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शान्ति पर्व · अध्याय 332

अरणी से शुक का जन्म

वर पाने के बाद व्यास अग्नि प्रकट करने के लिए अरणी का मन्थन करते हैं और शुकी का रूप धरे अप्सरा घृताची को देखते हैं। काम से अभिभूत होकर उनका वीर्य अरणी पर गिरता है और उसी से अग्नि के समान तेजस्वी शुक उत्पन्न होते हैं। गंगा बालक को स्नान कराती हैं, देवता हर्षित होते हैं और महादेव उनका उपनयन कराते हैं। शुक बृहस्पति से वेदों का अध्ययन करके तप आरम्भ करते हैं, पर गृहस्थ जीवन में उनका मन नहीं रमता।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.332.1)

स लब्ध्वा परमं देवाद्वरं सत्यवतीसुतः । अरणीं तु ततो गृह्य ममन्थाग्निचिकीर्षया ॥

sa labdhvā paramaṃ devādvaraṃ satyavatīsutaḥ | araṇīṃ tu tato gṛhya mamanthāgnicikīrṣayā

सत्यवती के पुत्र व्यास ने देवता से वह परम वर पाकर अरणी को लिया और अग्नि प्रकट करने की इच्छा से उसका मन्थन आरम्भ किया।

श्लोक 2 (12.332.2)

अथ रूपं परं राजन्बिभ्रतीं स्वेन तेजसा । घृताचीं नामाप्सरसमपश्यद्भगवानृषिः ॥

atha rūpaṃ paraṃ rājanbibhratīṃ svena tejasā | ghṛtācīṃ nāmāpsarasamapaśyadbhagavānṛṣiḥ

हे राजन्, तब भगवान् ऋषि ने अपने ही तेज से परम रूप धारण किए हुए घृताची नामक अप्सरा को देखा।

श्लोक 3 (12.332.3)

ऋषिरप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः । अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्युधिष्ठिर ॥

ṛṣirapsarasaṃ dṛṣṭvā sahasā kāmamohitaḥ | abhavadbhagavānvyāso vane tasminyudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, उस अप्सरा को देखकर ऋषि भगवान् व्यास उस वन में सहसा कामवश मोहित हो गए।

श्लोक 4 (12.332.4)

सा च दृष्ट्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् । शुकी भूत्वा महाराज घृताची समुपागमत् ॥

sā ca dṛṣṭvā tadā vyāsaṃ kāmasaṃvignamānasam | śukī bhūtvā mahārāja ghṛtācī samupāgamat

हे महाराज, घृताची ने व्यास को काम से व्याकुल मन देखकर शुकी (मादा तोता) का रूप धरा और उनके निकट आई।

श्लोक 5 (12.332.5)

स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् । शरीरजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ॥

sa tāmapsarasaṃ dṛṣṭvā rūpeṇānyena saṃvṛtām | śarīrajenānugataḥ sarvagātrātigena ha

दूसरे रूप से आवृत उस अप्सरा को देखकर वे सब अंगों में फैल जानेवाले, शरीर से उत्पन्न काम से भर गए।

श्लोक 6 (12.332.6)

स तु धैर्येण महता निगृह्णन्हृच्छयं मुनिः । न शशाक नियन्तुं तद्व्यासः प्रविसृतं मनः । भावित्वाच्चैव भावस्य घृताच्या वपुषा हृतः ॥

sa tu dhairyeṇa mahatā nigṛhṇanhṛcchayaṃ muniḥ | na śaśāka niyantuṃ tadvyāsaḥ pravisṛtaṃ manaḥ | bhāvitvāccaiva bhāvasya ghṛtācyā vapuṣā hṛtaḥ

बड़े धैर्य से हृदय में उठते काम को रोकते हुए भी मुनि व्यास अपने बहते हुए मन को न रोक सके; और होनहार के कारण घृताची के रूप ने उन्हें हर लिया।

श्लोक 7 (12.332.7)

यत्नान्नियच्छतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया । अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् ॥

yatnānniyacchatastasya muneragnicikīrṣayā | araṇyāmeva sahasā tasya śukramavāpatat

अग्नि प्रकट करने की इच्छा से यत्नपूर्वक अपने को रोकते हुए भी उन मुनि का वीर्य अचानक अरणी पर ही गिर पड़ा।

श्लोक 8 (12.332.8)

सोऽविशङ्केन मनसा तथैव द्विजसत्तमः । अरणीं ममन्थ ब्रह्मर्षिस्तस्यां जज्ञे शुको नृप ॥

so'viśaṅkena manasā tathaiva dvijasattamaḥ | araṇīṃ mamantha brahmarṣistasyāṃ jajñe śuko nṛpa

द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ने निःशंक मन से पहले की तरह अरणी का मन्थन जारी रखा, और हे राजन्, उसी में से शुक उत्पन्न हुए।

श्लोक 9 (12.332.9)

शुक्रे निर्मथ्यमाने स शुको जज्ञे महातपाः । परमर्षिर्महायोगी अरणीगर्भसंभवः ॥

śukre nirmathyamāne sa śuko jajñe mahātapāḥ | paramarṣirmahāyogī araṇīgarbhasaṃbhavaḥ

वीर्य के मथे जाते समय महातपस्वी शुक उत्पन्न हुए, परम ऋषि और महायोगी, जो अरणी के गर्भ से जन्मे थे।

श्लोक 10 (12.332.10)

यथाऽध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुदावहन् । तथारूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा ॥

yathā'dhvare samiddho'gnirbhāti havyamudāvahan | tathārūpaḥ śuko jajñe prajvalanniva tejasā

जैसे यज्ञ में प्रज्वलित अग्नि हव्य को वहन करती हुई शोभित होती है, वैसे ही शुक तेज से दहकते हुए-से उसी रूप में उत्पन्न हुए।

श्लोक 11 (12.332.11)

विभ्रत्पितुश्च कौरव्य रूपवर्णमनुत्तमम् । बभौ तदा भावितात्मा विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

vibhratpituśca kauravya rūpavarṇamanuttamam | babhau tadā bhāvitātmā vidhūmo'gniriva jvalan

हे कौरव्य, पिता का अनुपम रूप और वर्ण धारण किए हुए वे शुद्ध अन्तःकरणवाले उस समय धूम-रहित जलती अग्नि के समान शोभित हुए।

श्लोक 12 (12.332.12)

तं गङ्गा सरितां श्रेष्ठा मेरुपृष्ठे जनेश्वर । स्वरूपिणी तदाऽभ्येत्य स्नापयामास वारिणा ॥

taṃ gaṅgā saritāṃ śreṣṭhā merupṛṣṭhe janeśvara | svarūpiṇī tadā'bhyetya snāpayāmāsa vāriṇā

हे जनेश्वर, नदियों में श्रेष्ठ गंगा ने मेरु के शिखर पर साक्षात् रूप धारण करके उनके पास आकर अपने जल से उन्हें स्नान कराया।

श्लोक 13 (12.332.13)

अन्तरिक्षाच्च कौरव्य दण्डः कृष्णाजिनं च ह । पपात भुवि राजेन्द्र शुकस्यार्थे महात्मनः ॥

antarikṣācca kauravya daṇḍaḥ kṛṣṇājinaṃ ca ha | papāta bhuvi rājendra śukasyārthe mahātmanaḥ

हे कौरव्य, हे राजेन्द्र, महात्मा शुक के लिए आकाश से दण्ड और कृष्णमृगचर्म पृथ्वी पर आ गिरे।

श्लोक 14 (12.332.14)

जेगीयन्ते स्म गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ॥

jegīyante sma gandharvā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ | devadundubhayaścaiva prāvādyanta sahasraśaḥ

गन्धर्व गाने लगे, अप्सराओं के समूह नाचने लगे, और हज़ारों देवदुन्दुभियाँ बज उठीं।

श्लोक 15 (12.332.15)

विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा तुम्बुरुनारदौ । हाहा हूहूश्च गन्धर्वौ तुष्टुवुः शुकसंभवम् ॥

viśvāvasuśca gandharvastathā tumburunāradau | hāhā hūhūśca gandharvau tuṣṭuvuḥ śukasaṃbhavam

गन्धर्व विश्वावसु, तुम्बुरु, नारद, तथा गन्धर्व हाहा और हूहू ने शुक के जन्म की स्तुति की।

श्लोक 16 (12.332.16)

तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः । देवा देवर्षयश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च ॥

tatra śakrapurogāśca lokapālāḥ samāgatāḥ | devā devarṣayaścaiva tathā brahmarṣayo'pi ca

वहाँ इन्द्र के नेतृत्व में लोकपाल, देवता, देवर्षि और ब्रह्मर्षि भी एकत्र हुए।

श्लोक 17 (12.332.17)

दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः । जङ्गमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् ॥

divyāni sarvapuṣpāṇi pravavarṣa ca mārutaḥ | jaṅgamaṃ sthāvaraṃ caiva prahṛṣṭamabhavajjagat

वायु ने सब प्रकार के दिव्य पुष्पों की वर्षा की, और चर-अचर सारा जगत् आनन्दित हो उठा।

श्लोक 18 (12.332.18)

तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः । जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत्तदा ॥

taṃ mahātmā svayaṃ prītyā devyā saha mahādyutiḥ | jātamātraṃ muneḥ putraṃ vidhinopānayattadā

तब महात्मा महाद्युति महादेव ने देवी के साथ स्वयं प्रसन्न होकर मुनि के उस नवजात पुत्र का विधिपूर्वक उपनयन कराया।

श्लोक 19 (12.332.19)

तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् । ददौ कमण्डलुं प्रीत्या देववासांसि चाभिभो ॥

tasya deveśvaraḥ śakro divyamadbhutadarśanam | dadau kamaṇḍaluṃ prītyā devavāsāṃsi cābhibho

हे विभु, देवेश्वर इन्द्र ने प्रसन्नता से उन्हें एक दिव्य, अद्भुत दिखनेवाला कमण्डलु और देववस्त्र दिए।

श्लोक 20 (12.332.20)

हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः । प्रदक्षिणमवर्तन्त शुकाश्चाषाश्च भारत ॥

haṃsāśca śatapatrāśca sārasāśca sahasraśaḥ | pradakṣiṇamavartanta śukāścāṣāśca bhārata

हे भारत, हंस, कठफोड़वे, हज़ारों सारस, तोते और नीलकण्ठ पक्षी उनकी प्रदक्षिणा करने लगे।

श्लोक 21 (12.332.21)

आरणेयस्ततो दिव्यं प्राप्य जन्म महाद्युतिः । तत्रैवोवास मेधावी ब्रह्मचारी समाहितः ॥

āraṇeyastato divyaṃ prāpya janma mahādyutiḥ | tatraivovāsa medhāvī brahmacārī samāhitaḥ

इस प्रकार दिव्य जन्म पाकर अरणी से उत्पन्न वे महातेजस्वी, मेधावी और एकाग्र शुक ब्रह्मचारी बनकर वहीं रहे।

श्लोक 22 (12.332.22)

उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः । उपतस्थुर्महाराज यथाऽस्य पितरं तथा ॥

utpannamātraṃ taṃ vedāḥ sarahasyāḥ sasaṃgrahāḥ | upatasthurmahārāja yathā'sya pitaraṃ tathā

हे महाराज, उत्पन्न होते ही रहस्यों और संग्रहों सहित वेद उनकी सेवा में उपस्थित हो गए, जैसे उनके पिता की सेवा में रहते थे।

श्लोक 23 (12.332.23)

बृहस्पतिं च वव्रे स वेदवेदाङ्गभाष्यवित् । उपाध्यायं महाराज धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥

bṛhaspatiṃ ca vavre sa vedavedāṅgabhāṣyavit | upādhyāyaṃ mahārāja dharmamevānucintayan

हे महाराज, धर्म का ही चिन्तन करते हुए उन्होंने वेद, वेदांग और भाष्यों के ज्ञाता बृहस्पति को अपना उपाध्याय (गुरु) चुना।

श्लोक 24 (12.332.24)

सोऽधीत्य निखिलान्वेदान्सरहस्यान्ससंग्रहान् । इतिहासं च कार्त्स्न्येन धर्मशास्त्राणि चाभिभो ॥

so'dhītya nikhilānvedānsarahasyānsasaṃgrahān | itihāsaṃ ca kārtsnyena dharmaśāstrāṇi cābhibho

हे अभिभो, उन्होंने रहस्यों और संग्रहों सहित सब वेदों का, सम्पूर्ण इतिहास का और धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया,

श्लोक 25 (12.332.25)

गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो महामुनिः । उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहितः ॥

gurave dakṣiṇāṃ dattvā samāvṛtto mahāmuniḥ | ugraṃ tapaḥ samārebhe brahmacārī samāhitaḥ

गुरु को दक्षिणा देकर वे महामुनि लौट आए और एकाग्र ब्रह्मचारी के रूप में उग्र तप करने लगे।

श्लोक 26 (12.332.26)

देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि स महातपाः । संमन्त्रणीयो मान्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा ॥

devatānāmṛṣīṇāṃ ca bālye'pi sa mahātapāḥ | saṃmantraṇīyo mānyaśca jñānena tapasā tathā

बाल्यावस्था में भी वे महातपस्वी ज्ञान और तप के कारण देवताओं और ऋषियों के लिए सम्मान्य और परामर्श योग्य थे।

श्लोक 27 (12.332.27)

न त्वस्य रमते बुद्धिराश्रमेषु नराधिप । त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः ॥

na tvasya ramate buddhirāśrameṣu narādhipa | triṣu gārhasthyamūleṣu mokṣadharmānudarśinaḥ

परन्तु हे नराधिप, मोक्षधर्म को देखनेवाले उनकी बुद्धि गृहस्थ-आश्रम जिनका मूल है, उन तीनों आश्रमों में नहीं रमती थी।

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