शान्ति पर्व · अध्याय 337
नारद द्वारा शुक को मोक्ष-मार्ग का उपदेश
नारद फिर शुक के पास आते हैं, और शुक उनसे वही माँगते हैं जो इस लोक में उनके लिए हितकर हो। नारद सनत्कुमार का उपदेश सुनाते हैं: काम और क्रोध पर संयम, सत्य और दया, परिग्रह, परिवार और यहाँ तक कि धर्म-अधर्म का भी त्याग, क्योंकि परलोक में अपने कर्म ही साथ जाते हैं। वे पुरुष को रचने वाले तत्त्वों की गणना करते हैं, बताते हैं कि जीव कर्मों से कैसे बँधकर संसार में भटकता है, और शुक से बन्धन से मुक्त होकर सिद्धि पाने का आग्रह करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.337.1)
एतस्मिन्नन्तरे भूते नारदः पुनरागमत् । शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान्प्रष्टुमीप्सया ॥
etasminnantare bhūte nāradaḥ punarāgamat | śukaṃ svādhyāyanirataṃ vedārthānpraṣṭumīpsayā
इसी बीच नारद फिर आए; वे वेदों के अर्थ के विषय में स्वाध्याय में लगे शुक से पूछना चाहते थे।
श्लोक 2 (12.337.2)
देवर्षिं तु शुको दृष्ट्वा नारदं समुपस्थितम् । अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजयत् ॥
devarṣiṃ tu śuko dṛṣṭvā nāradaṃ samupasthitam | arghyapūrveṇa vidhinā vedoktenābhyapūjayat
देवर्षि नारद को आया देखकर शुक ने वेद में बताई विधि के अनुसार अर्घ्य आदि से उनका पूजन किया।
श्लोक 3 (12.337.3)
नारदोऽथाब्रवीत्प्रीतो ब्रूहि ब्रह्मविदां वर । केन त्वां श्रेयसा वत्स योजयामीति हृष्टवत् ॥
nārado'thābravītprīto brūhi brahmavidāṃ vara | kena tvāṃ śreyasā vatsa yojayāmīti hṛṣṭavat
प्रसन्न होकर नारद ने हर्ष से कहा, "हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, बताओ: वत्स, मैं तुम्हें किस कल्याण से जोड़ूँ?"
श्लोक 4 (12.337.4)
नारदस्य वचः श्रुत्वा शुकः प्रोवाच भारत । अस्मिँल्लोके हितं यत्स्यात्तेन मां योक्तुमर्हसि ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā śukaḥ provāca bhārata | asmim̐lloke hitaṃ yatsyāttena māṃ yoktumarhasi
नारद की बात सुनकर शुक ने कहा, "हे भारत, इस लोक में मेरे लिए जो हितकर हो, उसी से आप मुझे जोड़ें।"
नारद उवाच
श्लोक 5 (12.337.5)
तत्त्वं जिज्ञासतां पूर्वमृषीणां भावितात्मनाम् । सनत्कुमारो भगवानिदं वचनमब्रवीत् ॥
tattvaṃ jijñāsatāṃ pūrvamṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām | sanatkumāro bhagavānidaṃ vacanamabravīt
नारद बोले: "सत्य को जानना चाहने वाले शुद्ध अन्तःकरण के प्राचीन ऋषियों से भगवान सनत्कुमार ने ये वचन कहे थे।"
श्लोक 6 (12.337.6)
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥
nāsti vidyāsamaṃ cakṣurnāsti satyasamaṃ tapaḥ | nāsti rāgasamaṃ duḥkhaṃ nāsti tyāgasamaṃ sukham
"विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं, राग के समान कोई दुःख नहीं और त्याग के समान कोई सुख नहीं।"
श्लोक 7 (12.337.7)
निवृत्तिः कर्मणा पापात्सततं पुण्यशीलता । सद्वृत्तिः सद्वदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम् ॥
nivṛttiḥ karmaṇā pāpātsatataṃ puṇyaśīlatā | sadvṛttiḥ sadvadācāraḥ śreya etadanuttamam
"पापकर्म से निवृत्ति, निरन्तर पुण्य का स्वभाव, सद्वृत्ति और सज्जनों जैसा आचार: यही परम कल्याण है।"
श्लोक 8 (12.337.8)
मानुष्यमसुखं प्राप्य यः सज्जति न मुच्यते । नालं स दुःखमोक्षाय संयोगो दुःखलक्षणम् ॥
mānuṣyamasukhaṃ prāpya yaḥ sajjati na mucyate | nālaṃ sa duḥkhamokṣāya saṃyogo duḥkhalakṣaṇam
"इस सुखरहित मानव-जन्म को पाकर जो उसमें आसक्त होता है, वह मुक्त नहीं होता; वह दुःख से छूटने योग्य नहीं, क्योंकि संयोग ही दुःख का लक्षण है।"
श्लोक 9 (12.337.9)
सक्तस्य बुद्धिश्चलति मोहजालविवर्धनी । मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र सोऽश्नुते ॥
saktasya buddhiścalati mohajālavivardhanī | mohajālāvṛto duḥkhamiha cāmutra so'śnute
"आसक्त मनुष्य की बुद्धि डगमगाती है और मोह का जाल बढ़ाती है; मोह के जाल में लिपटा वह इस लोक में भी और परलोक में भी दुःख पाता है।"
श्लोक 10 (12.337.10)
सर्वोपायात्तु कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । कार्यः श्रेयोर्थिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ ॥
sarvopāyāttu kāmasya krodhasya ca vinigrahaḥ | kāryaḥ śreyorthinā tau hi śreyoghātārthamudyatau
"कल्याण चाहने वाले को हर उपाय से काम और क्रोध को वश में करना चाहिए, क्योंकि ये दोनों कल्याण का नाश करने को तत्पर रहते हैं।"
श्लोक 11 (12.337.11)
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥
nityaṃ krodhāttapo rakṣecchriyaṃ rakṣecca matsarāt | vidyāṃ mānāvamānābhyāmātmānaṃ tu pramādataḥ
"तप को सदा क्रोध से बचाए, लक्ष्मी को डाह से, विद्या को मान और अपमान से, और अपने आपको प्रमाद से।"
श्लोक 12 (12.337.12)
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद्विद्यते परम् ॥
ānṛśaṃsyaṃ paro dharmaḥ kṣamā ca paramaṃ balam | ātmajñānaṃ paraṃ jñānaṃ na satyādvidyate param
"दया (क्रूरता का अभाव) परम धर्म है, क्षमा परम बल है, आत्मज्ञान परम ज्ञान है; सत्य से बढ़कर कुछ नहीं।"
श्लोक 13 (12.337.13)
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् । यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम ॥
satyasya vacanaṃ śreyaḥ satyādapi hitaṃ vadet | yadbhūtahitamatyantametatsatyaṃ mataṃ mama
"सत्य बोलना श्रेष्ठ है, पर सत्य से भी बढ़कर जो हितकर हो वही बोलना चाहिए। जो प्राणियों के लिए पूर्ण रूप से हितकारी है, वही मेरे मत में सत्य है।"
श्लोक 14 (12.337.14)
सर्वारम्भपरित्यागी निराशीर्निष्परिग्रहः । येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान्स च पण्डितः ॥
sarvārambhaparityāgī nirāśīrniṣparigrahaḥ | yena sarvaṃ parityaktaṃ sa vidvānsa ca paṇḍitaḥ
"जिसने सब आरम्भ छोड़ दिए, जो आशा और परिग्रह से रहित है, जिसने सब कुछ त्याग दिया है: वही विद्वान् है, वही पण्डित है।"
श्लोक 15 (12.337.15)
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान्यश्चरत्यात्मवशैरिह । आसज्जमानः शान्तात्मा निर्विकारः समाहितः ॥
indriyairindriyārthānyaścaratyātmavaśairiha | āsajjamānaḥ śāntātmā nirvikāraḥ samāhitaḥ
"जो यहाँ आत्मा के वश में रहने वाली इन्द्रियों से विषयों के बीच विचरता है, आसक्त नहीं होता, शान्त, निर्विकार और समाहित रहता है,
श्लोक 16 (12.337.16)
आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च । स विमुक्तः परं श्रेयो नचिरेणाधिगच्छति ॥
ātmabhūtairatadbhūtaḥ saha caiva vinaiva ca | sa vimuktaḥ paraṃ śreyo nacireṇādhigacchati
जो अपने जैसे प्राणियों के बीच रहकर भी उनसे अलग है, उनके साथ भी और उनके बिना भी, वह मुक्त होकर शीघ्र ही परम कल्याण को पा लेता है।"
श्लोक 17 (12.337.17)
अदर्शनमसंस्पर्शस्तथाऽसंभाषणं तदा । यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते परम् ॥
adarśanamasaṃsparśastathā'saṃbhāṣaṇaṃ tadā | yasya bhūtaiḥ saha mune sa śreyo vindate param
"जो प्राणियों के साथ न देखना, न छूना और न बातचीत करना रखता है, हे मुनि, वह परम कल्याण पाता है।"
श्लोक 18 (12.337.18)
न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥
na hiṃsyātsarvabhūtāni maitrāyaṇagataścaret | nedaṃ janma samāsādya vairaṃ kurvīta kenacit
"किसी प्राणी की हिंसा न करे; मैत्री के मार्ग पर चले। इस जन्म को पाकर किसी से वैर न करे।"
श्लोक 19 (12.337.19)
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशीस्त्वमचापलम् । एतदाहुः परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः ॥
ākiñcanyaṃ susaṃtoṣo nirāśīstvamacāpalam | etadāhuḥ paraṃ śreya ātmajñasya jitātmanaḥ
"अकिंचनता, पूर्ण सन्तोष, आशा का अभाव और अचंचलता: आत्मज्ञानी और जितात्मा के लिए यही परम कल्याण कहा गया है।"
श्लोक 20 (12.337.20)
परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रियः । अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाभयम् ॥
parigrahaṃ parityajya bhava tāta jitendriyaḥ | aśokaṃ sthānamātiṣṭha iha cāmutra cābhayam
"हे तात, परिग्रह छोड़कर जितेन्द्रिय बनो। उस शोकरहित स्थान में स्थित हो जाओ, जहाँ इस लोक में भी भय नहीं और परलोक में भी नहीं।"
श्लोक 21 (12.337.21)
निरामिषा न शोचन्ति त्यजेदामिषमात्मनः । परित्यज्यामिषं सौम्य दुःखतापाद्विमोक्ष्यसे ॥
nirāmiṣā na śocanti tyajedāmiṣamātmanaḥ | parityajyāmiṣaṃ saumya duḥkhatāpādvimokṣyase
"जो विषयरूपी चारे से रहित हैं, वे शोक नहीं करते; अपने भीतर के चारे को छोड़ दे। हे सौम्य, चारे को छोड़कर तुम दुःख की जलन से छूट जाओगे।"
श्लोक 22 (12.337.22)
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना । अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥
taponityena dāntena muninā saṃyatātmanā | ajitaṃ jetukāmena bhāvyaṃ saṅgeṣvasaṅginā
"जो अब तक न जीती गई वस्तु को जीतना चाहता है, उसे नित्य तपस्वी, संयमी, संयत चित्त वाला मुनि और आसक्तियों के बीच अनासक्त होना चाहिए।"
श्लोक 23 (12.337.23)
गुणसङ्गेष्वनासक्त एकचर्यारतः सदा । ब्राह्मणो नचिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम् ॥
guṇasaṅgeṣvanāsakta ekacaryārataḥ sadā | brāhmaṇo nacirādeva sukhamāyātyanuttamam
"गुणों की आसक्तियों में न फँसा और सदा अकेले विचरने में रमा हुआ ब्राह्मण शीघ्र ही परम सुख को पा लेता है।"
श्लोक 24 (12.337.24)
द्वन्द्वारामेषु भूतेषु य एको रमते मुनिः । विद्धि प्रज्ञानतृप्तं तं ज्ञानतृप्तो न शोचति ॥
dvandvārāmeṣu bhūteṣu ya eko ramate muniḥ | viddhi prajñānatṛptaṃ taṃ jñānatṛpto na śocati
"द्वन्द्वों में रमने वाले प्राणियों के बीच जो मुनि अकेला रमता है, उसे प्रज्ञा से तृप्त जानो; ज्ञान से तृप्त मनुष्य शोक नहीं करता।"
श्लोक 25 (12.337.25)
शुभैर्लभति देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् । अशुभैश्चाप्यधोजन्म कर्मभिर्लभतेऽवशः ॥
śubhairlabhati devatvaṃ vyāmiśrairjanma mānuṣam | aśubhaiścāpyadhojanma karmabhirlabhate'vaśaḥ
"शुभ कर्मों से देवत्व मिलता है, मिले-जुले कर्मों से मनुष्य-जन्म, और अशुभ कर्मों से नीच योनि; मनुष्य कर्मों के वश होकर यह सब पाता है।"
श्लोक 26 (12.337.26)
तत्र मृत्युवशो दुःखैः सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यते जन्तुस्तत्कथं नावबुध्यसे ॥
tatra mṛtyuvaśo duḥkhaiḥ satataṃ samabhidrutaḥ | saṃsāre pacyate jantustatkathaṃ nāvabudhyase
"वहाँ मृत्यु के वश में, दुःखों से निरन्तर घिरा हुआ जीव संसार में पकता रहता है; तब तुम यह क्यों नहीं समझते?"
श्लोक 27 (12.337.27)
अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः । अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुध्यसे ॥
ahite hitasaṃjñastvamadhruve dhruvasaṃjñakaḥ | anarthe cārthasaṃjñastvaṃ kimarthaṃ nāvabudhyase
"तुम अहित को हित, अनित्य को नित्य और अनर्थ को अर्थ समझते हो। तुम क्यों नहीं समझते?"
श्लोक 28 (12.337.28)
संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहात्तन्तुभिरात्मजैः । कोशकार इवात्मानं वेष्टयन्नावबुध्यसे ॥
saṃveṣṭyamānaṃ bahubhirmohāttantubhirātmajaiḥ | kośakāra ivātmānaṃ veṣṭayannāvabudhyase
"रेशम के कीड़े की तरह तुम अपनी ही सन्तानों से बने मोह के बहुत-से तन्तुओं में अपने को लपेटते जाते हो, और समझते नहीं।"
श्लोक 29 (12.337.29)
अलं परिग्रहेणेह दोषवान्हि परिग्रहः । कृमिर्हि कोशकारस्तु बध्यते स परिग्रहात् ॥
alaṃ parigraheṇeha doṣavānhi parigrahaḥ | kṛmirhi kośakārastu badhyate sa parigrahāt
"परिग्रह बहुत हुआ! परिग्रह दोषों से भरा है: रेशम का कीड़ा अपने ही परिग्रह से बँधता है।"
श्लोक 30 (12.337.30)
पुत्रदारकुटुम्बेषु सक्ताः सीदन्ति जन्तवः । सरःपङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ॥
putradārakuṭumbeṣu saktāḥ sīdanti jantavaḥ | saraḥpaṅkārṇave magnā jīrṇā vanagajā iva
"पुत्र, स्त्री और परिवार में आसक्त प्राणी दुःख में डूब जाते हैं, जैसे सरोवर के कीचड़ के समुद्र में फँसे बूढ़े वनैले हाथी।"
श्लोक 31 (12.337.31)
महाजालसमाकृष्टान्स्थले मत्स्यानिवोद्धृतान् । मोहजालसमाकृष्टान्पश्य जन्तून्सुदुःखितान् ॥
mahājālasamākṛṣṭānsthale matsyānivoddhṛtān | mohajālasamākṛṣṭānpaśya jantūnsuduḥkhitān
"देखो, मोह के जाल से खिंचे हुए प्राणी कितने दुःखी हैं, जैसे बड़े जाल से खींचकर स्थल पर डाली गई मछलियाँ।"
श्लोक 32 (12.337.32)
कुटुम्बं पुत्रदारांश्च शरीरं संचयाश्च ये । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृतम् ॥
kuṭumbaṃ putradārāṃśca śarīraṃ saṃcayāśca ye | pārakyamadhruvaṃ sarvaṃ kiṃ svaṃ sukṛtaduṣkṛtam
"कुटुम्ब, पुत्र और स्त्रियाँ, शरीर और जो कुछ जोड़ा हुआ धन है, सब पराया और अनित्य है। अपना क्या है? केवल पुण्य और पाप के कर्म।"
श्लोक 33 (12.337.33)
यदा सर्वान्परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं समर्थं नानुतिष्ठसि ॥
yadā sarvānparityajya gantavyamavaśena te | anarthe kiṃ prasaktastvaṃ samarthaṃ nānutiṣṭhasi
"जब सबको छोड़कर तुम्हें विवश होकर जाना ही है, तब तुम व्यर्थ में क्यों लगे हो, और जो सार्थक है उसमें क्यों नहीं लगते?"
श्लोक 34 (12.337.34)
अविश्रान्तमनालम्बमपाथेयमदैशिकम् । तमः कान्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ॥
aviśrāntamanālambamapātheyamadaiśikam | tamaḥ kāntāramadhvānaṃ kathameko gamiṣyasi
"बिना विश्राम का, बिना सहारे का, बिना पाथेय का, बिना पथ-प्रदर्शक का अन्धकार का वह वन-मार्ग है; तुम उस पर अकेले कैसे जाओगे?"
श्लोक 35 (12.337.35)
न हि त्वां प्रस्थितं कश्चित्पृष्ठतोऽनुगमिष्यति । सुकृतं दुष्कृतं च त्वां यास्यन्तमनुयास्यतः ॥
na hi tvāṃ prasthitaṃ kaścitpṛṣṭhato'nugamiṣyati | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ ca tvāṃ yāsyantamanuyāsyataḥ
"जब तुम प्रस्थान करोगे, तब कोई तुम्हारे पीछे-पीछे नहीं जाएगा; केवल तुम्हारे पुण्य और पाप ही जाते हुए तुम्हारे पीछे चलेंगे।"
श्लोक 36 (12.337.36)
विद्या कर्म च शौचं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुसार्यन्ते सिद्धार्थस्य विमुच्यते ॥
vidyā karma ca śaucaṃ ca jñānaṃ ca bahuvistaram | arthārthamanusāryante siddhārthasya vimucyate
"विद्या, कर्म, शौच और ज्ञान अपने बहुत विस्तार के साथ किसी प्रयोजन के लिए अपनाए जाते हैं; जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया, वह मुक्त हो जाता है।"
श्लोक 37 (12.337.37)
निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥
nibandhanī rajjureṣā yā grāme vasato ratiḥ | chittvaitāṃ sukṛto yānti naināṃ chindanti duṣkṛtaḥ
"गाँव में बसने वाले का जो रस है, वही यह बाँधने वाली रस्सी है। पुण्यात्मा इसे काटकर चले जाते हैं; पापी इसे नहीं काटते।"
श्लोक 38 (12.337.38)
रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गन्धपङ्कां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुरावहाम् ॥
rūpakūlāṃ manaḥsrotāṃ sparśadvīpāṃ rasāvahām | gandhapaṅkāṃ śabdajalāṃ svargamārgadurāvahām
"एक नदी, जिसके किनारे रूप हैं, जिसकी धारा मन है, जिसके द्वीप स्पर्श हैं, जो रसों को बहा लाती है, जिसका कीचड़ गन्ध है और जिसका जल शब्द है, जिसे पार करके स्वर्ग-मार्ग पर जाना कठिन है,
श्लोक 39 (12.337.39)
क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यपदाङ्कुराम् । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां नौतार्यां तां नदीं तरेत् ॥
kṣamāritrāṃ satyamayīṃ dharmasthairyapadāṅkurām | tyāgavātādhvagāṃ śīghrāṃ nautāryāṃ tāṃ nadīṃ taret
जिसके चप्पू क्षमा हैं, जो सत्य से बनी है, जिसका आधार और अंकुर धर्म में दृढ़ता है, जो तेज़ बहती है और जिसे त्याग की हवा चलाती है: उस नदी को नाव से पार करना चाहिए।"
श्लोक 40 (12.337.40)
त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज ॥
tyaja dharmamadharmaṃ ca ubhe satyānṛte tyaja | ubhe satyānṛte tyaktvā yena tyajasi taṃ tyaja
"धर्म और अधर्म को छोड़ दो; सत्य और असत्य दोनों को छोड़ दो। सत्य और असत्य दोनों को छोड़कर उसे भी छोड़ दो जिससे तुम छोड़ते हो।"
श्लोक 41 (12.337.41)
त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यलिप्सया । उभे सत्यानृते बुद्ध्या बुद्धिं परमनिश्चयात् ॥
tyaja dharmamasaṃkalpādadharmaṃ cāpyalipsayā | ubhe satyānṛte buddhyā buddhiṃ paramaniścayāt
"संकल्प के अभाव से धर्म को छोड़ो और लोभ के अभाव से अधर्म को; सत्य और असत्य दोनों को बुद्धि से छोड़ो, और बुद्धि को परम निश्चय से।"
श्लोक 42 (12.337.42)
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् । चर्मावनद्धं दुर्गन्धिं पूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥
asthisthūṇaṃ snāyuyutaṃ māṃsaśoṇitalepanam | carmāvanaddhaṃ durgandhiṃ pūrṇaṃ mūtrapurīṣayoḥ
हड्डियों के खम्भों वाला, नसों से बँधा, मांस और रक्त के लेप वाला, चमड़े से मढ़ा, दुर्गन्धयुक्त, मल-मूत्र से भरा,
श्लोक 43 (12.337.43)
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यज ॥
jarāśokasamāviṣṭaṃ rogāyatanamāturam | rajasvalamanityaṃ ca bhūtāvāsamimaṃ tyaja
जरा और शोक से घिरा, रोगों का घर, पीड़ित, मलिन और अनित्य यह शरीर: प्राणियों के इस निवास को छोड़ दो।
श्लोक 44 (12.337.44)
इदं विश्वं जगत्सर्वमजगच्चापि यद्भवेत् । महाभूतात्मकं सर्वं महद्यत्परमाणु च ॥
idaṃ viśvaṃ jagatsarvamajagaccāpi yadbhavet | mahābhūtātmakaṃ sarvaṃ mahadyatparamāṇu ca
यह सारा विश्व, जो कुछ चल है और जो अचल है, वह सब, चाहे बड़ा हो या परमाणु, महाभूतों से बना है।
श्लोक 45 (12.337.45)
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा मही । षष्ठं तु चेतना या तु आत्मा सप्तममुच्यते । अष्टमं तु मनो ज्ञेयं बुद्धिस्तु नवमी स्मृता ॥
mahābhūtāni khaṃ vāyuragnirāpastathā mahī | ṣaṣṭhaṃ tu cetanā yā tu ātmā saptamamucyate | aṣṭamaṃ tu mano jñeyaṃ buddhistu navamī smṛtā
महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी हैं; छठी चेतना है और सातवाँ आत्मा कहा जाता है; आठवाँ मन जानना चाहिए और नवीं बुद्धि कही गई है।
श्लोक 46 (12.337.46)
इन्द्रियाणि च पञ्चैव तमः सत्वं रजस्तथा । इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः ॥
indriyāṇi ca pañcaiva tamaḥ satvaṃ rajastathā | ityeṣa saptadaśako rāśiravyaktasaṃjñakaḥ
पाँच इन्द्रियाँ, तथा तम, सत्त्व और रज: इस प्रकार यह सत्रह तत्त्वों की राशि है, जिसे अव्यक्त कहा जाता है।
श्लोक 47 (12.337.47)
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि संहितः । चतुर्विशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गणः ॥
sarvairihendriyārthaiśca vyaktāvyaktairhi saṃhitaḥ | caturviśaka ityeṣa vyaktāvyaktamayo gaṇaḥ
यहाँ के सब इन्द्रिय-विषयों से, व्यक्त और अव्यक्त से, जुड़ा हुआ यह व्यक्त-अव्यक्त से बना चौबीस तत्त्वों का समूह है।
श्लोक 48 (12.337.48)
एतैः सर्वैः समायुक्तः पुमानित्यभिधीयते । त्रिवर्गं तु सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा ॥
etaiḥ sarvaiḥ samāyuktaḥ pumānityabhidhīyate | trivargaṃ tu sukhaṃ duḥkhaṃ jīvitaṃ maraṇaṃ tathā
इन सबसे युक्त होने पर ही पुरुष कहलाता है; और इसी प्रकार तीनों पुरुषार्थ, सुख, दुःख, जीवन और मरण भी हैं।
श्लोक 49 (12.337.49)
य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ । पारम्पर्येह बोद्धव्यं ज्ञानानां यच्च किंचन ॥
ya idaṃ veda tattvena sa veda prabhavāpyayau | pāramparyeha boddhavyaṃ jñānānāṃ yacca kiṃcana
जो इसे यथार्थ रूप से जानता है, वह उत्पत्ति और लय को जानता है, और ज्ञान की शाखाओं में गुरु-परम्परा से जो कुछ जानने योग्य है, उसे भी।
श्लोक 50 (12.337.50)
इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः । अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥
indriyairgṛhyate yadyattattadvyaktamiti sthitiḥ | avyaktamiti vijñeyaṃ liṅgagrāhyamatīndriyam
जो-जो इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है, वह व्यक्त है; अव्यक्त उसे जानना चाहिए जो अनुमान से ग्राह्य और इन्द्रियों से परे है।
श्लोक 51 (12.337.51)
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विततमात्मानं लोकांश्चात्मनि पश्यति ॥
indriyairniyatairdehī dhārābhiriva tarpyate | loke vitatamātmānaṃ lokāṃścātmani paśyati
संयत इन्द्रियों से देहधारी मानो धाराओं से तृप्त होता है; वह जगत् में फैले हुए आत्मा को और आत्मा में जगतों को देखता है।
श्लोक 52 (12.337.52)
परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥
parāvaradṛśaḥ śaktirjñānamūlā na naśyati | paśyataḥ sarvabhūtāni sarvāvasthāsu sarvadā
जो ऊँच और नीच दोनों को देखता है, उसकी ज्ञान पर आधारित शक्ति नष्ट नहीं होती, क्योंकि वह सब अवस्थाओं में, सदा, सब प्राणियों को देखता है।
श्लोक 53 (12.337.53)
ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । ज्ञानेन विविधान्क्लेशानतिवृत्तस्य मोहजान् ॥
brahmabhūtasya saṃyogo nāśubhenopapadyate | jñānena vividhānkleśānativṛttasya mohajān
जो ब्रह्मरूप हो चुका है और ज्ञान के द्वारा मोह से उत्पन्न अनेक क्लेशों के पार जा चुका है, उसका अशुभ से संयोग नहीं होता।
श्लोक 54 (12.337.54)
लोके बुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यते । अनादिनिधनज्ञं तमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥
loke buddhiprakāśena lokamārgo na riṣyate | anādinidhanajñaṃ tamātmani sthitamavyayam
जगत् में बुद्धि के प्रकाश से लोकमार्ग का नाश नहीं होता। उस आदि-अन्त से रहित, ज्ञाता, अपने भीतर स्थित, अविनाशी को
श्लोक 55 (12.337.55)
अकर्तारममूर्तं च भगवानाह तीर्थवित् । यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥
akartāramamūrtaṃ ca bhagavānāha tīrthavit | yo jantuḥ svakṛtaistaistaiḥ karmabhirnityaduḥkhitaḥ
तीर्थ को जानने वाले भगवान ने अकर्ता और निराकार कहा है। जो जीव अपने ही किए हुए तरह-तरह के कर्मों से सदा दुःखी रहता है,
श्लोक 56 (12.337.56)
स दुःखप्रतिघातार्थं हन्ति जन्तूननेकधा । ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु ॥
sa duḥkhapratighātārthaṃ hanti jantūnanekadhā | tataḥ karma samādatte punaranyannavaṃ bahu
वह उस दुःख को दूर करने के लिए अनेक प्रकार से प्राणियों को मारता है, और फिर बहुत-से नए-नए कर्म और अपना लेता है।
श्लोक 57 (12.337.57)
तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः । अजस्रमेव मोहान्धो दुःखेषु सुखसंज्ञितः ॥
tapyate'tha punastena bhuktvāpathyamivāturaḥ | ajasrameva mohāndho duḥkheṣu sukhasaṃjñitaḥ
फिर वह उन्हीं से फिर तपता है, जैसे अपथ्य खाकर रोगी; मोह से अन्धा होकर वह निरन्तर दुःखों में ही सुख मान बैठता है।
श्लोक 58 (12.337.58)
बध्यते मथ्यते चैव कर्मभिर्मन्थवत्सदा । ततो निबद्धः स्वां योनिं कर्मणामुदयादिह ॥
badhyate mathyate caiva karmabhirmanthavatsadā | tato nibaddhaḥ svāṃ yoniṃ karmaṇāmudayādiha
वह कर्मों से सदा मथानी की तरह बँधता और मथा जाता है; इस प्रकार बँधा हुआ वह कर्मों के फल आने पर यहाँ अपनी योनि में आता है,
श्लोक 59 (12.337.59)
परिभ्रमति संसारं चक्रवद्बहुवेदनः । स त्वं निर्वृत्तबन्धस्तु निवृत्तश्चापि कर्मतः ॥
paribhramati saṃsāraṃ cakravadbahuvedanaḥ | sa tvaṃ nirvṛttabandhastu nivṛttaścāpi karmataḥ
और बहुत वेदना सहता हुआ चक्र की तरह संसार में घूमता रहता है। पर तुम, जिनके बन्धन छूट गए हैं और जो कर्म से भी निवृत्त हो चुके हो,
श्लोक 60 (12.337.60)
सर्ववित्सर्वजित्सिद्धौ भव भावविवर्जितः । संयमेन नवं बन्धं निवर्त्य तपसो बलात् । संप्राप्ता बहवः सिद्धिमप्यबाधां सुखोदयाम् ॥
sarvavitsarvajitsiddhau bhava bhāvavivarjitaḥ | saṃyamena navaṃ bandhaṃ nivartya tapaso balāt | saṃprāptā bahavaḥ siddhimapyabādhāṃ sukhodayām
सर्वज्ञ और सर्वजयी होकर सिद्धि में स्थित हो जाओ, सब भावों से रहित होकर। संयम से नए बन्धन को रोककर और तप के बल से बहुत-से लोगों ने निर्बाध और सुख से भरी सिद्धि प्राप्त की है।