ha
उस अत्यन्त सूक्ष्म वृत्तान्त को सुनकर, यह सोचकर कि वह सच है या नहीं, संशय में पड़कर उसने जनक के दर्शन का निश्चय किया।
श्लोक 10 (12.325.10)
तत्र सा विप्रहायाऽथ पूर्वरूपं हि योगतः । अबिभ्रदनवद्याङ्गी रूपमन्यदनुत्तमम् ॥
tatra sā viprahāyā'tha pūrvarūpaṃ hi yogataḥ | abibhradanavadyāṅgī rūpamanyadanuttamam
वहाँ योगबल से उसने अपना पहला रूप त्याग दिया और निर्दोष अंगों वाली उस स्त्री ने दूसरा, परम सुन्दर रूप धारण कर लिया।
श्लोक 11 (12.325.11)
चक्षुर्निमेषमात्रेण लध्वस्त्रगतिगामिनी । विदेहानां पुरीं सुभ्रूर्जगाम कमलेक्षणा ॥
cakṣurnimeṣamātreṇa ladhvastragatigāminī | videhānāṃ purīṃ subhrūrjagāma kamalekṣaṇā
पलक झपकते ही, फेंके हुए अस्त्र की गति से चलकर वह सुन्दर भौंहों और कमल-जैसे नेत्रों वाली स्त्री विदेहों की नगरी में जा पहुँची।
श्लोक 12 (12.325.12)
सा प्राप्य मिथिलां रम्यां समृद्धजनसंकुलाम् । भैक्ष्यचर्यापदेशेन ददर्श मिथिलेश्वरम् ॥
sā prāpya mithilāṃ ramyāṃ samṛddhajanasaṃkulām | bhaikṣyacaryāpadeśena dadarśa mithileśvaram
समृद्ध जनों से भरी हुई रमणीय मिथिला में पहुँचकर उसने भिक्षा माँगने के बहाने मिथिलापति के दर्शन किए।
श्लोक 13 (12.325.13)
राजा तस्याः परं दृष्ट्वा सौकुमार्यं पुनस्तदा । केयं कस्य कुतो वेति बभूवागतविस्मयः ॥
rājā tasyāḥ paraṃ dṛṣṭvā saukumāryaṃ punastadā | keyaṃ kasya kuto veti babhūvāgatavismayaḥ
उसकी परम सुकुमारता को देखकर राजा विस्मय से भर गया और सोचने लगा, "यह कौन है, किसकी है और कहाँ से आई है?"
श्लोक 14 (12.325.14)
ततोस्याः स्वागतं कृत्वा व्यादिश्य च वरासनम् । पूजितां पादशौचेन वरान्नेनाप्यतर्पयत् ॥
tatosyāḥ svāgataṃ kṛtvā vyādiśya ca varāsanam | pūjitāṃ pādaśaucena varānnenāpyatarpayat
फिर उसने उसका स्वागत किया, उत्तम आसन दिखाया, पाँव धोने का जल देकर उसका सत्कार किया और उत्तम अन्न से उसे तृप्त किया।
श्लोक 15 (12.325.15)
अथ भुक्तवतीं प्रीतां राजा तां मन्त्रिभिर्वृतः । सर्वभाष्यविदां मध्ये चोदयामास भिक्षुकीम् ॥
atha bhuktavatīṃ prītāṃ rājā tāṃ mantribhirvṛtaḥ | sarvabhāṣyavidāṃ madhye codayāmāsa bhikṣukīm
जब वह भिक्षुणी भोजन करके प्रसन्न हो गई, तब मन्त्रियों से घिरे हुए राजा ने सब भाष्यों के जानकारों के बीच उससे प्रश्न करना आरम्भ किया।
श्लोक 16 (12.325.16)
सुलभा त्वस्य धर्मेषु मुक्तो नेति ससंशया । सत्वं सत्वेन योगज्ञा प्रविष्टाऽभून्महीपते ॥
sulabhā tvasya dharmeṣu mukto neti sasaṃśayā | satvaṃ satvena yogajñā praviṣṭā'bhūnmahīpate
परन्तु हे पृथ्वीपति, सुलभा ने यह संशय करके कि यह राजा अपने आचरण में सचमुच मुक्त है या नहीं, योग की जानकार होने से अपने मन से उसके मन में प्रवेश किया।
श्लोक 17 (12.325.17)
नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्य रश्मीन्संयोज्य रश्मिभिः । सा स्म तं चोदयिष्यन्ती योगबन्धैर्बबन्ध ह ॥
netrābhyāṃ netrayorasya raśmīnsaṃyojya raśmibhiḥ | sā sma taṃ codayiṣyantī yogabandhairbabandha ha
अपने नेत्रों की किरणों को उसके नेत्रों की किरणों से जोड़कर उसे परखने की इच्छा से उसने उसे योग के बन्धनों में बाँध लिया।
श्लोक 18 (12.325.18)
जनकोप्युत्स्मयन्राजा भावमस्या विशेषयन् । प्रतिजग्राह भावेन भावमस्या नृपोत्तम ॥
janakopyutsmayanrājā bhāvamasyā viśeṣayan | pratijagrāha bhāvena bhāvamasyā nṛpottama
हे नृपश्रेष्ठ, जनक ने भी मुस्कराते हुए उसके अभिप्राय को दबाने का यत्न किया और उसके भाव का अपने भाव से सामना किया।
श्लोक 19 (12.325.19)
तदेकस्मिन्नधिष्ठाने संवादः श्रूयतामयम् । छत्रादिषु विमुक्तस्य मुक्तायाश्च त्रिदण्डकैः ॥
tadekasminnadhiṣṭhāne saṃvādaḥ śrūyatāmayam | chatrādiṣu vimuktasya muktāyāśca tridaṇḍakaiḥ
अब उस एक ही स्थान पर हुआ वह संवाद सुनो, जो छत्र आदि राजचिह्नों के बीच मुक्त राजा और त्रिदण्डों के साथ मुक्त उस भिक्षुणी के बीच हुआ।
जनक उवाच
श्लोक 20 (12.325.20)
भगवत्याः क्व चर्येयं कृता क्व च गमिष्यसि । कस्य च त्वं कुतो वेति पप्रच्छैनां महीपतिः ॥
bhagavatyāḥ kva caryeyaṃ kṛtā kva ca gamiṣyasi | kasya ca tvaṃ kuto veti papracchaināṃ mahīpatiḥ
जनक ने कहा, "भगवती, आपने यह चर्या कहाँ ग्रहण की और आप कहाँ जाएँगी? आप किसकी हैं और कहाँ से आई हैं?" इस प्रकार पृथ्वीपति ने उससे पूछा।
श्लोक 21 (12.325.21)
श्रुते वयसि जातौ च सद्भावो नाधिगम्यते । एष्वर्थेषूत्तरं तस्मात्प्रवेद्यं मत्समागमे ॥
śrute vayasi jātau ca sadbhāvo nādhigamyate | eṣvartheṣūttaraṃ tasmātpravedyaṃ matsamāgame
विद्या, आयु और जन्म के विषय में किसी की वास्तविक स्थिति जानी नहीं जाती; इसलिए इन बातों का उत्तर हमारी भेंट में आपको देना चाहिए।
श्लोक 22 (12.325.22)
छत्रादिषु विशेषेषु मुक्तं मां विद्धि तत्त्वतः । सत्वां संवेत्तुमिच्छामि मानार्हा हि मताऽसिमे ॥
chatrādiṣu viśeṣeṣu muktaṃ māṃ viddhi tattvataḥ | satvāṃ saṃvettumicchāmi mānārhā hi matā'sime
मुझे छत्र आदि राजचिह्नों के बीच भी वास्तव में मुक्त जानिए। मैं आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपको सम्मान के योग्य मानता हूँ।
श्लोक 23 (12.325.23)
यस्माच्चैतन्मया प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा । यस्य नान्यः प्रवक्ताऽस्ति मोक्षे तमपि मे शृणु ॥
yasmāccaitanmayā prāptaṃ jñānaṃ vaiśeṣikaṃ purā | yasya nānyaḥ pravaktā'sti mokṣe tamapi me śṛṇu
जिनसे मैंने बहुत पहले मोक्ष का यह विशेष ज्ञान पाया, और जिनके समान मोक्ष का दूसरा उपदेशक नहीं है, उनके विषय में भी मुझसे सुनिए।
श्लोक 24 (12.325.24)
पराशरसगोत्रस्य वृद्धस्य सुमहात्मनः । भिक्षोः पञ्चशिखस्याहं शिष्यः परमसंमतः ॥
parāśarasagotrasya vṛddhasya sumahātmanaḥ | bhikṣoḥ pañcaśikhasyāhaṃ śiṣyaḥ paramasaṃmataḥ
मैं पराशर-गोत्र के वृद्ध और परम महात्मा भिक्षु पञ्चशिख का अत्यन्त प्रिय शिष्य हूँ।
श्लोक 25 (12.325.25)
साङ्ख्यज्ञाने च योगे च महीपालविधौ तथा । त्रिविधे मोक्षधर्मोस्मिन्गताध्वा छिन्नसंशयः ॥
sāṅkhyajñāne ca yoge ca mahīpālavidhau tathā | trividhe mokṣadharmosmingatādhvā chinnasaṃśayaḥ
साङ्ख्य के ज्ञान में, योग में और राजाओं के विधान में, इस तीन प्रकार के मोक्षधर्म में मैं पार पहुँच चुका हूँ और मेरे संशय कट गए हैं।
श्लोक 26 (12.325.26)
स यथा शास्त्रदृष्टेन मार्गेणेह परिभ्रमन् । वार्षिकांश्चतुरो मासान्पुरा मयि सुखोषितः ॥
sa yathā śāstradṛṣṭena mārgeṇeha paribhraman | vārṣikāṃścaturo māsānpurā mayi sukhoṣitaḥ
शास्त्र में बताए मार्ग से यहाँ विचरते हुए वे पहले एक बार वर्षा के चार महीने सुखपूर्वक मेरे यहाँ ठहरे थे।
श्लोक 27 (12.325.27)
तेनाहं साङ्ख्यमुख्येन सुदृष्टार्थेन तत्त्वतः । श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्धि चालितः ॥
tenāhaṃ sāṅkhyamukhyena sudṛṣṭārthena tattvataḥ | śrāvitastrividhaṃ mokṣaṃ na ca rājyāddhi cālitaḥ
तत्त्व को ठीक-ठीक देख चुके उन साङ्ख्य-प्रमुख ने मुझे तीन प्रकार का मोक्ष सुनाया, पर मुझे राज्य से विचलित नहीं किया।
श्लोक 28 (12.325.28)
सोहं तामखिलां वृत्तिं त्रिविधां मोक्षसंहिताम् । मुक्तरागश्चराम्येकः पदे परमके स्थितः ॥
sohaṃ tāmakhilāṃ vṛttiṃ trividhāṃ mokṣasaṃhitām | muktarāgaścarāmyekaḥ pade paramake sthitaḥ
सो मैं मोक्ष की उस सारी तीन प्रकार की वृत्ति का पालन करता हूँ और राग से मुक्त होकर, अकेला, परम पद में स्थित रहता हूँ।
श्लोक 29 (12.325.29)
वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमो विधिः । ज्ञानादेव च वैराग्यं जायते येन मुच्यते ॥
vairāgyaṃ punaretasya mokṣasya paramo vidhiḥ | jñānādeva ca vairāgyaṃ jāyate yena mucyate
वैराग्य ही इस मोक्ष का परम विधान है, और वैराग्य ज्ञान से ही उत्पन्न होता है, जिससे मनुष्य मुक्त होता है।
श्लोक 30 (12.325.30)
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् । महद्द्वन्द्वप्रमोक्षाय सा सिद्धिर्या वयोतिगा ॥
jñānena kurute yatnaṃ yatnena prāpyate mahat | mahaddvandvapramokṣāya sā siddhiryā vayotigā
ज्ञान से मनुष्य प्रयत्न करता है और प्रयत्न से महान् फल पाता है, महान् द्वन्द्वों से मुक्त होने के लिए। वही वह सिद्धि है जो अवस्था से परे जाती है।
श्लोक 31 (12.325.31)
सेयं परमिका सिद्धिः प्राप्ता निर्द्वन्द्वता मया । इहैव गतमोहेन चरता मुक्तसङ्गिना ॥
seyaṃ paramikā siddhiḥ prāptā nirdvandvatā mayā | ihaiva gatamohena caratā muktasaṅginā
यही परम सिद्धि है, द्वन्द्वों से रहित होने की अवस्था, जिसे मैंने मोह से मुक्त होकर, आसक्तियों को छोड़कर विचरते हुए यहीं पा लिया है।
श्लोक 32 (12.325.32)
यथा क्षेत्रं मृदुभूतमद्भिराप्लावितं तथा । जनयत्यङ्कुरं कर्म नृणां तद्वत्पुनर्भवम् ॥
yathā kṣetraṃ mṛdubhūtamadbhirāplāvitaṃ tathā | janayatyaṅkuraṃ karma nṛṇāṃ tadvatpunarbhavam
जैसे पानी से सींची हुई कोमल हुई भूमि अंकुर उत्पन्न करती है, वैसे ही मनुष्यों का कर्म पुनर्जन्म उत्पन्न करता है।
श्लोक 33 (12.325.33)
यथा चोत्तापितं बीजं कपाले यत्रतत्र वा । प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमबीजत्वान्न जायते ॥
yathā cottāpitaṃ bījaṃ kapāle yatratatra vā | prāpyāpyaṅkurahetutvamabījatvānna jāyate
और जैसे ठीकरे में या कहीं भी भुना हुआ बीज अंकुर के कारण को पाकर भी, बीज न रहने से, अंकुरित नहीं होता,
श्लोक 34 (12.325.34)
तद्वद्भगवताऽनेन शिखाप्रोक्तेन भिक्षुणा । ज्ञानं कृतमबीजं मे विषयेषु न जायते ॥
tadvadbhagavatā'nena śikhāproktena bhikṣuṇā | jñānaṃ kṛtamabījaṃ me viṣayeṣu na jāyate
वैसे ही उन पूज्य भिक्षु शिख के उपदेश से मेरा ज्ञान बीज-रहित कर दिया गया है और वह विषयों में अंकुरित नहीं होता।
श्लोक 35 (12.325.35)
नाभिरज्यति कस्मिंश्चिन्नानर्थे न परिग्रहे । नाभिरज्यति चैतेषु व्यर्थत्वाद्रागरोषयोः ॥
nābhirajyati kasmiṃścinnānarthe na parigrahe | nābhirajyati caiteṣu vyarthatvādrāgaroṣayoḥ
वह न किसी वस्तु में आसक्त होता है, न व्यर्थ पदार्थ में, न संग्रह में; राग और रोष को व्यर्थ जानकर वह इनमें अनुरक्त नहीं होता।
श्लोक 36 (12.325.36)
यश्च मे दक्षिणं बाहुं चन्दनेन समुक्षयेत् । सव्यं वाऽस्यापि यस्तक्षेत्समावेतावुभौ मम ॥
yaśca me dakṣiṇaṃ bāhuṃ candanena samukṣayet | savyaṃ vā'syāpi yastakṣetsamāvetāvubhau mama
यदि कोई मेरी दाहिनी भुजा पर चन्दन लगाए और कोई मेरी बाईं भुजा को काटे, तो दोनों मेरे लिए समान हैं।
श्लोक 37 (12.325.37)
सुखी सोऽहमवाप्तार्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । मुक्तसङ्गः स्थितो राज्ये विशिष्टोऽन्यैस्त्रिदण्डिभिः ॥
sukhī so'hamavāptārthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | muktasaṅgaḥ sthito rājye viśiṣṭo'nyaistridaṇḍibhiḥ
मैं सुखी हूँ, मेरे प्रयोजन पूरे हो चुके हैं, मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना मेरे लिए बराबर हैं; आसक्ति से मुक्त मैं राज्य में रहता हूँ और अन्य त्रिदण्डी संन्यासियों से विशिष्ट हूँ।
श्लोक 38 (12.325.38)
मोक्षे हि त्रिविधा निष्ठा दृष्टाऽन्यैर्मोक्षवित्तमैः । ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥
mokṣe hi trividhā niṣṭhā dṛṣṭā'nyairmokṣavittamaiḥ | jñānaṃ lokottaraṃ yacca sarvatyāgaśca karmaṇām
मोक्ष में अन्य श्रेष्ठ मोक्षवेत्ताओं ने तीन प्रकार की निष्ठा देखी है: लोक से परे का ज्ञान, और कर्मों का सर्वथा त्याग।
श्लोक 39 (12.325.39)
ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः । कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥
jñānaniṣṭhāṃ vadantyeke mokṣaśāstravido janāḥ | karmaniṣṭhāṃ tathaivānye yatayaḥ sūkṣmadarśinaḥ
मोक्षशास्त्र को जानने वाले कुछ लोग ज्ञाननिष्ठा बताते हैं, और सूक्ष्मदर्शी यति दूसरे उसी प्रकार कर्मनिष्ठा बताते हैं।
श्लोक 40 (12.325.40)
प्रहायोभयमप्येव ज्ञानं कर्म च केवलम् । तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥
prahāyobhayamapyeva jñānaṃ karma ca kevalam | tṛtīyeyaṃ samākhyātā niṣṭhā tena mahātmanā
केवल ज्ञान और केवल कर्म, इन दोनों को भी छोड़कर उन महात्मा ने यह तीसरी निष्ठा बताई है।
श्लोक 41 (12.325.41)
यमे च नियमे चैव कामे द्वेषे परिग्रहे । माने दम्भे तथा स्नेहे सदृशास्ते कुटुम्बिभिः ॥
yame ca niyame caiva kāme dveṣe parigrahe | māne dambhe tathā snehe sadṛśāste kuṭumbibhiḥ
यम और नियम में, काम और द्वेष में, संग्रह में, मान, दम्भ और स्नेह में वे गृहस्थों के समान ही हैं।
श्लोक 42 (12.325.42)
त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञानेन केनचित् । छत्रादिषु कथं न स्यात्तुल्यहेतौ परिग्रहे ॥
tridaṇḍādiṣu yadyasti mokṣo jñānena kenacit | chatrādiṣu kathaṃ na syāttulyahetau parigrahe
यदि त्रिदण्डधारियों में किसी ज्ञान से मोक्ष होता है, तो छत्र आदि वालों में क्यों न हो, जब संग्रह रूप कारण समान है?
श्लोक 43 (12.325.43)
येनयेन हि यस्यार्थः कारणेनेह कर्मणि । तत्तदालम्बते सर्वद्रव्ये स्वार्थपरिग्रहे ॥
yenayena hi yasyārthaḥ kāraṇeneha karmaṇi | tattadālambate sarvadravye svārthaparigrahe
किसी कार्य में जिस साधन से जिसका प्रयोजन सिद्ध होता है, वह उसी वस्तु को अपनाता है, सब पदार्थों के संग्रह में अपना प्रयोजन देखकर।
श्लोक 44 (12.325.44)
दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरे । उत्सृजन्परिगृह्णंश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते ॥
doṣadarśī tu gārhasthye yo vrajatyāśramāntare | utsṛjanparigṛhṇaṃśca so'pi saṅgānna mucyate
जो गृहस्थाश्रम में दोष देखकर दूसरे आश्रम में जाता है, वह भी वहाँ कुछ छोड़ते और कुछ ग्रहण करते हुए आसक्तियों से मुक्त नहीं होता।
श्लोक 45 (12.325.45)
आधिपत्ये तथा तुल्ये निग्रहानुग्रहात्मके । राजभिर्भिक्षुकास्तुल्या मुच्यन्ते केन हेतुना ॥
ādhipatye tathā tulye nigrahānugrahātmake | rājabhirbhikṣukāstulyā mucyante kena hetunā
निग्रह और अनुग्रह रूप अधिकार में भिक्षु राजाओं के समान ही हैं; तब किस कारण से वे मुक्त होते हैं?
श्लोक 46 (12.325.46)
अथ सत्याधिपत्येऽपि ज्ञानेनैवेह केवलम् । मुच्यन्ते किं न मुच्यन्ते पदे परमके स्थिताः ॥
atha satyādhipatye'pi jñānenaiveha kevalam | mucyante kiṃ na mucyante pade paramake sthitāḥ
और यदि सच्चे अधिकार में रहते हुए भी लोग यहाँ केवल ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं, तो परम पद में स्थित लोग क्यों मुक्त न होंगे?
श्लोक 47 (12.325.47)
काषायधारणं मौण्ड्यं त्रिविष्टब्धं कमण्डलुम् । लिङ्गान्युत्पथभूतानि न मोक्षायेति मे मतिः ॥
kāṣāyadhāraṇaṃ mauṇḍyaṃ triviṣṭabdhaṃ kamaṇḍalum | liṅgānyutpathabhūtāni na mokṣāyeti me matiḥ
गेरुआ वस्त्र, मुण्डन, त्रिदण्ड और कमण्डलु, ये चिह्न मार्ग से हटे हुए हैं, मोक्ष के लिए नहीं हैं, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 48 (12.325.48)
यदि सत्यपि लिङ्गेऽस्मिञ्ज्ञानमेवात्र कारणम् । निर्मोक्षायेह दुःखस्य लिङ्गमात्रं निरर्थकम् ॥
yadi satyapi liṅge'smiñjñānamevātra kāraṇam | nirmokṣāyeha duḥkhasya liṅgamātraṃ nirarthakam
यदि इस चिह्न के रहते हुए भी दुःख से छूटने का कारण ज्ञान ही है, तो केवल चिह्न निरर्थक है।
श्लोक 49 (12.325.49)
अथवा दुःखशैथिल्यं वीक्ष्य लिङ्गे कृता मतिः । किं तदेवार्थसामान्यं छत्रादिषु न लक्ष्यते ॥
athavā duḥkhaśaithilyaṃ vīkṣya liṅge kṛtā matiḥ | kiṃ tadevārthasāmānyaṃ chatrādiṣu na lakṣyate
अथवा दुःख की शिथिलता देखकर यदि चिह्न में मन लगाया गया है, तो वही समान प्रयोजन छत्र आदि में क्यों नहीं दिखाई देता?
श्लोक 50 (12.325.50)
आकिञ्चन्ये न मोक्षोस्ति कैञ्चन्ये नास्ति बन्धनम् । कैञ्चन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते ॥
ākiñcanye na mokṣosti kaiñcanye nāsti bandhanam | kaiñcanye cetare caiva janturjñānena mucyate
अकिञ्चन होने में मोक्ष नहीं है और कुछ रखने में बन्धन नहीं है; सम्पत्ति वाला हो या दूसरी स्थिति वाला, प्राणी ज्ञान से ही मुक्त होता है।
श्लोक 51 (12.325.51)
तस्माद्धर्मार्थकामेषु तथा राज्यपरिग्रहे । बन्धनायतनेष्वेषु विद्ध्यबन्धे पदे स्थितम् ॥
tasmāddharmārthakāmeṣu tathā rājyaparigrahe | bandhanāyataneṣveṣu viddhyabandhe pade sthitam
इसलिए धर्म, अर्थ और काम में तथा राज्य के ग्रहण में, जो बन्धन के आधार हैं, मुझे बन्धन-रहित पद में स्थित जानिए।
श्लोक 52 (12.325.52)
राज्यैश्वर्यमयः पाशः स्नेहायतनबन्धनः । मोक्षाश्मनिशितेनेह च्छिन्नस्त्यागासिना मया ॥
rājyaiśvaryamayaḥ pāśaḥ snehāyatanabandhanaḥ | mokṣāśmaniśiteneha cchinnastyāgāsinā mayā
राज्य और ऐश्वर्य से बना, स्नेह जिसका निवास है, ऐसा पाश मैंने मोक्षरूपी सान पर तेज किए हुए त्याग के खड्ग से काट डाला है।
श्लोक 53 (12.325.53)
सोहमेवं गतो मुक्तो जातास्थस्त्वयि भिक्षुकि । अयथार्थं हि ते वर्णं वक्ष्यामि शृणु तन्मम ॥
sohamevaṃ gato mukto jātāsthastvayi bhikṣuki | ayathārthaṃ hi te varṇaṃ vakṣyāmi śṛṇu tanmama
हे भिक्षुणी, इस प्रकार मुक्त हुए मैंने आप पर आस्था रखी है। अब सुनिए कि आपका रूप-वेश किस बात में यथार्थ से मेल नहीं खाता।
श्लोक 54 (12.325.54)
सौकुमार्यं तथा रूपं वपुरग्र्यं तथा वयः । तवैतानि समस्तानि नियमश्चेति संशयः ॥
saukumāryaṃ tathā rūpaṃ vapuragryaṃ tathā vayaḥ | tavaitāni samastāni niyamaśceti saṃśayaḥ
आपकी सुकुमारता, आपका रूप, आपकी श्रेष्ठ देह और आपकी युवावस्था, ये सब और साथ ही कठोर नियम का जीवन, इसी बात से सन्देह होता है।
श्लोक 55 (12.325.55)
यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् । मुक्तोऽयं स्यान्न वेति स्याद्धर्षितो मत्परिग्रहः ॥
yaccāpyananurūpaṃ te liṅgasyāsya viceṣṭitam | mukto'yaṃ syānna veti syāddharṣito matparigrahaḥ
इस चिह्न के अनुरूप आपका आचरण भी नहीं है। "यह मुक्त है या नहीं" इस प्रकार की परीक्षा से मेरे परिजनों का अपमान हुआ है।
श्लोक 56 (12.325.56)
न च कामसमायुक्ते युक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डके । न रक्ष्यते त्वया चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ॥
na ca kāmasamāyukte yukte'pyasti tridaṇḍake | na rakṣyate tvayā cedaṃ na muktasyāsti gopanā
जो काम से युक्त है उसके लिए त्रिदण्ड धारण करना भी व्यर्थ है; और आप इसमें अपनी रक्षा नहीं करतीं, जबकि मुक्त के लिए किसी रक्षा की आवश्यकता नहीं होती।
श्लोक 57 (12.325.57)
मत्पक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रमः । आश्रयन्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ॥
matpakṣasaṃśrayāccāyaṃ śṛṇu yaste vyatikramaḥ | āśrayantyāḥ svabhāvena mama pūrvaparigraham
मेरे पक्ष का आश्रय लेने से आपने जो अपराध किया है, वह भी सुनिए: आपने अपनी इच्छा से उस स्थान का आश्रय लिया जिसे मैं पहले से अपना बनाए हुए था।
श्लोक 58 (12.325.58)
प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरेपि वा । कस्य वा सन्निकर्षात्त्वं प्रविष्टा हृदयं मम ॥
praveśaste kṛtaḥ kena mama rāṣṭre purepi vā | kasya vā sannikarṣāttvaṃ praviṣṭā hṛdayaṃ mama
मेरे राज्य और नगर में आपका प्रवेश किसने कराया? अथवा किसके सम्पर्क से आप मेरे हृदय में प्रविष्ट हुईं?
श्लोक 59 (12.325.59)
वर्णप्रवरमुख्याऽसि ब्राह्मणी क्षत्रियस्त्वहम् । नावयोरेकयोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसंकरम् ॥
varṇapravaramukhyā'si brāhmaṇī kṣatriyastvaham | nāvayorekayogo'sti mā kṛthā varṇasaṃkaram
आप सर्वश्रेष्ठ वर्ण की ब्राह्मणी हैं और मैं क्षत्रिय हूँ। हम दोनों का कोई मेल नहीं हो सकता; वर्णसंकर मत कीजिए।
श्लोक 60 (12.325.60)
वर्तसे मोक्षधर्मेण त्वं गार्हस्थ्येऽहमाश्रमे । अयं चापि सुकष्टस्ते द्वितीयाश्रमसंकरः ॥
vartase mokṣadharmeṇa tvaṃ gārhasthye'hamāśrame | ayaṃ cāpi sukaṣṭaste dvitīyāśramasaṃkaraḥ
आप मोक्षधर्म के अनुसार चलती हैं और मैं गृहस्थाश्रम में हूँ; यह भी आपके लिए बड़ा कष्टकर दूसरा दोष है, आश्रमों का मेल।
श्लोक 61 (12.325.61)
सगोत्रां वाऽसगोत्रां वा न वेद त्वां न वेत्थ माम् । सगोत्रमाविशन्त्यास्ते तृतीयो गोत्रसंकरः ॥
sagotrāṃ vā'sagotrāṃ vā na veda tvāṃ na vettha mām | sagotramāviśantyāste tṛtīyo gotrasaṃkaraḥ
आप मेरे गोत्र की हैं या नहीं, मैं आपको नहीं जानता और आप मुझे नहीं जानतीं; यदि आप सगोत्र में प्रवेश कर रही हैं तो यह आपका तीसरा दोष, गोत्र का संकर, होगा।
श्लोक 62 (12.325.62)
अथ जीवति ते भर्ता प्रोषितोप्यथवा क्वचित् । अगम्या परभार्येति चतुर्थो धर्मसंकरः ॥
atha jīvati te bhartā proṣitopyathavā kvacit | agamyā parabhāryeti caturtho dharmasaṃkaraḥ
अथवा आपका पति जीवित है, या कहीं परदेश गया है? परायी पत्नी अगम्य है। यह चौथा धर्मसंकर है।
श्लोक 63 (12.325.63)
सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि । अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुनः ॥
sā tvametānyakāryāṇi kāryāpekṣā vyavasyasi | avijñānena vā yuktā mithyājñānena vā punaḥ
सो आप किसी कार्य की अपेक्षा से ये न करने योग्य काम करने पर उतारू हैं, या तो अज्ञान से या फिर मिथ्या ज्ञान से।
श्लोक 64 (12.325.64)
अथवापि स्वतन्त्राऽसि स्वदोषेणेह केनचित् । यदि किंचिच्छ्रुतं तेऽस्ति सर्वं कृतमनर्थकम् ॥
athavāpi svatantrā'si svadoṣeṇeha kenacit | yadi kiṃcicchrutaṃ te'sti sarvaṃ kṛtamanarthakam
अथवा आप अपने ही किसी दोष से स्वेच्छाचारिणी हैं। यदि आपने कुछ भी सुना-सीखा है, तो आपने वह सब निरर्थक कर दिया।
श्लोक 65 (12.325.65)
इदमन्यत्तृतीयं ते भावस्पर्शविघातकम् । दुष्टायाऽलक्ष्यते लिङ्गं विवृण्वत्या प्रकाशितम् ॥
idamanyattṛtīyaṃ te bhāvasparśavighātakam | duṣṭāyā'lakṣyate liṅgaṃ vivṛṇvatyā prakāśitam
आपके विरुद्ध यह एक और, तीसरी बात है, जो मन के मेल को चोट पहुँचाती है: आपके स्वयं प्रकट करने से एक दुष्ट स्त्री का लक्षण दिखाई दे रहा है।
श्लोक 66 (12.325.66)
न मय्येवाभिसन्धिस्ते जयैषिण्या जये कृतः । येयं मत्परिषत्कृत्स्ना जेतुमिच्छसि तामपि ॥
na mayyevābhisandhiste jayaiṣiṇyā jaye kṛtaḥ | yeyaṃ matpariṣatkṛtsnā jetumicchasi tāmapi
आपका अभिप्राय केवल मेरे ही प्रति नहीं है: विजय की इच्छा रखने वाली आपने जय पर ही दृष्टि लगाई है, और मेरी इस सारी सभा को भी जीतना चाहती हैं।
श्लोक 67 (12.325.67)
तथाऽर्हतस्ततश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि । मत्पक्षप्रतिघाताय स्वपक्षोद्भवनाय च ॥
tathā'rhatastataśca tvaṃ dṛṣṭiṃ svāṃ pratimuñcasi | matpakṣapratighātāya svapakṣodbhavanāya ca
और इसी प्रकार आप यहाँ के माननीय जनों पर भी अपनी दृष्टि डालती हैं, मेरे पक्ष को पराजित करने और अपने पक्ष को उठाने के लिए।
श्लोक 68 (12.325.68)
सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता । भूयः सृजसि योगांस्त्वं विषामृतमिवैकताम् ॥
sā svenāmarṣajena tvamṛddhimohena mohitā | bhūyaḥ sṛjasi yogāṃstvaṃ viṣāmṛtamivaikatām
अपने क्रोध से उपजे अभिमान और ऋद्धि के मोह से मोहित होकर आप फिर नए योग रचती हैं, मानो विष और अमृत को एक कर रही हों।
श्लोक 69 (12.325.69)
इच्छतोरत्र यो लाभः स्त्रीपुंसोरमृतोपमः । अलाभश्चापि रक्तस्य सोपि दोषो विषोपमः ॥
icchatoratra yo lābhaḥ strīpuṃsoramṛtopamaḥ | alābhaścāpi raktasya sopi doṣo viṣopamaḥ
जब दोनों चाहते हों तब स्त्री-पुरुष का मिलन अमृत के समान होता है; पर आसक्त के लिए उसका न मिलना भी दोष है, जो विष के समान है।
श्लोक 70 (12.325.70)
मा त्याक्षीः साधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय । कृतेयं हि विजिज्ञासा मुक्तो नेति त्वया मम ॥
mā tyākṣīḥ sādhu jānīṣva svaśāstramanupālaya | kṛteyaṃ hi vijijñāsā mukto neti tvayā mama
छोड़िए मत; इसे अच्छी तरह समझिए और अपने शास्त्र का पालन कीजिए। आपने मेरे विषय में यह जिज्ञासा की है कि मैं मुक्त हूँ या नहीं।
श्लोक 71 (12.325.71)
एतत्सर्वं प्रतिच्छन्नं मयि नार्हसि गूहितम् । सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपतेः । तत्त्वमत्र प्रतिच्छन्ना मयि नार्हसि गूहितम् ॥
etatsarvaṃ praticchannaṃ mayi nārhasi gūhitam | sā yadi tvaṃ svakāryeṇa yadyanyasya mahīpateḥ | tattvamatra praticchannā mayi nārhasi gūhitam
यह सब मुझसे छिपाना आपके लिए उचित नहीं, आप तो वेश बदले हुए हैं। यदि आप अपने काम से आई हैं या किसी अन्य राजा के लिए, तब भी वेश में छिपी हुई आपको सत्य मुझसे नहीं छिपाना चाहिए।
श्लोक 72 (12.325.72)
न राजानं मृषा गच्छेन्न द्विजातिं कथंचन । न स्त्रियं स्त्रीगुणोपेतां हन्युर्ह्येते मृषागताः ॥
na rājānaṃ mṛṣā gacchenna dvijātiṃ kathaṃcana | na striyaṃ strīguṇopetāṃ hanyurhyete mṛṣāgatāḥ
राजा के पास, द्विज के पास या स्त्रियोचित गुणों वाली स्त्री के पास कभी झूठ लेकर नहीं जाना चाहिए; झूठ से आने वालों को ये नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 73 (12.325.73)
राज्ञां हि बलमैश्वर्यं ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् । रूपयौवनसौभाग्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम् ॥
rājñāṃ hi balamaiśvaryaṃ brahma brahmavidāṃ balam | rūpayauvanasaubhāgyaṃ strīṇāṃ balamanuttamam
राजाओं का बल ऐश्वर्य है, ब्रह्मवेत्ताओं का बल वेद है, और स्त्रियों का परम बल रूप, यौवन और सौभाग्य है।
श्लोक 74 (12.325.74)
अत एतैर्बलैरेव बलिनः स्वार्थमिच्छता । आर्जवेनाभिगन्तव्या विनाशाय ह्यनार्जवम् ॥
ata etairbalaireva balinaḥ svārthamicchatā | ārjavenābhigantavyā vināśāya hyanārjavam
इसलिए इन बलों से बलवान लोगों से अपना प्रयोजन चाहने वाले को सरलता से उनके पास जाना चाहिए; कपट विनाश के लिए होता है।
श्लोक 75 (12.325.75)
सा त्वं जातिं श्रुतं वृत्तं भावं प्रकृतिमात्मनः । कृत्यमागमने चैव वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥
sā tvaṃ jātiṃ śrutaṃ vṛttaṃ bhāvaṃ prakṛtimātmanaḥ | kṛtyamāgamane caiva vaktumarhasi tattvataḥ
सो आप अपनी जाति, शास्त्र-ज्ञान, आचरण, भाव, स्वभाव और यहाँ आने का प्रयोजन मुझे यथार्थ रूप से बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 76 (12.325.76)
इत्येतैरसुखैर्वाक्यैरयुक्तैरसमञ्जसैः । प्रत्यादिष्टा नरेन्द्रेण सुलभा न व्यकम्पत ॥
ityetairasukhairvākyairayuktairasamañjasaiḥ | pratyādiṣṭā narendreṇa sulabhā na vyakampata
राजा ने इन कठोर, अनुचित और असंगत वचनों से उसे रोक दिया, फिर भी सुलभा विचलित नहीं हुई।
श्लोक 77 (12.325.77)
उक्तवाक्ये तु नृपतौ सुलभा चारुदर्शना । ततश्चारुतरं वाक्यं प्रचक्रामाथ भाषितुम् ॥
uktavākye tu nṛpatau sulabhā cārudarśanā | tataścārutaraṃ vākyaṃ pracakrāmātha bhāṣitum
जब राजा बोल चुका, तब सुन्दर दर्शन वाली सुलभा ने उससे भी अधिक सुन्दर वचन कहना आरम्भ किया।
सुलभोवाच
श्लोक 78 (12.325.78)
नवभिर्नवभिश्चैव दोषैर्वाग्बुद्धिदूषणैः । अपेतमुपपन्नार्थमष्टादशगुणान्वितम् ॥
navabhirnavabhiścaiva doṣairvāgbuddhidūṣaṇaiḥ | apetamupapannārthamaṣṭādaśaguṇānvitam
जो वाणी वाक् और बुद्धि को दूषित करने वाले नौ और नौ दोषों से रहित है, अर्थ से पूर्ण है और अठारह गुणों से युक्त है,
श्लोक 79 (12.325.79)
सौक्ष्म्यं साङ्ख्यक्रमौ चोभौ निर्णयः सप्रयोजनः । पञ्चैतान्यर्थजातानि वाक्यमित्युच्यते नृप ॥
saukṣmyaṃ sāṅkhyakramau cobhau nirṇayaḥ saprayojanaḥ | pañcaitānyarthajātāni vākyamityucyate nṛpa
और जिसमें सूक्ष्मता, संख्या और क्रम, तथा प्रयोजन सहित निर्णय, ये पाँच बातें होती हैं, हे राजन्, उसी को वाक्य कहा जाता है।
श्लोक 80 (12.325.80)
एषामेकैकशोऽर्थानां सौक्ष्म्यादीनां स्वलक्षणम् । शृणु संसार्यमाणानां पदार्थपदवाक्यतः ॥
eṣāmekaikaśo'rthānāṃ saukṣmyādīnāṃ svalakṣaṇam | śṛṇu saṃsāryamāṇānāṃ padārthapadavākyataḥ
अब सूक्ष्मता आदि इन बातों में से प्रत्येक का अपना लक्षण सुनिए, जैसा पद, पदार्थ और वाक्य के अनुसार बताया जाता है।
श्लोक 81 (12.325.81)
ज्ञानं ज्ञेयेषु भिन्नेषु यदा भेदेन वर्तते । तत्रातिशयिनी बुद्धिस्तत्सौक्ष्म्यमिति वर्तते ॥
jñānaṃ jñeyeṣu bhinneṣu yadā bhedena vartate | tatrātiśayinī buddhistatsaukṣmyamiti vartate
जब भिन्न-भिन्न ज्ञेय वस्तुओं में ज्ञान प्रत्येक को अलग-अलग पहचानता हुआ चलता है और वहाँ बुद्धि अत्यन्त तीक्ष्ण होती है, तब उसे सूक्ष्मता कहते हैं।
श्लोक 82 (12.325.82)
दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतः । कंचिदर्थमभिप्रेत्य सा सङ्ख्येत्युपधार्यताम् ॥
doṣāṇāṃ ca guṇānāṃ ca pramāṇaṃ pravibhāgataḥ | kaṃcidarthamabhipretya sā saṅkhyetyupadhāryatām
किसी विशेष विषय को लेकर दोषों और गुणों का विभाग-पूर्वक परिमाण, उसे संख्या समझा जाए।
श्लोक 83 (12.325.83)
इदं पूर्वमिदं पश्चाद्वक्तव्यं यद्विवक्षितम् । क्रमयोगं तमप्याहुर्वाक्यं वाक्यविदो जनाः ॥
idaṃ pūrvamidaṃ paścādvaktavyaṃ yadvivakṣitam | kramayogaṃ tamapyāhurvākyaṃ vākyavido janāḥ
"यह पहले, यह बाद में कहना चाहिए, जैसा कहना अभीष्ट हो", इसे भी वाक्य के जानकार लोग वाक्य का क्रम कहते हैं।
श्लोक 84 (12.325.84)
धर्मकामार्थमोक्षेषु प्रतिज्ञाय विशेषतः । इदं तदिति वाक्यान्ते प्रोच्यते स विनिर्णयः ॥
dharmakāmārthamokṣeṣu pratijñāya viśeṣataḥ | idaṃ taditi vākyānte procyate sa vinirṇayaḥ
जब धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के विषय में विशेष रूप से प्रतिज्ञा करके वाक्य के अन्त में "यह वही है" ऐसा कहा जाता है, तब उसे निर्णय कहते हैं।
श्लोक 85 (12.325.85)
इच्छाद्वेषभवैर्दुःखैः प्रकर्षो यत्र जायते । तत्र या नृपते वृत्तिस्तत्प्रयोजनमिष्यते ॥
icchādveṣabhavairduḥkhaiḥ prakarṣo yatra jāyate | tatra yā nṛpate vṛttistatprayojanamiṣyate
जहाँ इच्छा और द्वेष से उत्पन्न दुःखों की अति हो जाती है, वहाँ, हे राजन्, जो आचरण किया जाता है, वही प्रयोजन कहा जाता है।
श्लोक 86 (12.325.86)
तान्येतानि यथोक्तानि सौक्ष्म्यादीनि जनाधिप । एकार्थसमवेतानि वाक्यं मम निशामय ॥
tānyetāni yathoktāni saukṣmyādīni janādhipa | ekārthasamavetāni vākyaṃ mama niśāmaya
हे जनाधिप, सूक्ष्मता आदि ये बातें जैसी बताई गईं, एक ही अर्थ में मिली हुई हैं; अब मेरा वाक्य सुनिए।
श्लोक 87 (12.325.87)
उपेतार्थमभिन्नार्थं न्यायवृत्तं न चाधिकम् । नाश्लक्ष्णं न च संदिग्धं वक्ष्यामि परमं ततः ॥
upetārthamabhinnārthaṃ nyāyavṛttaṃ na cādhikam | nāślakṣṇaṃ na ca saṃdigdhaṃ vakṣyāmi paramaṃ tataḥ
जो अर्थ से पूर्ण हो, अर्थ में अभिन्न हो, न्याय के अनुकूल हो, अधिक न हो, कठोर न हो और सन्दिग्ध न हो, वैसा परम वाक्य मैं आपसे कहूँगी।
श्लोक 88 (12.325.88)
न गुर्वक्षरसंयुक्तं पराङ्मुखपदं न च । नानृतं न त्रिवर्गेण विरुद्धं नाप्यसंस्कृतम् ॥
na gurvakṣarasaṃyuktaṃ parāṅmukhapadaṃ na ca | nānṛtaṃ na trivargeṇa viruddhaṃ nāpyasaṃskṛtam
जो भारी अक्षरों से लदा न हो, जिसके पद टालमटोल वाले न हों, जो असत्य न हो, तीनों पुरुषार्थों के विरुद्ध न हो और असंस्कृत न हो,
श्लोक 89 (12.325.89)
न न्यूनं नष्टशब्दं वा व्युत्क्रमाभिहितं न च । सदोषमभिकल्पेन निष्कारणमहेतुकम् ॥
na nyūnaṃ naṣṭaśabdaṃ vā vyutkramābhihitaṃ na ca | sadoṣamabhikalpena niṣkāraṇamahetukam
न कम हो, न जिसके शब्द बिगड़े हों, न क्रम से उलटा कहा गया हो, न कृत्रिमता से दोषपूर्ण हो, न बिना कारण और बिना हेतु का हो।
श्लोक 90 (12.325.90)
कामात्क्रोधाद्भयाल्लोभाद्दैन्याच्चानार्थकात्तथा । ह्रीतोऽनुक्रोशतो मानान्न वक्ष्यामि कथंचन ॥
kāmātkrodhādbhayāllobhāddainyāccānārthakāttathā | hrīto'nukrośato mānānna vakṣyāmi kathaṃcana
मैं काम, क्रोध, भय, लोभ, दीनता या निरर्थक प्रयोजन से, तथा लज्जा, दया या अभिमान से कभी नहीं बोलूँगी।
श्लोक 91 (12.325.91)
वक्ता श्रोता च वाक्यं च यदा त्वविकलं नृप । स ममेति विवक्षायां तदा सोर्थः प्रकाशते ॥
vaktā śrotā ca vākyaṃ ca yadā tvavikalaṃ nṛpa | sa mameti vivakṣāyāṃ tadā sorthaḥ prakāśate
हे राजन्, जब वक्ता, श्रोता और वाक्य तीनों निर्दोष हों और कहने की इच्छा में वक्ता इसे "मेरा" मानकर कहे, तब वह अर्थ प्रकाशित होता है।
श्लोक 92 (12.325.92)
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्यते । स्वार्थमाह परार्थं तत्तदा वाक्यं न रोहति ॥
vaktavye tu yadā vaktā śrotāramavamanyate | svārthamāha parārthaṃ tattadā vākyaṃ na rohati
परन्तु जब वक्ता कहने योग्य बात होने पर श्रोता का अनादर करता है और अपना या दूसरे का प्रयोजन कहता है, तब वाक्य जमता नहीं।
श्लोक 93 (12.325.93)
अथ यः स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानवः । विशङ्का जायते तस्मिन्वाक्यं तदपि दोषवत् ॥
atha yaḥ svārthamutsṛjya parārthaṃ prāha mānavaḥ | viśaṅkā jāyate tasminvākyaṃ tadapi doṣavat
और जो मनुष्य अपना प्रयोजन छोड़कर दूसरे का प्रयोजन कहता है, उस पर सन्देह होता है; वह वाक्य भी दोषयुक्त है।
श्लोक 94 (12.325.94)
यस्तु वक्ता द्वयोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते । श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ॥
yastu vaktā dvayorarthamaviruddhaṃ prabhāṣate | śrotuścaivātmanaścaiva sa vaktā netaro nṛpa
पर जो वक्ता श्रोता और अपने, दोनों के हित के अविरुद्ध बात कहता है, हे राजन्, वही वक्ता है, दूसरा नहीं।
श्लोक 95 (12.325.95)
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसंपदा । अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ॥
tadarthavadidaṃ vākyamupetaṃ vākyasaṃpadā | avikṣiptamanā rājannekāgraḥ śrotumarhasi
अतः मेरा यह वाक्य अर्थपूर्ण है और वाक्-सम्पदा से युक्त है। हे राजन्, आपको विक्षेप-रहित और एकाग्र मन से इसे सुनना चाहिए।
श्लोक 96 (12.325.96)
काऽसि कस्य कुतो वेति त्वयाऽहमिति चोदिता । तत्रोत्तरमिदं वाक्यं राजन्नेकमनाः शृणु ॥
kā'si kasya kuto veti tvayā'hamiti coditā | tatrottaramidaṃ vākyaṃ rājannekamanāḥ śṛṇu
"आप कौन हैं, किसकी हैं, कहाँ से आई हैं", इस प्रकार आपने मुझसे पूछा था। हे राजन्, उसका यह उत्तर एकाग्र मन से सुनिए।
श्लोक 97 (12.325.97)
यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदबिन्दवः । सुश्लिष्टानि तथा राजन्प्राणिनामिह संभवः ॥
yathā jatu ca kāṣṭhaṃ ca pāṃsavaścodabindavaḥ | suśliṣṭāni tathā rājanprāṇināmiha saṃbhavaḥ
जैसे लाख, लकड़ी, धूल और जल की बूँदें आपस में भली-भाँति जुड़ी रहती हैं, हे राजन्, वैसे ही यहाँ प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 98 (12.325.98)
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रियाणि च । पृथगात्मा दशात्मानं संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् । न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चयः ॥
śabdaḥ sparśo raso rūpaṃ gandhaḥ pañcendriyāṇi ca | pṛthagātmā daśātmānaṃ saṃśliṣṭā jatukāṣṭhavat | na caiṣāṃ codanā kācidastītyeṣa viniścayaḥ
शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध तथा पाँच इन्द्रियाँ: ये दस लाख और लकड़ी की तरह आपस में जुड़े हुए हैं, जबकि आत्मा इनसे अलग है। इनके बीच किसी प्रकार की कोई प्रेरणा नहीं है; यही निश्चित सिद्धान्त है।
श्लोक 99 (12.325.99)
एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे । न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते ॥
ekaikasyeha vijñānaṃ nāstyātmani tathā pare | na veda cakṣuścakṣuṣṭvaṃ śrotraṃ nātmani vartate
यहाँ इनमें से किसी एक को भी न अपना ज्ञान है, न दूसरों का। आँख अपने नेत्र-स्वरूप को नहीं जानती और कान अपने ही ऊपर कार्य नहीं करता।
श्लोक 100 (12.325.100)
तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् । प्रश्लिष्टं च न जानन्ति यथाऽऽप इव पांसवः ॥
tathaiva vyabhicāreṇa na vartante parasparam | praśliṣṭaṃ ca na jānanti yathā''pa iva pāṃsavaḥ
इसी प्रकार वे अपनी-अपनी सीमा लाँघकर एक-दूसरे पर कार्य नहीं करतीं; और आपस में सटी होने पर भी वे एक-दूसरे को नहीं जानतीं, जैसे धूल के कण जल को नहीं जानते।
श्लोक 101 (12.325.101)
बाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु । रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रयः ॥
bāhyānanyānapekṣante guṇāṃstānapi me śṛṇu | rūpaṃ cakṣuḥ prakāśaśca darśane hetavastrayaḥ
वे बाहरी वस्तुओं की भी अपेक्षा रखती हैं; उन गुणों को भी मुझसे सुनिए। रूप, नेत्र और प्रकाश: ये तीन देखने के कारण हैं।
श्लोक 102 (12.325.102)
यथैवात्र तथाऽन्येषु ज्ञानज्ञेयेषु हेतवः । ज्ञानज्ञेयांतरेतस्मिन्मनो नामापरो गुणः ॥
yathaivātra tathā'nyeṣu jñānajñeyeṣu hetavaḥ | jñānajñeyāṃtaretasminmano nāmāparo guṇaḥ
जैसे यहाँ है, वैसे ही अन्य ज्ञान और ज्ञेय विषयों में भी कारण होते हैं। ज्ञान और ज्ञेय के बीच में एक और गुण है, जिसे मन कहते हैं,
श्लोक 103 (12.325.103)
विचारयति येनायं निश्चये साध्वसाधुनी । द्वादशस्त्वपरस्तत्र बुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः । येन संशयपूर्वेषु बोद्धव्येषु व्यवस्यति ॥
vicārayati yenāyaṃ niścaye sādhvasādhunī | dvādaśastvaparastatra buddhirnāma guṇaḥ smṛtaḥ | yena saṃśayapūrveṣu boddhavyeṣu vyavasyati
जिससे मनुष्य निश्चय करते समय भले और बुरे पर विचार करता है। उसके बाद एक बारहवाँ दूसरा गुण है, जिसे बुद्धि कहा गया है; उसी से मनुष्य उन जानने योग्य बातों का निर्णय करता है जो पहले संशय में थीं।
श्लोक 104 (12.325.104)
अथ द्वादशके तस्मिन्सत्वं नामापरो गुणः । महासत्वोऽल्पसत्वो वा जन्तुर्येनानुमीयते ॥
atha dvādaśake tasminsatvaṃ nāmāparo guṇaḥ | mahāsatvo'lpasatvo vā janturyenānumīyate
फिर उस बारह के समूह में एक और गुण जुड़ता है, जिसे सत्त्व कहा गया है; उसी से प्राणी के महान् या अल्प बलवाला होने का अनुमान किया जाता है।
श्लोक 105 (12.325.105)
क्षेत्रज्ञ इति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः । ममायमिति येनायं मन्यते न ममेति च ॥
kṣetrajña iti cāpyanyo guṇastatra caturdaśaḥ | mamāyamiti yenāyaṃ manyate na mameti ca
वहाँ एक और चौदहवाँ गुण है, जिसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं; उसी के कारण यह जीव 'यह मेरा है' और 'यह मेरा नहीं है' ऐसा मानता है।
श्लोक 106 (12.325.106)
अथ पञ्चदशो राजन्गुणस्तत्रापरः स्मृतः । पृथक्कालसमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ॥
atha pañcadaśo rājanguṇastatrāparaḥ smṛtaḥ | pṛthakkālasamūhasya sāmagryaṃ tadihocyate
फिर, हे राजन्, वहाँ पन्द्रहवाँ गुण कहा गया है: अलग-अलग कालों का एकत्र हो जाना। उसी को यहाँ समग्रता कहा जाता है।
श्लोक 107 (12.325.107)
गुणस्त्वेकोऽपरस्तत्र संघात इति षोडशः । आकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन्समाश्रितौ ॥
guṇastveko'parastatra saṃghāta iti ṣoḍaśaḥ | ākṛtirvyaktirityetau guṇau yasminsamāśritau
वहाँ एक और सोलहवाँ गुण है, जिसे संघात कहते हैं; और आकृति तथा व्यक्ति, ये दो गुण उसी में आश्रित हैं।
श्लोक 108 (12.325.108)
सुखासुखे जन्ममृत्यू लाभालाभौ प्रियाप्रिये । इति चैकोनविंशोऽयं द्वन्द्वयोग इति स्मृतः ॥
sukhāsukhe janmamṛtyū lābhālābhau priyāpriye | iti caikonaviṃśo'yaṃ dvandvayoga iti smṛtaḥ
सुख और असुख, जन्म और मृत्यु, लाभ और हानि, प्रिय और अप्रिय: यह उन्नीसवाँ गुण द्वन्द्वयोग कहा गया है।
श्लोक 109 (12.325.109)
ऊर्ध्वमेकोनविंशत्या कालो नामापरो गुणः । इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥
ūrdhvamekonaviṃśatyā kālo nāmāparo guṇaḥ | itīmaṃ viddhi viṃśatyā bhūtānāṃ prabhavāpyayam
उन्नीस के ऊपर एक और गुण है, जिसे काल कहते हैं। इस प्रकार इन बीस को प्राणियों की उत्पत्ति और लय का कारण जानिए।
श्लोक 110 (12.325.110)
विंशकश्चैव संघातो महाभूतानि पञ्च च । सदसद्भावयोगौ तु गुणावन्यौ प्रकाशकौ ॥
viṃśakaścaiva saṃghāto mahābhūtāni pañca ca | sadasadbhāvayogau tu guṇāvanyau prakāśakau
बीसवाँ संघात है, और फिर पाँच महाभूत हैं; तथा सत्-असत् भाव और योग, ये दो और गुण हैं जो वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं।
श्लोक 111 (12.325.111)
इत्येवं विंशतिश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः । विधिः शुक्रं बलं चेति त्रय एते गुणाः परे ॥
ityevaṃ viṃśatiścaiva guṇāḥ sapta ca ye smṛtāḥ | vidhiḥ śukraṃ balaṃ ceti traya ete guṇāḥ pare
इस प्रकार बीस गुण हैं और सात दूसरे जो स्मरण किए गए हैं; और ये तीन और गुण हैं: विधि, शुक्र और बल।
श्लोक 112 (12.325.112)
एवं विंशच्च दश च कलाः संख्यानतः स्मृताः । समग्रा यत्र वर्तन्ते तच्छरीरमिति स्मृतम् ॥
evaṃ viṃśacca daśa ca kalāḥ saṃkhyānataḥ smṛtāḥ | samagrā yatra vartante taccharīramiti smṛtam
इस प्रकार गिनती में कलाएँ बीस और दस मानी गई हैं; जहाँ वे सब पूर्ण रूप से विद्यमान होती हैं, उसी को शरीर कहा गया है।
श्लोक 113 (12.325.113)
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति । व्यक्तं चासां तथैवान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ॥
avyaktaṃ prakṛtiṃ tvāsāṃ kalānāṃ kaścidicchati | vyaktaṃ cāsāṃ tathaivānyaḥ sthūladarśī prapaśyati
कोई इन कलाओं का मूल कारण अव्यक्त को मानता है; और दूसरा, स्थूल को देखनेवाला, इनमें केवल व्यक्त को ही देखता है।
श्लोक 114 (12.325.114)
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयं वाऽथ चतुष्टयम् । प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ॥
avyaktaṃ yadi vā vyaktaṃ dvayaṃ vā'tha catuṣṭayam | prakṛtiṃ sarvabhūtānāṃ paśyantyadhyātmacintakāḥ
अव्यक्त हो या व्यक्त, या दोनों, या चतुर्विध: अध्यात्म का चिन्तन करनेवाले इसी प्रकार समस्त प्राणियों की प्रकृति को देखते हैं।
श्लोक 115 (12.325.115)
सेयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता । ततोऽहं त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ॥
seyaṃ prakṛtiravyaktā kalābhirvyaktatāṃ gatā | tato'haṃ tvaṃ ca rājendra ye cāpyanye śarīriṇaḥ
यह अव्यक्त प्रकृति कलाओं के द्वारा व्यक्त रूप को प्राप्त हुई है। उसी से मैं, आप, हे राजेन्द्र, और अन्य सब देहधारी हुए हैं।
श्लोक 116 (12.325.116)
विन्दुन्यासादयोऽवस्थाः शुक्रशोणितसंभवाः । यासामेव निपातेन कललं नाम जायते ॥
vindunyāsādayo'vasthāḥ śukraśoṇitasaṃbhavāḥ | yāsāmeva nipātena kalalaṃ nāma jāyate
बिन्दु के स्थापित होने से आरम्भ होनेवाली अवस्थाएँ, जो शुक्र और रक्त से उत्पन्न होती हैं; उन्हीं के संयोग से कलल नामक अवस्था बनती है।
श्लोक 117 (12.325.117)
कललाद्बुद्बुदोत्पत्तिः पेशी वा बुद्बुदात्स्मृता । पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः ॥
kalalādbudbudotpattiḥ peśī vā budbudātsmṛtā | peśyāstvaṅgābhinirvṛttirnakharomāṇi cāṅgataḥ
कलल से बुद्बुद की उत्पत्ति होती है, और बुद्बुद से पेशी कही गई है; पेशी से अंगों का निर्माण होता है और अंगों से नख तथा रोम बनते हैं।
श्लोक 118 (12.325.118)
संपूर्णे नवमे मासि जन्तोर्जातस्य मैथिल । जायते नामरूपत्वं स्त्रीपुमान्वेति लिङ्गतः ॥
saṃpūrṇe navame māsi jantorjātasya maithila | jāyate nāmarūpatvaṃ strīpumānveti liṅgataḥ
हे मिथिलापते, नवाँ महीना पूरा होने पर उत्पन्न हुए प्राणी में नाम और रूप प्रकट होते हैं, और चिह्न से जाना जाता है कि वह स्त्री है या पुरुष।
श्लोक 119 (12.325.119)
जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि । कौमारं रूपमापन्नं रूपवानुपलभ्यते ॥
jātamātraṃ tu tadrūpaṃ dṛṣṭvā tāmranakhāṅguli | kaumāraṃ rūpamāpannaṃ rūpavānupalabhyate
जन्म के क्षण में वह रूप ताँबे जैसे लाल नाखूनों और उँगलियोंवाला दिखाई देता है; और जब वह बाल्यावस्था के रूप को प्राप्त हो जाता है, तब सुन्दर रूपवाला जान पड़ता है।
श्लोक 120 (12.325.120)
कौमाराद्यौवनं चापि स्थाविर्यं चापि यौवनात् । अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ॥
kaumārādyauvanaṃ cāpi sthāviryaṃ cāpi yauvanāt | anena kramayogena pūrvaṃ pūrvaṃ na labhyate
बाल्यावस्था से यौवन आता है और यौवन से वृद्धावस्था; इसी क्रम से हर पिछली अवस्था फिर नहीं मिलती।
श्लोक 121 (12.325.121)
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे । वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते ॥
kalānāṃ pṛthagarthānāṃ pratibhedaḥ kṣaṇe kṣaṇe | vartate sarvabhūteṣu saukṣmyāttu na vibhāvyate
सब प्राणियों में अलग-अलग कार्यवाली कलाओं का क्षण-क्षण में परिवर्तन होता रहता है; पर सूक्ष्म होने के कारण वह दिखाई नहीं देता।
श्लोक 122 (12.325.122)
न चैषामप्ययो राजँल्लक्ष्यते प्रभवो न च । अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गतिः ॥
na caiṣāmapyayo rājam̐llakṣyate prabhavo na ca | avasthāyāmavasthāyāṃ dīpasyevārciṣo gatiḥ
हे राजन्, इनका न लय दिखाई देता है और न उत्पत्ति; प्रत्येक अवस्था में इनकी गति दीपक की लौ की गति के समान है।
श्लोक 123 (12.325.123)
तस्याप्येवंप्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः । अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ॥
tasyāpyevaṃprabhāvasya sadaśvasyeva dhāvataḥ | ajasraṃ sarvalokasya kaḥ kuto vā na vā kutaḥ
तेज़ घोड़े की तरह निरन्तर दौड़ते हुए इस सारे संसार के प्रवाह में कौन क्या है, और कहाँ से? अथवा कहाँ से नहीं?
श्लोक 124 (12.325.124)
कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः । संबन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवयवैरिह ॥
kasyedaṃ kasya vā nedaṃ kuto vedaṃ na vā kutaḥ | saṃbandhaḥ ko'sti bhūtānāṃ svairapyavayavairiha
यह किसका है और किसका नहीं है? यह कहाँ से है और कहाँ से नहीं? यहाँ प्राणियों का अपने ही अंगों के साथ भी कौन-सा सम्बन्ध है?
श्लोक 125 (12.325.125)
यथाऽऽदित्यान्मणेश्चापि वीरुद्भ्यश्चैव पावकः । जायन्त्येवं समुदयात्कलानामिह जन्तवः ॥
yathā''dityānmaṇeścāpi vīrudbhyaścaiva pāvakaḥ | jāyantyevaṃ samudayātkalānāmiha jantavaḥ
जैसे सूर्य से, मणि से और सूखी वनस्पतियों से अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही यहाँ कलाओं के मेल से प्राणी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 126 (12.325.126)
आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं यथा त्वमनुपश्यसि । एवमेवात्मनाऽऽत्मानमन्यस्मिन्किं न पश्यसि ॥
ātmanyevātmanā''tmānaṃ yathā tvamanupaśyasi | evamevātmanā''tmānamanyasminkiṃ na paśyasi
जैसे आप अपने में अपने ही द्वारा आत्मा को देखते हैं, वैसे ही दूसरे में आत्मा के द्वारा आत्मा को क्यों नहीं देखते?
श्लोक 127 (12.325.127)
यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि । अथ मां काऽसि कस्येति किमर्थमनुपृच्छसि ॥
yadyātmani parasmiṃśca samatāmadhyavasyasi | atha māṃ kā'si kasyeti kimarthamanupṛcchasi
यदि आप अपने में और दूसरे में समानता का निश्चय करते हैं, तो फिर मुझसे 'तुम कौन हो, किसकी हो' यह क्यों बार-बार पूछते हैं?
श्लोक 128 (12.325.128)
इदं मे स्यादिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य मैथिल । काऽसि कस्य कुतो वेति वचनैः किं प्रयोजनम् ॥
idaṃ me syādidaṃ neti dvandvairmuktasya maithila | kā'si kasya kuto veti vacanaiḥ kiṃ prayojanam
हे मिथिलापते, 'यह मेरा हो, यह नहीं' ऐसे द्वन्द्वों से जो मुक्त है, उसके लिए 'तुम कौन हो, किसकी हो, कहाँ से आई हो' इन वचनों से क्या प्रयोजन?
श्लोक 129 (12.325.129)
रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजये सन्धिविग्रहे । कृतवान्यो महीपालः किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ॥
ripau mitre'tha madhyasthe vijaye sandhivigrahe | kṛtavānyo mahīpālaḥ kiṃ tasminmuktalakṣaṇam
जिस राजा ने शत्रु, मित्र और तटस्थ के साथ, विजय में, सन्धि और युद्ध में व्यवहार किया है, उसमें मुक्ति का क्या लक्षण है?
श्लोक 130 (12.325.130)
त्रिवर्गं सप्तधा न्यस्तं यो न वेदेह कर्मसु । सङ्गवान्यस्त्रिवर्गे च किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ॥
trivargaṃ saptadhā nyastaṃ yo na vedeha karmasu | saṅgavānyastrivarge ca kiṃ tasminmuktalakṣaṇam
जो अपने कर्मों में सात प्रकार से बँटे हुए त्रिवर्ग को नहीं जानता और त्रिवर्ग में आसक्त है, उसमें मुक्ति का क्या लक्षण है?
श्लोक 131 (12.325.131)
प्रिये वाऽप्यप्रिये वाऽपि दुर्बले बलवत्यपि । यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ॥
priye vā'pyapriye vā'pi durbale balavatyapi | yasya nāsti samaṃ cakṣuḥ kiṃ tasminmuktalakṣaṇam
जिसकी दृष्टि प्रिय और अप्रिय में, दुर्बल और बलवान में समान नहीं है, उसमें मुक्ति का क्या लक्षण है?
श्लोक 132 (12.325.132)
तदयुक्तस्य ते मोक्षे योऽभिमानो भवेन्नृप । सुहृद्भिः सन्निवार्यस्तेऽविरक्तस्येव भेषजम् ॥
tadayuktasya te mokṣe yo'bhimāno bhavennṛpa | suhṛdbhiḥ sannivāryaste'viraktasyeva bheṣajam
इसलिए, हे राजन्, मोक्ष के विषय में आपको जो अभिमान है, जबकि आप उसके योग्य नहीं हैं, उसे आपके मित्रों को रोकना चाहिए, जैसे राग से मुक्त न हुए व्यक्ति को औषध दी जाती है।
श्लोक 133 (12.325.133)
तानि तान्यनुसंदृश्य सङ्गस्थानान्यरिंदम । आत्मनाऽऽत्मनि संपश्य किमन्यन्मुक्तलक्षणम् ॥
tāni tānyanusaṃdṛśya saṅgasthānānyariṃdama | ātmanā''tmani saṃpaśya kimanyanmuktalakṣaṇam
हे शत्रुदमन, उन-उन आसक्ति के स्थानों को एक-एक करके देखकर अपने भीतर अपने ही द्वारा देखिए: मुक्ति का और कौन-सा लक्षण है?
श्लोक 134 (12.325.134)
इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य केनचित् । चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ॥
imānyanyāni sūkṣmāṇi mokṣamāśritya kenacit | caturaṅgapravṛttāni saṅgasthānāni me śṛṇu
मोक्ष का आश्रय लेनेवाले किसी व्यक्ति में पाए जानेवाले, चार अंगों के द्वारा प्रवृत्त होनेवाले आसक्ति के इन दूसरे सूक्ष्म स्थानों को मुझसे सुनिए।
श्लोक 135 (12.325.135)
य इमां पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति ह । एकमेव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ॥
ya imāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāmekacchatrāṃ praśāsti ha | ekameva sa vai rājā puramadhyāvasatyuta
जो राजा इस सारी पृथ्वी पर एक छत्र शासन करता है, वह भी एक ही नगर में निवास करता है।
श्लोक 136 (12.325.136)
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति । गृहे शयनमप्येकं निशायां यत्र लीयते ॥
tatpure caikamevāsya gṛhaṃ yadadhitiṣṭhati | gṛhe śayanamapyekaṃ niśāyāṃ yatra līyate
उस नगर में उसका केवल एक ही घर है जिसमें वह रहता है, और उस घर में एक ही शय्या, जिस पर वह रात में लेटता है।
श्लोक 137 (12.325.137)
शय्यार्धं तस्य चाप्यत्र स्त्रीपूर्वमधितिष्ठति । तदनेन प्रसङ्गेन फलेनाल्पेन युज्यते ॥
śayyārdhaṃ tasya cāpyatra strīpūrvamadhitiṣṭhati | tadanena prasaṅgena phalenālpena yujyate
और उस शय्या का आधा भाग पहले से एक स्त्री घेरे रहती है। इस प्रकार इस आसक्ति के कारण वह केवल थोड़े-से फल से बँधा है।
श्लोक 138 (12.325.138)
एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च । गुणेष्वपरिमेयेषु निग्रहानुग्रहं प्रति ॥
evamevopabhogeṣu bhojanācchādaneṣu ca | guṇeṣvaparimeyeṣu nigrahānugrahaṃ prati
इसी प्रकार भोगों में, खान-पान और वस्त्रों में, तथा अनगिनत गुणों के विषय में, दण्ड देने और अनुग्रह करने के प्रसंग में भी यही बात है।
श्लोक 139 (12.325.139)
परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पे सोऽपि प्रसज्जते । सन्धिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ॥
paratantraḥ sadā rājā svalpe so'pi prasajjate | sandhivigrahayoge ca kuto rājñaḥ svatantratā
राजा सदा दूसरों के अधीन रहता है और छोटी-छोटी बातों में भी फँस जाता है; सन्धि और युद्ध के संचालन में राजा की स्वतन्त्रता कहाँ?
श्लोक 140 (12.325.140)
स्त्रीषु क्रीडाविहारेषु नित्यमस्यास्वतन्त्रता । मन्त्रे चामात्यसहिते कुतस्तस्य स्वतन्त्रता ॥
strīṣu krīḍāvihāreṣu nityamasyāsvatantratā | mantre cāmātyasahite kutastasya svatantratā
स्त्रियों के बीच, क्रीड़ा और विहार में उसे कभी स्वतन्त्रता नहीं रहती; और मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा में उसकी स्वतन्त्रता कहाँ?
श्लोक 141 (12.325.141)
यदा ह्याज्ञापयत्यन्यांस्तत्रास्योक्ता स्वतन्त्रता । अवशः कार्यते तत्र तस्मिंस्तस्मिन्गुणे स्थितः ॥
yadā hyājñāpayatyanyāṃstatrāsyoktā svatantratā | avaśaḥ kāryate tatra tasmiṃstasminguṇe sthitaḥ
जब वह दूसरों को आज्ञा देता है, केवल तभी उसकी स्वतन्त्रता की बात कही जाती है; और तब भी वह एक-एक बन्धन में पड़ा हुआ विवश होकर कार्य करने को बाध्य किया जाता है।
श्लोक 142 (12.325.142)
स्वप्नकामो न लभते स्वप्तुं कार्यार्थिभिर्जनैः । शयने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ॥
svapnakāmo na labhate svaptuṃ kāryārthibhirjanaiḥ | śayane cāpyanujñātaḥ supta utthāpyate'vaśaḥ
सोना चाहने पर भी काम से आए लोगों के कारण वह सो नहीं पाता; और शयन की अनुमति मिल जाने पर भी सोते-सोते उसे विवश होकर जगाया जाता है।
श्लोक 143 (12.325.143)
स्नाह्यालभ पिब प्राश जुहुध्यग्नीन्यजेत्यपि । वदस्व शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ॥
snāhyālabha piba prāśa juhudhyagnīnyajetyapi | vadasva śṛṇu cāpīti vivaśaḥ kāryate paraiḥ
'स्नान करो! अनुलेपन करो! पियो! खाओ! अग्नियों में आहुति दो! यज्ञ करो! बोलो! सुनो!' इस प्रकार विवश होकर वह दूसरों के द्वारा कराया जाता है।
श्लोक 144 (12.325.144)
अभिगम्याभिगम्यैवं याचन्ते सततं नराः । न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनान् ॥
abhigamyābhigamyaivaṃ yācante satataṃ narāḥ | na cāpyutsahate dātuṃ vittarakṣī mahājanān
लोग बार-बार उसके पास आकर निरन्तर माँगते रहते हैं; पर धन की रक्षा में लगा हुआ वह इतने बड़े जनसमूह को देने का साहस नहीं कर पाता।
श्लोक 145 (12.325.145)
दाने कोशक्षयोऽप्यस्य वैरं चास्य प्रयच्छतः । क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ॥
dāne kośakṣayo'pyasya vairaṃ cāsya prayacchataḥ | kṣaṇenāsyopavartante doṣā vairāgyakārakāḥ
देने में उसका कोश घटता है, और देते हुए भी उसके प्रति वैर पैदा होता है; क्षण भर में उसके भीतर ऐसे दोष आ जाते हैं जो विरक्ति पैदा करनेवाले हैं।
श्लोक 146 (12.325.146)
प्राज्ञाञ्शूरांस्तथा वैद्यानेकस्थानपि शङ्कते । भयमप्यनये राज्ञो यैश्च नित्यमुपास्यते ॥
prājñāñśūrāṃstathā vaidyānekasthānapi śaṅkate | bhayamapyanaye rājño yaiśca nityamupāsyate
वह बुद्धिमानों, शूरों और विद्वानों पर एक ही स्थान में रहते हुए भी शंका करता है; और जिनसे वह सदा घिरा रहता है, उनसे राजा को नीति की चूक में भी भय बना रहता है।
श्लोक 147 (12.325.147)
तथा चैते प्रदुष्यन्ति राजन्ये कीर्तिता मया । तथैवास्य भयं तेभ्यो जायते पश्य यादृशम् ॥
tathā caite praduṣyanti rājanye kīrtitā mayā | tathaivāsya bhayaṃ tebhyo jāyate paśya yādṛśam
हे राजन्, जिनका मैंने नाम लिया है, वे जैसे-जैसे विरोधी हो जाते हैं, वैसे-वैसे उसे उनसे भय उत्पन्न होता है; देखिए, वह कैसा होता है।
श्लोक 148 (12.325.148)
सर्वः स्वेस्वे गृहे राजा सर्वः स्वेस्वे गृहे गृही । निग्रहानुग्रहौ कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ॥
sarvaḥ svesve gṛhe rājā sarvaḥ svesve gṛhe gṛhī | nigrahānugrahau kurvaṃstulyo janaka rājabhiḥ
हर कोई अपने-अपने घर में राजा है, हर कोई अपने-अपने घर में गृहस्थ है; दण्ड देने और अनुग्रह करने में, हे जनक, वह राजाओं के समान ही है।
श्लोक 149 (12.325.149)
पुत्रा दारास्तथैवात्मा कोशो मित्राणि संचयाः । परैः साधारणा ह्येते तैस्तैरेवास्य हेतुभिः ॥
putrā dārāstathaivātmā kośo mitrāṇi saṃcayāḥ | paraiḥ sādhāraṇā hyete taistairevāsya hetubhiḥ
पुत्र, पत्नियाँ, अपना शरीर, कोश, मित्र और संचित धन: ये सब दूसरों के साथ साझे के हैं, अपने-अपने कारणों से।
श्लोक 150 (12.325.150)
हतो देशः पुरं दग्धं प्रधानः कुञ्जरो मृतः । लोकसाधारणेष्वेषु मिथ्याज्ञानेन तप्यते ॥
hato deśaḥ puraṃ dagdhaṃ pradhānaḥ kuñjaro mṛtaḥ | lokasādhāraṇeṣveṣu mithyājñānena tapyate
'देश उजड़ गया, नगर जल गया, प्रधान हाथी मर गया': संसार के सबके साझे इन विषयों में वह मिथ्या ज्ञान से सन्तप्त होता है।
श्लोक 151 (12.325.151)
अमुक्तो मानसैर्दुःखैरिच्छाद्वेषप्रियोद्भवैः । शिरोरोगादिभी रोगैस्तथैव विनिपातिभिः ॥
amukto mānasairduḥkhairicchādveṣapriyodbhavaiḥ | śirorogādibhī rogaistathaiva vinipātibhiḥ
वह इच्छा, द्वेष और प्रिय से उत्पन्न मानसिक दुःखों से मुक्त नहीं है, न सिरदर्द आदि रोगों से, और न उसी प्रकार अचानक आ पड़नेवाली विपत्तियों से।
श्लोक 152 (12.325.152)
द्वन्द्वैस्तैस्तैरुपहतः सर्वतः परिशङ्कितः । बहुभिः प्रार्थितं राज्यमुपास्ते गणयन्निशाः ॥
dvandvaistaistairupahataḥ sarvataḥ pariśaṅkitaḥ | bahubhiḥ prārthitaṃ rājyamupāste gaṇayanniśāḥ
एक-एक द्वन्द्व से आहत, चारों ओर से शंकित, वह बहुतों के द्वारा चाहे गए राज्य की सेवा करता हुआ रातें गिनता रहता है।
श्लोक 153 (12.325.153)
तदल्पसुखमत्यर्थं बहुदुःखमसारवत् । तृणाग्निज्वलनप्रख्यं फेनबुद्बुदसंनिभम् ॥
tadalpasukhamatyarthaṃ bahuduḥkhamasāravat | tṛṇāgnijvalanaprakhyaṃ phenabudbudasaṃnibham
वह राज्य अत्यन्त अल्प सुखवाला, बहुत दुःखवाला और सारहीन है; वह तिनकों की आग की लपट के समान और झाग के बुलबुले के समान है।
श्लोक 154 (12.325.154)
को राज्यमभिपद्येत प्राप्य चोपशमं लभेत् । ममेदमिति यच्चेदं पुरं राष्ट्रं च मन्यसे ॥
ko rājyamabhipadyeta prāpya copaśamaṃ labhet | mamedamiti yaccedaṃ puraṃ rāṣṭraṃ ca manyase
कौन राज्य को अपनाएगा, और उसे पाकर शान्ति पाएगा? और यह नगर तथा राष्ट्र, जिसे आप 'मेरा' मानते हैं,
श्लोक 155 (12.325.155)
बलं कोशममात्यांश्च कस्यैतानि न वा नृप । मित्रामात्यपुरं राष्ट्रं दण्डः कोशो महीपतिः ॥
balaṃ kośamamātyāṃśca kasyaitāni na vā nṛpa | mitrāmātyapuraṃ rāṣṭraṃ daṇḍaḥ kośo mahīpatiḥ
सेना, कोश और मन्त्री: हे राजन्, ये किसके हैं और किसके नहीं? मित्र, अमात्य, नगर, राष्ट्र, दण्ड, कोश और राजा:
श्लोक 156 (12.325.156)
सप्ताङ्गश्चैष सङ्घातो राज्यमित्युच्यते नृप । सप्ताङ्गस्यास्य राज्यस्य त्रिदण्डस्येव तिष्ठतः । अन्योन्यगुणयुक्तस्य कः केन गुणतोऽधिकः ॥
saptāṅgaścaiṣa saṅghāto rājyamityucyate nṛpa | saptāṅgasyāsya rājyasya tridaṇḍasyeva tiṣṭhataḥ | anyonyaguṇayuktasya kaḥ kena guṇato'dhikaḥ
सात अंगों का यह समूह ही राज्य कहलाता है, हे राजन्। तिपाई के समान खड़े इस सात अंगोंवाले राज्य में, जहाँ सब अंग अपने गुणों से एक-दूसरे को सँभालते हैं, कौन किससे गुण में अधिक है?
श्लोक 157 (12.325.157)
तेषुतेषु हि कालेषु तत्तदङ्गं विशिष्यते । येन यत्सिध्यते कार्यं तत्प्राधान्याय कल्पते ॥
teṣuteṣu hi kāleṣu tattadaṅgaṃ viśiṣyate | yena yatsidhyate kāryaṃ tatprādhānyāya kalpate
भिन्न-भिन्न समयों में कभी एक अंग और कभी दूसरा अंग प्रधान हो जाता है; जिस अंग से जो कार्य सिद्ध होता है, वही प्रधानता के योग्य होता है।
श्लोक 158 (12.325.158)
सप्ताङ्गश्चैव संघातस्त्रयश्चान्ये नृपोत्तम । संभूय दशवर्गोऽयं भुङ्क्ते राज्यं हि राजवत् ॥
saptāṅgaścaiva saṃghātastrayaścānye nṛpottama | saṃbhūya daśavargo'yaṃ bhuṅkte rājyaṃ hi rājavat
सात अंगों का समूह और तीन दूसरे, हे नृपश्रेष्ठ, मिलकर दस का वर्ग बनते हैं, जो राजा की तरह राज्य का भोग करता है।
श्लोक 159 (12.325.159)
यश्च राजा महोत्साहः क्षत्रधर्मे रतो भवेत् । स तुष्येद्दशभागेन ततस्त्वन्यो दशावरैः ॥
yaśca rājā mahotsāhaḥ kṣatradharme rato bhavet | sa tuṣyeddaśabhāgena tatastvanyo daśāvaraiḥ
जो राजा महान् उत्साही और क्षत्रिय धर्म में रत हो, वह दसवें भाग से सन्तुष्ट हो जाता है, और उसके बाद दूसरा कम से कम दस के भागों से।
श्लोक 160 (12.325.160)
नास्त्यसाधारणो राजा नास्ति राज्यमराजकम् । राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ॥
nāstyasādhāraṇo rājā nāsti rājyamarājakam | rājye'sati kuto dharmo dharme'sati kutaḥ param
ऐसा कोई राजा नहीं जो सबका साझा न हो, और राजा के बिना कोई राज्य नहीं होता। राज्य न हो तो धर्म कहाँ? और धर्म न हो तो उससे परे कुछ कहाँ?
श्लोक 161 (12.325.161)
योऽप्यत्र परमो धर्मः पवित्रं राजराज्ययोः । पृथिवी दक्षिणा यस्य सोऽश्वमेधो न विद्यते ॥
yo'pyatra paramo dharmaḥ pavitraṃ rājarājyayoḥ | pṛthivī dakṣiṇā yasya so'śvamedho na vidyate
और यहाँ जो परम धर्म है, राजा और राज्य दोनों को पवित्र करनेवाला, वह अश्वमेध जिसकी दक्षिणा पृथ्वी है, वह विद्यमान नहीं रहता।
श्लोक 162 (12.325.162)
साऽहमेतानि कर्माणि राजदुःखानि मैथिल । समर्था शतशो वक्तुमथवाऽपि सहस्रशः ॥
sā'hametāni karmāṇi rājaduḥkhāni maithila | samarthā śataśo vaktumathavā'pi sahasraśaḥ
हे मिथिलापते, मैं राज्य के इन दुःखों को सैकड़ों, यहाँ तक कि हज़ारों की संख्या में बता सकती हूँ।
श्लोक 163 (12.325.163)
स्वदेहे नाभिषङ्गो मे कुतः परपरिग्रहे । न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि ॥
svadehe nābhiṣaṅgo me kutaḥ paraparigrahe | na māmevaṃvidhāṃ yuktāmīdṛśaṃ vaktumarhasi
मुझे अपने शरीर में भी आसक्ति नहीं है, फिर दूसरे की वस्तु में कहाँ? मुझ जैसी संयमी से आपको ऐसा कहना उचित नहीं।
श्लोक 164 (12.325.164)
ननु नाम त्वया मोक्षः कृत्स्नः पञ्चशिखाच्छ्रुतः । सोपायः सोपनिषदः सोपसङ्गः सनिश्चयः ॥
nanu nāma tvayā mokṣaḥ kṛtsnaḥ pañcaśikhācchrutaḥ | sopāyaḥ sopaniṣadaḥ sopasaṅgaḥ saniścayaḥ
निश्चय ही आपने पंचशिख से मोक्ष का सम्पूर्ण उपदेश सुना है: उपायों, उपनिषद् (रहस्य), सहायक अंगों और निश्चयों सहित।
श्लोक 165 (12.325.165)
तस्य ते मुक्तसङ्गस्य पाशानाक्रम्य तिष्ठतः । छत्रादिषु विशेषेषु पुनः सङ्गः कथं नृप ॥
tasya te muktasaṅgasya pāśānākramya tiṣṭhataḥ | chatrādiṣu viśeṣeṣu punaḥ saṅgaḥ kathaṃ nṛpa
हे राजन्, जब आप आसक्ति से मुक्त हैं और बन्धनों को लाँघकर खड़े हैं, तब छत्र आदि विशेष चिह्नों में आपकी आसक्ति फिर कैसे हो सकती है?
श्लोक 166 (12.325.166)
श्रुतं ते न श्रुतं मन्ये मृषा वाऽपि श्रुतं श्रुतम् । अथवा श्रुतसंकाशं श्रुतमन्यच्छ्रुतं त्वया ॥
śrutaṃ te na śrutaṃ manye mṛṣā vā'pi śrutaṃ śrutam | athavā śrutasaṃkāśaṃ śrutamanyacchrutaṃ tvayā
मुझे लगता है कि जो आपने सुना, वह सुना ही नहीं गया; या जो सुना वह व्यर्थ ही सुना; अथवा वह सुनने जैसा ही कुछ था; आपने कुछ और ही सुन लिया।
श्लोक 167 (12.325.167)
अथापीमासु संज्ञासु लौकिकीषु प्रतिष्ठसे । अभिषङ्गावरोधाभ्यां बद्धस्त्वं प्राकृतो यथा ॥
athāpīmāsu saṃjñāsu laukikīṣu pratiṣṭhase | abhiṣaṅgāvarodhābhyāṃ baddhastvaṃ prākṛto yathā
अथवा आप इन लौकिक संज्ञाओं में ही टिके हुए हैं; आसक्ति और रोक-टोक से बँधे हुए आप साधारण मनुष्य के समान हैं।
श्लोक 168 (12.325.168)
सत्वेनानुप्रवेशो हि योऽयं त्वयि कृतो मया । किं तवापकृतं तत्र यदि मुक्तोऽसि सर्वशः ॥
satvenānupraveśo hi yo'yaṃ tvayi kṛto mayā | kiṃ tavāpakṛtaṃ tatra yadi mukto'si sarvaśaḥ
मैंने अपने अन्तःसत्त्व के द्वारा जो आपमें प्रवेश किया है, उसमें मैंने आपका क्या अपकार किया, यदि आप सब प्रकार से मुक्त हैं?
श्लोक 169 (12.325.169)
नियमो ह्येषु धर्मेषु यतीनां शून्यवासिता । शून्यमावासयन्त्या च मया किं कस्य दूषितम् ॥
niyamo hyeṣu dharmeṣu yatīnāṃ śūnyavāsitā | śūnyamāvāsayantyā ca mayā kiṃ kasya dūṣitam
इन धर्मों में यह नियम है कि यति सूने स्थान में निवास करते हैं; सूने स्थान में निवास करती हुई मैंने किसका क्या दूषित किया?
श्लोक 170 (12.325.170)
न पाणिभ्यां न बाहुभ्यां पादोरुभ्यां न चानघ । न गात्रावयवैरन्यैः स्पृशामि त्वां नराधिप ॥
na pāṇibhyāṃ na bāhubhyāṃ pādorubhyāṃ na cānagha | na gātrāvayavairanyaiḥ spṛśāmi tvāṃ narādhipa
हे निष्पाप, हे नराधिप, मैं आपको न हाथों से, न भुजाओं से, न पैरों और जंघाओं से, और न शरीर के किसी अन्य अंग से छूती हूँ।
श्लोक 171 (12.325.171)
कुले महति जातेन ह्रीमता दीर्घदर्शिना । नैतत्सदसि वक्तव्यं सद्वाऽसद्वा मिथः कृतम् ॥
kule mahati jātena hrīmatā dīrghadarśinā | naitatsadasi vaktavyaṃ sadvā'sadvā mithaḥ kṛtam
आप ऊँचे कुल में जन्मे हैं, लज्जाशील और दूरदर्शी हैं; आपको सभा में यह नहीं कहना चाहिए कि एकान्त में अच्छा या बुरा क्या किया गया।
श्लोक 172 (12.325.172)
ब्राह्मणा गुरवश्चेमे तथा मान्या गुरूत्तमाः । त्वं चाथ गुरुरप्येषामेवमन्योन्यगौरवम् ॥
brāhmaṇā guravaśceme tathā mānyā gurūttamāḥ | tvaṃ cātha gururapyeṣāmevamanyonyagauravam
ये ब्राह्मण आपके गुरुजन हैं और परम गुरु के रूप में माननीय हैं, और आप भी इनके गुरु हैं; इस प्रकार दोनों ओर परस्पर आदर है।
श्लोक 173 (12.325.173)
तदेवमनुसंदृश्य वाच्यावाच्यं परीक्षता । स्त्रीपुंसोः समवायोऽयं त्वया वाच्यो न संसदि ॥
tadevamanusaṃdṛśya vācyāvācyaṃ parīkṣatā | strīpuṃsoḥ samavāyo'yaṃ tvayā vācyo na saṃsadi
इसलिए इसे भली-भाँति सोचकर और क्या कहना चाहिए, क्या नहीं, इसकी परीक्षा करके आपको सभा में स्त्री-पुरुष के इस मिलन की बात नहीं कहनी चाहिए।
श्लोक 174 (12.325.174)
यथा पुष्करपर्णस्थं जलं तत्पर्णसंस्थितम् । तिष्ठत्यस्पृशती तद्वत्त्वयि वत्स्यामि मैथिल ॥
yathā puṣkaraparṇasthaṃ jalaṃ tatparṇasaṃsthitam | tiṣṭhatyaspṛśatī tadvattvayi vatsyāmi maithila
जैसे कमल के पत्ते पर पड़ा जल उसे बिना छुए उसी पत्ते पर टिका रहता है, वैसे ही, हे मिथिलापते, मैं आपमें निवास करूँगी।
श्लोक 175 (12.325.175)
यदि चाद्य स्पृशन्त्या मे स्पर्शं जानासि कंचन । ज्ञानं कृतमबीजं ते कथं तेनेह भिक्षुणा ॥
yadi cādya spṛśantyā me sparśaṃ jānāsi kaṃcana | jñānaṃ kṛtamabījaṃ te kathaṃ teneha bhikṣuṇā
और यदि आज मेरे छूने पर आप कोई स्पर्श जानते हैं, तो उस भिक्षु ने आपके ज्ञान को बीजरहित कैसे किया?
श्लोक 176 (12.325.176)
स गार्हस्थ्याच्च्युतश्च त्वं मोक्षं चानाप्य दुर्विदम् । उभयोरन्तराले वै वर्तसे मोक्षवादिकः ॥
sa gārhasthyāccyutaśca tvaṃ mokṣaṃ cānāpya durvidam | ubhayorantarāle vai vartase mokṣavādikaḥ
आप गृहस्थ-धर्म से च्युत हो गए हैं और कठिनाई से जाने जानेवाले मोक्ष को भी नहीं पा सके; आप दोनों के बीच में खड़े हैं, केवल मोक्ष की बातें करनेवाले।
श्लोक 177 (12.325.177)
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वयोः । भावाभावसमायोगे जायते वर्णसंकरः ॥
na hi muktasya muktena jñasyaikatvapṛthaktvayoḥ | bhāvābhāvasamāyoge jāyate varṇasaṃkaraḥ
क्योंकि एक मुक्त और दूसरे मुक्त के बीच, जो एकता और भिन्नता दोनों को जानते हैं, सत् और असत् के मेल से वर्णसंकर उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 178 (12.325.178)
वर्णाश्रमाः पृथक्त्वेन दृष्टार्थस्यापृथक्त्वतः । नान्यदन्यदिति ज्ञात्वा नान्यदन्यत्र वर्तते ॥
varṇāśramāḥ pṛthaktvena dṛṣṭārthasyāpṛthaktvataḥ | nānyadanyaditi jñātvā nānyadanyatra vartate
वर्ण और आश्रम अपने-अपने रूप में अलग हैं, पर जिसने लक्ष्य को देख लिया है उसके लिए कोई अलगाव नहीं; यह जानकर कि एक वस्तु दूसरी नहीं है, एक वस्तु दूसरी में प्रवृत्त नहीं होती।
श्लोक 179 (12.325.179)
पाणौ कुण्डं तथा कुण्डे पयः पयसि मक्षिका । आश्रिताश्रययोगेन पृथक्त्वेनाश्रिताः पुनः ॥
pāṇau kuṇḍaṃ tathā kuṇḍe payaḥ payasi makṣikā | āśritāśrayayogena pṛthaktvenāśritāḥ punaḥ
हाथ में कुण्ड है, कुण्ड में दूध है, दूध में मक्खियाँ हैं; आश्रित और आश्रय के सम्बन्ध से वे एक-दूसरे पर टिके हैं, फिर भी हर एक अलग रूप से ही टिका है।
श्लोक 180 (12.325.180)
न तु कुण्डे पयोभावः पयश्चापि न मक्षिका । स्वयमेवाश्रयन्त्येते भावा न तु पराश्रयम् ॥
na tu kuṇḍe payobhāvaḥ payaścāpi na makṣikā | svayamevāśrayantyete bhāvā na tu parāśrayam
कुण्ड दूध नहीं बन जाता, और दूध मक्खियाँ नहीं बन जाता; ये सब वस्तुएँ अपने ही आश्रय पर टिकी हैं, किसी दूसरे के आश्रय पर नहीं।
श्लोक 181 (12.325.181)
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च । परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकरः ॥
pṛthaktvādāśramāṇāṃ ca varṇānyatve tathaiva ca | parasparapṛthaktvācca kathaṃ te varṇasaṃkaraḥ
आश्रमों की भिन्नता, वर्णों के अन्तर और परस्पर अलगाव को देखते हुए आपके लिए वर्णसंकर कैसे हो सकता है?
श्लोक 182 (12.325.182)
नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा । तव राजन्सवर्णाऽस्मि शुद्धयोनिरविप्लुता ॥
nāsmi varṇottamā jātyā na vaiśyā nāvarā tathā | tava rājansavarṇā'smi śuddhayoniraviplutā
हे राजन्, मैं जन्म से न उत्तम वर्ण की हूँ, न वैश्य, और न उससे नीची; मैं आपके ही वर्ण की हूँ, शुद्ध योनि से उत्पन्न और निष्कलंक।
श्लोक 183 (12.325.183)
प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः । कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम् ॥
pradhāno nāma rājarṣirvyaktaṃ te śrotramāgataḥ | kule tasya samutpannāṃ sulabhāṃ nāma viddhi mām
प्रधान नाम के राजर्षि का नाम आपके कानों तक अवश्य पहुँचा होगा। मुझे उनके कुल में उत्पन्न सुलभा जानिए।
श्लोक 184 (12.325.184)
द्रोणश्च शतशृङ्गश्च वक्रद्वारश्च पर्वतः । मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह ॥
droṇaśca śataśṛṅgaśca vakradvāraśca parvataḥ | mama satreṣu pūrveṣāṃ citā maghavatā saha
द्रोण, शतशृङ्ग और वक्रद्वार पर्वत, मघवा (इन्द्र) के साथ, मेरे पूर्वजों के यज्ञ-सत्रों में चयन-रूप में स्थापित हुए थे।
श्लोक 185 (12.325.185)
साहं तस्मिन्कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे । विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम् ॥
sāhaṃ tasminkule jātā bhartaryasati madvidhe | vinītā mokṣadharmeṣu carāmyekā munivratam
मैं उसी कुल में उत्पन्न हुई; मेरे योग्य कोई पति न मिला, इसलिए मोक्ष-धर्मों में प्रशिक्षित होकर मैं अकेली मुनि-व्रत का पालन करती विचरती हूँ।
श्लोक 186 (12.325.186)
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वाभिमानिनी । न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि दृढव्रता ॥
nāsmi satrapraticchannā na parasvābhimāninī | na dharmasaṃkarakarī svadharme'smi dṛḍhavratā
मैं न कपट से संन्यासी का वेश बनानेवाली हूँ, न दूसरों की वस्तु पर अभिमान करनेवाली; मैं धर्मों का मेल-मिश्रण करनेवाली नहीं हूँ; मैं अपने धर्म में दृढ़ व्रतवाली हूँ।
श्लोक 187 (12.325.187)
नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी । नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥
nāsthirā svapratijñāyāṃ nāsamīkṣya pravādinī | nāsamīkṣyāgatā ceha tvatsakāśaṃ janādhipa
हे जनाधिप, मैं अपनी प्रतिज्ञा में अस्थिर नहीं हूँ, बिना विचारे बोलनेवाली नहीं हूँ, और बिना विचारे आपके पास यहाँ आई भी नहीं हूँ।
श्लोक 188 (12.325.188)
मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाऽहं कुशलैषिणी । तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥
mokṣe te bhāvitāṃ buddhiṃ śrutvā'haṃ kuśalaiṣiṇī | tava mokṣasya cāpyasya jijñāsārthamihāgatā
आपकी बुद्धि मोक्ष में लगी है, यह सुनकर, आपका कल्याण चाहती हुई, मैं आपके इस मोक्ष की परीक्षा के लिए यहाँ आई हूँ।
श्लोक 189 (12.325.189)
न वर्गस्था ब्रवीम्येतत्स्वपक्षपरपक्षयोः । मुक्तो विमुच्यते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्यति ॥
na vargasthā bravīmyetatsvapakṣaparapakṣayoḥ | mukto vimucyate yaśca śāntau yaśca na śāmyati
मैं यह अपने पक्ष या दूसरे के पक्ष के प्रति पक्षपात से नहीं कहती, उस विषय में जो मुक्त होकर विमुक्त होता है, और जो शान्त है तथा जो शान्त नहीं होता।
श्लोक 190 (12.325.190)
यथा शून्ये पुराऽगारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् । तथाऽहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥
yathā śūnye purā'gāre bhikṣurekāṃ niśāṃ vaset | tathā'haṃ tvaccharīre'sminnimāṃ vatsyāmi śarvarīm
जैसे कोई भिक्षु किसी सूने पुराने घर में एक रात बिताता है, वैसे ही मैं आपके इस शरीर में यह रात बिताऊँगी।
श्लोक 191 (12.325.191)
साऽहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता । सुप्ता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥
sā'haṃ mānapradānena vāgātithyena cārcitā | suptā suśaraṇaṃ prītā śvo gamiṣyāmi maithila
हे मिथिलापते, आपके द्वारा मान देने और वाणी के आतिथ्य से सम्मानित होकर, मैं प्रसन्न होकर अच्छे आश्रय में सोऊँगी और कल चली जाऊँगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 192 (12.325.192)
इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च । श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किंचिदन्यदतः परं ॥
ityetāni sa vākyāni hetumantyarthavanti ca | śrutvā nādhijagau rājā kiṃcidanyadataḥ paraṃ
हेतुओं और अर्थ से भरे इन वचनों को सुनकर राजा इसके बाद और कुछ नहीं कह सका।