शान्ति पर्व · अध्याय 335
शुक का व्यास के पास लौटना और वेदाध्यापन के नियम
जनक के उपदेश से सन्तुष्ट होकर शुक हिमालय की ओर चल पड़ते हैं, जहाँ नारद भी आते हैं। भीष्म उस पवित्र पर्वत का वर्णन करते हैं: जहाँ विष्णु ने स्कन्द की शक्ति को हिलाया और प्रह्लाद उसे उठा न सके, और जहाँ आदित्यपर्वत के पास शिव तप करते हैं। उसके पूर्वी ढलान पर व्यास सुमन्तु, वैशम्पायन, जैमिनि और पैल को वेद पढ़ाते हैं, और शुक पिता को जनक से हुई अपनी बातचीत सुनाते हैं। चारों शिष्य प्रार्थना करते हैं कि उनके और व्यासपुत्र के अतिरिक्त कोई छठा शिष्य न लिया जाए, और व्यास उत्तर में बताते हैं कि वेद किसे देना चाहिए, शिष्यों की परीक्षा कैसे हो, और उसका प्रचार कैसे किया जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.335.1)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं कृतात्मा कृतनिश्चयः । आत्मनाऽऽत्मानमास्थाय दृष्ट्वा चात्मानमात्मना ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ kṛtātmā kṛtaniścayaḥ | ātmanā''tmānamāsthāya dṛṣṭvā cātmānamātmanā
इन वचनों को सुनकर कृतात्मा और दृढ़ निश्चयवाले शुक ने आत्मा के द्वारा आत्मा में स्थित होकर और आत्मा के द्वारा आत्मा को देखकर,
श्लोक 2 (12.335.2)
कृतकार्यः सुखी शान्तस्तूष्णीं प्रायादुदङ्मुखः । शैशिरं गिरिमुद्दिश्य सधर्मा मातरिश्वनः ॥
kṛtakāryaḥ sukhī śāntastūṣṇīṃ prāyādudaṅmukhaḥ | śaiśiraṃ girimuddiśya sadharmā mātariśvanaḥ
कृतकृत्य, सुखी और शान्त होकर चुपचाप उत्तर दिशा की ओर, हिमालय पर्वत की ओर, पवन के समान स्वभाव से चल पड़े।
श्लोक 3 (12.335.3)
एतस्मिन्नेव काले तु देवर्षिर्नारदस्तथा । हिमवन्तमियाद्द्रष्टुं सिद्धचारणसेवितम् ॥
etasminneva kāle tu devarṣirnāradastathā | himavantamiyāddraṣṭuṃ siddhacāraṇasevitam
उसी समय देवर्षि नारद भी सिद्धों और चारणों से सेवित हिमालय को देखने आए,
श्लोक 4 (12.335.4)
तमप्सरोगणाकीर्णं गीतस्वननिनादितम् । किन्नराणां सहस्रैश्च भृङ्गराजैस्तथैव च ॥
tamapsarogaṇākīrṇaṃ gītasvananināditam | kinnarāṇāṃ sahasraiśca bhṛṅgarājaistathaiva ca
जो अप्सराओं के गणों से भरा और गीतों के स्वर से गूँजता था, जहाँ हज़ारों किन्नर थे और भृङ्गराज पक्षी थे,
श्लोक 5 (12.335.5)
मद्गुभिः खञ्जरीटैश्च विचित्रैर्जीवजीवकैः ॥
madgubhiḥ khañjarīṭaiśca vicitrairjīvajīvakaiḥ
मद्गु जलपक्षियों, खञ्जनों और रंग-बिरंगे जीवंजीवक चकोरों से युक्त,
श्लोक 6 (12.335.6)
चित्रवर्णैर्मयूरैश्च केकाशतविराजितैः । राजहंससमूहैश्च हृष्टैः परभृतैस्तथा ॥
citravarṇairmayūraiśca kekāśatavirājitaiḥ | rājahaṃsasamūhaiśca hṛṣṭaiḥ parabhṛtaistathā
सैकड़ों केका-ध्वनियों से शोभित रंग-बिरंगे मोरों, राजहंसों के झुण्डों और आनन्दित कोयलों से युक्त।
श्लोक 7 (12.335.7)
पक्षिराजो गरुत्मांश्च यं नित्यमधितिष्ठति । चत्वारो लोकपालाश्च देवाः सर्षिगणास्तथा ॥
pakṣirājo garutmāṃśca yaṃ nityamadhitiṣṭhati | catvāro lokapālāśca devāḥ sarṣigaṇāstathā
जिस पर्वत में पक्षिराज गरुड़ सदा आते-जाते हैं, और जहाँ चारों लोकपाल तथा ऋषिगणों के साथ देवता
श्लोक 8 (12.335.8)
तत्र नित्यं समायान्ति लोकस्य हितकाम्यया । विष्णुना यत्र पुत्रार्थे तपस्तप्तं महात्मना ॥
tatra nityaṃ samāyānti lokasya hitakāmyayā | viṣṇunā yatra putrārthe tapastaptaṃ mahātmanā
संसार के हित की इच्छा से सदा आया करते हैं; जहाँ महात्मा विष्णु ने पुत्र के लिए तप किया था।
श्लोक 9 (12.335.9)
तत्रैव च कुमारेण बाल्ये क्षिप्ता दिवौकसः । शक्तिर्न्यस्ता क्षितितले त्रैलोक्यमवमन्य वै ॥
tatraiva ca kumāreṇa bālye kṣiptā divaukasaḥ | śaktirnyastā kṣititale trailokyamavamanya vai
और वहीं कुमार ने बचपन में देवताओं को ललकारा; तीनों लोकों की अवहेलना करके उसने अपनी शक्ति धरती पर गाड़ दी।
श्लोक 10 (12.335.10)
तत्रोवाच जगत्स्कन्दः क्षिपन्वाक्यमिदं तदा । योऽन्योऽस्ति मत्तोऽभ्यधिको विप्रा यस्याधिकं प्रियाः ॥
tatrovāca jagatskandaḥ kṣipanvākyamidaṃ tadā | yo'nyo'sti matto'bhyadhiko viprā yasyādhikaṃ priyāḥ
वहाँ जगत् के स्वामी स्कन्द ने ललकारते हुए यह वचन कहा: "हे ब्राह्मणो! क्या मुझसे बढ़कर कोई और है, कोई ऐसा जिसे ब्राह्मण मुझसे अधिक प्रिय हों,
श्लोक 11 (12.335.11)
यो ब्रह्मण्यो द्वितीयोऽस्ति त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् । सोऽभ्युद्धरत्विमां शक्तिमथवा कम्पयत्विति ॥
yo brahmaṇyo dvitīyo'sti triṣu lokeṣu vīryavān | so'bhyuddharatvimāṃ śaktimathavā kampayatviti
तीनों लोकों में ब्राह्मणों का कोई दूसरा हितैषी और पराक्रमी हो, तो वह इस शक्ति को उठा ले, या कम से कम हिला ही दे!"
श्लोक 12 (12.335.12)
तच्छुत्वा व्यथिता लोकाः क इमामुद्धरेदिति । अथ देवगणं सर्वं संभ्रान्तेन्द्रियमानसम् ॥
tacchutvā vyathitā lokāḥ ka imāmuddharediti | atha devagaṇaṃ sarvaṃ saṃbhrāntendriyamānasam
यह सुनकर लोक व्याकुल हो उठे: "इसे कौन उठाएगा?" तब सारा देवगण, जिसकी इन्द्रियाँ और मन घबरा गए थे,
श्लोक 13 (12.335.13)
अपश्यद्भगवान्विष्णुः क्षिप्तं सासुरराक्षसम् । किंन्वत्र सुकृतं कार्यं भवेदिति विचिन्तयन् ॥
apaśyadbhagavānviṣṇuḥ kṣiptaṃ sāsurarākṣasam | kiṃnvatra sukṛtaṃ kāryaṃ bhavediti vicintayan
असुरों और राक्षसों-सहित अपमानित वह देवगण भगवान् विष्णु ने देखा; और वे सोचने लगे, "यहाँ कौन-सा उचित कार्य करना चाहिए?"
श्लोक 14 (12.335.14)
अनामृष्य ततः क्षेपमवैक्षत च पावकिम् । संप्रगृह्य विशुद्धात्मा शक्तिं प्रज्वलितां तदा ॥
anāmṛṣya tataḥ kṣepamavaikṣata ca pāvakim | saṃpragṛhya viśuddhātmā śaktiṃ prajvalitāṃ tadā
उस ललकार को सहन न करके उन्होंने अग्नि के पुत्र स्कन्द की ओर देखा, और निर्मल मन से उस प्रज्वलित शक्ति को हाथ में लिया।
श्लोक 15 (12.335.15)
कम्पयामास सव्येन पाणिना पुरुषोत्तमः । शक्त्यां तु कम्प्यमानायां विष्णुना बलिना तदा ॥
kampayāmāsa savyena pāṇinā puruṣottamaḥ | śaktyāṃ tu kampyamānāyāṃ viṣṇunā balinā tadā
पुरुषोत्तम विष्णु ने उसे बाएँ हाथ से हिलाया। जब बलशाली विष्णु उस शक्ति को हिला रहे थे,
श्लोक 16 (12.335.16)
मेदिनी कम्पिता सर्वा सशैलवनकानना । शक्तेनापि समुद्धर्तुं कम्पिता साऽभवत्तदा ॥
medinī kampitā sarvā saśailavanakānanā | śaktenāpi samuddhartuṃ kampitā sā'bhavattadā
पर्वतों, वनों और काननों-सहित सारी पृथ्वी काँप उठी; और उठा सकने में समर्थ होते हुए भी उन्होंने उस शक्ति को तब केवल हिलाया ही।
श्लोक 17 (12.335.17)
रक्षिता स्कन्दराजस्य धर्षणा प्रभविष्णुना । तां कम्पयित्वा भगवान्प्रह्लादमिदमब्रवीत् ॥
rakṣitā skandarājasya dharṣaṇā prabhaviṣṇunā | tāṃ kampayitvā bhagavānprahlādamidamabravīt
इस प्रकार समर्थ विष्णु ने राजा स्कन्द की ललकार को निष्फल कर दिया। उस शक्ति को हिलाकर भगवान् ने प्रह्लाद से यह कहा:
श्लोक 18 (12.335.18)
पश्य वीर्यं कुमारस्य नैतदन्यः करिष्यति । सोऽमृष्यमाणस्तद्वाक्यं समुद्धरणनिश्चितः ॥
paśya vīryaṃ kumārasya naitadanyaḥ kariṣyati | so'mṛṣyamāṇastadvākyaṃ samuddharaṇaniścitaḥ
"इस कुमार का पराक्रम देखो; इसे कोई दूसरा नहीं कर सकेगा।" यह बात सहन न कर पाने पर, और उसे उठाने का निश्चय करके,
श्लोक 19 (12.335.19)
जग्राह तां तदा शक्तिं न चैनामभ्यकम्पयत् । नादं महान्तं मुक्त्वा स मूर्च्छितो गिरिमूर्घनि ॥
jagrāha tāṃ tadā śaktiṃ na caināmabhyakampayat | nādaṃ mahāntaṃ muktvā sa mūrcchito girimūrghani
प्रह्लाद ने उस शक्ति को पकड़ा, पर उसे हिला भी नहीं सके; और बड़ी चीख़ मारकर वे पर्वत की चोटी पर मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 20 (12.335.20)
विह्वलः प्रापतद्भूमौ हिरण्यकशिपोः सुतः । तत्रोत्तरां दिशं गत्वा शैलराजस्य पार्श्वतः ॥
vihvalaḥ prāpatadbhūmau hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ | tatrottarāṃ diśaṃ gatvā śailarājasya pārśvataḥ
हिरण्यकशिपु का वह पुत्र व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़ा। वहीं उत्तर दिशा में पर्वतराज के पार्श्व में जाकर,
श्लोक 21 (12.335.21)
तपोऽतप्यत दुर्घर्षं तात नित्यं वृषध्वजः । पावकेन परिक्षिप्तं दीप्यता यस्य चाश्रमम् ॥
tapo'tapyata durgharṣaṃ tāta nityaṃ vṛṣadhvajaḥ | pāvakena parikṣiptaṃ dīpyatā yasya cāśramam
हे तात! वृषध्वज शिव सदा दुर्धर्ष तप करते रहे; और उनका आश्रम प्रज्वलित अग्नि से घिरा हुआ है,
श्लोक 22 (12.335.22)
आदित्यपर्वतं नाम दुर्घर्षमकृतात्मभिः । न तत्र शक्यते गन्तुं यक्षराक्षसदानवैः ॥
ādityaparvataṃ nāma durgharṣamakṛtātmabhiḥ | na tatra śakyate gantuṃ yakṣarākṣasadānavaiḥ
जिसका नाम आदित्यपर्वत है, जहाँ अशुद्ध चित्तवालों का पहुँचना असम्भव है; यक्ष, राक्षस और दानव भी वहाँ नहीं जा सकते।
श्लोक 23 (12.335.23)
दशयोजनविस्तारमग्निज्वालसमावृतम् । भगवान्पावकस्तत्र स्वयं तिष्ठति वीर्यवान् ॥
daśayojanavistāramagnijvālasamāvṛtam | bhagavānpāvakastatra svayaṃ tiṣṭhati vīryavān
वह दस योजन विस्तार का है और अग्नि की ज्वालाओं से घिरा है; वहाँ बलवान् भगवान् अग्नि स्वयं रहते हैं,
श्लोक 24 (12.335.24)
सर्वान्विघ्नान्प्रशमयन्महादेवस्य धीमतः । दिव्यं वर्षसहस्रं हि पादेनैकेन तिष्ठतः ॥
sarvānvighnānpraśamayanmahādevasya dhīmataḥ | divyaṃ varṣasahasraṃ hi pādenaikena tiṣṭhataḥ
बुद्धिमान् महादेव के सब विघ्नों को शान्त करते हुए, जो दिव्य एक हज़ार वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहे,
श्लोक 25 (12.335.25)
देवान्संतापयंस्तत्र महादेवो महाव्रतः । ऐन्द्रीं तु दिशमास्थाय शैलराजस्य धीमतः ॥
devānsaṃtāpayaṃstatra mahādevo mahāvrataḥ | aindrīṃ tu diśamāsthāya śailarājasya dhīmataḥ
वहाँ देवताओं को तपाते हुए महाव्रती महादेव थे। और बुद्धिमान् पर्वतराज की पूर्व दिशा में
श्लोक 26 (12.335.26)
विविक्ते पर्वततटे पाराशर्यो महातपाः । वेदानध्यापयामास व्यासः शिष्यान्महातपाः ॥
vivikte parvatataṭe pārāśaryo mahātapāḥ | vedānadhyāpayāmāsa vyāsaḥ śiṣyānmahātapāḥ
एक एकान्त पर्वत-तट पर महातपस्वी पराशरपुत्र व्यास अपने शिष्यों को वेद पढ़ाते थे,
श्लोक 27 (12.335.27)
सुमन्तुं च महाभागं वैशंपायनमेव च । जैमिनिं च महाप्राज्ञं पैलं चापि तपस्विनम् ॥
sumantuṃ ca mahābhāgaṃ vaiśaṃpāyanameva ca | jaiminiṃ ca mahāprājñaṃ pailaṃ cāpi tapasvinam
अर्थात् महाभाग सुमन्तु, वैशम्पायन, महाप्राज्ञ जैमिनि और तपस्वी पैल को।
श्लोक 28 (12.335.28)
एभिः शिष्यैः परिवृतो व्यास आस्ते महातपाः । तत्राश्रमपदं रम्यं ददर्श पितुरुत्तमम् । आरणेयो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकरः ॥
ebhiḥ śiṣyaiḥ parivṛto vyāsa āste mahātapāḥ | tatrāśramapadaṃ ramyaṃ dadarśa pituruttamam | āraṇeyo viśuddhātmā nabhasīva divākaraḥ
इन शिष्यों से घिरे महातपस्वी व्यास वहाँ रहते थे। वहाँ आकाश में सूर्य के समान शुद्धात्मा अरणी-पुत्र शुक ने अपने पिता का सुन्दर और उत्तम आश्रम देखा।
श्लोक 29 (12.335.29)
अथ व्यासः परिक्षिप्तं ज्वलन्तमिव पावकम् । ददृशे सुतमायान्तं दिवाकरसमप्रभम् ॥
atha vyāsaḥ parikṣiptaṃ jvalantamiva pāvakam | dadṛśe sutamāyāntaṃ divākarasamaprabham
तब व्यास ने अपने पुत्र को आते देखा, जो प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से घिरा हुआ और सूर्य के समान प्रभावाला था,
श्लोक 30 (12.335.30)
असज्जमानं वृक्षेषु शैलेषु विषयेषु च । योगयुक्तं महात्मानं यथा बाणं गुणच्युतम् ॥
asajjamānaṃ vṛkṣeṣu śaileṣu viṣayeṣu ca | yogayuktaṃ mahātmānaṃ yathā bāṇaṃ guṇacyutam
वृक्षों, पर्वतों और प्रदेशों से कहीं न रुकता हुआ, योग में युक्त वह महात्मा धनुष की डोरी से छूटे बाण के समान चला आ रहा था।
श्लोक 31 (12.335.31)
सोऽभिगम्य पितुः पादावगृह्णादरणीसुतः । यथोपजोषं तैश्चापि समागच्छन्महामुनिः ॥
so'bhigamya pituḥ pādāvagṛhṇādaraṇīsutaḥ | yathopajoṣaṃ taiścāpi samāgacchanmahāmuniḥ
अरणी-पुत्र ने पास जाकर पिता के चरण पकड़े, और फिर उन महामुनि ने यथायोग्य उन शिष्यों से भी भेंट की।
श्लोक 32 (12.335.32)
ततो निवेदयामास पित्रे सर्वमशेषतः । शुको जनकराजेन संवादं प्रीतमानसः ॥
tato nivedayāmāsa pitre sarvamaśeṣataḥ | śuko janakarājena saṃvādaṃ prītamānasaḥ
तब प्रसन्न मन से शुक ने पिता को राजा जनक के साथ हुआ अपना सारा संवाद पूरा-पूरा सुनाया।
श्लोक 33 (12.335.33)
एवमध्यापयञ्शिष्यान्व्यासः पुत्रं च वीर्यवान् । उवास हिमवत्पृष्ठे पाराशर्यो महामुनिः ॥
evamadhyāpayañśiṣyānvyāsaḥ putraṃ ca vīryavān | uvāsa himavatpṛṣṭhe pārāśaryo mahāmuniḥ
इस प्रकार शिष्यों और पुत्र को पढ़ाते हुए बलवान् महामुनि पराशरपुत्र व्यास हिमालय के पृष्ठ-भाग पर रहने लगे।
श्लोक 34 (12.335.34)
ततः कदाचिच्छिष्यास्तं परिवार्यावतस्थिरे । वेदाध्ययनसंपन्नाः शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥
tataḥ kadācicchiṣyāstaṃ parivāryāvatasthire | vedādhyayanasaṃpannāḥ śāntātmāno jitendriyāḥ
फिर एक दिन वेदाध्ययन पूरा कर चुके, शान्त चित्तवाले और जितेन्द्रिय शिष्य उन्हें घेरकर खड़े हो गए,
श्लोक 35 (12.335.35)
वेदेषु निष्ठां संप्राप्य साङ्गेष्वपि तपस्विनः । अथोचुस्ते तदा व्यासं शिष्याः प्राञ्जलयो गुरुम् ॥
vedeṣu niṣṭhāṃ saṃprāpya sāṅgeṣvapi tapasvinaḥ | athocuste tadā vyāsaṃ śiṣyāḥ prāñjalayo gurum
और अंगों-सहित वेदों में निपुणता पाकर उन तपस्वी शिष्यों ने तब हाथ जोड़कर अपने गुरु व्यास से कहा।
शिष्या ऊचुः
श्लोक 36 (12.335.36)
महता तेजसा युक्ता यशसा चापि वर्धिताः । एकं त्विदानीमिच्छामो गुरुणाऽनुग्रहं कृतम् ॥
mahatā tejasā yuktā yaśasā cāpi vardhitāḥ | ekaṃ tvidānīmicchāmo guruṇā'nugrahaṃ kṛtam
"हम महान् तेज से युक्त हैं और यश से भी बढ़े हैं। अब हम गुरुजी से एक अनुग्रह की इच्छा रखते हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (12.335.37)
इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मर्षिस्तानुवाद ह । उच्यतामिति तद्वत्सा यद्वः कार्यं प्रियं मया ॥
iti teṣāṃ vacaḥ śrutvā brahmarṣistānuvāda ha | ucyatāmiti tadvatsā yadvaḥ kāryaṃ priyaṃ mayā
उनकी बात सुनकर ब्रह्मर्षि ने उनसे कहा, "कहो वत्सो! तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य मुझे करना है?"
श्लोक 38 (12.335.38)
एतद्वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः । पुनः प्राञ्जलयो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ॥
etadvākyaṃ guroḥ śrutvā śiṣyāste hṛṣṭamānasāḥ | punaḥ prāñjalayo bhūtvā praṇamya śirasā gurum
गुरु की यह बात सुनकर वे शिष्य मन में हर्षित हुए; वे फिर हाथ जोड़कर गुरु को सिर झुकाकर प्रणाम करके
श्लोक 39 (12.335.39)
ऊचुस्ते सहिता राजन्निदं वचनमुत्तमम् । यदि प्रीत उपाध्यायो धन्याः स्मो मुनिसत्तम ॥
ūcuste sahitā rājannidaṃ vacanamuttamam | yadi prīta upādhyāyo dhanyāḥ smo munisattama
हे राजन्! सबने मिलकर यह उत्तम बात कही, "हे मुनिश्रेष्ठ! यदि गुरुजी प्रसन्न हैं, तो हम धन्य हैं।
शिष्या ऊचुः
श्लोक 40 (12.335.40)
काङ्क्षामस्तु वयं सर्वे वरं दत्तं महर्षिणा । षष्ठः शिष्यो न ते ख्यातिं गच्छेदत्र प्रसीद नः ॥
kāṅkṣāmastu vayaṃ sarve varaṃ dattaṃ maharṣiṇā | ṣaṣṭhaḥ śiṣyo na te khyātiṃ gacchedatra prasīda naḥ
महर्षि ने जो वर दिया है, हम सब वही चाहते हैं: यहाँ आपका कोई छठा शिष्य ख्याति न पाए। हम पर कृपा कीजिए।
श्लोक 41 (12.335.41)
चत्वारस्ते वयं शिष्या गुरुपुत्रश्च पञ्चमः । इह वेदाः प्रतिष्ठेरन्नेष नः काङ्क्षितो वरः ॥
catvāraste vayaṃ śiṣyā guruputraśca pañcamaḥ | iha vedāḥ pratiṣṭheranneṣa naḥ kāṅkṣito varaḥ
हम चार आपके शिष्य हैं और गुरुपुत्र पाँचवें हैं। यहाँ हमीं से वेद प्रतिष्ठित हों; यही हमारा चाहा हुआ वर है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 42 (12.335.42)
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा व्यासो वेदार्थतत्त्ववित् । पराशरात्मजो धीमान्परलोकार्थचिन्तकः ॥
śiṣyāṇāṃ vacanaṃ śrutvā vyāso vedārthatattvavit | parāśarātmajo dhīmānparalokārthacintakaḥ
शिष्यों की बात सुनकर वेदों के अर्थ के तत्त्व को जाननेवाले, परलोक के हित का विचार करनेवाले बुद्धिमान् पराशरपुत्र व्यास ने
श्लोक 43 (12.335.43)
उवाच शिष्यान्धर्मात्मा धर्म्यं नैःश्रेयसं वचः । ब्राह्मणाय सदा देयं ब्रह्म शुश्रूषवे तथा ॥
uvāca śiṣyāndharmātmā dharmyaṃ naiḥśreyasaṃ vacaḥ | brāhmaṇāya sadā deyaṃ brahma śuśrūṣave tathā
धर्मात्मा होकर अपने शिष्यों से धर्मयुक्त और कल्याणकारी वचन कहे: "ब्रह्म (वेद) सदा ब्राह्मण को देना चाहिए, और वैसे ही सेवा की इच्छा रखनेवाले को भी;
व्यास उवाच
श्लोक 44 (12.335.44)
ब्रह्मलोके निवासं यो ध्रुवं समभिकाङ्क्षते । भवन्तो बहुलाः सन्तु वेदो विस्तार्यतामयम् ॥
brahmaloke nivāsaṃ yo dhruvaṃ samabhikāṅkṣate | bhavanto bahulāḥ santu vedo vistāryatāmayam
उसे भी, जो ब्रह्मलोक में स्थायी निवास चाहता हो। तुम बहुत होओ, और यह वेद फैलाया जाए।
श्लोक 45 (12.335.45)
नाशिष्ये संप्रदातव्यो नाव्रते नाकृतात्मनि । एते शिष्यगुणाः सर्वे विज्ञातव्या यथार्थतः । नापरीक्षितचारित्रे विद्या देया कथंचन ॥
nāśiṣye saṃpradātavyo nāvrate nākṛtātmani | ete śiṣyaguṇāḥ sarve vijñātavyā yathārthataḥ | nāparīkṣitacāritre vidyā deyā kathaṃcana
जो शिष्य नहीं है, जो व्रतरहित है, या जिसका चित्त संस्कारित नहीं है, उसे यह नहीं देना चाहिए। शिष्य के ये सब गुण यथार्थ रूप से जान लेने चाहिए। जिसके आचरण की परीक्षा न हुई हो, उसे कभी विद्या नहीं देनी चाहिए।
श्लोक 46 (12.335.46)
यथा हि कनकं शुद्धं तापच्छेदनिकर्षणैः । परीक्षेत तथा शिष्यानीक्षेत्कुलगुणादिभिः ॥
yathā hi kanakaṃ śuddhaṃ tāpacchedanikarṣaṇaiḥ | parīkṣeta tathā śiṣyānīkṣetkulaguṇādibhiḥ
जैसे सोने को ताप, छेदन और घिसने से परखकर शुद्ध जाना जाता है, वैसे ही शिष्यों को कुल, गुण आदि से परखना चाहिए।
श्लोक 47 (12.335.47)
न नियोज्याश्च वः शिष्या अनियोगे महाभये । यथामति यथापाठं तथा विद्या फलिष्यति ॥
na niyojyāśca vaḥ śiṣyā aniyoge mahābhaye | yathāmati yathāpāṭhaṃ tathā vidyā phaliṣyati
तुम्हारे शिष्यों को ऐसे कार्य में नहीं लगाना चाहिए जो उनके नियुक्त करने योग्य न हो और जिसमें बड़ा भय हो; जैसी जिसकी बुद्धि और जैसा पाठ होगा, वैसा ही विद्या फलेगी।
श्लोक 48 (12.335.48)
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु । श्रावयेच्चतुरो वर्णान्कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ॥
sarvastaratu durgāṇi sarvo bhadrāṇi paśyatu | śrāvayeccaturo varṇānkṛtvā brāhmaṇamagrataḥ
सब कठिनाइयों को पार करें, सब कल्याण देखें; ब्राह्मण को आगे रखकर वह चारों वर्णों को सुनाए।
श्लोक 49 (12.335.49)
वेदस्याध्ययनं हीदं तच्च कार्यं महत्स्मृतम् । स्तुत्यर्थमिह देवानां वेदाः सृष्टाः स्वयंभुवा ॥
vedasyādhyayanaṃ hīdaṃ tacca kāryaṃ mahatsmṛtam | stutyarthamiha devānāṃ vedāḥ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā
यही वेद का अध्ययन है, और यह महान् कर्तव्य माना गया है। वेदों की सृष्टि स्वयंभू ने देवताओं की स्तुति के लिए की है।
श्लोक 50 (12.335.50)
यो निर्वदेत संमोहाद्ब्राह्मणं वेदपारगम् । सोऽभिध्यानाद्ब्राह्मणस्य पराभूयादसंशयम् ॥
yo nirvadeta saṃmohādbrāhmaṇaṃ vedapāragam | so'bhidhyānādbrāhmaṇasya parābhūyādasaṃśayam
जो मोहवश वेद में पारंगत ब्राह्मण की निन्दा करता है, वह उस ब्राह्मण के अनिष्ट-चिन्तन से निःसन्देह पराभव को प्राप्त होता है।
श्लोक 51 (12.335.51)
यश्चाधर्मेण विब्रूयाद्यश्चाधर्मेण पृच्छति । तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति ॥
yaścādharmeṇa vibrūyādyaścādharmeṇa pṛcchati | tayoranyataraḥ praiti vidveṣaṃ cādhigacchati
जो अधर्मपूर्वक उपदेश करता है और जो अधर्मपूर्वक प्रश्न करता है, उन दोनों में से एक नष्ट हो जाता है या शत्रुता पाता है।
श्लोक 52 (12.335.52)
एतद्वः सर्वमाख्यातं स्वाध्यायस्य विधिं प्रति । उपकुर्याच्च शिष्याणामेतच्च हृदि वो भवेत् ॥
etadvaḥ sarvamākhyātaṃ svādhyāyasya vidhiṃ prati | upakuryācca śiṣyāṇāmetacca hṛdi vo bhavet
वेदाध्ययन की विधि के विषय में यह सब मैंने तुम्हें बता दिया। शिष्यों का उपकार करना, और यह तुम्हारे हृदय में बना रहे।"