Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 331

पुत्र के लिए व्यास का तप

युधिष्ठिर पूछते हैं कि शुक व्यास के पुत्र रूप में कैसे उत्पन्न हुए और उन्हें परम सिद्धि कैसे मिली। भीष्म पहले तप और इन्द्रिय-संयम की महिमा बताते हैं, फिर कहते हैं कि अग्नि, भूमि, जल, वायु और आकाश के समान पुत्र पाने के लिए व्यास ने मेरु पर सौ वर्ष तक योग-साधना की। देवता और ऋषि वहाँ एकत्र हुए, और महादेव ने देवी सहित प्रकट होकर व्यास को शुद्ध और तेजस्वी पुत्र का वर दिया।

अध्याय 329अध्याय-सूचीअध्याय 332

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.331.1)

कथं व्यासस्य धर्मात्मा शुको जज्ञे महातपाः । सिद्धिं च परमां प्राप्तस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kathaṃ vyāsasya dharmātmā śuko jajñe mahātapāḥ | siddhiṃ ca paramāṃ prāptastanme brūhi pitāmaha

"हे पितामह, महातपस्वी धर्मात्मा शुक व्यास के यहाँ कैसे उत्पन्न हुए, और परम सिद्धि को कैसे प्राप्त हुए? यह मुझे बताइए।"

श्लोक 2 (12.331.2)

कस्यां चोत्पादयामास शुकं व्यासस्तपोधनः । न ह्यस्य जननीं विद्मो जन्म चाग्र्यं महात्मनः ॥

kasyāṃ cotpādayāmāsa śukaṃ vyāsastapodhanaḥ | na hyasya jananīṃ vidmo janma cāgryaṃ mahātmanaḥ

"तपोधन व्यास ने शुक को किसके गर्भ से उत्पन्न किया? हम न तो इन महात्मा की माता को जानते हैं, न उनके उत्कृष्ट जन्म को।"

श्लोक 3 (12.331.3)

कथं च बालस्य सतः सूक्ष्मज्ञाने रता मतिः । यथा नान्यस्य लोकेऽस्मिन्द्वितीयस्येह कस्यचित् ॥

kathaṃ ca bālasya sataḥ sūkṣmajñāne ratā matiḥ | yathā nānyasya loke'smindvitīyasyeha kasyacit

"और बालक होते हुए भी उनकी बुद्धि सूक्ष्म ज्ञान में कैसे रम गई, जैसी इस लोक में किसी दूसरे की नहीं हुई?"

श्लोक 4 (12.331.4)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते । न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतोऽमृतमुत्तमम् ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa mahāmate | na hi me tṛptirastīha śṛṇvato'mṛtamuttamam

"हे महामते, मैं यह विस्तार से सुनना चाहता हूँ; इस उत्तम अमृत को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।"

श्लोक 5 (12.331.5)

माहात्म्यमात्मयोगं च विज्ञानं च शुकस्य ह । यथावदानुपूर्व्येण तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

māhātmyamātmayogaṃ ca vijñānaṃ ca śukasya ha | yathāvadānupūrvyeṇa tanme brūhi pitāmaha

"हे पितामह, शुक की महिमा, उनका आत्मयोग और उनका विज्ञान, यह सब यथावत् क्रम से मुझे बताइए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (12.331.6)

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥

na hāyanairna palitairna vittairna ca bandhubhiḥ | ṛṣayaścakrire dharmaṃ yo'nūcānaḥ sa no mahān

ऋषियों ने धर्म में बड़प्पन न वर्षों पर, न पके केशों पर, न धन पर और न बन्धुओं पर टिकाया। हमारे बीच जो वेद का पारंगत (अनूचान) है, वही महान् है।

श्लोक 7 (12.331.7)

तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि पाण्डव । तदिन्द्रियाणि संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥

tapomūlamidaṃ sarvaṃ yanmāṃ pṛcchasi pāṇḍava | tadindriyāṇi saṃyamya tapo bhavati nānyathā

हे पाण्डव, तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह सब तप के मूल पर टिका है; और तप इन्द्रियों को संयम में रखने से ही होता है, किसी और प्रकार से नहीं।

श्लोक 8 (12.331.8)

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् । संनियम्य तु तान्येव सिद्धिमाप्नोति मानवः ॥

indriyāṇāṃ prasaṅgena doṣamṛcchatyasaṃśayam | saṃniyamya tu tānyeva siddhimāpnoti mānavaḥ

इन्द्रियों के वश में होने से मनुष्य निःसंदेह दोष में पड़ता है, और उन्हीं का भली-भाँति संयम करके वह सिद्धि पाता है।

श्लोक 9 (12.331.9)

अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । योगस्य कलया तात न तुल्यं विद्यते फलम् ॥

aśvamedhasahasrasya vājapeyaśatasya ca | yogasya kalayā tāta na tulyaṃ vidyate phalam

हे तात, हज़ार अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञों का फल भी योग की एक कला के बराबर नहीं होता।

श्लोक 10 (12.331.10)

अत्र ते वर्तयिष्यामि जन्मयोगफलं तथा । शुकस्याग्र्यां गतिं चैव दुर्विदामकृतात्मभिः ॥

atra te vartayiṣyāmi janmayogaphalaṃ tathā | śukasyāgryāṃ gatiṃ caiva durvidāmakṛtātmabhiḥ

इसी प्रसंग में मैं तुम्हें शुक का जन्म, योग का फल और उनकी वह परम गति बताऊँगा, जिसे अशुद्ध अन्तःकरणवाले नहीं समझ पाते।

श्लोक 11 (12.331.11)

मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायुते । विजहार महादेवो भीमैर्भूतगणैर्वृतः ॥

meruśṛṅge kila purā karṇikāravanāyute | vijahāra mahādevo bhīmairbhūtagaṇairvṛtaḥ

कहते हैं, बहुत पहले मेरु के शिखर पर, जहाँ कनेर के वनों का विस्तार था, भयंकर भूतगणों से घिरे हुए महादेव विहार करते थे।

श्लोक 12 (12.331.12)

शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत्पुरा । तत्र दिव्यं तपस्तेषे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ॥

śailarājasutā caiva devī tatrābhavatpurā | tatra divyaṃ tapasteṣe kṛṣṇadvaipāyanaḥ prabhuḥ

उस समय वहाँ पर्वतराज की पुत्री देवी भी थीं, और वहीं प्रभु कृष्णद्वैपायन ने दिव्य तप किया।

श्लोक 13 (12.331.13)

योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः । धारयन्स तपस्तेपे पुत्रार्थं कुरुसत्तम ॥

yogenātmānamāviśya yogadharmaparāyaṇaḥ | dhārayansa tapastepe putrārthaṃ kurusattama

हे कुरुश्रेष्ठ, योग से आत्मा में प्रवेश करके, योगधर्म में तत्पर रहते हुए, वे पुत्र की कामना से तप पर स्थिर रहे।

श्लोक 14 (12.331.14)

अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य वा विभो । वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह ॥

agnerbhūmerapāṃ vāyorantarikṣasya vā vibho | vīryeṇa saṃmitaḥ putro mama bhūyāditi sma ha

हे विभु, "मेरा पुत्र अग्नि, भूमि, जल, वायु अथवा आकाश के समान तेजस्वी हो," ऐसा उन्होंने संकल्प किया।

श्लोक 15 (12.331.15)

संकल्पेनाथ मौनेन दुष्प्रापमकृतात्मभिः । वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् ॥

saṃkalpenātha maunena duṣprāpamakṛtātmabhiḥ | varayāmāsa deveśamāsthitastapa uttamam

संकल्प और मौन के साथ उत्तम तप में स्थित होकर उन्होंने उन देवेश्वर से वर माँगा, जो अशुद्ध अन्तःकरणवालों के लिए दुर्लभ हैं।

श्लोक 16 (12.331.16)

अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः । आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् ॥

atiṣṭhanmārutāhāraḥ śataṃ kila samāḥ prabhuḥ | ārādhayanmahādevaṃ bahurūpamumāpatim

कहते हैं, वायु ही का आहार करते हुए प्रभु सौ वर्ष तक खड़े रहे और बहुरूप उमापति महादेव की आराधना करते रहे।

श्लोक 17 (12.331.17)

तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा । लोकपालाश्च लोकेशं साध्याश्च वसुभिः सह ॥

tatra brahmarṣayaścaiva sarve devarṣayastathā | lokapālāśca lokeśaṃ sādhyāśca vasubhiḥ saha

वहाँ ब्रह्मर्षि, सब देवर्षि, लोकपाल और वसुओं सहित साध्य लोकेश्वर के पास आए।

श्लोक 18 (12.331.18)

आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ । मारुतो मरुतश्चैव सागराः सरितस्तथा ॥

ādityāścaiva rudrāśca divākaraniśākarau | māruto marutaścaiva sāgarāḥ saritastathā

आदित्य और रुद्र, सूर्य और चन्द्रमा, वायुदेव मारुत और मरुद्गण, समुद्र तथा नदियाँ भी आईं।

श्लोक 19 (12.331.19)

अश्विनौ देवगन्धर्वास्तथा नारदपर्वतौ । विश्वावसुश्च गन्धर्वः सिद्धाश्चाप्सरसां गणाः ॥

aśvinau devagandharvāstathā nāradaparvatau | viśvāvasuśca gandharvaḥ siddhāścāpsarasāṃ gaṇāḥ

दोनों अश्विनीकुमार, देव और गन्धर्व, नारद और पर्वत, गन्धर्व विश्वावसु, सिद्ध और अप्सराओं के समूह भी आए।

श्लोक 20 (12.331.20)

तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् । धारयाणः स्रजं भाति ज्योत्स्नामिव निशाकरः ॥

tatra rudro mahādevaḥ karṇikāramayīṃ śubhām | dhārayāṇaḥ srajaṃ bhāti jyotsnāmiva niśākaraḥ

वहाँ महादेव रुद्र कनेर के फूलों की सुन्दर माला धारण किए हुए ऐसे शोभित थे, जैसे चाँदनी से घिरा चन्द्रमा।

श्लोक 21 (12.331.21)

तस्मिन्दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले । आस्थितः परमं योगमृषिः पुत्रार्थमच्युतः ॥

tasmindivye vane ramye devadevarṣisaṃkule | āsthitaḥ paramaṃ yogamṛṣiḥ putrārthamacyutaḥ

देवों और देवर्षियों से भरे उस दिव्य, रमणीय वन में अविचल ऋषि पुत्र के लिए परम योग में स्थित रहे।

श्लोक 22 (12.331.22)

न चास्य हीयते प्राणो न ग्लानिरुपजायते । त्रयाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥

na cāsya hīyate prāṇo na glānirupajāyate | trayāṇāmapi lokānāṃ tadadbhutamivābhavat

न उनके प्राण क्षीण हुए, न उन्हें थकान हुई; तीनों लोकों के लिए यह अद्भुत-सी बात थी।

श्लोक 23 (12.331.23)

जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः । प्रज्वलन्त्यः स्म दृश्यन्ते युक्तस्यामिततेजसः ॥

jaṭāśca tejasā tasya vaiśvānaraśikhopamāḥ | prajvalantyaḥ sma dṛśyante yuktasyāmitatejasaḥ

उनकी जटाएँ उनके तेज से अग्नि की लपटों जैसी हो गईं, और उस योगयुक्त, अपार तेजस्वी की जटाएँ जलती हुई दिखाई देती थीं।

श्लोक 24 (12.331.24)

मार्कण्डेयो हि भगवानेतदाख्यातवान्मम । स देवचरितानीह कथयामास मे तदा ॥

mārkaṇḍeyo hi bhagavānetadākhyātavānmama | sa devacaritānīha kathayāmāsa me tadā

भगवान् मार्कण्डेय ने मुझे यह सुनाया था; तब उन्होंने मुझे देवताओं के चरित बताए थे।

श्लोक 25 (12.331.25)

एता अद्यापि कृष्णस्य तपसा तेन दीपिताः । अग्निवर्णा जटास्तात प्रकाशन्ते महात्मनः ॥

etā adyāpi kṛṣṇasya tapasā tena dīpitāḥ | agnivarṇā jaṭāstāta prakāśante mahātmanaḥ

हे तात, कृष्ण (व्यास) के उस तप से प्रदीप्त हुई उन महात्मा की अग्नि के रंग की जटाएँ आज भी चमकती हैं।

श्लोक 26 (12.331.26)

एवंविधेन तपसा तस्य भक्त्या च भारत । महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् ॥

evaṃvidhena tapasā tasya bhaktyā ca bhārata | maheśvaraḥ prasannātmā cakāra manasā matim

हे भारत, ऐसे तप और उनकी भक्ति से प्रसन्नचित्त महेश्वर ने मन में (वर देने का) निश्चय किया।

श्लोक 27 (12.331.27)

ततस्तस्य महादेवो दर्शयामास साम्बिकः । उवाच चैवं भगवांस्त्र्यम्बकः प्रहसन्निव । एवंविधस्ते तनयो द्वैपायन भविष्यति ॥

tatastasya mahādevo darśayāmāsa sāmbikaḥ | uvāca caivaṃ bhagavāṃstryambakaḥ prahasanniva | evaṃvidhaste tanayo dvaipāyana bhaviṣyati

तब अम्बिका सहित महादेव ने उन्हें दर्शन दिए। और भगवान् त्र्यम्बक ने मुस्कराते हुए उनसे कहा, "हे द्वैपायन, तुम्हारा पुत्र ऐसा ही होगा।"

महादेव उवाच

श्लोक 28 (12.331.28)

यथा ह्यग्निर्यथा वायुर्यथा भूमिर्यथा जलम् । यथाऽऽकाशस्तथा शुद्धो भविता ते सुतो महान् ॥

yathā hyagniryathā vāyuryathā bhūmiryathā jalam | yathā''kāśastathā śuddho bhavitā te suto mahān

"जैसे अग्नि, वायु, भूमि, जल और आकाश शुद्ध हैं, वैसा ही शुद्ध और महान् तुम्हारा पुत्र होगा।"

श्लोक 29 (12.331.29)

तद्भावभावी तद्बुद्धिस्तदाऽऽत्मा तदपाश्रयः । तेजसाऽऽवृत्य लोकांस्त्रीन्यशः प्राप्स्यति ते सुतः ॥

tadbhāvabhāvī tadbuddhistadā''tmā tadapāśrayaḥ | tejasā''vṛtya lokāṃstrīnyaśaḥ prāpsyati te sutaḥ

"उसी भाव में रमा हुआ, उसी में बुद्धि लगाए, उसी को आत्मा बनाए और उसी का आश्रय लिए हुए तुम्हारा पुत्र अपने तेज से तीनों लोकों को आच्छादित करके यश पाएगा।"

अध्याय 329अध्याय-सूचीअध्याय 332