शान्ति पर्व · अध्याय 333
शुक की राजा जनक के पास यात्रा
मोक्ष की खोज में शुक अपने पिता व्यास से उपदेश माँगते हैं, योग और कपिल के सांख्य का अध्ययन करते हैं, और फिर व्यास उन्हें विनम्रता और आज्ञापालन के साथ पैदल मिथिला के राजा जनक के पास भेजते हैं। पर्वत, नदियाँ और अनेक देश पार करके वे विदेह और मिथिला पहुँचते हैं, जहाँ कठोर वाणी सुनकर भी द्वार पर अविचल रहते हैं; उन्हें दो ड्योढ़ियों से भीतर ले जाया जाता है और पचास सुन्दर स्त्रियाँ उनकी सेवा करती हैं। शान्त और निर्विकार रहकर वे दिन-रात ध्यान में ही लगे रहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.333.1)
स मोक्षमनुचिन्त्यैव शुकः पितरमभ्यगात् । प्राहाभिवाद्य च गुरुं श्रेयोर्थी विनयान्वितः ॥
sa mokṣamanucintyaiva śukaḥ pitaramabhyagāt | prāhābhivādya ca guruṃ śreyorthī vinayānvitaḥ
मोक्ष का ही चिन्तन करते हुए शुक अपने पिता के पास गए और अभिवादन करके, कल्याण के अभिलाषी तथा विनय से युक्त होकर गुरु से बोले:
शुक उवाच
श्लोक 2 (12.333.2)
मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान्प्रब्रवीतु मे । यथा मे मनसः शान्तिः परमा संभवेत्प्रभो ॥
mokṣadharmeṣu kuśalo bhagavānprabravītu me | yathā me manasaḥ śāntiḥ paramā saṃbhavetprabho
"भगवन्, आप मोक्षधर्मों में कुशल हैं; हे प्रभु, मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मेरे मन को परम शान्ति प्राप्त हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.333.3)
श्रुत्वा पुत्रस्य तु वचः परमर्षिरुवाच तम् । अधीहि पुत्र मोक्षं वै धर्मांश्च विविधानपि ॥
śrutvā putrasya tu vacaḥ paramarṣiruvāca tam | adhīhi putra mokṣaṃ vai dharmāṃśca vividhānapi
पुत्र की बात सुनकर परमर्षि ने उससे कहा, "पुत्र, मोक्ष का तथा अनेक प्रकार के धर्मों का भी अध्ययन करो।"
श्लोक 4 (12.333.4)
पितुर्नियोगाज्जग्राह शुको धर्मभृतां वरः । योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव भारत ॥
piturniyogājjagrāha śuko dharmabhṛtāṃ varaḥ | yogaśāstraṃ ca nikhilaṃ kāpilaṃ caiva bhārata
पिता की आज्ञा से धर्मधारियों में श्रेष्ठ शुक ने सम्पूर्ण योगशास्त्र और, हे भारत, कपिल के शास्त्र का भी अध्ययन किया।
श्लोक 5 (12.333.5)
स तं ब्राह्म्या श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् । मेने पुत्रं यदा व्यासो मोक्षधर्मविशारदम् ॥
sa taṃ brāhmyā śriyā yuktaṃ brahmatulyaparākramam | mene putraṃ yadā vyāso mokṣadharmaviśāradam
जब व्यास ने अपने पुत्र को ब्रह्म की श्री से युक्त, ब्रह्मा के समान पराक्रमी और मोक्षधर्म में निपुण समझा,
श्लोक 6 (12.333.6)
उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् । स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलं मिथिलेश्वरः ॥
uvāca gaccheti tadā janakaṃ mithileśvaram | sa te vakṣyati mokṣārthaṃ nikhilaṃ mithileśvaraḥ
तब उन्होंने उससे कहा, "मिथिला के स्वामी राजा जनक के पास जाओ; मिथिला के वे स्वामी मोक्ष के विषय में तुम्हें सब कुछ बताएँगे।"
श्लोक 7 (12.333.7)
पितुर्नियोगादगमन्मैथिलं जनकं नृपम् । प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् ॥
piturniyogādagamanmaithilaṃ janakaṃ nṛpam | praṣṭuṃ dharmasya niṣṭhāṃ vai mokṣasya ca parāyaṇam
पिता की आज्ञा से वे धर्म की अन्तिम निष्ठा और मोक्ष के परम आश्रय के विषय में पूछने के लिए मिथिला के राजा जनक के पास गए।
श्लोक 8 (12.333.8)
उक्तश्च मानुषेण त्वं पथा गच्छेत्यविस्मितः । न प्रभावेण गन्तव्यमन्तरिक्षचरेण वै ॥
uktaśca mānuṣeṇa tvaṃ pathā gacchetyavismitaḥ | na prabhāveṇa gantavyamantarikṣacareṇa vai
उन्हें यह भी कहा गया था, "तुम निरभिमान होकर मनुष्यों के मार्ग से जाना; अपने प्रभाव से आकाश में चलकर मत जाना।"
व्यास उवाच
श्लोक 9 (12.333.9)
आर्जवेनैव गन्तव्यं न सुखान्वेषिणा तथा । नान्वेष्टव्या विशेषास्तु विशेषा हि प्रसङ्गिनः ॥
ārjavenaiva gantavyaṃ na sukhānveṣiṇā tathā | nānveṣṭavyā viśeṣāstu viśeṣā hi prasaṅginaḥ
"सरलता से जाना, सुख खोजते हुए नहीं। विशेष सुविधाएँ मत ढूँढ़ना, क्योंकि विशेष सुविधाएँ तो आसक्त लोगों के लिए होती हैं।"
श्लोक 10 (12.333.10)
अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन्नराधिपे । स्थातव्यं च वशे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् ॥
ahaṃkāro na kartavyo yājye tasminnarādhipe | sthātavyaṃ ca vaśe tasya sa te chetsyati saṃśayam
"मेरे यजमान उस राजा के प्रति अहंकार मत करना; उसके वश में रहना। वह तुम्हारा संशय काट देगा।"
श्लोक 11 (12.333.11)
स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः । याज्यो मम स यद्ब्रूयात्तत्कार्यमविशङ्कया ॥
sa dharmakuśalo rājā mokṣaśāstraviśāradaḥ | yājyo mama sa yadbrūyāttatkāryamaviśaṅkayā
"वह राजा धर्म में कुशल और मोक्षशास्त्र का ज्ञाता है; वह मेरा यजमान है। वह जो कहे, उसे बिना शंका के करना।"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (12.333.12)
एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः । पद्भ्यां शक्तोऽन्तरिक्षेण क्रान्तुं पृथ्वीं ससागराम् ॥
evamuktaḥ sa dharmātmā jagāma mithilāṃ muniḥ | padbhyāṃ śakto'ntarikṣeṇa krāntuṃ pṛthvīṃ sasāgarām
ऐसा कहे जाने पर वे धर्मात्मा मुनि पैदल ही मिथिला की ओर चले, यद्यपि वे आकाश-मार्ग से समुद्रों सहित पृथ्वी को लाँघ सकते थे।
श्लोक 13 (12.333.13)
स गिरींश्चाप्यतिक्रम्य नदीतीर्थसरांसि च । बहुव्यालमृगाकीर्णा ह्यटवीश्च वनानि च ॥
sa girīṃścāpyatikramya nadītīrthasarāṃsi ca | bahuvyālamṛgākīrṇā hyaṭavīśca vanāni ca
उन्होंने पर्वतों, नदियों के घाटों और सरोवरों को पार किया, तथा बहुत-से हिंसक पशुओं और सर्पों से भरे जंगलों और वनों को भी।
श्लोक 14 (12.333.14)
मेरोर्हरेश्च द्वे वर्षे वर्षं हैमवतं ततः । क्रमेणैवं व्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥
merorhareśca dve varṣe varṣaṃ haimavataṃ tataḥ | krameṇaivaṃ vyatikramya bhārataṃ varṣamāsadat
क्रम से मेरु और हरि के दोनों वर्ष, फिर हैमवत वर्ष को पार करके वे भारतवर्ष में पहुँचे।
श्लोक 15 (12.333.15)
स देशान्विविधान्पश्यंश्चीनहूणनिषेवितान् । आर्यावर्तमिमं देशमाजगाम महामुनिः ॥
sa deśānvividhānpaśyaṃścīnahūṇaniṣevitān | āryāvartamimaṃ deśamājagāma mahāmuniḥ
चीनों और हूणों से बसे हुए अनेक देशों को देखते हुए वे महामुनि इस आर्यावर्त देश में आए।
श्लोक 16 (12.333.16)
पितुर्वचनमाज्ञाय तमेवार्थं विचिन्तयन् । अध्वानं सोऽतिचक्राम खचरः खे पतन्निव ॥
piturvacanamājñāya tamevārthaṃ vicintayan | adhvānaṃ so'ticakrāma khacaraḥ khe patanniva
पिता का वचन मानकर और उसी प्रयोजन का चिन्तन करते हुए वे आकाश में उड़ते खगचर की भाँति शीघ्रता से मार्ग पार करते गए।
श्लोक 17 (12.333.17)
पत्तनानि च रम्याणि स्फीतानि नगराणि च । रत्नानि च विचित्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥
pattanāni ca ramyāṇi sphītāni nagarāṇi ca | ratnāni ca vicitrāṇi paśyannapi na paśyati
सुन्दर नगर, समृद्ध पुर और विचित्र रत्न देखते हुए भी वे नहीं देखते थे।
श्लोक 18 (12.333.18)
उद्यानानि च रम्याणि तथैवायतनानि च । पुण्यानि चैव तीर्थानि सोऽत्यक्रामदथाध्वगः ॥
udyānāni ca ramyāṇi tathaivāyatanāni ca | puṇyāni caiva tīrthāni so'tyakrāmadathādhvagaḥ
रमणीय उद्यान, देवालय और पवित्र तीर्थ पार करते हुए वे पथिक आगे बढ़ते गए।
श्लोक 19 (12.333.19)
सोचिरेणैव कालेन विदेहानाससाद ह । रक्षितान्धर्मराजेन जनकेन महात्मना ॥
socireṇaiva kālena videhānāsasāda ha | rakṣitāndharmarājena janakena mahātmanā
थोड़े ही समय में वे महात्मा धर्मराज जनक से रक्षित विदेह देश में पहुँचे।
श्लोक 20 (12.333.20)
तत्र ग्रामान्बहून्पश्यन्बह्वन्नरसभोजनान् । पल्लीघोषान्समृद्धांश्च बहुगोकुलसंकुलान् ॥
tatra grāmānbahūnpaśyanbahvannarasabhojanān | pallīghoṣānsamṛddhāṃśca bahugokulasaṃkulān
वहाँ उन्होंने बहुत-से गाँव देखे, जहाँ अन्न और रसीले भोजन की बहुतायत थी, और गौओं के झुंडों से भरी समृद्ध ग्वालों की बस्तियाँ भी।
श्लोक 21 (12.333.21)
स्फीतांश्च शालियवसैर्हंससारससेवितान् । पद्मिनीभिश्च शतशः श्रीमतीभिरलकृतान् ॥
sphītāṃśca śāliyavasairhaṃsasārasasevitān | padminībhiśca śataśaḥ śrīmatībhiralakṛtān
वे गाँव धान, जौ और चारे से भरे, हंसों और सारसों से सेवित, तथा सैकड़ों शोभायमान कमल-सरोवरों से सजे हुए थे।
श्लोक 22 (12.333.22)
स विदेहानतिक्रम्य समृद्धजनसेवितान् । मिथिलोपवनं रम्यमाससाद समृद्धिमत् ॥
sa videhānatikramya samṛddhajanasevitān | mithilopavanaṃ ramyamāsasāda samṛddhimat
समृद्ध जनों से बसे विदेह को पार करके वे मिथिला के रमणीय और समृद्ध उपवन में पहुँचे।
श्लोक 23 (12.333.23)
हस्त्यश्वरथसंकीर्णं नरनारीसमाकुलम् । पश्यन्नपश्यन्निव तत्समतिक्रामदच्युतः ॥
hastyaśvarathasaṃkīrṇaṃ naranārīsamākulam | paśyannapaśyanniva tatsamatikrāmadacyutaḥ
हाथी, घोड़े और रथों से भरे तथा स्त्री-पुरुषों से खचाखच उस उपवन को वे अविचल मुनि देखते हुए भी न देखते-से लाँघ गए।
श्लोक 24 (12.333.24)
मनसा तं वहन्भारं तमेवार्थं विचिन्तयन् । आत्मारामः प्रसन्नात्मा मिथिलामाससाद ह ॥
manasā taṃ vahanbhāraṃ tamevārthaṃ vicintayan | ātmārāmaḥ prasannātmā mithilāmāsasāda ha
उस भार को मन में ढोते हुए और उसी प्रयोजन का चिन्तन करते हुए, आत्मा में रमे और प्रसन्नचित्त वे मिथिला पहुँचे।
श्लोक 25 (12.333.25)
तस्या द्वारं समासाद्य द्वारपालैर्निवारितः । स्थितो ध्यानपरो मुक्तो विदितः प्रविवेश ह ॥
tasyā dvāraṃ samāsādya dvārapālairnivāritaḥ | sthito dhyānaparo mukto viditaḥ praviveśa ha
उसके द्वार पर पहुँचकर द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया; वे ध्यान में लीन, मुक्त भाव से खड़े रहे, और परिचय हो जाने पर भीतर गए।
श्लोक 26 (12.333.26)
स राजमार्गमासाद्य समृद्धजनसंकुलम् । पार्थिवक्षयमासाद्य निःशङ्कः प्रविवेश ह ॥
sa rājamārgamāsādya samṛddhajanasaṃkulam | pārthivakṣayamāsādya niḥśaṅkaḥ praviveśa ha
समृद्ध जनों से भरे राजमार्ग पर पहुँचकर वे निर्भय होकर राजभवन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 27 (12.333.27)
तत्रापि द्वारपालास्तमुग्रवाचा न्यषेधयन् । तथैव च शुकस्तत्र निर्मन्युः समतिष्ठत ॥
tatrāpi dvārapālāstamugravācā nyaṣedhayan | tathaiva ca śukastatra nirmanyuḥ samatiṣṭhata
वहाँ भी द्वारपालों ने कठोर वाणी से उन्हें रोका, और शुक वहाँ क्रोध-रहित होकर खड़े रहे।
श्लोक 28 (12.333.28)
न चातपाध्वसंतप्तः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः । प्रताम्यति ग्लायति वा नापैति च तथाऽऽतपात् ॥
na cātapādhvasaṃtaptaḥ kṣutpipāsāśramānvitaḥ | pratāmyati glāyati vā nāpaiti ca tathā''tapāt
न धूप में चलने की तपन, न भूख, प्यास और थकान उन्हें सता सकी; वे न मुरझाए, न थके, और न धूप से हटे।
श्लोक 29 (12.333.29)
तेषां तु द्वारपालानामेकः शोकसमन्वितः । मध्यंगतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् ॥
teṣāṃ tu dvārapālānāmekaḥ śokasamanvitaḥ | madhyaṃgatamivādityaṃ dṛṣṭvā śukamavasthitam
दोपहर के सूर्य की तरह खड़े शुक को देखकर उन द्वारपालों में से एक का मन खेद से भर गया;
श्लोक 30 (12.333.30)
पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः । प्रावेशयत्ततः कक्ष्यां प्रथमां राजवेश्मनः ॥
pūjayitvā yathānyāyamabhivādya kṛtāñjaliḥ | prāveśayattataḥ kakṣyāṃ prathamāṃ rājaveśmanaḥ
उसने यथोचित आदर किया, हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन्हें राजभवन की पहली ड्योढ़ी में ले गया।
श्लोक 31 (12.333.31)
तत्रासीनः शुकस्तात मोक्षमेवान्वचिन्तयत् । छायायामातपे चैव समदर्शी समद्युतिः ॥
tatrāsīnaḥ śukastāta mokṣamevānvacintayat | chāyāyāmātape caiva samadarśī samadyutiḥ
हे तात, वहाँ बैठे हुए शुक छाया और धूप में समान दृष्टि और समान तेजवाले होकर मोक्ष का ही चिन्तन करते रहे।
श्लोक 32 (12.333.32)
तं मुहूर्तादिवागम्य राज्ञो मन्त्री कृताञ्जलिः । प्रावेशयत्ततः कक्ष्यां द्वितीयां राजवेश्मनः ॥
taṃ muhūrtādivāgamya rājño mantrī kṛtāñjaliḥ | prāveśayattataḥ kakṣyāṃ dvitīyāṃ rājaveśmanaḥ
थोड़ी देर बाद राजा का मन्त्री हाथ जोड़कर उनके पास आया और उन्हें राजभवन की दूसरी ड्योढ़ी में ले गया।
श्लोक 33 (12.333.33)
तत्रान्तः पुरसंबद्धं महच्चैत्ररथोपमम् । सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् ॥
tatrāntaḥ purasaṃbaddhaṃ mahaccaitrarathopamam | suvibhaktajalākrīḍaṃ ramyaṃ puṣpitapādapam
वहाँ अन्तःपुर से जुड़ा हुआ, चैत्ररथ वन के समान एक बड़ा उपवन था, जिसमें जल-क्रीड़ा के सरोवर सुन्दर ढंग से बने थे और वृक्ष फूलों से लदे थे।
श्लोक 34 (12.333.34)
तं दर्शयित्वा स शुकं मन्त्री जनकमुत्तमम् । अर्हमासनमादिश्य निश्चक्राम ततः पुनः ॥
taṃ darśayitvā sa śukaṃ mantrī janakamuttamam | arhamāsanamādiśya niścakrāma tataḥ punaḥ
जनक के उस उत्तम स्थान को शुक को दिखाकर मन्त्री उन्हें योग्य आसन बताकर फिर बाहर चला गया।
श्लोक 35 (12.333.35)
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः । सूक्ष्मरक्ताम्बरधरास्तप्तकाञ्चनभूषणाः ॥
taṃ cāruveṣāḥ suśroṇyastaruṇyaḥ priyadarśanāḥ | sūkṣmaraktāmbaradharāstaptakāñcanabhūṣaṇāḥ
तब सुन्दर वेश-भूषावाली, सुन्दर कमरवाली, तरुण और प्रियदर्शन स्त्रियाँ, जो झीने लाल वस्त्र पहने और तपे हुए सोने के आभूषणों से सजी थीं,
श्लोक 36 (12.333.36)
संलापालापकुशला नृत्तगीतविशारदाः । स्मितपूर्वाभिभाषिण्यो रूपेणाप्सरसां समाः ॥
saṃlāpālāpakuśalā nṛttagītaviśāradāḥ | smitapūrvābhibhāṣiṇyo rūpeṇāpsarasāṃ samāḥ
बातचीत में कुशल, नृत्य-गीत में निपुण, मुस्कराकर पहले बोलनेवाली, और रूप में अप्सराओं के समान,
श्लोक 37 (12.333.37)
भावोपचारकुशला भावज्ञाः सत्वकोविदाः । परं पञ्चाशतं नार्यो वारमुख्याः समाद्रवन् ॥
bhāvopacārakuśalā bhāvajñāḥ satvakovidāḥ | paraṃ pañcāśataṃ nāryo vāramukhyāḥ samādravan
भावों की सेवा में कुशल, हृदय की बात जाननेवाली, मनुष्यों की प्रकृति को पहचाननेवाली, पचास से अधिक श्रेष्ठ गणिकाएँ उनके पास दौड़ी आईं।
श्लोक 38 (12.333.38)
पाद्यादीनि प्रतिग्राह्य पूजया परयाऽर्चयन् । कालोपपन्नेन तदा स्वाद्वन्नेनाभ्यतर्पयन् ॥
pādyādīni pratigrāhya pūjayā parayā'rcayan | kālopapannena tadā svādvannenābhyatarpayan
उन्होंने पाद्य आदि स्वीकार कराकर परम आदर से उनका पूजन किया और समय पर स्वादिष्ट अन्न से उन्हें तृप्त किया।
श्लोक 39 (12.333.39)
तस्य भुक्तवतस्तात तदन्तः पुरकाननम् । सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकश्येन भारत ॥
tasya bhuktavatastāta tadantaḥ purakānanam | suramyaṃ darśayāmāsurekaikaśyena bhārata
हे तात, हे भारत, जब वे भोजन कर चुके तो उन्होंने उन्हें अन्तःपुर का अति रमणीय उद्यान एक-एक करके दिखाया।
श्लोक 40 (12.333.40)
क्रीडन्त्यश्च हसन्त्यश्च गायन्त्यश्चापि ताः शुभम् । उदारसत्वं सत्वज्ञाः स्त्रियः पर्यचरंस्तथा ॥
krīḍantyaśca hasantyaśca gāyantyaścāpi tāḥ śubham | udārasatvaṃ satvajñāḥ striyaḥ paryacaraṃstathā
खेलती, हँसती और मधुर गाती हुई मनुष्यों का स्वभाव समझनेवाली वे स्त्रियाँ उन उदार स्वभाववाले की इसी प्रकार सेवा करती रहीं।
श्लोक 41 (12.333.41)
आरणेयस्तु शुद्धात्मा निःसंदेहस्त्रिकर्मकृत् । वश्येन्द्रियो जितक्रोधो न हृष्यति न कुप्यति ॥
āraṇeyastu śuddhātmā niḥsaṃdehastrikarmakṛt | vaśyendriyo jitakrodho na hṛṣyati na kupyati
परन्तु अरणी से उत्पन्न शुद्धात्मा शुक, संदेह-रहित, अपने तीनों कर्तव्यों में लगे, इन्द्रियों को वश में किए और क्रोध को जीते हुए न हर्षित हुए, न कुपित।
श्लोक 42 (12.333.42)
तस्मै शय्यासनं दिव्यं वरार्हं रत्नभूषितम् । स्पर्ध्यास्तरणसंकीर्णं ददुस्ताः परमस्त्रियः ॥
tasmai śayyāsanaṃ divyaṃ varārhaṃ ratnabhūṣitam | spardhyāstaraṇasaṃkīrṇaṃ dadustāḥ paramastriyaḥ
उन श्रेष्ठ स्त्रियों ने उन्हें रत्नों से जड़ी, बहुमूल्य बिछौनों से ढकी, श्रेष्ठों के योग्य दिव्य शय्या और आसन दिया।
श्लोक 43 (12.333.43)
पादशौचं तु कृत्वैव शुकः संध्यामुपास्य च । निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं विचिन्तयन् ॥
pādaśaucaṃ tu kṛtvaiva śukaḥ saṃdhyāmupāsya ca | niṣasādāsane puṇye tamevārthaṃ vicintayan
पैर धोकर और सन्ध्योपासना करके शुक पवित्र आसन पर बैठे और उसी प्रयोजन का चिन्तन करते रहे।
श्लोक 44 (12.333.44)
पूर्वरात्रे तु तत्रासौ हुत्वा ध्यानपरायणः । मध्यरात्रे यथान्यायं निद्रामाहारयत्प्रभुः ॥
pūrvarātre tu tatrāsau hutvā dhyānaparāyaṇaḥ | madhyarātre yathānyāyaṃ nidrāmāhārayatprabhuḥ
रात के पहले पहर में उन्होंने वहीं हवन करके ध्यान किया, और मध्यरात्रि में विधिपूर्वक प्रभु ने निद्रा ली।
श्लोक 45 (12.333.45)
ततो मुहूर्तादुत्थाय कृत्वा शौचमनन्तरम् । स्त्रीभिः परिवृतो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत ॥
tato muhūrtādutthāya kṛtvā śaucamanantaram | strībhiḥ parivṛto dhīmāndhyānamevānvapadyata
फिर थोड़ी देर बाद उठकर शौच आदि करके, स्त्रियों से घिरे हुए उन बुद्धिमान् ने फिर ध्यान ही अपनाया।
श्लोक 46 (12.333.46)
अनेन विधिना कार्ष्णिस्तदहः शेषमच्युतः । तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास भारत ॥
anena vidhinā kārṣṇistadahaḥ śeṣamacyutaḥ | tāṃ ca rātriṃ nṛpakule vartayāmāsa bhārata
हे भारत, इस प्रकार कृष्ण (व्यास) के पुत्र उन अविचल शुक ने उस दिन का शेष भाग और वह रात राजा के भवन में बिताई।