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शान्ति पर्व · अध्याय 334

शुक का जनक से प्रश्न और मोक्ष का मार्ग

भीष्म बताते हैं कि पिता व्यास के कहने पर व्यासपुत्र शुक जब राजा जनक के पास आते हैं, तब जनक मन्त्रियों और पुरोहित के साथ उनका सत्कार करते हैं। शुक पूछते हैं कि ब्राह्मण को क्या करना चाहिए और मोक्ष कैसे मिलता है। जनक क्रमशः आश्रमों के कर्तव्य बताते हैं, फिर समझाते हैं कि मोक्ष के लिए गुरु से प्राप्त ज्ञान और विज्ञान चाहिए, और जिसे साक्षात्कार हो चुका है वह आश्रमों से भी परे जा सकता है। वे ययाति की गाथाएँ सुनाते हैं कि समता और संयम से मनुष्य ब्रह्म हो जाता है, और अन्त में शुक से कहते हैं कि जिस लक्ष्य के विषय में वे पूछ रहे हैं, उसी में वे स्वयं स्थित हैं।

अध्याय 333अध्याय-सूचीअध्याय 335

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.334.1)

ततः स राजा जनको मन्त्रिभिः सह भारत । पुरोहितं पुरस्कृत्य सर्वाण्यन्तः पुराणि च ॥

tataḥ sa rājā janako mantribhiḥ saha bhārata | purohitaṃ puraskṛtya sarvāṇyantaḥ purāṇi ca

हे भारत! तब राजा जनक मन्त्रियों के साथ, पुरोहित को आगे करके और अन्तःपुर की सभी स्त्रियों को साथ लेकर,

श्लोक 2 (12.334.2)

आसनं च पुरस्कृत्य रत्नानि विविधानि च । शिरसा चार्ध्यमादाय गुरुपुत्रं समभ्यगात् ॥

āsanaṃ ca puraskṛtya ratnāni vividhāni ca | śirasā cārdhyamādāya guruputraṃ samabhyagāt

आसन और अनेक प्रकार के रत्न लिये तथा सिर पर अर्घ्य उठाए हुए गुरुपुत्र शुक की अगवानी के लिए गया।

श्लोक 3 (12.334.3)

स तदासनमादाय बहुरत्नविभूषितम् । स्पर्ध्यास्तरणसंस्तीर्णं सर्वतोभद्रमृद्धिमत् ॥

sa tadāsanamādāya bahuratnavibhūṣitam | spardhyāstaraṇasaṃstīrṇaṃ sarvatobhadramṛddhimat

अनेक रत्नों से सजा, बहुमूल्य बिछौनों से ढका हुआ, सब ओर से सुखद और शोभायमान वह आसन लेकर

श्लोक 4 (12.334.4)

पुरोधसा संगृहीतं हस्तेनालभ्य पार्थिवः । प्रददौ गुरुपुत्राय शुकाय परमार्चितम् ॥

purodhasā saṃgṛhītaṃ hastenālabhya pārthivaḥ | pradadau guruputrāya śukāya paramārcitam

जिसे पुरोहित ने थाम रखा था, राजा ने हाथ से छूकर वह परम सम्मानित आसन गुरुपुत्र शुक को अर्पित किया।

श्लोक 5 (12.334.5)

तत्रोपविष्टं तं कार्ष्णि शास्त्रतः प्रतिपूज्य च । पाद्यं निवेद्य प्रथममर्ध्यं गां च न्यवेदयत् ॥

tatropaviṣṭaṃ taṃ kārṣṇi śāstrataḥ pratipūjya ca | pādyaṃ nivedya prathamamardhyaṃ gāṃ ca nyavedayat

वहाँ बैठे हुए व्यासपुत्र का राजा ने शास्त्र के अनुसार पूजन किया; पहले पैर धोने का जल दिया, फिर अर्घ्य और एक गाय निवेदित की।

श्लोक 6 (12.334.6)

स च तां मन्त्रवत्पूजां प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि । प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकाद्द्विजसत्तमः ॥

sa ca tāṃ mantravatpūjāṃ pratyagṛhṇādyathāvidhi | pratigṛhya tu tāṃ pūjāṃ janakāddvijasattamaḥ

द्विजश्रेष्ठ शुक ने मन्त्रोच्चारण-सहित की गई उस पूजा को विधिपूर्वक स्वीकार किया। जनक से वह पूजा ग्रहण करके

श्लोक 7 (12.334.7)

गां चैव समनुज्ञाय राजानमनुमान्य च । पर्यपृच्छन्महातेजा राज्ञः कुशलमव्ययम् ॥

gāṃ caiva samanujñāya rājānamanumānya ca | paryapṛcchanmahātejā rājñaḥ kuśalamavyayam

और गाय के विषय में अपनी स्वीकृति देकर तथा राजा का सम्मान करके उन महातेजस्वी ने राजा का अक्षय कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 8 (12.334.8)

अनामयं च राजेन्द्र शुकः सानुचरस्य ह । अनुज्ञातः स तेनाथ निषसाद सहानुगः ॥

anāmayaṃ ca rājendra śukaḥ sānucarasya ha | anujñātaḥ sa tenātha niṣasāda sahānugaḥ

हे राजेन्द्र! शुक ने राजा के अनुचरों-सहित स्वास्थ्य के विषय में भी पूछा। फिर राजा की आज्ञा पाकर वे अपने अनुगामियों के साथ बैठ गए।

श्लोक 9 (12.334.9)

कुशलं चाव्ययं चैव पृष्ट्वा वैयासकिं नृपः । किमागमनमित्येवं पर्यपृच्छत पार्थिवः ॥

kuśalaṃ cāvyayaṃ caiva pṛṣṭvā vaiyāsakiṃ nṛpaḥ | kimāgamanamityevaṃ paryapṛcchata pārthivaḥ

व्यासपुत्र से कुशल और अखण्ड मंगल पूछकर राजा ने उनसे पूछा, "आपके आने का क्या प्रयोजन है?"

शुक उवाच

श्लोक 10 (12.334.10)

पित्राऽहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः । विदेहराजो याज्यो मे जनको नाम विश्रुतः ॥

pitrā'hamukto bhadraṃ te mokṣadharmārthakovidaḥ | videharājo yājyo me janako nāma viśrutaḥ

पिताजी ने मुझसे कहा था, "तुम्हारा कल्याण हो; विदेह देश के प्रसिद्ध राजा जनक मेरे यजमान हैं, जो मोक्षधर्म के अर्थ के ज्ञाता हैं।

श्लोक 11 (12.334.11)

तत्र गच्छस्व वै तूर्णं यदि ते हृदि संशयः । प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा स ते च्छेत्स्यति संशयं ॥

tatra gacchasva vai tūrṇaṃ yadi te hṛdi saṃśayaḥ | pravṛttau vā nivṛttau vā sa te cchetsyati saṃśayaṃ

यदि तुम्हारे हृदय में प्रवृत्ति या निवृत्ति के विषय में कोई संशय है, तो शीघ्र उनके पास जाओ; वे तुम्हारा संशय मिटा देंगे।"

श्लोक 12 (12.334.12)

सोऽहं पितुर्नियोगात्त्वामुपप्रष्टुमिहागतः । तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥

so'haṃ piturniyogāttvāmupapraṣṭumihāgataḥ | tanme dharmabhṛtāṃ śreṣṭha yathāvadvaktumarhasi

इसीलिए मैं पिता की आज्ञा से आपसे पूछने यहाँ आया हूँ। अतः हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! आप मुझे यथार्थ रूप से बताइए:

श्लोक 13 (12.334.13)

किं कार्यं ब्राह्मणेनेह मोक्षार्थश्च किमात्मकः । कथं च मोक्षः प्राप्तव्यो ज्ञानेन तपसाऽथवा ॥

kiṃ kāryaṃ brāhmaṇeneha mokṣārthaśca kimātmakaḥ | kathaṃ ca mokṣaḥ prāptavyo jñānena tapasā'thavā

इस संसार में ब्राह्मण को क्या करना चाहिए? मोक्ष का स्वरूप क्या है? और मोक्ष ज्ञान से प्राप्त करना चाहिए या तप से?

जनक उवाच

श्लोक 14 (12.334.14)

यत्कार्यं ब्राह्मणेनेह जन्मप्रभृति तच्छृणु । कृतोपनयनस्तात भवेद्वेदपरायणः ॥

yatkāryaṃ brāhmaṇeneha janmaprabhṛti tacchṛṇu | kṛtopanayanastāta bhavedvedaparāyaṇaḥ

जन्म से लेकर इस लोक में ब्राह्मण को जो करना चाहिए, वह सुनो। हे तात! उपनयन हो जाने पर वह वेद-परायण हो,

श्लोक 15 (12.334.15)

तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण चाभिभो । देवतानामृषीणां चाप्यनृणो ह्यनसूयकः ॥

tapasā guruvṛttyā ca brahmacaryeṇa cābhibho | devatānāmṛṣīṇāṃ cāpyanṛṇo hyanasūyakaḥ

और हे समर्थ! तप, गुरु की सेवा और ब्रह्मचर्य से वह देवताओं और ऋषियों के ऋण से मुक्त तथा द्वेषरहित हो।

श्लोक 16 (12.334.16)

वेदानधीत्य नियतो दक्षिणामपवर्ज्य च । अभ्यनुज्ञामथ प्राप्य समावर्तेत वै द्विजः ॥

vedānadhītya niyato dakṣiṇāmapavarjya ca | abhyanujñāmatha prāpya samāvarteta vai dvijaḥ

नियमपूर्वक वेदों का अध्ययन करके, गुरुदक्षिणा चुकाकर और फिर आज्ञा पाकर द्विज घर लौट आए।

श्लोक 17 (12.334.17)

समावृत्तश्च गार्हस्थ्ये स्वदारनिरतो वसेत् । अनसूयुर्यथान्यायमाहिताग्निरनावृतः ॥

samāvṛttaśca gārhasthye svadāranirato vaset | anasūyuryathānyāyamāhitāgniranāvṛtaḥ

लौटकर वह गृहस्थाश्रम में अपनी ही पत्नी में अनुरक्त रहे, द्वेषहीन रहे, विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना रखे और खुले हृदय से रहे।

श्लोक 18 (12.334.18)

उत्पाद्य पुत्रं पौत्रं तु वन्याश्रमपदे वसेत् । तानेवाग्नीन्यथाशास्त्रमर्चयन्नतिथिप्रियः ॥

utpādya putraṃ pautraṃ tu vanyāśramapade vaset | tānevāgnīnyathāśāstramarcayannatithipriyaḥ

पुत्र और पौत्र उत्पन्न करके वह वनाश्रम में जाकर बसे, शास्त्र के अनुसार उन्हीं अग्नियों की पूजा करता हुआ और अतिथियों को प्रिय मानता हुआ।

श्लोक 19 (12.334.19)

स वनेऽग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा ब्रह्माश्रमपदे वसेत् ॥

sa vane'gnīnyathānyāyamātmanyāropya dharmavit | nirdvandvo vītarāgātmā brahmāśramapade vaset

फिर धर्म को जाननेवाला वह वन में विधिपूर्वक अग्नियों को अपने भीतर स्थापित करके, द्वन्द्वों से परे और वीतराग हृदयवाला होकर ब्रह्म के आश्रम में निवास करे।

शुक उवाच

श्लोक 20 (12.334.20)

उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने प्रत्यक्षे हृदि शाश्वते । किमवश्यं निवस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा ॥

utpanne jñānavijñāne pratyakṣe hṛdi śāśvate | kimavaśyaṃ nivastavyamāśrameṣu vaneṣu vā

जब हृदय में शाश्वत ज्ञान और विज्ञान प्रत्यक्ष उत्पन्न हो चुका हो, तब क्या आश्रमों में या वनों में रहना आवश्यक है?

श्लोक 21 (12.334.21)

एतद्भवन्तं पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति । यथा वेदार्थतत्त्वेन ब्रूहि मे त्वं जनाधिप ॥

etadbhavantaṃ pṛcchāmi tadbhavānvaktumarhati | yathā vedārthatattvena brūhi me tvaṃ janādhipa

मैं आपसे यही पूछता हूँ, और आप बताने में समर्थ हैं। हे नरेश्वर! वेद के अर्थ के तत्त्व के अनुसार मुझे बताइए।

जनक उवाच

श्लोक 22 (12.334.22)

न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् । न विना गुरुसंबन्धं ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥

na vinā jñānavijñāne mokṣasyādhigamo bhavet | na vinā gurusaṃbandhaṃ jñānasyādhigamaḥ smṛtaḥ

ज्ञान और विज्ञान के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, और गुरु-सम्बन्ध के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं मानी गई है।

श्लोक 23 (12.334.23)

गुरुः प्लावयिता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते । विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तीर्णस्तदुभयं त्यजेत् ॥

guruḥ plāvayitā tasya jñānaṃ plava ihocyate | vijñāya kṛtakṛtyastu tīrṇastadubhayaṃ tyajet

गुरु पार लगानेवाला है और ज्ञान यहाँ नाव कहा जाता है। जानकर कृतकृत्य हुआ और पार उतरा हुआ मनुष्य उन दोनों को छोड़ दे।

श्लोक 24 (12.334.24)

अनुच्छेदाय लोकानामनुच्छेदाय कर्मणाम् । पूर्वैराचरितो धर्मश्चातुराश्रम्यसंश्रितः ॥

anucchedāya lokānāmanucchedāya karmaṇām | pūrvairācarito dharmaścāturāśramyasaṃśritaḥ

लोकों का उच्छेद न हो और कर्मों का उच्छेद न हो, इसलिए पूर्वजों ने चारों आश्रमों पर आधारित धर्म का आचरण किया।

श्लोक 25 (12.334.25)

अनेन क्रमयोगेन बहुजातिषु कर्मणाम् । कृत्वा शुभाशुभं कर्म मोक्षो नामेह लभ्यते ॥

anena kramayogena bahujātiṣu karmaṇām | kṛtvā śubhāśubhaṃ karma mokṣo nāmeha labhyate

इसी क्रम-योग से अनेक जन्मों में शुभ-अशुभ कर्म करते हुए मनुष्य को यहाँ मोक्ष नामक वस्तु प्राप्त होती है।

श्लोक 26 (12.334.26)

भावितैः करणैश्चायं बहुसंसारयोनिषु । आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं वै प्रथमाश्रमे ॥

bhāvitaiḥ karaṇaiścāyaṃ bahusaṃsārayoniṣu | āsādayati śuddhātmā mokṣaṃ vai prathamāśrame

संस्कारित इन्द्रियों के द्वारा यह शुद्ध आत्मा संसार की अनेक योनियों में रहते हुए भी प्रथम आश्रम में ही मोक्ष पा सकता है।

श्लोक 27 (12.334.27)

तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चितः । त्रिष्वाश्रमेषु कोऽन्वर्थो भवेत्परमभीप्सतः ॥

tamāsādya tu muktasya dṛṣṭārthasya vipaścitaḥ | triṣvāśrameṣu ko'nvartho bhavetparamabhīpsataḥ

उसे पाकर जो मुक्त और लक्ष्य को देख चुका ज्ञानी परम की इच्छा रखता है, उसके लिए शेष तीन आश्रमों का क्या प्रयोजन रह जाता है?

श्लोक 28 (12.334.28)

राजसांस्तामसांश्चैव नित्यं दोषान्विवर्जयेत् । सात्विकं मार्गमास्थाय पश्येदात्मानमात्मना ॥

rājasāṃstāmasāṃścaiva nityaṃ doṣānvivarjayet | sātvikaṃ mārgamāsthāya paśyedātmānamātmanā

वह रजोगुण और तमोगुण के दोषों से सदा बचे; सात्त्विक मार्ग पर स्थित होकर आत्मा को आत्मा से देखे।

श्लोक 29 (12.334.29)

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नोपलिप्येत जले वारिचरो यथा ॥

sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani | saṃpaśyannopalipyeta jale vāricaro yathā

सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सब प्राणियों को देखता हुआ वह वैसे ही लिप्त नहीं होता, जैसे जल में रहनेवाला जलचर।

श्लोक 30 (12.334.30)

पक्षिवत्प्रायणादूर्ध्वममुत्रानन्त्यमश्नुते । विहाय देहान्निर्मुक्तो निर्द्वन्द्वः प्रशमं गतः ॥

pakṣivatprāyaṇādūrdhvamamutrānantyamaśnute | vihāya dehānnirmukto nirdvandvaḥ praśamaṃ gataḥ

देहत्याग के बाद पक्षी की तरह ऊपर उठकर वह परलोक में अनन्तता पाता है; देह को छोड़कर वह मुक्त, द्वन्द्वों से परे और शान्त हो जाता है।

श्लोक 31 (12.334.31)

अत्र गाथाः पुरा गीताः शृणु राज्ञा ययातिना । धार्यन्ते या द्विजैस्तात मोक्षशास्त्रविशारदैः ॥

atra gāthāḥ purā gītāḥ śṛṇu rājñā yayātinā | dhāryante yā dvijaistāta mokṣaśāstraviśāradaiḥ

इस विषय में राजा ययाति द्वारा पूर्वकाल में गाई गई गाथाएँ सुनो, हे तात! जिन्हें मोक्षशास्त्र में कुशल द्विज स्मरण में धारण करते हैं।

श्लोक 32 (12.334.32)

ज्योतिरात्मनि नान्यत्र सर्वजन्तुषु तत्समम् । स्वयं च शक्यते द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा ॥

jyotirātmani nānyatra sarvajantuṣu tatsamam | svayaṃ ca śakyate draṣṭuṃ susamāhitacetasā

ज्योति आत्मा में है, कहीं और नहीं; वह सब प्राणियों में समान है; और एकाग्र चित्तवाला मनुष्य उसे स्वयं देख सकता है।

श्लोक 33 (12.334.33)

न बिभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः । यश्च नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तु सः ॥

na bibheti paro yasmānna bibheti parācca yaḥ | yaśca necchati na dveṣṭi brahma saṃpadyate tu saḥ

जिससे कोई दूसरा नहीं डरता, जो किसी दूसरे से नहीं डरता, और जो न इच्छा करता है, न द्वेष, वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (12.334.34)

यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

yadā bhāvaṃ na kurute sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā

जब वह कर्म, मन और वाणी से किसी भी प्राणी के प्रति पापभाव नहीं रखता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (12.334.35)

संयोज्य मनसाऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहनीम् । त्यक्त्वा कामं च मोहं च ततो ब्रह्मत्वमश्नुते ॥

saṃyojya manasā''tmānamīrṣyāmutsṛjya mohanīm | tyaktvā kāmaṃ ca mohaṃ ca tato brahmatvamaśnute

मन से आत्मा को जोड़कर, मोह में डालनेवाली ईर्ष्या त्यागकर और काम तथा मोह को छोड़कर वह तब ब्रह्मभाव को पाता है।

श्लोक 36 (12.334.36)

यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाप्ययम् । समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

yadā śrāvye ca dṛśye ca sarvabhūteṣu cāpyayam | samo bhavati nirdvandvo brahma saṃpadyate tadā

जब वह सुनी और देखी हुई वस्तुओं में तथा सब प्राणियों में सम हो जाता है और द्वन्द्वों से परे हो जाता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 37 (12.334.37)

यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेनैव पश्यति । काञ्चनं चायसं चैव सुखं दुःखं तथैव च ॥

yadā stutiṃ ca nindāṃ ca samatvenaiva paśyati | kāñcanaṃ cāyasaṃ caiva sukhaṃ duḥkhaṃ tathaiva ca

जब वह स्तुति और निन्दा को, सोने और लोहे को, तथा सुख और दुःख को समान दृष्टि से देखता है,

श्लोक 38 (12.334.38)

शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम् । जीवितं मरणं चैव ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

śītamuṣṇaṃ tathaivārthamanarthaṃ priyamapriyam | jīvitaṃ maraṇaṃ caiva brahma saṃpadyate tadā

सर्दी और गर्मी को, लाभ और हानि को, प्रिय और अप्रिय को, जीवन और मरण को, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 39 (12.334.39)

प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः । तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा ॥

prasāryeha yathāṅgāni kūrmaḥ saṃharate punaḥ | tathendriyāṇi manasā saṃyantavyāni bhikṣuṇā

जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही भिक्षु को मन के द्वारा इन्द्रियों का संयम करना चाहिए।

श्लोक 40 (12.334.40)

तमः परिगतं वेश्म यथा दीपेन दृश्यते । तथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम् ॥

tamaḥ parigataṃ veśma yathā dīpena dṛśyate | tathā buddhipradīpena śakya ātmā nirīkṣitum

जैसे अँधेरे से भरा घर दीपक से दिखाई देता है, वैसे ही बुद्धि के दीपक से आत्मा को देखा जा सकता है।

श्लोक 41 (12.334.41)

एतत्सर्वं च पश्यामि त्वयि बुद्धिमतां वर । यच्चान्यदपि नोक्तं मे तत्त्वतो वेद तद्भवान् ॥

etatsarvaṃ ca paśyāmi tvayi buddhimatāṃ vara | yaccānyadapi noktaṃ me tattvato veda tadbhavān

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! यह सब मैं आप में देखता हूँ; और जो कुछ और मैंने नहीं कहा, उसे भी आप यथार्थ रूप से जानते हैं।

श्लोक 42 (12.334.42)

ब्रह्मर्षे विदितश्चासि विषयान्तमुपागतः । गुरोस्तव प्रसादेन तव चैवोपशिक्षया ॥

brahmarṣe viditaścāsi viṣayāntamupāgataḥ | gurostava prasādena tava caivopaśikṣayā

हे ब्रह्मर्षि! मैं आपको जानता हूँ: आप अपने गुरु की कृपा से और अपनी ही शिक्षा से विषयों के पार पहुँच चुके हैं।

श्लोक 43 (12.334.43)

तस्यैव च प्रसादेन प्रादुर्भूतं महात्मनः । ज्ञानं दिव्यं ममापीदं तेनासि विदितो मम ॥

tasyaiva ca prasādena prādurbhūtaṃ mahātmanaḥ | jñānaṃ divyaṃ mamāpīdaṃ tenāsi vidito mama

और उन्हीं महात्मा की कृपा से मुझमें भी यह दिव्य ज्ञान प्रकट हुआ है; इसी कारण आप मुझे ज्ञात हैं।

श्लोक 44 (12.334.44)

अधिकं तव विज्ञानमधिका च गतिस्तव । अधिकं तव चैश्वर्यं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥

adhikaṃ tava vijñānamadhikā ca gatistava | adhikaṃ tava caiśvaryaṃ tacca tvaṃ nāvabudhyase

आपका विज्ञान अधिक है, आपकी गति अधिक है, आपका ऐश्वर्य अधिक है; फिर भी आप उसे नहीं पहचानते।

श्लोक 45 (12.334.45)

बाल्याद्वा संशयाद्वापि भयाद्वाऽप्यविमोक्षणात् । उत्पन्ने चापि विज्ञाने नाधिगच्छति तां गतिं ॥

bālyādvā saṃśayādvāpi bhayādvā'pyavimokṣaṇāt | utpanne cāpi vijñāne nādhigacchati tāṃ gatiṃ

बचपन से, संशय से, भय से, या मुक्ति न हो पाने के कारण मनुष्य विज्ञान उत्पन्न होने पर भी उस गति को नहीं पाता।

श्लोक 46 (12.334.46)

व्यवसायेन शुद्धेन मद्विधैश्छिन्नसंशयः । विमुच्य हृदयग्रन्थीनासादयति तां गतिम् ॥

vyavasāyena śuddhena madvidhaiśchinnasaṃśayaḥ | vimucya hṛdayagranthīnāsādayati tāṃ gatim

मेरे जैसे लोगों द्वारा जिसका संशय काट दिया गया है, वह शुद्ध निश्चय के द्वारा हृदय की गाँठों को खोलकर उस गति को पाता है।

श्लोक 47 (12.334.47)

भवांश्चोत्पन्नविज्ञानः स्थिरबुद्धिरलोलुपः । व्यवसायादृते ब्रह्मन्नासादयति तत्परम् ॥

bhavāṃścotpannavijñānaḥ sthirabuddhiralolupaḥ | vyavasāyādṛte brahmannāsādayati tatparam

और आप, जिनमें विज्ञान उत्पन्न हो चुका है, जो स्थिर बुद्धिवाले और निर्लोभ हैं, हे ब्रह्मन्! उस परम को केवल निश्चय के द्वारा ही पाते हैं।

श्लोक 48 (12.334.48)

नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नास्ति लोलुपः । नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते ॥

nāsti te sukhaduḥkheṣu viśeṣo nāsti lolupaḥ | nautsukyaṃ nṛtyagīteṣu na rāga upajāyate

आपके लिए सुख और दुःख में कोई भेद नहीं, कोई लोभ नहीं; नाच-गाने में आपको उत्साह नहीं, और कोई राग उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 49 (12.334.49)

न बन्धुष्वनुबन्धस्ते न भयेष्वस्ति ते भयम् । पश्यामि त्वां महाभाग तुल्यलोष्टाश्मकाञ्चनम् ॥

na bandhuṣvanubandhaste na bhayeṣvasti te bhayam | paśyāmi tvāṃ mahābhāga tulyaloṣṭāśmakāñcanam

बन्धुओं में आपकी आसक्ति नहीं, भय के प्रसंगों में आपको भय नहीं। हे महाभाग! मैं आपको ढेले, पत्थर और सोने को समान माननेवाला देखता हूँ।

श्लोक 50 (12.334.50)

अहं त्वामनुपश्यामि ये चाप्यन्ते मनीषिणः । आस्थितं परमं मार्गमक्षयं तमनामयम् ॥

ahaṃ tvāmanupaśyāmi ye cāpyante manīṣiṇaḥ | āsthitaṃ paramaṃ mārgamakṣayaṃ tamanāmayam

मैं आपको देखता हूँ, और उन अन्य मनीषियों को भी, जो अन्त में उस परम, अक्षय और निरामय मार्ग पर स्थित हैं।

श्लोक 51 (12.334.51)

यत्फलं ब्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्च यदात्मकः । तस्मिन्वै वर्तसे विप्र किमन्यत्परिपृच्छसि ॥

yatphalaṃ brāhmaṇasyeha mokṣārthaśca yadātmakaḥ | tasminvai vartase vipra kimanyatparipṛcchasi

ब्राह्मण का जो फल यहाँ है और मोक्ष का जो स्वरूप है, आप उसी में स्थित हैं। हे विप्र! फिर और क्या पूछते हैं?

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