शान्ति पर्व · अध्याय 339
शुक का मोक्ष का निश्चय और कैलास के लिए प्रस्थान
नारद शुक को उपदेश देते रहते हैं: जब भाग्य पलट जाता है तो न प्रज्ञा रक्षा करती है, न पुरुषार्थ। सन्तान का जन्म, स्वास्थ्य और रोग, धन और निर्धनता, सब दिखाते हैं कि मनुष्य के हाथ में कितना कम है, और वैद्य तथा राजा भी रोग और बुढ़ापे के आगे हार जाते हैं। अन्त में वे शुक से कहते हैं कि धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, यहाँ तक कि जिससे त्यागा जाता है उसे भी त्याग दे। फिर भीष्म बताते हैं कि पहले निश्चय न कर पाने वाले शुक ने योग द्वारा परम गति पाने और सूर्य में प्रवेश करने का संकल्प किया। उन्होंने नारद से और अपने पिता व्यास से विदा ली, पिता के एक दिन और रुक जाने के आग्रह की उपेक्षा की और कैलास पर्वत की ओर चल पड़े।
नारद उवाच
श्लोक 1 (12.339.1)
सुखदुःखविपर्यासो यदा समनुपद्यते । नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नापि पौरुषम् ॥
sukhaduḥkhaviparyāso yadā samanupadyate | nainaṃ prajñā sunītaṃ vā trāyate nāpi pauruṣam
जब सुख-दुःख का उलटफेर आ पड़ता है, तब न प्रज्ञा, न सुनीति और न पुरुषार्थ ही मनुष्य की रक्षा कर पाता है।
श्लोक 2 (12.339.2)
स्वभावाद्यत्नमातिष्ठेद्यत्नवान्नावसीदति । जरामरणरोगेभ्यः प्रियमात्मानमुद्धरेत् ॥
svabhāvādyatnamātiṣṭhedyatnavānnāvasīdati | jarāmaraṇarogebhyaḥ priyamātmānamuddharet
स्वभाव से ही मनुष्य को प्रयत्न में लगना चाहिए; प्रयत्नशील मनुष्य नहीं डूबता। अपने प्रिय आत्मा को वह जरा, मृत्यु और रोगों से ऊपर उठाए।
श्लोक 3 (12.339.3)
रुजन्ति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः । सायका इव तीक्ष्णाग्राः प्रयुक्ता दृढधन्विभिः ॥
rujanti hi śarīrāṇi rogāḥ śārīramānasāḥ | sāyakā iva tīkṣṇāgrāḥ prayuktā dṛḍhadhanvibhiḥ
शारीरिक और मानसिक रोग शरीरों को वैसे ही बींधते हैं जैसे बलवान धनुर्धरों के छोड़े हुए तीखी नोक वाले बाण।
श्लोक 4 (12.339.4)
व्यथितस्य विधित्साभिस्त्रस्यतो जीवितैषिणः । अवशस्य विनाशाय शरीरमपकृष्यते ॥
vyathitasya vidhitsābhistrasyato jīvitaiṣiṇaḥ | avaśasya vināśāya śarīramapakṛṣyate
जो पीड़ित है, तृष्णाओं से प्रेरित है, काँपता है, जीवन की इच्छा करता है और विवश है, उसका शरीर विनाश की ओर खींचा जाता है।
श्लोक 5 (12.339.5)
स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानां रात्र्यहानि पुनः पुनः ॥
sravanti na nivartante srotāṃsi saritāmiva | āyurādāya martyānāṃ rātryahāni punaḥ punaḥ
नदियों की धाराएँ बहती जाती हैं, लौटती नहीं; वैसे ही रातें और दिन मरणधर्मा प्राणियों की आयु को लेकर बार-बार बीतते जाते हैं।
श्लोक 6 (12.339.6)
व्यत्ययो ह्ययमत्यन्तं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । जातान्मर्त्याञ्जरयति निमेषान्नावतिष्ठते ॥
vyatyayo hyayamatyantaṃ pakṣayoḥ śuklakṛṣṇayoḥ | jātānmartyāñjarayati nimeṣānnāvatiṣṭhate
शुक्ल और कृष्ण पक्षों का यह उलटफेर अत्यन्त निर्मम है; यह उत्पन्न हुए मनुष्यों को जीर्ण करता जाता है और पलक भर भी नहीं रुकता।
श्लोक 7 (12.339.7)
सुखदुःखानि भूतानामजरो जरयत्यसौ । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च ॥
sukhaduḥkhāni bhūtānāmajaro jarayatyasau | ādityo hyastamabhyeti punaḥ punarudeti ca
जो स्वयं कभी जीर्ण नहीं होता, वही प्राणियों के सुख-दुःखों को जीर्ण कर देता है: सूर्य अस्त होता है और बार-बार उदित होता है।
श्लोक 8 (12.339.8)
अदृष्टपूर्वानादाय भावानपरिशङ्कितान् । इष्टानिष्टान्मनुष्याणामस्तं गच्छन्ति रात्रयः ॥
adṛṣṭapūrvānādāya bhāvānapariśaṅkitān | iṣṭāniṣṭānmanuṣyāṇāmastaṃ gacchanti rātrayaḥ
मनुष्यों के लिए पहले कभी न देखे, अनसोचे, प्रिय और अप्रिय भावों को लाकर रातें अस्त हो जाती हैं।
श्लोक 9 (12.339.9)
योयदिच्छेद्यथाकाममयत्नाच्च तदाप्नुयात् । यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रियाफलम् ॥
yoyadicchedyathākāmamayatnācca tadāpnuyāt | yadi syānna parādhīnaṃ puruṣasya kriyāphalam
यदि मनुष्य के कर्म का फल दूसरे के अधीन न होता, तो जो जैसा चाहता, वैसा ही बिना प्रयत्न के पा लेता।
श्लोक 10 (12.339.10)
संयताश्च हि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः । दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः ॥
saṃyatāśca hi dakṣāśca matimantaśca mānavāḥ | dṛśyante niṣphalāḥ santaḥ prahīṇāḥ sarvakarmabhiḥ
संयमी, कुशल और बुद्धिमान मनुष्य भी फल से रहित दिखाई देते हैं; अपने सब कर्मों के फल से वंचित रह जाते हैं।
श्लोक 11 (12.339.11)
अपरे बालिशाः सन्तो निर्गुणाः पुरुषाधमाः । अशुभैरपि संयुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः ॥
apare bāliśāḥ santo nirguṇāḥ puruṣādhamāḥ | aśubhairapi saṃyuktā dṛśyante sarvakāminaḥ
दूसरे लोग मूर्ख, गुणहीन और अधम पुरुष होकर, अशुभ से युक्त रहते हुए भी, सब कामनाएँ पूरी करते दिखाई देते हैं।
श्लोक 12 (12.339.12)
भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः । वञ्चनायां च लोकस्य स सुखेष्वेव जीर्यते ॥
bhūtānāmaparaḥ kaściddhiṃsāyāṃ satatotthitaḥ | vañcanāyāṃ ca lokasya sa sukheṣveva jīryate
कोई दूसरा सदा प्राणियों की हिंसा और संसार को ठगने में लगा रहता है, फिर भी वह सुखों में ही बूढ़ा होता है।
श्लोक 13 (12.339.13)
अचेष्टमानमासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठते । कश्चित्कर्मानुसृत्यान्यो नाप्राप्यमधिगच्छति ॥
aceṣṭamānamāsīnaṃ śrīḥ kaṃcidupatiṣṭhate | kaścitkarmānusṛtyānyo nāprāpyamadhigacchati
बिना चेष्टा किए बैठे किसी मनुष्य के पास लक्ष्मी स्वयं आ जाती है; दूसरा कर्म के पीछे लगा रहता है, फिर भी जो उसके भाग्य में नहीं है उसे नहीं पाता।
श्लोक 14 (12.339.14)
अपराधं समाचक्ष्व पुरुषस्य स्वभावतः । शुक्रमन्यत्र संभूतं पुनरन्यत्र गच्छति ॥
aparādhaṃ samācakṣva puruṣasya svabhāvataḥ | śukramanyatra saṃbhūtaṃ punaranyatra gacchati
बताओ, मनुष्य का अपराध कहाँ है, जब यह उसके स्वभाव से है: बीज एक स्थान में बनता है और फिर दूसरे स्थान में जाता है।
श्लोक 15 (12.339.15)
तस्य योनौ प्रसक्तस्य गर्भो भवति वा न वा । आम्रपुष्पोपमा यस्य निर्वृत्तिरुपलभ्यते ॥
tasya yonau prasaktasya garbho bhavati vā na vā | āmrapuṣpopamā yasya nirvṛttirupalabhyate
योनि में प्रवृत्त उस पुरुष को गर्भ होता भी है और नहीं भी; उसकी सफलता आम के बौर के समान दिखाई देती है।
श्लोक 16 (12.339.16)
केषांचित्पुत्रकामानामनुसन्तानमिच्छताम् । सिद्धौ प्रयतमानानां न चाण्डमुपजायते ॥
keṣāṃcitputrakāmānāmanusantānamicchatām | siddhau prayatamānānāṃ na cāṇḍamupajāyate
कुछ लोग पुत्र चाहते हैं, वंश-परम्परा की इच्छा करते हैं और सिद्धि के लिए प्रयत्न करते हैं, फिर भी उनके यहाँ अण्ड तक उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 17 (12.339.17)
गर्भाच्चोद्विजमानानां क्रुद्धादाशीविषादिव । आयुष्माञ्जायते पुत्रः कथं प्रेतः पितेव ह ॥
garbhāccodvijamānānāṃ kruddhādāśīviṣādiva | āyuṣmāñjāyate putraḥ kathaṃ pretaḥ piteva ha
किन्तु कुपित विषधर सर्प के समान गर्भ से डरने वालों के यहाँ भी दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होता है। तब वह पिता के समान ही मरा हुआ कैसे हो जाता है?
श्लोक 18 (12.339.18)
देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः । दश मासान्परिधृता जायन्ते कुलपांसनाः ॥
devāniṣṭvā tapastaptvā kṛpaṇaiḥ putragṛddhibhiḥ | daśa māsānparidhṛtā jāyante kulapāṃsanāḥ
देवताओं का यज्ञ करके और तप करके पुत्र के लोभी दीन मनुष्य दस मास तक उन्हें धारण करते हैं, और वे कुल को कलंकित करने वाले होकर जन्मते हैं।
श्लोक 19 (12.339.19)
अपरे धनधान्यानि भोगांश्च पितृसंचितान् । विपुलानभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः ॥
apare dhanadhānyāni bhogāṃśca pitṛsaṃcitān | vipulānabhijāyante labdhāstaireva maṅgalaiḥ
दूसरे लोग पिता के संचित विपुल धन-धान्य और भोगों के बीच जन्म लेते हैं, जो उन्हीं मंगल उपायों से प्राप्त हुए होते हैं।
श्लोक 20 (12.339.20)
अन्योन्यं समभिप्रेत्य मैथुनस्य समागमे । उपद्रव इवाविष्टो योनिं गर्भः प्रपद्यते ॥
anyonyaṃ samabhipretya maithunasya samāgame | upadrava ivāviṣṭo yoniṃ garbhaḥ prapadyate
एक-दूसरे की इच्छा करके दोनों मैथुन में मिलते हैं, और गर्भ मानो किसी उपद्रव से ग्रस्त होकर योनि में प्रवेश करता है।
श्लोक 21 (12.339.21)
शीर्णं परशरीराणि च्छिन्नबीजं शरीरिणम् । प्राणिनं प्राणंसरोधे मांसश्लेष्मविचेष्टितम् ॥
śīrṇaṃ paraśarīrāṇi cchinnabījaṃ śarīriṇam | prāṇinaṃ prāṇaṃsarodhe māṃsaśleṣmaviceṣṭitam
दूसरे शरीरों में सूखा हुआ, बीज से कटा हुआ, देहधारी प्राणी, जो प्राण के रुकने पर मांस और कफ से हिलता-डुलता है,
श्लोक 22 (12.339.22)
निर्दग्धं परदेहेऽपि परदेहं चलाचलम् । विनश्यन्तं विनाशान्ते भावि नावमिवाहितम् ॥
nirdagdhaṃ paradehe'pi paradehaṃ calācalam | vinaśyantaṃ vināśānte bhāvi nāvamivāhitam
दूसरे शरीर में जला हुआ, स्वयं दूसरा चलायमान शरीर, नष्ट होता हुआ और विनाश के अन्त में होने वाला, मानो नाव पर रखी हुई नाव हो।
श्लोक 23 (12.339.23)
सङ्गत्या जठरे न्यस्तं रेतोबिन्दुमचेतनम् । केन यत्नेन जीवन्तं गर्भं त्वमिह पश्यसि ॥
saṅgatyā jaṭhare nyastaṃ retobindumacetanam | kena yatnena jīvantaṃ garbhaṃ tvamiha paśyasi
संयोग से उदर में रखा हुआ चेतनाहीन वीर्य-बिन्दु; तुम किस प्रयत्न से यहाँ गर्भ को जीवित देखते हो?
श्लोक 24 (12.339.24)
अन्नपानानि जीर्यन्ते यत्र भक्षाश्च भक्षिताः । तस्मिन्नेवोदरे गर्भः किं नान्नमिव जीर्यते ॥
annapānāni jīryante yatra bhakṣāśca bhakṣitāḥ | tasminnevodare garbhaḥ kiṃ nānnamiva jīryate
जिस उदर में अन्न-पान और खाये हुए सब भोज्य पदार्थ पचते हैं, उसी में गर्भ अन्न के समान क्यों नहीं पच जाता?
श्लोक 25 (12.339.25)
गर्भे मूत्रपुरीषाणां स्वभावनियता गतिः । धारणे वा विसर्गे वा न कर्ता विद्यतेऽवशः ॥
garbhe mūtrapurīṣāṇāṃ svabhāvaniyatā gatiḥ | dhāraṇe vā visarge vā na kartā vidyate'vaśaḥ
गर्भ में मल-मूत्र की गति स्वभाव से नियत है; रोकने या त्यागने में कोई कर्ता नहीं पाया जाता, क्योंकि जीव अपने वश में नहीं है।
श्लोक 26 (12.339.26)
स्रवन्ति ह्युदराद्गर्भा जायमानास्तथा परे । आगमेन तथाऽन्येषां विनाश उपपद्यते ॥
sravanti hyudarādgarbhā jāyamānāstathā pare | āgamena tathā'nyeṣāṃ vināśa upapadyate
कितने ही गर्भ उदर से गिर जाते हैं, कुछ जन्म लेते समय नष्ट हो जाते हैं, और औरों का विनाश उनके आते ही हो जाता है।
श्लोक 27 (12.339.27)
एतस्माद्योनिसंबन्धाद्यो जीवः परिमुच्यते । प्रजां च लभते कांचित्पुनर्द्वन्द्वेषु सज्जति ॥
etasmādyonisaṃbandhādyo jīvaḥ parimucyate | prajāṃ ca labhate kāṃcitpunardvandveṣu sajjati
इस योनि-सम्बन्ध से जो जीव छूट जाता है, वह कोई सन्तान पाता है और फिर द्वन्द्वों में फँस जाता है।
श्लोक 28 (12.339.28)
स तस्य सहजातस्य सप्तमीं नवमीं दशाम् । प्राप्नुवन्ति ततः पञ्च न भवन्ति शतायुषः ॥
sa tasya sahajātasya saptamīṃ navamīṃ daśām | prāpnuvanti tataḥ pañca na bhavanti śatāyuṣaḥ
उसके साथ जन्मे हुए लोग जीवन की सातवीं, नौवीं और दसवीं अवस्था तक पहुँचते हैं; उसके बाद पाँच बचते हैं, और कोई भी सौ वर्ष की आयु वाला नहीं होता।
श्लोक 29 (12.339.29)
नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगाः स्युर्नात्र संशयः । व्याधिभिश्च विमथ्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव ॥
nābhyutthāne manuṣyāṇāṃ yogāḥ syurnātra saṃśayaḥ | vyādhibhiśca vimathyante vyādhaiḥ kṣudramṛgā iva
पुरुषार्थ में मनुष्यों की सामर्थ्य काम नहीं देती, इसमें सन्देह नहीं; रोग उन्हें वैसे ही मथ डालते हैं जैसे व्याध छोटे मृगों को।
श्लोक 30 (12.339.30)
व्याधिभिर्भक्ष्यमाणानां त्यजतां विपुलं धनम् । वेदनां नापकर्षन्ति यतमानाश्चिकित्सकाः ॥
vyādhibhirbhakṣyamāṇānāṃ tyajatāṃ vipulaṃ dhanam | vedanāṃ nāpakarṣanti yatamānāścikitsakāḥ
रोगों से खाए जाते हुए, विपुल धन लुटाने वाले मनुष्यों की वेदना को चिकित्सक प्रयत्न करने पर भी दूर नहीं कर पाते।
श्लोक 31 (12.339.31)
ते चापि निपुणा वैद्याः कुशलाः संभृतौषधाः । व्याधिभिः परिकृष्यन्ते मृगा व्याधैरिवार्दिताः ॥
te cāpi nipuṇā vaidyāḥ kuśalāḥ saṃbhṛtauṣadhāḥ | vyādhibhiḥ parikṛṣyante mṛgā vyādhairivārditāḥ
वे निपुण और कुशल वैद्य भी, जिन्होंने औषधियाँ जुटा रखी हैं, रोगों द्वारा वैसे ही खींचे जाते हैं जैसे व्याधों से सताए हुए मृग।
श्लोक 32 (12.339.32)
ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पीषि विविधानि च । दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः ॥
te pibantaḥ kaṣāyāṃśca sarpīṣi vividhāni ca | dṛśyante jarayā bhagnā nagā nāgairivottamaiḥ
काढ़े और अनेक प्रकार के घृत पीते हुए भी वे बुढ़ापे से वैसे ही टूटे दिखाई देते हैं जैसे श्रेष्ठ हाथियों से वृक्ष।
श्लोक 33 (12.339.33)
के वा भुवि चिकित्सन्ते रोगार्तान्मृगपक्षिणः । श्वापदानि दरिद्रांश्च प्रायो नार्ता भवन्ति ते ॥
ke vā bhuvi cikitsante rogārtānmṛgapakṣiṇaḥ | śvāpadāni daridrāṃśca prāyo nārtā bhavanti te
पृथ्वी पर रोग से पीड़ित मृगों और पक्षियों की, हिंस्र पशुओं की और निर्धनों की चिकित्सा कौन करता है? फिर भी प्रायः वे पीड़ित नहीं होते।
श्लोक 34 (12.339.34)
पौरानपि दुराधर्षान्नृपतीनुग्रतेजसः । आक्रम्य खादन्ते रोगाः पशून्पशुपचा इव ॥
paurānapi durādharṣānnṛpatīnugratejasaḥ | ākramya khādante rogāḥ paśūnpaśupacā iva
दुर्धर्ष नगरवासियों और उग्र तेज वाले राजाओं पर भी रोग टूट पड़कर उन्हें वैसे ही खा जाते हैं जैसे कसाई पशुओं को।
श्लोक 35 (12.339.35)
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् । स्रोतसा सहसा क्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा ॥
iti lokamanākrandaṃ mohaśokapariplutam | srotasā sahasā kṣiptaṃ hriyamāṇaṃ balīyasā
इस प्रकार यह संसार वेदना से मूढ़ होकर चीख भी नहीं पाता; मोह और शोक में डूबा हुआ वह प्रबल धारा द्वारा अचानक बहा लिया जाता है।
श्लोक 36 (12.339.36)
न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसा तथा । स्वभावमतिवर्तन्ते ये नियुक्ताः शरीरिणः ॥
na dhanena na rājyena nogreṇa tapasā tathā | svabhāvamativartante ye niyuktāḥ śarīriṇaḥ
जो शरीरधारी इस प्रकार नियुक्त हैं, वे न धन से, न राज्य से, न उग्र तप से अपने स्वभाव का अतिक्रमण कर पाते हैं।
श्लोक 37 (12.339.37)
न म्रियेरन्न जीर्येरन्सर्वे स्युः सर्वकामिनः । नाप्रियं प्रतिपश्येयुरुत्थानस्य फले सति ॥
na mriyeranna jīryeransarve syuḥ sarvakāminaḥ | nāpriyaṃ pratipaśyeyurutthānasya phale sati
यदि उद्योग का फल निश्चित होता, तो कोई न मरता, कोई जीर्ण न होता, सब सब कुछ चाहे हुए पा लेते और कोई अप्रिय का सामना न करता।
श्लोक 38 (12.339.38)
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो भवितुमीहते । यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ॥
uparyupari lokasya sarvo bhavitumīhate | yatate ca yathāśakti na ca tadvartate tathā
संसार में सब ऊपर से ऊपर उठना चाहते हैं और यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं, परन्तु वैसा होता नहीं।
श्लोक 39 (12.339.39)
ऐश्वर्यमदमत्तांश्च मत्तान्मद्यमदेन च । अप्रमत्ताश्च शूराश्च विक्रान्ताः पर्युपासते ॥
aiśvaryamadamattāṃśca mattānmadyamadena ca | apramattāśca śūrāśca vikrāntāḥ paryupāsate
ऐश्वर्य के मद से मतवाले और मदिरा के मद से मत्त लोगों की सेवा सावधान, शूर और पराक्रमी लोग करते हैं।
श्लोक 40 (12.339.40)
क्लेशाः प्रतिनिवर्तन्ते केषांचिदसमीक्षिताः । स्वंस्वं न पुनरन्येषां न किंचिदधिगम्यते ॥
kleśāḥ pratinivartante keṣāṃcidasamīkṣitāḥ | svaṃsvaṃ na punaranyeṣāṃ na kiṃcidadhigamyate
किन्हीं के क्लेश बिना सोचे ही लौट जाते हैं; पर औरों को अपना भी कुछ नहीं मिलता, और कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 41 (12.339.41)
महच्च फलवैपम्यं दृश्यते कर्मसिद्धिषु । वहन्ति शिविकामन्ये यान्त्यन्ये शिविकागताः ॥
mahacca phalavaipamyaṃ dṛśyate karmasiddhiṣu | vahanti śivikāmanye yāntyanye śivikāgatāḥ
कर्मों की सिद्धि में फल की बड़ी विषमता दिखाई देती है: कुछ लोग पालकी ढोते हैं और कुछ पालकी में बैठकर जाते हैं।
श्लोक 42 (12.339.42)
सर्वेषामृद्धिकामानामन्ये रथपुरःसराः । मनुजाश्च गतस्त्रीकाः शतशो विविधाः स्त्रियः ॥
sarveṣāmṛddhikāmānāmanye rathapuraḥsarāḥ | manujāśca gatastrīkāḥ śataśo vividhāḥ striyaḥ
सब समृद्धि चाहने वालों में किन्हीं के आगे-आगे रथ चलते हैं; दूसरे स्त्री-रहित पुरुष हैं, और सैकड़ों तरह की स्त्रियाँ भी हैं।
श्लोक 43 (12.339.43)
द्वन्द्वारामेषु भूतेषु गच्छन्त्येकैकशो नराः । इदमन्यत्परं पश्य माऽत्र मोहं करिष्यसि ॥
dvandvārāmeṣu bhūteṣu gacchantyekaikaśo narāḥ | idamanyatparaṃ paśya mā'tra mohaṃ kariṣyasi
द्वन्द्वों में रमने वाले प्राणियों में लोग एक-एक करके जाते हैं। इस दूसरी, परम बात को देखो और इस विषय में मोह मत करो।
श्लोक 44 (12.339.44)
त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज ॥
tyaja dharmamadharmaṃ ca ubhe satyānṛte tyaja | ubhe satyānṛte tyaktvā yena tyajasi taṃ tyaja
धर्म और अधर्म को त्याग दो; सत्य और असत्य दोनों को त्याग दो। सत्य और असत्य दोनों को त्यागकर उसे भी त्याग दो जिससे तुम त्यागते हो।
श्लोक 45 (12.339.45)
एतत्ते परमं गुह्यमाख्यातमृषिसत्तम । येन देवाः परित्यज्य मर्त्यलोकं दिवं गताः ॥
etatte paramaṃ guhyamākhyātamṛṣisattama | yena devāḥ parityajya martyalokaṃ divaṃ gatāḥ
हे ऋषिश्रेष्ठ, यही वह परम गुह्य बात है जो मैंने तुम्हें बताई, जिससे देवता मर्त्यलोक को छोड़कर स्वर्ग को गए।
भीष्म उवाच
श्लोक 46 (12.339.46)
नारदस्य वचः श्रुत्वा शुकः परमबुद्धिमान् । संचिन्त्य मनसा धीरो निश्चयं नाध्यगच्छत ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā śukaḥ paramabuddhimān | saṃcintya manasā dhīro niścayaṃ nādhyagacchata
नारद के वचन सुनकर परम बुद्धिमान और धीर शुक ने मन में विचार किया, पर वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके।
श्लोक 47 (12.339.47)
पुत्रदारैर्महान्क्लेशो विद्याम्नाये महाञ्छ्रमः । किंनु स्याच्छाश्वतं स्थानमल्पक्लेशं महोदयम् ॥
putradārairmahānkleśo vidyāmnāye mahāñchramaḥ | kiṃnu syācchāśvataṃ sthānamalpakleśaṃ mahodayam
पुत्र और पत्नी के साथ बड़ा क्लेश है, और विद्या के अध्ययन में बड़ा श्रम है। ऐसा शाश्वत स्थान कौन-सा हो सकता है जिसमें क्लेश थोड़ा और फल बड़ा हो?
श्लोक 48 (12.339.48)
ततो मुहूर्तं संचिन्त्य निश्चितां गतिमात्मनः । परावरज्ञो धर्मस्य परां नैःश्रेयसीं गतिम् ॥
tato muhūrtaṃ saṃcintya niścitāṃ gatimātmanaḥ | parāvarajño dharmasya parāṃ naiḥśreyasīṃ gatim
तब क्षण भर विचार करके, धर्म के ऊँच-नीच को जानने वाले शुक ने अपने लिए निश्चित गति, मोक्ष के परम मार्ग, पर मन लगाया।
श्लोक 49 (12.339.49)
कथं त्वहमसंश्लिष्टो गच्छेयं गतिमुत्तमाम् । नावर्तेयं यथा भूयो योनिसंसारसागरे ॥
kathaṃ tvahamasaṃśliṣṭo gaccheyaṃ gatimuttamām | nāvarteyaṃ yathā bhūyo yonisaṃsārasāgare
मैं बिना आसक्ति के उस उत्तम गति को कैसे प्राप्त करूँ, जिससे फिर कभी जन्म और संसार के सागर में न लौटूँ?
श्लोक 50 (12.339.50)
परं भावं हि काङ्क्षामि यत्र नावर्तते पुनः । सर्वसङ्गान्परित्यज्य निश्चितो मनसा गतिम् ॥
paraṃ bhāvaṃ hi kāṅkṣāmi yatra nāvartate punaḥ | sarvasaṅgānparityajya niścito manasā gatim
मैं उस परम भाव की इच्छा करता हूँ जहाँ से फिर लौटना नहीं होता; सब आसक्तियाँ छोड़कर मैंने मन से उसी गति का निश्चय किया है।
श्लोक 51 (12.339.51)
तत्र यास्यामि यत्रात्मा शर्म मेऽधिगमिष्यति । अक्षयश्चाव्ययश्चैव यत्र स्थास्यामि शाश्वतः ॥
tatra yāsyāmi yatrātmā śarma me'dhigamiṣyati | akṣayaścāvyayaścaiva yatra sthāsyāmi śāśvataḥ
मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी, जहाँ मैं अक्षय, अविनाशी और शाश्वत होकर रहूँगा।
श्लोक 52 (12.339.52)
न तु योगमृते शक्त्या प्राप्नुयां परमां गतिम् । अनुबन्धो विमुक्तस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ॥
na tu yogamṛte śaktyā prāpnuyāṃ paramāṃ gatim | anubandho vimuktasya karmabhirnopapadyate
किन्तु योग के बिना मैं अपनी शक्ति मात्र से परम गति को नहीं पा सकता; और मुक्त पुरुष के लिए कर्मों का बन्धन फिर नहीं बनता।
श्लोक 53 (12.339.53)
यस्माद्योगं समास्थाय त्यक्त्वा गृहकलेवरम् । वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम् ॥
yasmādyogaṃ samāsthāya tyaktvā gṛhakalevaram | vāyubhūtaḥ pravekṣyāmi tejorāśiṃ divākaram
इसलिए योग का आश्रय लेकर और इस गृहरूप शरीर को छोड़कर मैं वायु होकर तेज की राशि दिवाकर सूर्य में प्रवेश करूँगा।
श्लोक 54 (12.339.54)
न ह्येष क्षयतां याति सोमः सुरगणैर्यथा । कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति ॥
na hyeṣa kṣayatāṃ yāti somaḥ suragaṇairyathā | kampitaḥ patate bhūmiṃ punaścaivādhirohati
यह चन्द्रमा देवताओं के समूहों के समान सर्वथा क्षय को नहीं प्राप्त होता; वह काँपकर भूमि पर गिरता है और फिर ऊपर चढ़ता है।
श्लोक 55 (12.339.55)
क्षीयते हि सदा सोमः पुनश्चैवाभिपूर्यते । नेच्छाम्येवं विदित्वैते ह्रासवृद्धी पुनः पुनः ॥
kṣīyate hi sadā somaḥ punaścaivābhipūryate | necchāmyevaṃ viditvaite hrāsavṛddhī punaḥ punaḥ
चन्द्रमा सदा क्षीण होता है और फिर पूर्ण होता है। इस घटने-बढ़ने को बार-बार जानकर मैं इसे नहीं चाहता।
श्लोक 56 (12.339.56)
रविस्तु संतापयते लोकान्रश्मिभिरुल्बणैः । सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षयमण्डलः ॥
ravistu saṃtāpayate lokānraśmibhirulbaṇaiḥ | sarvatasteja ādatte nityamakṣayamaṇḍalaḥ
परन्तु सूर्य प्रखर किरणों से लोकों को तपाता है; वह सब ओर से तेज ग्रहण करता है और उसका मण्डल सदा अक्षय रहता है।
श्लोक 57 (12.339.57)
अतो मे रोचते गन्तुमादित्यं दीप्ततेजसम् । अत्र वत्स्यामि दुर्धर्षो निःसङ्गेनान्तरात्मना ॥
ato me rocate gantumādityaṃ dīptatejasam | atra vatsyāmi durdharṣo niḥsaṅgenāntarātmanā
इसलिए मुझे दीप्त तेज वाले सूर्य के पास जाना अच्छा लगता है। वहाँ मैं अजेय रहकर, आसक्ति से रहित अन्तरात्मा के साथ निवास करूँगा।
श्लोक 58 (12.339.58)
सूर्यस्य सदने चाहं निक्षिप्येदं कलेवरम् । ऋषिभिः सह वत्स्यामि सौरं तेजोऽतिदुःसहं ॥
sūryasya sadane cāhaṃ nikṣipyedaṃ kalevaram | ṛṣibhiḥ saha vatsyāmi sauraṃ tejo'tiduḥsahaṃ
सूर्य के धाम में इस शरीर को रखकर मैं ऋषियों के साथ उस अत्यन्त दुःसह सौर तेज में निवास करूँगा।
श्लोक 59 (12.339.59)
आपृच्छामि नगान्नागान्गिरीनुर्वी दिशो दश । देवदानवगन्धर्वान्पिशाचोरगराक्षसान् ॥
āpṛcchāmi nagānnāgāngirīnurvī diśo daśa | devadānavagandharvānpiśācoragarākṣasān
मैं वृक्षों, नागों, पर्वतों, पृथ्वी, दसों दिशाओं तथा देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, पिशाचों, उरगों और राक्षसों से विदा माँगता हूँ।
श्लोक 60 (12.339.60)
लोकेषु सर्वभूतानि प्रवेक्ष्यामि न संशयः । पश्यन्तु योगवीर्यं मे सर्वे देवाः सहर्षिभिः ॥
lokeṣu sarvabhūtāni pravekṣyāmi na saṃśayaḥ | paśyantu yogavīryaṃ me sarve devāḥ saharṣibhiḥ
मैं लोकों में सब प्राणियों में प्रवेश करूँगा, इसमें सन्देह नहीं। सब देवता ऋषियों सहित मेरे योग का बल देखें।
श्लोक 61 (12.339.61)
अथानुज्ञाप्य तमृषिं नारदं लोकविश्रुतम् । तस्मादनुज्ञां संप्राप्य जगाम पितरं प्रति ॥
athānujñāpya tamṛṣiṃ nāradaṃ lokaviśrutam | tasmādanujñāṃ saṃprāpya jagāma pitaraṃ prati
तब लोकविख्यात ऋषि नारद से विदा माँगकर और उनकी अनुमति पाकर वे अपने पिता के पास गए।
श्लोक 62 (12.339.62)
सोऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं मुनिम् । शुकः प्रदक्षिणं कृत्वा कृष्णमापृष्टवान्मुनिम् ॥
so'bhivādya mahātmānaṃ kṛṣṇadvaipāyanaṃ munim | śukaḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā kṛṣṇamāpṛṣṭavānmunim
उन्होंने महात्मा मुनि कृष्ण द्वैपायन को प्रणाम किया, और शुक ने उनकी प्रदक्षिणा करके मुनि कृष्ण से विदा माँगी।
श्लोक 63 (12.339.63)
श्रुत्वा चर्षिस्तद्वचनं शुकस्य । प्रीतो महात्मा पुनराह चैनम् । भोभो पुत्र स्थीयतां तावदद्य । यावच्चक्षुः प्रीणयामि त्वदर्थे ॥
śrutvā carṣistadvacanaṃ śukasya | prīto mahātmā punarāha cainam | bhobho putra sthīyatāṃ tāvadadya | yāvaccakṣuḥ prīṇayāmi tvadarthe
शुक की वह बात सुनकर महात्मा ऋषि प्रसन्न हुए और उनसे फिर बोले: "पुत्र, आज यहीं ठहरो, जब तक मैं तुम्हें देखकर अपनी आँखें तृप्त न कर लूँ।"
श्लोक 64 (12.339.64)
निरपेक्षः शुको भूत्वा निःस्नेहो मुक्तसंशयः । मोक्षमेवानुसंचिन्त्य गमनाय मनो दधे ॥
nirapekṣaḥ śuko bhūtvā niḥsneho muktasaṃśayaḥ | mokṣamevānusaṃcintya gamanāya mano dadhe
शुक निरपेक्ष, स्नेहरहित और संशयमुक्त हो गए; मोक्ष का ही चिन्तन करके उन्होंने प्रस्थान का मन बना लिया।
श्लोक 65 (12.339.65)
पितरं स परित्यज्य जगाम मुनिसत्तमः । कैलासपृष्ठं विपुलं सिद्धसङ्घनिषेवितम् ॥
pitaraṃ sa parityajya jagāma munisattamaḥ | kailāsapṛṣṭhaṃ vipulaṃ siddhasaṅghaniṣevitam
पिता को छोड़कर वे मुनिश्रेष्ठ सिद्धों के समूहों से सेवित कैलास के विशाल शिखर पर चले गए।