शान्ति पर्व · अध्याय 338
नारद का शुक को शोक पर विजय का उपदेश
नारद व्यासपुत्र शुक को शोक का नाश करने वाला उपदेश देना आरम्भ करते हैं। वे कहते हैं कि जो खो गया उसके लिए शोक करने से दुःख पर दुःख ही बढ़ता है; हर संचय का अन्त क्षय में, हर संयोग का वियोग में और जीवन का मृत्यु में होता है। मन के दुःख के लिए प्रज्ञा, शरीर के लिए औषध, सच्चे धन के रूप में सन्तोष, इन्द्रियों का संयम और आत्मा को ही सहायक बनाकर जीने का मार्ग वे बताते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (12.338.1)
अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शान्तिकरं शिवम् । निशम्य लभते बुद्धिं तां लब्ध्वा सुखमेधते ॥
aśokaṃ śokanāśārthaṃ śāstraṃ śāntikaraṃ śivam | niśamya labhate buddhiṃ tāṃ labdhvā sukhamedhate
यह शास्त्र शोक से रहित है, शोक का नाश करने वाला, शान्ति देने वाला और कल्याणकारी है। इसे सुनकर मनुष्य को बुद्धि प्राप्त होती है और उसे पाकर वह सुख से बढ़ता है।
श्लोक 2 (12.338.2)
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
śokasthānasahasrāṇi bhayasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam
शोक के हज़ारों और भय के सैकड़ों अवसर प्रतिदिन मूढ़ मनुष्य पर आ पड़ते हैं, पण्डित पर नहीं।
श्लोक 3 (12.338.3)
तस्मादनिष्टनाशार्थमितिहासं निबोध मे । तिष्ठते चेद्वशे बुद्धिर्लभते शोकनाशनम् ॥
tasmādaniṣṭanāśārthamitihāsaṃ nibodha me | tiṣṭhate cedvaśe buddhirlabhate śokanāśanam
इसलिए अनिष्ट के नाश के लिए मुझसे यह इतिहास सुनो। यदि बुद्धि अपने वश में रहे, तो वह शोक के नाश को प्राप्त करती है।
श्लोक 4 (12.338.4)
अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते स्वल्पबुद्ध्यः ॥
aniṣṭasaṃprayogācca viprayogātpriyasya ca | manuṣyā mānasairduḥkhairyujyante svalpabuddhyaḥ
अप्रिय के संयोग से और प्रिय के वियोग से अल्पबुद्धि मनुष्य मन के दुःखों में जकड़ जाते हैं।
श्लोक 5 (12.338.5)
द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिन्तयेत् । न तानाद्रियमाणस्य स्नेहबन्धः प्रमुच्यते ॥
dravyeṣu samatīteṣu ye guṇāstānna cintayet | na tānādriyamāṇasya snehabandhaḥ pramucyate
जो वस्तुएँ बीत चुकी हैं, उनके गुणों का चिन्तन न करे। जो उनका आदर नहीं करता, उसका स्नेह का बन्धन छूट जाता है।
श्लोक 6 (12.338.6)
दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्तते । अनिष्टवद्धितं पश्येत्तथा क्षिप्रं विरज्यते ॥
doṣadarśī bhavettatra yatra rāgaḥ pravartate | aniṣṭavaddhitaṃ paśyettathā kṣipraṃ virajyate
जहाँ आसक्ति उत्पन्न हो, वहाँ दोष देखे। जिसे वह प्रिय समझता है, उसे अप्रिय के समान देखे; तब वह शीघ्र ही विरक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (12.338.7)
नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अप्यभावेन युज्येत तच्चास्य न निवर्तते ॥
nārtho na dharmo na yaśo yo'tītamanuśocati | apyabhāvena yujyeta taccāsya na nivartate
जो बीती हुई बात पर शोक करता है, उसे न अर्थ मिलता है, न धर्म, न यश। उलटे उसे और हानि भी हो सकती है, और जिसका वह शोक करता है वह लौटता नहीं।
श्लोक 8 (12.338.8)
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि युज्यते ॥
guṇairbhūtāni yujyante viyujyante tathaiva ca | sarvāṇi naitadekasya śokasthānaṃ hi yujyate
प्राणी अपने गुणों और वस्तुओं से जुड़ते हैं और उसी प्रकार उनसे बिछुड़ते भी हैं। यह सब पर समान रूप से बीतता है, इसलिए किसी एक के लिए शोक का कारण नहीं ठहरता।
श्लोक 9 (12.338.9)
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ॥
mṛtaṃ vā yadi vā naṣṭaṃ yo'tītamanuśocati | duḥkhena labhate duḥkhaṃ dvāvanarthau prapadyate
जो मरे हुए या खोये हुए बीते पदार्थ पर शोक करता है, वह दुःख से दुःख पाता है और दो अनर्थों में पड़ता है।
श्लोक 10 (12.338.10)
नाश्रु कुर्वन्ति ये बुद्ध्या दृष्ट्वा लोकेषु संततिम् । सम्यक्प्रपश्यतः सर्वं नाश्रुकर्मोपपद्यते ॥
nāśru kurvanti ye buddhyā dṛṣṭvā lokeṣu saṃtatim | samyakprapaśyataḥ sarvaṃ nāśrukarmopapadyate
जो लोग बुद्धि से लोकों में प्राणियों की परम्परा को देखते हैं, वे रोते नहीं। जो सब कुछ सम्यक् रूप से देखता है, उससे आँसू बहाने का कर्म नहीं होता।
श्लोक 11 (12.338.11)
दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिन्तयेत् ॥
duḥkhopaghāte śārīre mānase cāpyupasthite | yasminna śakyate kartuṃ yatnastannānucintayet
शरीर या मन का दुःख आ पड़ने पर जिस बात में प्रयत्न से कुछ नहीं किया जा सकता, उसका चिन्तन न करे।
श्लोक 12 (12.338.12)
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् । चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥
bhaiṣajyametadduḥkhasya yadetannānucintayet | cintyamānaṃ hi na vyeti bhūyaścāpi pravardhate
दुःख की यही औषधि है कि उसका चिन्तन न किया जाए। चिन्तन करने से वह जाता नहीं, उलटे और बढ़ता है।
श्लोक 13 (12.338.13)
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञानमसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥
prajñayā mānasaṃ duḥkhaṃ hanyācchārīramauṣadhaiḥ | etadvijñānamasāmarthyaṃ na bālaiḥ samatāmiyāt
मन के दुःख को प्रज्ञा से और शरीर के दुःख को औषधियों से नष्ट करे। यही विवेक है और इसका अभाव असमर्थता है; मनुष्य अपने को बालकों के समान न बनाए।
श्लोक 14 (12.338.14)
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः । आरोग्यं प्रियसंसर्गो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥
anityaṃ yauvanaṃ rūpaṃ jīvitaṃ dravyasaṃcayaḥ | ārogyaṃ priyasaṃsargo gṛdhyettatra na paṇḍitaḥ
यौवन, रूप, जीवन, धन का संचय, आरोग्य और प्रियजनों का साथ, ये सब अनित्य हैं; पण्डित इनमें आसक्त नहीं होता।
श्लोक 15 (12.338.15)
न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥
na jānapadikaṃ duḥkhamekaḥ śocitumarhati | aśocanpratikurvīta yadi paśyedupakramam
जो दुःख सारे जनपद का है, उसके लिए अकेला मनुष्य शोक करे, यह उचित नहीं। यदि उपाय दिखाई दे तो शोक किए बिना उसका प्रतिकार करे।
श्लोक 16 (12.338.16)
सुखाद्बहुतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । स्निग्धत्वं चेन्द्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् ॥
sukhādbahutaraṃ duḥkhaṃ jīvite nātra saṃśayaḥ | snigdhatvaṃ cendriyārtheṣu mohānmaraṇamapriyam
जीवन में सुख से बहुत अधिक दुःख है, इसमें सन्देह नहीं। इन्द्रियों के विषयों में जो स्नेह है, वह मोह से है, और मोह के कारण ही मृत्यु अप्रिय लगती है।
श्लोक 17 (12.338.17)
परित्यजति यो दुःखं सुखं वाऽप्युभयं नरः । अभ्येति ब्रह्म सोत्यन्तं न तं शोचन्ति पण्डिताः ॥
parityajati yo duḥkhaṃ sukhaṃ vā'pyubhayaṃ naraḥ | abhyeti brahma sotyantaṃ na taṃ śocanti paṇḍitāḥ
जो मनुष्य दुःख और सुख दोनों को छोड़ देता है, वह अन्त में ब्रह्म को पा लेता है; पण्डित उसके लिए शोक नहीं करते।
श्लोक 18 (12.338.18)
त्यजन्ते दुःखमर्था हि पालनेन च ते सुखाः । दुःखेन चाधिगम्यन्ते नाशमेषां न चिन्तयेत् ॥
tyajante duḥkhamarthā hi pālanena ca te sukhāḥ | duḥkhena cādhigamyante nāśameṣāṃ na cintayet
धन दुःख के साथ छोड़ा जाता है, रक्षा करने से ही वह सुख देता है, और दुःख से ही पाया जाता है; इसलिए उसके नाश का चिन्तन न करे।
श्लोक 19 (12.338.19)
अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिकीं नराः । अतृप्ता यान्ति विध्वंसं संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥
anyāmanyāṃ dhanāvasthāṃ prāpya vaiśeṣikīṃ narāḥ | atṛptā yānti vidhvaṃsaṃ saṃtoṣaṃ yānti paṇḍitāḥ
धन की एक के बाद एक ऊँची अवस्था पाकर भी अतृप्त मनुष्य विनाश को प्राप्त होते हैं, जबकि पण्डित सन्तोष पा लेते हैं।
श्लोक 20 (12.338.20)
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥
sarve kṣayāntā nicayāḥ patanāntāḥ samucchrayāḥ | saṃyogā viprayogāntā maraṇāntaṃ hi jīvitam
सब संचयों का अन्त क्षय में है, सब ऊँचाइयों का पतन में, सब संयोगों का वियोग में और जीवन का मृत्यु में।
श्लोक 21 (12.338.21)
अन्तो नास्ति पिपासायास्तुष्टिस्तु परमं सुखम् । तस्मात्संतोषमेवेह धनं पश्यन्ति पण्डिताः ॥
anto nāsti pipāsāyāstuṣṭistu paramaṃ sukham | tasmātsaṃtoṣameveha dhanaṃ paśyanti paṇḍitāḥ
तृष्णा का अन्त नहीं है, पर सन्तोष परम सुख है। इसलिए पण्डित इस संसार में सन्तोष को ही धन मानते हैं।
श्लोक 22 (12.338.22)
निमेषमात्रमपि हि वयो गच्छन्न तिष्ठति । स्वशरीरेष्वनित्येषु नित्यं किमनुचिन्तयेत् ॥
nimeṣamātramapi hi vayo gacchanna tiṣṭhati | svaśarīreṣvanityeṣu nityaṃ kimanucintayet
पलक झपकने भर के लिए भी आयु ठहरती नहीं, चली जाती है। फिर अपने अनित्य शरीरों के विषय में सदा चिन्ता क्यों की जाए?
श्लोक 23 (12.338.23)
भूतेषु भावं संचिन्त्य ये बुद्ध्वा मनसः परम् । न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिं ॥
bhūteṣu bhāvaṃ saṃcintya ye buddhvā manasaḥ param | na śocanti gatādhvānaḥ paśyantaḥ paramāṃ gatiṃ
जिन्होंने प्राणियों के स्वरूप पर विचार करके मन से परे जो है उसे जान लिया है, वे शोक नहीं करते। उनका मार्ग पूरा हो चुका है और वे परम गति को देखते हैं।
श्लोक 24 (12.338.24)
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥
saṃcinvānakamevainaṃ kāmānāmavitṛptakam | vyāghraḥ paśumivāsādya mṛtyurādāya gacchati
जैसे बाघ पशु को पकड़कर ले जाता है, वैसे ही मृत्यु उस मनुष्य को पकड़कर ले जाती है जो संचय में लगा है और कामनाओं से कभी तृप्त नहीं होता।
श्लोक 25 (12.338.25)
तथाऽप्युपायं संपश्येद्दुःखस्य परिमोक्षणे । अशोचन्नारभेतैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥
tathā'pyupāyaṃ saṃpaśyedduḥkhasya parimokṣaṇe | aśocannārabhetaiva yuktaścāvyasanī bhavet
फिर भी दुःख से छूटने का उपाय खोजे; शोक किए बिना उसमें लग जाए और संयमी तथा व्यसन से रहित रहे।
श्लोक 26 (12.338.26)
शब्दे स्पर्शे च रूपे च गन्धेषु च रसेषु च । नोपभोगात्परं किंचिद्धनिनो वाऽधनस्य च ॥
śabde sparśe ca rūpe ca gandheṣu ca raseṣu ca | nopabhogātparaṃ kiṃciddhanino vā'dhanasya ca
शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध और रस में धनी या निर्धन, सबके लिए उपभोग से बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 27 (12.338.27)
प्राक्संप्रयोगाद्भूतानां नास्ति दुःखं परायणम् । विप्रयोगात्तु सर्वस्य न शोचेत्प्रकृतिस्थितः ॥
prāksaṃprayogādbhūtānāṃ nāsti duḥkhaṃ parāyaṇam | viprayogāttu sarvasya na śocetprakṛtisthitaḥ
वस्तुओं के संयोग से पहले प्राणियों के लिए दुःख अन्तिम आश्रय नहीं होता। इसलिए किसी भी वस्तु से वियोग होने पर अपने स्वभाव में स्थित मनुष्य शोक न करे।
श्लोक 28 (12.338.28)
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा । चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च विद्यया ॥
dhṛtyā śiśnodaraṃ rakṣetpāṇipādaṃ ca cakṣuṣā | cakṣuḥśrotre ca manasā mano vācaṃ ca vidyayā
धैर्य से उपस्थ और उदर की रक्षा करे, नेत्र से हाथ-पैरों की, मन से नेत्र और कानों की, तथा विद्या से मन और वाणी की।
श्लोक 29 (12.338.29)
प्रणयं प्रतिसंहृत्य सस्निग्धेष्वितरेषु च । विचरेदसमुन्नद्धः स सुखी स च पण्डितः ॥
praṇayaṃ pratisaṃhṛtya sasnigdheṣvitareṣu ca | vicaredasamunnaddhaḥ sa sukhī sa ca paṇḍitaḥ
प्रिय जनों से और दूसरों से भी अपना अनुराग समेटकर जो बिना अहंकार के विचरता है, वही सुखी है और वही पण्डित है।
श्लोक 30 (12.338.30)
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः । आत्मनैव सहायेन यश्चरेत्स सुखी भवेत् ॥
adhyātmaratirāsīno nirapekṣo nirāmiṣaḥ | ātmanaiva sahāyena yaścaretsa sukhī bhavet
जो आत्मा में रमता है, शान्त बैठा रहता है, निरपेक्ष और निर्लोभ है तथा आत्मा को ही सहायक बनाकर चलता है, वह सुखी होता है।