शान्ति पर्व · अध्याय 336
नारद द्वारा व्यास को प्रेरणा; शुक को सात वायुओं का उपदेश
व्यास के शिष्यों के पृथ्वी पर चले जाने के बाद नारद उन्हें आश्रम में मौन बैठा पाते हैं और उनसे पुत्र शुक के साथ फिर वेदपाठ करने को कहते हैं। नारद बताते हैं कि बाह्लीक पृथ्वी का मैल क्यों कहे जाते हैं, और उस ब्राह्मणी की कथा सुनाते हैं जो हरि के बारह अक्षरों वाले नाम के जप से एक पिशाची का उद्धार करती है और अच्युत के धाम को पहुँचती है। अध्ययन के बीच अचानक आँधी उठने पर व्यास शुक को वायु के सात मार्गों, उनके नामों और कार्यों के बारे में बताते हैं और यह भी कि तेज़ हवा चलने पर वेदपाठ क्यों नहीं किया जाता।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.336.1)
एतच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यं व्यासशिष्या महौजसः । अन्योन्यं हृष्टमनसः परिषस्वजिरे तदा ॥
etacchrutvā gurorvākyaṃ vyāsaśiṣyā mahaujasaḥ | anyonyaṃ hṛṣṭamanasaḥ pariṣasvajire tadā
अपने गुरु का यह वचन सुनकर व्यास के महातेजस्वी शिष्यों ने प्रसन्न होकर एक-दूसरे को गले लगा लिया।
शिष्या ऊचुः
श्लोक 2 (12.336.2)
उक्ताः स्मो यद्भगवता तदात्वायतिसंहितम् । तन्नो मनसि संरूढं करिष्यामस्तथा च तत् ॥
uktāḥ smo yadbhagavatā tadātvāyatisaṃhitam | tanno manasi saṃrūḍhaṃ kariṣyāmastathā ca tat
"भगवन्, आपने हमसे जो कहा है, जो वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए हितकर है, वह हमारे मन में जम गया है; हम वैसा ही करेंगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.336.3)
अन्योन्यं संविभाष्यैवं सुप्रीतमनसः पुनः । विज्ञापयन्ति स्म गुरुं पुनर्वाक्यविशारदाः ॥
anyonyaṃ saṃvibhāṣyaivaṃ suprītamanasaḥ punaḥ | vijñāpayanti sma guruṃ punarvākyaviśāradāḥ
इस प्रकार आपस में बातचीत करके प्रसन्न मन वाले वे वाक्पटु शिष्य फिर अपने गुरु से निवेदन करने लगे।
शिष्या ऊचुः
श्लोक 4 (12.336.4)
शैलादस्मान्महीं गन्तुं काङ्क्षितं नो महामुने । वेदाननेकधा कर्तुं यदि ते रुचितं प्रभो ॥
śailādasmānmahīṃ gantuṃ kāṅkṣitaṃ no mahāmune | vedānanekadhā kartuṃ yadi te rucitaṃ prabho
"हे महामुने, हम इस पर्वत से पृथ्वी पर जाना चाहते हैं; हे प्रभो, यदि आपको यह रुचे कि हम वेदों को अनेक प्रकार से विभक्त करें।"
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.336.5)
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥
śiṣyāṇāṃ vacanaṃ śrutvā parāśarasutaḥ prabhuḥ | pratyuvāca tato vākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam
शिष्यों की बात सुनकर पराशर के पुत्र प्रभु व्यास ने उन्हें धर्म और अर्थ से भरा हितकारी उत्तर दिया।
व्यास उवाच
श्लोक 6 (12.336.6)
क्षितिं वा देवलोकं वा गम्यतां यदि रोचते । अप्रमादश्च वः कार्यो ब्रह्म हि प्रचुरच्छलम् ॥
kṣitiṃ vā devalokaṃ vā gamyatāṃ yadi rocate | apramādaśca vaḥ kāryo brahma hi pracuracchalam
"चाहो तो पृथ्वी पर जाओ या देवलोक में; पर तुम्हें कभी असावधान नहीं होना चाहिए, क्योंकि वेद में चूक की बहुत गुंजाइश रहती है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 7 (12.336.7)
तेऽनुज्ञातास्ततः सर्वे गुरुणा सत्यवादिना । जग्मुः प्रदक्षिणं कृत्वा व्यासं मूर्ध्नाऽभिवाद्य च ॥
te'nujñātāstataḥ sarve guruṇā satyavādinā | jagmuḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā vyāsaṃ mūrdhnā'bhivādya ca
सत्यवादी गुरु से आज्ञा पाकर वे सब व्यास की प्रदक्षिणा करके और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करके चल पड़े।
श्लोक 8 (12.336.8)
अवतीर्य महीं तेऽथ चातुर्होत्रमकल्पयन् । संयाजयन्तो विप्रांश्च राजन्यांश्च विशस्तथा ॥
avatīrya mahīṃ te'tha cāturhotramakalpayan | saṃyājayanto viprāṃśca rājanyāṃśca viśastathā
पृथ्वी पर उतरकर उन्होंने चातुर्होत्र की स्थापना की और ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों के यज्ञ कराने लगे।
श्लोक 9 (12.336.9)
पूज्यमाना द्विजैर्नित्यं मोदमाना गृहे रताः । याजनाध्यापनरताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ॥
pūjyamānā dvijairnityaṃ modamānā gṛhe ratāḥ | yājanādhyāpanaratāḥ śrīmanto lokaviśrutāḥ
द्विजों से सदा सम्मान पाते हुए, प्रसन्न और गृहस्थ-जीवन में रमे हुए वे यज्ञ कराने और पढ़ाने में लगे रहे; वे समृद्ध थे और संसार भर में प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 10 (12.336.10)
अवतीर्णेषु शिष्येषु व्यासः पुत्रसहायवान् । तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकान्ते समुपाविशत् ॥
avatīrṇeṣu śiṣyeṣu vyāsaḥ putrasahāyavān | tūṣṇīṃ dhyānaparo dhīmānekānte samupāviśat
शिष्यों के पृथ्वी पर उतर जाने पर बुद्धिमान व्यास केवल अपने पुत्र को साथ लिए एकान्त में जा बैठे, मौन और ध्यान में लीन।
श्लोक 11 (12.336.11)
एतस्मिन्नेव काले तु देवर्षिर्नारदस्तथा । हिमवन्तमगं द्रष्टुं सिद्धचारणसेवितम् ॥
etasminneva kāle tu devarṣirnāradastathā | himavantamagaṃ draṣṭuṃ siddhacāraṇasevitam
उसी समय देवर्षि नारद सिद्धों और चारणों से सेवित हिमालय पर्वत को देखने आए।
श्लोक 12 (12.336.12)
तं ददर्शाश्रमपदे नारदः सुमहातपाः । अथैनमब्रवीत्काले मधुराक्षरया गिरा ॥
taṃ dadarśāśramapade nāradaḥ sumahātapāḥ | athainamabravītkāle madhurākṣarayā girā
महान तपस्वी नारद ने आश्रम में व्यास को देखा और फिर उचित समय पर मधुर वाणी में उनसे कहा।
नारद उवाच
श्लोक 13 (12.336.13)
भोभो महर्षे वासिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते । एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्से चिन्तयन्निव ॥
bhobho maharṣe vāsiṣṭha brahmaghoṣo na vartate | eko dhyānaparastūṣṇīṃ kimāsse cintayanniva
"अरे महर्षि वासिष्ठ! वेदपाठ की ध्वनि सुनाई नहीं दे रही। आप अकेले चुपचाप ध्यान में डूबे, मानो किसी चिन्ता में, क्यों बैठे हैं?"
श्लोक 14 (12.336.14)
ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते । रजसा तमसा चैव सोमः सोपप्लवो यथा ॥
brahmaghoṣairvirahitaḥ parvato'yaṃ na śobhate | rajasā tamasā caiva somaḥ sopaplavo yathā
"वेदघोष के बिना यह पर्वत शोभा नहीं पा रहा, जैसे धूल और अन्धकार से ढका, राहु के ग्रास में पड़ा चन्द्रमा।"
श्लोक 15 (12.336.15)
न भ्राजते यथापूर्वं निषादानामिवालयः । देवर्षिगणजुष्टोऽपि वेदध्वनिविनाकृतः ॥
na bhrājate yathāpūrvaṃ niṣādānāmivālayaḥ | devarṣigaṇajuṣṭo'pi vedadhvanivinākṛtaḥ
"देवर्षियों के समूह यहाँ आते हैं, फिर भी वेद की ध्वनि के बिना यह पहले की तरह नहीं चमकता; यह निषादों की बस्ती जैसा लगता है।"
श्लोक 16 (12.336.16)
ऋषयश्च हि देवाश्च गन्धर्वाश्च महौजसः । वियुक्ता ब्रह्मघोषेण न भ्राजन्ते यथा पुरा ॥
ṛṣayaśca hi devāśca gandharvāśca mahaujasaḥ | viyuktā brahmaghoṣeṇa na bhrājante yathā purā
"ऋषि, देवता और महातेजस्वी गन्धर्व भी वेदघोष से रहित होकर पहले जैसे नहीं चमकते।"
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (12.336.17)
नारदस्य वचः श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । महर्षे यत्त्वया प्रोक्तं वेदवादविचक्षण ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā kṛṣṇadvaipāyano'bravīt | maharṣe yattvayā proktaṃ vedavādavicakṣaṇa
नारद की बात सुनकर कृष्ण द्वैपायन ने कहा: "हे महर्षि, आप वेद की चर्चा में निपुण हैं; आपने जो कहा है,
व्यास उवाच
श्लोक 18 (12.336.18)
एतन्मनोऽनुकूलं मे भवानर्हसि भाषितुम् । सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वत्र च कुतूहली ॥
etanmano'nukūlaṃ me bhavānarhasi bhāṣitum | sarvajñaḥ sarvadarśī ca sarvatra ca kutūhalī
"वह मेरे मन के अनुकूल है, और उसे कहने के योग्य आप ही हैं। आप सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं और सब बातों में जिज्ञासु रहते हैं।"
श्लोक 19 (12.336.19)
त्रिषु लोकेषु यद्वृत्तं सर्वं तव मते स्थितम् । तदाज्ञापय विप्रर्षे ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
triṣu lokeṣu yadvṛttaṃ sarvaṃ tava mate sthitam | tadājñāpaya viprarṣe brūhi kiṃ karavāṇi te
"तीनों लोकों में जो कुछ घटता है, वह सब आपके मन में स्थित है। हे विप्रर्षि, मुझे आज्ञा दीजिए; बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?"
श्लोक 20 (12.336.20)
यन्मया समनुष्ठेयं ब्रह्मर्षे तदुदाहर । वियुक्तस्येह शिष्यैर्मे नातिहृष्टमिदं मनः ॥
yanmayā samanuṣṭheyaṃ brahmarṣe tadudāhara | viyuktasyeha śiṣyairme nātihṛṣṭamidaṃ manaḥ
"हे ब्रह्मर्षि, बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए। शिष्यों से बिछुड़ जाने के कारण यहाँ मेरा मन बहुत प्रसन्न नहीं है।"
नारद उवाच
श्लोक 21 (12.336.21)
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् । मलं पृथिव्या बाह्लीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ॥
anāmnāyamalā vedā brāhmaṇasyāvrataṃ malam | malaṃ pṛthivyā bāhlīkāḥ strīṇāṃ kautūhalaṃ malam
"वेदों का मैल उनका पाठ न करना है; ब्राह्मण का मैल व्रतहीनता है; पृथ्वी का मैल बाह्लीक हैं; और स्त्रियों का मैल व्यर्थ का कौतूहल है।"
श्लोक 22 (12.336.22)
अधीयतां भवान्वेदान्सार्धं पुत्रेण धीमता । विधुन्वन्ब्रह्मघोषेण रक्षोभयकृतं तमः ॥
adhīyatāṃ bhavānvedānsārdhaṃ putreṇa dhīmatā | vidhunvanbrahmaghoṣeṇa rakṣobhayakṛtaṃ tamaḥ
"आप अपने बुद्धिमान पुत्र के साथ वेदों का अध्ययन कीजिए, और वेदघोष से राक्षसों के भय से उत्पन्न अन्धकार को दूर कीजिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.336.23)
नारदस्य वचः श्रुत्वा व्यासः परमधर्मवित् । तथेत्युक्त्वाऽथ संहृष्टो वेदाभ्यासे दृढव्रतः ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā vyāsaḥ paramadharmavit | tathetyuktvā'tha saṃhṛṣṭo vedābhyāse dṛḍhavrataḥ
नारद की बात सुनकर परम धर्म को जानने वाले व्यास ने "ऐसा ही हो" कहा, और प्रसन्न होकर दृढ़ व्रत के साथ वेदाभ्यास में लग गए।
श्लोक 24 (12.336.24)
उवाच च महाप्राज्ञं नारदं पुनरेव हि ॥
uvāca ca mahāprājñaṃ nāradaṃ punareva hi
और उन्होंने महाप्राज्ञ नारद से फिर कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 25 (12.336.25)
मलं पृथिव्या बाह्लीका इत्युक्तमधुना त्वया । कीदृशाश्चैव वाह्लीका ब्रूहि मे वदतां वर ॥
malaṃ pṛthivyā bāhlīkā ityuktamadhunā tvayā | kīdṛśāścaiva vāhlīkā brūhi me vadatāṃ vara
"आपने अभी कहा कि पृथ्वी का मैल बाह्लीक हैं। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, बाह्लीक कैसे होते हैं? मुझे बताइए।"
नारद उवाच
श्लोक 26 (12.336.26)
अस्यां पृथिव्यां चत्वारो देशाः पापजनैर्वृताः । युगन्धरस्तु प्रथमस्तथा भूतिलकः स्मृतः ॥
asyāṃ pṛthivyāṃ catvāro deśāḥ pāpajanairvṛtāḥ | yugandharastu prathamastathā bhūtilakaḥ smṛtaḥ
"इस पृथ्वी पर चार देश पापी लोगों से भरे हैं। पहला युगन्धर है, और फिर भूतिलक कहा गया है।"
श्लोक 27 (12.336.27)
अच्युतच्छल इत्युक्तस्तृतीयः पापकृत्तमः । चतुर्थस्तु महापापो बाह्लीक इति संज्ञितः ॥
acyutacchala ityuktastṛtīyaḥ pāpakṛttamaḥ | caturthastu mahāpāpo bāhlīka iti saṃjñitaḥ
"तीसरा अच्युतच्छल कहा गया है, जो पाप करने वालों में सबसे बढ़कर है; और चौथा, महापापी, बाह्लीक नाम से जाना जाता है।"
श्लोक 28 (12.336.28)
मृगोष्ट्रगर्दभक्षीरं पिबन्त्यस्य युगन्धरे । एकवर्णास्तु दृश्यन्ते जना वै ह्यच्युतस्थले ॥
mṛgoṣṭragardabhakṣīraṃ pibantyasya yugandhare | ekavarṇāstu dṛśyante janā vai hyacyutasthale
"युगन्धर में लोग हिरनी, ऊँटनी और गधी का दूध पीते हैं; और अच्युतस्थल में लोग सब एक ही वर्ण के दिखाई देते हैं।"
श्लोक 29 (12.336.29)
मेहन्ति च मलं पापा विसृजन्ति जलेषु वै । नित्यं भूतिलकेऽत्यन्नं तज्जलं च पिबन्ति च ॥
mehanti ca malaṃ pāpā visṛjanti jaleṣu vai | nityaṃ bhūtilake'tyannaṃ tajjalaṃ ca pibanti ca
"वे पापी मल-मूत्र त्यागकर उसे जलों में बहा देते हैं; और भूतिलक में लोग सदा अत्यधिक खाते हैं और उसी जल को पीते हैं।"
श्लोक 30 (12.336.30)
हरिबाह्यास्तु बाहीका न स्मरन्ति हरिं क्वचित् । ऐहलौकिकमोक्षं ते मांसशोणितवर्धनाः । वृथा जाता भविष्यन्ति बाह्लीका इति विश्रुताः ॥
haribāhyāstu bāhīkā na smaranti hariṃ kvacit | aihalaukikamokṣaṃ te māṃsaśoṇitavardhanāḥ | vṛthā jātā bhaviṣyanti bāhlīkā iti viśrutāḥ
"बाह्लीक हरि से विमुख हैं और कभी हरि का स्मरण नहीं करते। वे केवल मांस और रक्त बढ़ाते हैं; इस लोक में उनके लिए कोई मोक्ष नहीं; वे व्यर्थ ही जन्मे हैं और बाह्लीक नाम से प्रसिद्ध होंगे।"
श्लोक 31 (12.336.31)
पुष्कराहारनिरताः पिशाचा यदभाषते । मुसुण्ठीं परिगृह्योग्रां तच्छृणुष्व महामुने ॥
puṣkarāhāraniratāḥ piśācā yadabhāṣate | musuṇṭhīṃ parigṛhyogrāṃ tacchṛṇuṣva mahāmune
"हे महामुनि, पुष्कर में आहार करने वाले पिशाचों ने उग्र मुसुण्ठी (गदा) उठाकर जो कहा था, उसे सुनिए।"
श्लोक 32 (12.336.32)
ब्राह्मणीं बहुपुत्रां तां पुष्करे स्नातुमागताम् । युगन्धरे पयः पीत्वा ह्युचिता ह्यच्युतस्थले ॥
brāhmaṇīṃ bahuputrāṃ tāṃ puṣkare snātumāgatām | yugandhare payaḥ pītvā hyucitā hyacyutasthale
बहुत पुत्रों वाली उस ब्राह्मणी से, जो युगन्धर में दूध पीकर और अच्युतस्थल में ठहरकर पुष्कर में स्नान करने आई थी, पिशाची ने कहा:
पिशाच्युवाच
श्लोक 33 (12.336.33)
तथा भूतिलके स्नात्वा बाह्लीकांश्च निरीक्ष्य वै । आगताऽसि तथा स्नातुं कथं स्वर्गं न गच्छसि ॥
tathā bhūtilake snātvā bāhlīkāṃśca nirīkṣya vai | āgatā'si tathā snātuṃ kathaṃ svargaṃ na gacchasi
'तुमने भूतिलक में स्नान किया और बाह्लीकों को देखा, और फिर यहाँ स्नान करने आई हो। तुम स्वर्ग क्यों नहीं जातीं?'
नारद उवाच
श्लोक 34 (12.336.34)
इत्युक्त्वा ब्राह्मणीभाण्डं पोथयित्वा मुसुण्ठिना । उवाच क्रोधताम्राक्षी पिशाची तीर्थपालिका ॥
ityuktvā brāhmaṇībhāṇḍaṃ pothayitvā musuṇṭhinā | uvāca krodhatāmrākṣī piśācī tīrthapālikā
यह कहकर उसने मुसुण्ठी से ब्राह्मणी का बर्तन फोड़ डाला, और तीर्थ की रक्षक वह पिशाची, क्रोध से लाल आँखें किए, फिर बोली:
पिशाच्युवाच
श्लोक 35 (12.336.35)
एतत्तु ते दिवावृत्तं रात्रौ वृत्तमथान्यथा । गच्छ बाह्लीकसंसर्गादशुचित्वं न संशयः ॥
etattu te divāvṛttaṃ rātrau vṛttamathānyathā | gaccha bāhlīkasaṃsargādaśucitvaṃ na saṃśayaḥ
'दिन में तुम्हारा आचरण यह था, और रात में कुछ और रहा। जाओ! बाह्लीकों के संसर्ग से तुम अपवित्र हो, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 36 (12.336.36)
यद्द्विषन्ति महात्मानं न स्मरन्ति जनार्दनम् । न तेषां पुण्यतीर्थेषु गतिः संसर्गिणामपि ॥
yaddviṣanti mahātmānaṃ na smaranti janārdanam | na teṣāṃ puṇyatīrtheṣu gatiḥ saṃsargiṇāmapi
जो महात्मा से द्वेष करते हैं और जनार्दन का स्मरण नहीं करते, उन्हें पवित्र तीर्थों में गति नहीं मिलती, और उनके संसर्ग में रहने वालों को भी नहीं।'
नारद उवाच
श्लोक 37 (12.336.37)
उद्युक्ता ब्राह्मणी भीता प्रतियाता सुतैः सह । स्वदेहस्था जजापैवं सपुत्रा ध्यानतत्परा ॥
udyuktā brāhmaṇī bhītā pratiyātā sutaiḥ saha | svadehasthā jajāpaivaṃ saputrā dhyānatatparā
भयभीत और घबराई हुई ब्राह्मणी अपने पुत्रों के साथ लौट पड़ी। अपने भीतर स्थित होकर, ध्यान में डूबी हुई, वह पुत्रों सहित इस प्रकार जप करने लगी:
श्लोक 38 (12.336.38)
अनन्तस्य हरेः शुद्धं नाम वै द्वादशाक्षरम् । वत्सरत्रितये पूर्णे ब्राह्मणी पुनरागता ॥
anantasya hareḥ śuddhaṃ nāma vai dvādaśākṣaram | vatsaratritaye pūrṇe brāhmaṇī punarāgatā
अनन्त हरि का शुद्ध बारह अक्षरों वाला नाम। तीन वर्ष पूरे होने पर ब्राह्मणी फिर लौटी।
श्लोक 39 (12.336.39)
सपुत्रा पुष्करद्वारं पिशाच्याह तथागतम् । नमस्ते ब्राह्मणि शुभे पूताऽहं तव दर्शनात् ॥
saputrā puṣkaradvāraṃ piśācyāha tathāgatam | namaste brāhmaṇi śubhe pūtā'haṃ tava darśanāt
वह पुत्रों के साथ पुष्कर के द्वार पर पहुँची, और आई हुई ब्राह्मणी से पिशाची ने कहा: 'हे शुभ ब्राह्मणी, तुम्हें नमस्कार; तुम्हारे दर्शन से मैं पवित्र हो गई।
पिशाच्युवाच
श्लोक 40 (12.336.40)
कुरु तीर्थाभिषेकं च सपुत्रा पापवर्जिता । हरेर्नाम्ना च मां साध्वी जलेन स्प्रष्टुमर्हसि ॥
kuru tīrthābhiṣekaṃ ca saputrā pāpavarjitā | harernāmnā ca māṃ sādhvī jalena spraṣṭumarhasi
पुत्रों सहित पापरहित होकर तीर्थ-स्नान करो; और हे साध्वी, हरि के नाम से जल छिड़ककर मुझे भी स्पर्श करो।'
नारद उवाच
श्लोक 41 (12.336.41)
इत्युक्ता ब्राह्मणी हृष्टा पुत्रैः सह शुभव्रता । जलेन प्रोक्षयामास द्वादशाक्षरसंयुतम् ॥
ityuktā brāhmaṇī hṛṣṭā putraiḥ saha śubhavratā | jalena prokṣayāmāsa dvādaśākṣarasaṃyutam
ऐसा कहे जाने पर व्रतों में दृढ़ ब्राह्मणी ने प्रसन्न होकर पुत्रों सहित बारह अक्षरों के नाम के साथ उस पर जल छिड़का।
श्लोक 42 (12.336.42)
तत्क्षणादभवच्छुद्धा पिशाची दिव्यरूपिणी । अप्सरा ह्यभवद्दिव्या गता स्वर्लोकमुत्तमम् ॥
tatkṣaṇādabhavacchuddhā piśācī divyarūpiṇī | apsarā hyabhavaddivyā gatā svarlokamuttamam
उसी क्षण वह पिशाची शुद्ध हो गई और दिव्य रूप वाली, दिव्य अप्सरा बनकर श्रेष्ठ स्वर्गलोक को चली गई।
श्लोक 43 (12.336.43)
ब्राह्मणी चैव कालेन वासुदेवपरायणा । सपुत्रा चागता स्थानमच्युतस्य शुभं परम् ॥
brāhmaṇī caiva kālena vāsudevaparāyaṇā | saputrā cāgatā sthānamacyutasya śubhaṃ param
और वह ब्राह्मणी भी समय आने पर वासुदेव में परायण रहकर पुत्रों सहित अच्युत के परम, मंगलमय धाम को पहुँची।
श्लोक 44 (12.336.44)
एतत्ते कथितं विद्वन्मुने कालोऽयमागतः ॥
etatte kathitaṃ vidvanmune kālo'yamāgataḥ
"हे विद्वान् मुनि, यह मैंने आपको सुना दिया; अब मेरे जाने का समय आ गया है।
श्लोक 45 (12.336.45)
गमिष्येऽहं महाप्राज्ञ आगमिष्यामि वै पुनः । इत्युक्त्वा स जगामाथ नारदो वदतांवरः ॥
gamiṣye'haṃ mahāprājña āgamiṣyāmi vai punaḥ | ityuktvā sa jagāmātha nārado vadatāṃvaraḥ
हे महाप्राज्ञ, मैं जाऊँगा और फिर आऊँगा।" यह कहकर वक्ताओं में श्रेष्ठ नारद चले गए।
भीष्म उवाच
श्लोक 46 (12.336.46)
द्वैपायनस्तु भगवांस्तच्छ्रुत्वा मुनिसत्तमात् । शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् । स्वरेणोच्चैः सशैक्ष्येण लोकानापूरयन्निव ॥
dvaipāyanastu bhagavāṃstacchrutvā munisattamāt | śukena saha putreṇa vedābhyāsamathākarot | svareṇoccaiḥ saśaikṣyeṇa lokānāpūrayanniva
और भगवान द्वैपायन मुनिश्रेष्ठ से यह सुनकर अपने पुत्र शुक के साथ वेदाभ्यास करने लगे; वे शिक्षा के नियमों के अनुसार ऊँचे स्वर में पाठ करते हुए मानो लोकों को भर रहे थे।
श्लोक 47 (12.336.47)
तयोरभ्यसतोरेव नानाधर्मप्रवादिनोः । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवेजितः ॥
tayorabhyasatoreva nānādharmapravādinoḥ | vāto'timātraṃ pravavau samudrānilavejitaḥ
जब वे दोनों अध्ययन कर रहे थे और धर्म के अनेक मतों की चर्चा कर रहे थे, तभी समुद्र की हवाओं से उठी एक अत्यन्त प्रबल वायु चलने लगी।
श्लोक 48 (12.336.48)
ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् । शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥
tato'nadhyāya iti taṃ vyāsaḥ putramavārayat | śuko vāritamātrastu kautūhalasamanvitaḥ
तब "यह अनध्याय का समय है" कहकर व्यास ने अपने पुत्र को रोक दिया। रोके जाते ही शुक कौतूहल से भर उठे।
श्लोक 49 (12.336.49)
अपृच्छत्पितरं ब्रह्मन्कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हति भवान्वायोः सर्वं विचेष्टितम् ॥
apṛcchatpitaraṃ brahmankuto vāyurabhūdayam | ākhyātumarhati bhavānvāyoḥ sarvaṃ viceṣṭitam
उन्होंने पिता से पूछा, "हे ब्रह्मन्, यह वायु कहाँ से आई? आप वायु की सारी गतिविधियाँ मुझे बताने के योग्य हैं।"
श्लोक 50 (12.336.50)
शुकस्यैतद्वचः श्रुत्वा व्यासः परमधर्मवित् । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
śukasyaitadvacaḥ śrutvā vyāsaḥ paramadharmavit | anadhyāyanimitte'sminnidaṃ vacanamabravīt
शुक की यह बात सुनकर परम धर्म के ज्ञाता व्यास ने अनध्याय के इस कारण के विषय में ये वचन कहे।
व्यास उवाच
श्लोक 51 (12.336.51)
दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वस्थं ते निश्चलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्वे व्यवस्थितः ॥
divyaṃ te cakṣurutpannaṃ svasthaṃ te niścalaṃ manaḥ | tamasā rajasā cāpi tyaktaḥ satve vyavasthitaḥ
"तुम्हारे भीतर दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो गई है; तुम्हारा मन स्थिर और अचल है; तम और रज से मुक्त होकर तुम सत्त्व में प्रतिष्ठित हो।"
श्लोक 52 (12.336.52)
आदर्शे स्वामिव च्छायां पश्यस्यात्मानमात्मना । न्यस्यात्मनि स्वयं चेतो बुद्ध्या समनुचिन्तय ॥
ādarśe svāmiva cchāyāṃ paśyasyātmānamātmanā | nyasyātmani svayaṃ ceto buddhyā samanucintaya
"जैसे दर्पण में अपनी छाया दिखती है, वैसे ही तुम आत्मा के द्वारा आत्मा को देखते हो। अपने चित्त को अपने भीतर टिकाकर बुद्धि से विचार करो।"
श्लोक 53 (12.336.53)
देवयानपथो विष्णुः पितृयानपथो रविः । द्वावेतौ प्रेत्य पन्थानौ दिवं चाधश्च गच्छतः ॥
devayānapatho viṣṇuḥ pitṛyānapatho raviḥ | dvāvetau pretya panthānau divaṃ cādhaśca gacchataḥ
"देवयान मार्ग विष्णु हैं और पितृयान मार्ग सूर्य है। मृत्यु के बाद ये ही दो मार्ग हैं, जो एक ऊपर स्वर्ग की ओर और दूसरा नीचे की ओर ले जाते हैं।"
श्लोक 54 (12.336.54)
पृथिव्यामन्तरिक्षे च यत्र संवान्ति वायवः । सप्तैते वायुमार्गा वै तान्निबोधानुपूर्वशः ॥
pṛthivyāmantarikṣe ca yatra saṃvānti vāyavaḥ | saptaite vāyumārgā vai tānnibodhānupūrvaśaḥ
"पृथ्वी और आकाश में जहाँ वायुएँ बहती हैं, वहाँ वायु के ये सात मार्ग हैं; उन्हें क्रम से समझो।"
श्लोक 55 (12.336.55)
तत्र देवगणाः साध्याः संबभूवुर्महाबलाः । तेषामप्यभवत्पुत्रः समानो नाम दुर्जयः ॥
tatra devagaṇāḥ sādhyāḥ saṃbabhūvurmahābalāḥ | teṣāmapyabhavatputraḥ samāno nāma durjayaḥ
"वहाँ महाबली साध्यगण उत्पन्न हुए, और उनका भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम समान था, जिसे जीतना कठिन है।"
श्लोक 56 (12.336.56)
उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद्व्यानस्तस्याभवत्सुतः । अपानश्च ततो ज्ञेयः प्राणश्चापि ततोऽपरः ॥
udānastasya putro'bhūdvyānastasyābhavatsutaḥ | apānaśca tato jñeyaḥ prāṇaścāpi tato'paraḥ
"उसका पुत्र उदान हुआ और उदान का पुत्र व्यान हुआ; उसके बाद अपान जानना चाहिए, और फिर सबसे अन्त में प्राण।"
श्लोक 57 (12.336.57)
अनपत्योऽभवत्प्राणो दुर्धर्षः शत्रुतापनः । पृथक्कर्माणि तेषां तु प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥
anapatyo'bhavatprāṇo durdharṣaḥ śatrutāpanaḥ | pṛthakkarmāṇi teṣāṃ tu pravakṣyāmi yathātatham
"प्राण के कोई सन्तान नहीं हुई; वह दुर्धर्ष था, शत्रुओं को तपाने वाला। अब मैं इन वायुओं के अलग-अलग कार्य ठीक-ठीक बताऊँगा।"
श्लोक 58 (12.336.58)
प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टां वर्तयते पृथक् । प्राणनाच्चैव भूतानां प्राण इत्यभिधीयते ॥
prāṇināṃ sarvato vāyuśceṣṭāṃ vartayate pṛthak | prāṇanāccaiva bhūtānāṃ prāṇa ityabhidhīyate
"वायु सर्वत्र प्राणियों की चेष्टा को अलग-अलग चलाती है; और प्राणियों को साँस लेने वाला बनाने के कारण वह प्राण कहलाती है।"
श्लोक 59 (12.336.59)
प्रेरयत्यभ्रसंघातान्धूमजांश्चोष्मजांश्च यः । प्रथमः प्रथमे मार्गे आवहो नाम योऽनिलः ॥
prerayatyabhrasaṃghātāndhūmajāṃścoṣmajāṃśca yaḥ | prathamaḥ prathame mārge āvaho nāma yo'nilaḥ
"जो वायु धुएँ से बने और ताप से बने बादलों के समूहों को चलाती है और पहले मार्ग में पहली है, उसका नाम आवह है।"
श्लोक 60 (12.336.60)
अम्बरे स्नेहमभ्रेभ्यस्तटिद्भ्यश्च महाद्युतिः । प्रवहो नाम संवाति द्वितीयश्च सतोयदः ॥
ambare snehamabhrebhyastaṭidbhyaśca mahādyutiḥ | pravaho nāma saṃvāti dvitīyaśca satoyadaḥ
"दूसरी वायु, जो आकाश में बादलों और बिजलियों से नमी लाती है और अत्यन्त तेजस्वी है, जल देने वाले मेघों के साथ बहती है; उसका नाम प्रवह है।"
श्लोक 61 (12.336.61)
उदयं ज्योतिषां शश्वत्सोमादीनां करोति यः । अन्तर्देहेषु चोदानं यं वदन्ति मनीषिणः ॥
udayaṃ jyotiṣāṃ śaśvatsomādīnāṃ karoti yaḥ | antardeheṣu codānaṃ yaṃ vadanti manīṣiṇaḥ
"जो वायु चन्द्रमा आदि ज्योतियों का निरन्तर उदय कराती है, और जिसे ज्ञानी लोग प्राणियों के शरीरों के भीतर उदान कहते हैं,
श्लोक 62 (12.336.62)
यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्धारयते जलम् । उद्धृत्याददते चापो जीमूतेभ्योऽम्बरेऽनिलः ॥
yaścaturbhyaḥ samudrebhyo vāyurdhārayate jalam | uddhṛtyādadate cāpo jīmūtebhyo'mbare'nilaḥ
"जो वायु चारों समुद्रों से जल को धारण करती है और उसे ऊपर उठाकर आकाश में बादलों तक पहुँचाती है,
श्लोक 63 (12.336.63)
योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान्पर्जन्याय प्रयच्छति । उद्वहो नाम वर्षिष्ठस्तृतीयः स सदागतिः ॥
yo'dbhiḥ saṃyojya jīmūtānparjanyāya prayacchati | udvaho nāma varṣiṣṭhastṛtīyaḥ sa sadāgatiḥ
"जो बादलों को जल से जोड़कर पर्जन्य को सौंपती है, उसका नाम उद्वह है; वह सबसे अधिक वर्षा कराने वाली, तीसरी और सदा गतिशील है।
श्लोक 64 (12.336.64)
समुह्यमाना बहुधा येन नीताः पृथग्घनाः । वर्षमोक्षकृतारम्भास्ते भवन्ति घनाघनाः ॥
samuhyamānā bahudhā yena nītāḥ pṛthagghanāḥ | varṣamokṣakṛtārambhāste bhavanti ghanāghanāḥ
"उसके द्वारा अनेक प्रकार से ढोए जाते हुए बादल अलग-अलग चलते हैं, और वर्षा छोड़ने का आरम्भ करते हुए घने, गरजते मेघ बन जाते हैं।
श्लोक 65 (12.336.65)
संहता येन चाविद्धा भवन्ति नदनान्तराः । रक्षणार्थाय संभूता मेघत्वमुपयान्ति च ॥
saṃhatā yena cāviddhā bhavanti nadanāntarāḥ | rakṣaṇārthāya saṃbhūtā meghatvamupayānti ca
"उसके द्वारा एकत्र और आहत होकर वे भीतर गर्जन से भर जाते हैं, और जगत् की रक्षा के लिए उत्पन्न होकर मेघ का रूप धारण करते हैं।
श्लोक 66 (12.336.66)
योऽसौ वहति देवानां विमानानि विहायसा । चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः ॥
yo'sau vahati devānāṃ vimānāni vihāyasā | caturthaḥ saṃvaho nāma vāyuḥ sa girimardanaḥ
"जो वायु देवताओं के विमानों को आकाश में ढोती है, वह चौथी है, उसका नाम संवह है; वह पर्वतों को चूर करने वाली है।
श्लोक 67 (12.336.67)
येन वेगवता तूर्णं रूक्षेणारुजता रसान् । वायुना विहता मेघा न भवन्ति बलाहकाः ॥
yena vegavatā tūrṇaṃ rūkṣeṇārujatā rasān | vāyunā vihatā meghā na bhavanti balāhakāḥ
"उसके तीव्र, रूखे और कठोर वेग से नमी शीघ्र सूख जाती है, और उस वायु से आहत मेघ फिर जल देने वाले बादल नहीं रहते।
श्लोक 68 (12.336.68)
दारुणोत्पातसंचारो नभसः स्तनयित्नुमान् । पञ्चमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः ॥
dāruṇotpātasaṃcāro nabhasaḥ stanayitnumān | pañcamaḥ sa mahāvego vivaho nāma mārutaḥ
"भयंकर उत्पात करती और गर्जन के साथ आकाश में दौड़ती हुई पाँचवीं, अत्यन्त वेग वाली वायु विवह नाम की है।
श्लोक 69 (12.336.69)
यस्मिन्पारिप्लवा दिव्या भवन्त्यापो विहायसा । पुण्यं चाकाशगङ्गायास्तोयं विष्टभ्य तिष्ठति ॥
yasminpāriplavā divyā bhavantyāpo vihāyasā | puṇyaṃ cākāśagaṅgāyāstoyaṃ viṣṭabhya tiṣṭhati
"उसी में आकाश के दिव्य जल तैरते हैं, और वह आकाशगंगा के पवित्र जल को थामे हुए स्थिर रहती है।
श्लोक 70 (12.336.70)
दूरात्प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः । योनिरंशुसहस्रस्य येन भाति वसुंधरा ॥
dūrātpratihato yasminnekaraśmirdivākaraḥ | yoniraṃśusahasrasya yena bhāti vasuṃdharā
"उसी में सूर्य दूर से ही रोका जाने पर केवल एक किरण वाला रह जाता है; वही उन हज़ार किरणों का स्रोत है, जिनसे पृथ्वी चमकती है।
श्लोक 71 (12.336.71)
यस्मादाप्यायते सोमो योनिर्दिव्योऽमृतस्य यः । षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जयतांवरः ॥
yasmādāpyāyate somo yonirdivyo'mṛtasya yaḥ | ṣaṣṭhaḥ parivaho nāma sa vāyurjayatāṃvaraḥ
"उसी से चन्द्रमा पुष्ट होता है, जो अमृत का दिव्य उद्गम है; वह छठी वायु परिवह नाम की है, जो विजयी वायुओं में श्रेष्ठ है।
श्लोक 72 (12.336.72)
सर्वप्राणभृतां प्राणान्योऽनुकाले निरस्यति । यस्य वर्त्मानुवर्तेते मृत्युवैवस्वतावुभौ ॥
sarvaprāṇabhṛtāṃ prāṇānyo'nukāle nirasyati | yasya vartmānuvartete mṛtyuvaivasvatāvubhau
"जो उचित समय पर सब प्राणधारियों के प्राण निकाल देती है, और जिसके मार्ग पर मृत्यु और वैवस्वत यम दोनों चलते हैं।
श्लोक 73 (12.336.73)
सम्यगन्वीक्षतां बुद्ध्या शान्तयाऽध्यात्मचिन्तकाः । ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते ॥
samyaganvīkṣatāṃ buddhyā śāntayā'dhyātmacintakāḥ | dhyānābhyāsābhirāmāṇāṃ yo'mṛtatvāya kalpate
"जो शान्त बुद्धि से भली-भाँति विचार करने वालों को, आत्मचिन्तन करने वालों को और ध्यान के अभ्यास में रमने वालों को अमरत्व के योग्य बनाती है।
श्लोक 74 (12.336.74)
यं समासाद्य वेगेन दिशामन्तं प्रपेदिरे । दक्षस्य दशपुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः ॥
yaṃ samāsādya vegena diśāmantaṃ prapedire | dakṣasya daśaputrāṇāṃ sahasrāṇi prajāpateḥ
"उसे वेग से पाकर प्रजापति दक्ष के दस हज़ार पुत्र दिशाओं के अन्त तक चले गए।
श्लोक 75 (12.336.75)
येन सृष्टः पराभूतो यात्येव न निवर्तते । परावहो नाम परो वायुः स दुरतिक्रमः ॥
yena sṛṣṭaḥ parābhūto yātyeva na nivartate | parāvaho nāma paro vāyuḥ sa duratikramaḥ
"जिससे प्रेरित होकर कोई जाता है तो लौटता नहीं; वह परावह नाम की परम वायु है, जिसे पार करना कठिन है।
श्लोक 76 (12.336.76)
एवमेतेऽदितेः पुत्रा मारुताः परमाद्भुताः । अनारतं ते संवान्ति सर्वगाः सर्वधारिणः ॥
evamete'diteḥ putrā mārutāḥ paramādbhutāḥ | anārataṃ te saṃvānti sarvagāḥ sarvadhāriṇaḥ
"इस प्रकार अदिति के ये पुत्र मरुत्, अत्यन्त अद्भुत, बिना रुके बहते रहते हैं; वे सर्वत्र जाने वाले और सबको धारण करने वाले हैं।
श्लोक 77 (12.336.77)
एतत्तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः । कम्पितः सहसा तेन वायुनाऽतिप्रवायता ॥
etattu mahadāścaryaṃ yadayaṃ parvatottamaḥ | kampitaḥ sahasā tena vāyunā'tipravāyatā
"यह बड़े आश्चर्य की बात है कि यह श्रेष्ठ पर्वत उस अत्यन्त प्रबल बहती वायु से अचानक काँप उठा।
श्लोक 78 (12.336.78)
विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः । सहसोदीर्यते तात जगत्प्रव्यथते तदा ॥
viṣṇorniḥśvāsavāto'yaṃ yadā vegasamīritaḥ | sahasodīryate tāta jagatpravyathate tadā
"यह विष्णु के निःश्वास की वायु है; जब यह अपने वेग से प्रेरित होकर अचानक उठती है, तब हे तात, सारा जगत् काँप उठता है।
श्लोक 79 (12.336.79)
तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्म नाधीयन्तेऽतिवायति । वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् ॥
tasmādbrahmavido brahma nādhīyante'tivāyati | vāyorvāyubhayaṃ hyuktaṃ brahma tatpīḍitaṃ bhavet
"इसलिए वेद को जानने वाले वायु के तेज़ चलने पर अध्ययन नहीं करते; वायु से वायु का भय कहा गया है, और उस समय पढ़ा गया वेद पीड़ित हो जाएगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 80 (12.336.80)
एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः । उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगङ्गामगात्तदा ॥
etāvaduktvā vacanaṃ parāśarasutaḥ prabhuḥ | uktvā putramadhīṣveti vyomagaṅgāmagāttadā
इतना कहकर पराशर के पुत्र प्रभु व्यास ने पुत्र से "पढ़ो" कहा और फिर आकाशगंगा की ओर चले गए।