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शान्ति पर्व · अध्याय 340

शुक का आकाश में उड़ान भरना

कैलास के एक शिखर पर व्यासपुत्र शुक योग में बैठते हैं, अपने को सब आसक्तियों से मुक्त देखते हैं और हँस पड़ते हैं। वे नारद से कहते हैं कि मार्ग दिख गया है, उनकी अनुमति पाकर गरुड़ के समान तेज से चमकते हुए आकाश में उठ जाते हैं। देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ और ऋषि विस्मय से देखते हैं; उर्वशी और पूर्वचित्ति उनकी पितृभक्ति पर आश्चर्य करती हैं। शुक सब दिशाओं से कहते हैं कि यदि व्यास उनका नाम पुकारते हुए पीछे आएँ तो वे उन्हें उत्तर दें, और दिशाएँ, समुद्र, नदियाँ तथा पर्वत ऐसा ही करने का वचन देते हैं।

अध्याय 339अध्याय-सूचीअध्याय 341

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.340.1)

गिरिशृङ्गं समारुह्य सुतो व्यासस्य भारत । समे देशे विविक्ते स निःशलाक उपाविशत् ॥

giriśṛṅgaṃ samāruhya suto vyāsasya bhārata | same deśe vivikte sa niḥśalāka upāviśat

हे भारत, व्यास के पुत्र पर्वत के शिखर पर चढ़कर एक समतल, एकान्त और काँटे-तिनकों से रहित स्थान पर बैठ गए।

श्लोक 2 (12.340.2)

धारयामास चात्मानं यथाशास्त्रं यथाविधि । पादप्रभृतिगात्रेषु क्रमेण क्रमयोगवित् ॥

dhārayāmāsa cātmānaṃ yathāśāstraṃ yathāvidhi | pādaprabhṛtigātreṣu krameṇa kramayogavit

योग के क्रम को जानने वाले उन्होंने शास्त्र और विधि के अनुसार अपने को स्थिर किया और पैरों से आरम्भ करके एक-एक अंग में क्रम से मन को धारण किया।

श्लोक 3 (12.340.3)

ततः स प्राङ्भुखो विद्वानादित्ये नाचिरोदिते । पाणिपादं समाधाय विनीतवदुपाविशत् ॥

tataḥ sa prāṅbhukho vidvānāditye nācirodite | pāṇipādaṃ samādhāya vinītavadupāviśat

तब उन विद्वान ने, सूर्य को उदित हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ था, पूर्व की ओर मुख करके हाथ-पैर समेटे और विनीत शिष्य की भाँति बैठ गए।

श्लोक 4 (12.340.4)

न तत्र पक्षिसंपातो न शब्दो नापि दर्शनम् । यत्र वैयासकिर्धीमान्योक्तुं समुपचक्रमे ॥

na tatra pakṣisaṃpāto na śabdo nāpi darśanam | yatra vaiyāsakirdhīmānyoktuṃ samupacakrame

जहाँ व्यास के बुद्धिमान पुत्र ने योग साधना आरम्भ की, वहाँ न पक्षियों का उतरना था, न कोई शब्द, न कोई दृश्य।

श्लोक 5 (12.340.5)

स ददर्श तदाऽऽत्मानं सर्वसङ्गविनिःसृतम् । प्रजहास ततो हासं शुकः संप्रेक्ष्य तत्परम् ॥

sa dadarśa tadā''tmānaṃ sarvasaṅgaviniḥsṛtam | prajahāsa tato hāsaṃ śukaḥ saṃprekṣya tatparam

उन्होंने अपने आपको सब आसक्तियों से पूरी तरह मुक्त देखा, और शुक उस परम तत्त्व को देखकर तब हँस पड़े।

श्लोक 6 (12.340.6)

स पुनर्योगमास्थाय मोक्षमार्गोपलब्धये । महायोगेश्वरो भूत्वा सोऽत्यक्रामद्विहायसम् ॥

sa punaryogamāsthāya mokṣamārgopalabdhaye | mahāyogeśvaro bhūtvā so'tyakrāmadvihāyasam

मोक्ष का मार्ग पाने के लिए उन्होंने फिर योग का आश्रय लिया और महायोगेश्वर होकर आकाश में ऊपर उठ गए।

श्लोक 7 (12.340.7)

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा देवर्षिं नारदं ततः । निवेदयामास च तं स्वं योगं परमर्षये ॥

tataḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā devarṣiṃ nāradaṃ tataḥ | nivedayāmāsa ca taṃ svaṃ yogaṃ paramarṣaye

तब उन्होंने देवर्षि नारद की प्रदक्षिणा की और उन परमर्षि को अपने योग का निवेदन किया।

शुक उवाच

श्लोक 8 (12.340.8)

दृष्टो मार्गः प्रवृत्तोस्मि स्वस्ति तेऽस्तु तपोधन । त्वत्प्रसादाद्गमिष्यामि गतिमिष्टां महाद्युते ॥

dṛṣṭo mārgaḥ pravṛttosmi svasti te'stu tapodhana | tvatprasādādgamiṣyāmi gatimiṣṭāṃ mahādyute

"मार्ग मैंने देख लिया है, मैं चल पड़ा हूँ। हे तपोधन, आपका कल्याण हो। हे महातेजस्वी, आपकी कृपा से मैं अपनी इच्छित गति को प्राप्त करूँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.340.9)

नारदेनाभ्यनुज्ञातः शुको द्वैपायनात्मजः । अभिवाद्य पुनर्योगमास्थायाकाशमाविशत् ॥

nāradenābhyanujñātaḥ śuko dvaipāyanātmajaḥ | abhivādya punaryogamāsthāyākāśamāviśat

नारद की आज्ञा पाकर द्वैपायन के पुत्र शुक ने उन्हें प्रणाम किया और फिर योग का आश्रय लेकर आकाश में प्रवेश किया।

श्लोक 10 (12.340.10)

कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा । अन्तरिक्षचरः श्रीमान्व्यासपुत्रः सुनिश्चितः ॥

kailāsapṛṣṭhādutpatya sa papāta divaṃ tadā | antarikṣacaraḥ śrīmānvyāsaputraḥ suniścitaḥ

कैलास के शिखर से उछलकर वे आकाश में उड़ चले; अन्तरिक्ष में विचरते हुए श्रीमान् व्यासपुत्र पूर्ण निश्चय वाले थे।

श्लोक 11 (12.340.11)

तमुद्यन्तं द्विजश्रेष्ठं वैनतेयसमद्युतिम् । ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ॥

tamudyantaṃ dvijaśreṣṭhaṃ vainateyasamadyutim | dadṛśuḥ sarvabhūtāni manomārutaraṃhasam

ऊपर उठते हुए उन द्विजश्रेष्ठ को, जो गरुड़ के समान दीप्तिमान और मन तथा वायु के समान वेगवान थे, सब प्राणियों ने देखा।

श्लोक 12 (12.340.12)

व्यवसायेन लोकांस्त्रीन्सर्वान्सोऽथ विचिन्तयन् । आस्थितो दिव्यमध्वानं पावकार्कसमप्रभः ॥

vyavasāyena lokāṃstrīnsarvānso'tha vicintayan | āsthito divyamadhvānaṃ pāvakārkasamaprabhaḥ

दृढ़ निश्चय से तीनों लोकों का चिन्तन करते हुए वे अग्नि और सूर्य के समान प्रभा वाले होकर दिव्य मार्ग पर चल पड़े।

श्लोक 13 (12.340.13)

तमेकमनसं यान्तमव्यग्रमकुतोभयम् । ददृशुः सर्वभूतानि जङ्गमानीतराणि च ॥

tamekamanasaṃ yāntamavyagramakutobhayam | dadṛśuḥ sarvabhūtāni jaṅgamānītarāṇi ca

एकाग्र मन से, निश्चिन्त और निर्भय होकर जाते हुए उन्हें चर और अचर सब प्राणियों ने देखा।

श्लोक 14 (12.340.14)

यथाशक्ति यथान्यायं पूजयांचक्रिरे तदा । पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमलंचक्रुर्दिवौकसः ॥

yathāśakti yathānyāyaṃ pūjayāṃcakrire tadā | puṣpavarṣaiśca divyaistamalaṃcakrurdivaukasaḥ

तब उन्होंने यथाशक्ति और यथोचित रूप से उनकी पूजा की, और देवताओं ने दिव्य पुष्पों की वर्षा से उन्हें सजा दिया।

श्लोक 15 (12.340.15)

तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गन्धर्वाप्सरसां गणाः । ऋषयश्चैव संसिद्धाः परं विस्मयमागताः ॥

taṃ dṛṣṭvā vismitāḥ sarve gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | ṛṣayaścaiva saṃsiddhāḥ paraṃ vismayamāgatāḥ

उन्हें देखकर गन्धर्वों और अप्सराओं के सब गण तथा ऋषि और सिद्ध अत्यन्त विस्मय में पड़ गए।

गन्धर्वाप्सरोगणा ऋषयश्चोचुः

श्लोक 16 (12.340.16)

अन्तरिक्षगतः कोऽयं तपसा सिद्धिमागतः । अधः कायोर्ध्ववक्त्रश्च नेत्रैः समतिवाह्यते ॥

antarikṣagataḥ ko'yaṃ tapasā siddhimāgataḥ | adhaḥ kāyordhvavaktraśca netraiḥ samativāhyate

"यह कौन है जो तप से सिद्धि पाकर आकाश में विचर रहा है? इसका शरीर नीचे है और मुख ऊपर की ओर, और यह अपनी दृष्टि के सहारे आगे बढ़ रहा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (12.340.17)

ततः परमधर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । भास्करं समुदीक्षन्स प्राङ्भुखो वाग्यतोऽगमत् । शब्देनाकाशमखिलं पूरयन्निव सर्वशः ॥

tataḥ paramadharmātmā triṣu lokeṣu viśrutaḥ | bhāskaraṃ samudīkṣansa prāṅbhukho vāgyato'gamat | śabdenākāśamakhilaṃ pūrayanniva sarvaśaḥ

तब परम धर्मात्मा, तीनों लोकों में विख्यात वे सूर्य की ओर देखते हुए, पूर्व की ओर मुख किए मौन होकर चलते गए, मानो अपने शब्द से सारे आकाश को सब ओर भर रहे हों।

श्लोक 18 (12.340.18)

तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा सर्वाप्सरोगणाः । संभ्रान्तमनसो राजन्नासन्परमविस्मिताः । पञ्चचूडाप्रभृतयो भृशमुत्फुल्ललोचनाः ॥

tamāpatantaṃ sahasā dṛṣṭvā sarvāpsarogaṇāḥ | saṃbhrāntamanaso rājannāsanparamavismitāḥ | pañcacūḍāprabhṛtayo bhṛśamutphullalocanāḥ

हे राजन्, उन्हें अचानक आते देखकर पञ्चचूडा आदि सब अप्सराओं के गण भ्रान्त चित्त और अत्यन्त विस्मित हो गए, उनकी आँखें खिल उठीं।

अप्सरोगणा ऊचुः

श्लोक 19 (12.340.19)

दैवतं कतमं ह्येतदुत्तमां गतिमास्थितम् । सुनिश्चितमिहायाति विमुक्तमिव निःस्पृहम् ॥

daivataṃ katamaṃ hyetaduttamāṃ gatimāsthitam | suniścitamihāyāti vimuktamiva niḥspṛham

"यह कौन-सा देवता है जो परम गति को प्राप्त हुआ है? पूर्ण निश्चय के साथ यह मानो मुक्त और निःस्पृह होकर इधर आ रहा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.340.20)

ततः समभिचक्राम मलयं नाम पर्वतम् । उर्वशी पूर्वचित्तिश्च यं नित्यमुपसेवतः ॥

tataḥ samabhicakrāma malayaṃ nāma parvatam | urvaśī pūrvacittiśca yaṃ nityamupasevataḥ

तब वे मलय नामक पर्वत के ऊपर से निकले, जहाँ उर्वशी और पूर्वचित्ति सदा विचरती रहती हैं।

श्लोक 21 (12.340.21)

तस्य ब्रह्मर्षिपुत्रस्य विस्मयं ययतुः परम् । अहो बुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे ॥

tasya brahmarṣiputrasya vismayaṃ yayatuḥ param | aho buddhisamādhānaṃ vedābhyāsarate dvije

वे दोनों ब्रह्मर्षि के उस पुत्र को देखकर अत्यन्त विस्मित हुईं: "अहो, वेदाभ्यास में लगे द्विज की बुद्धि की कैसी स्थिरता है!

उर्वश्युवाच

श्लोक 22 (12.340.22)

अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत् । पितृशुश्रूषया बुद्धिं संप्राप्तोऽयमनुत्तमाम् ॥

acireṇaiva kālena nabhaścarati candravat | pitṛśuśrūṣayā buddhiṃ saṃprāpto'yamanuttamām

इतने थोड़े समय में ही यह चन्द्रमा के समान आकाश में विचर रहा है! पिता की सेवा से इसने सर्वोत्तम बुद्धि पाई है।"

श्लोक 23 (12.340.23)

पितृभक्तो दृढतपाः पितुः सुदयितः सुतः । अनन्यमनसा तेन कथं पित्रा विसर्जितः ॥

pitṛbhakto dṛḍhatapāḥ pituḥ sudayitaḥ sutaḥ | ananyamanasā tena kathaṃ pitrā visarjitaḥ

"यह पितृभक्त है, तप में दृढ़ है और पिता का अत्यन्त प्रिय पुत्र है; फिर उस अनन्य मन वाले पिता ने इसे कैसे विदा कर दिया?"

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (12.340.24)

उर्वश्या वचनं श्रुत्वा शुकः परमधर्मवित् । उदैक्षत दिशः सर्वा वचने गतमानसः ॥

urvaśyā vacanaṃ śrutvā śukaḥ paramadharmavit | udaikṣata diśaḥ sarvā vacane gatamānasaḥ

उर्वशी की बात सुनकर परम धर्म को जानने वाले शुक ने उसके वचन में मन लगाए हुए सब दिशाओं की ओर देखा।

श्लोक 25 (12.340.25)

सोऽन्तरिक्षं महीं चैव सशैलवनकाननाम् । विलोकयामास तदा सरांसि सरितस्तथा ॥

so'ntarikṣaṃ mahīṃ caiva saśailavanakānanām | vilokayāmāsa tadā sarāṃsi saritastathā

तब उन्होंने आकाश को और पर्वतों, वनों तथा उपवनों सहित पृथ्वी को, तथा सरोवरों और नदियों को देखा।

श्लोक 26 (12.340.26)

ततो द्वैपायनसुतं बहुमानात्समन्ततः । कृताञ्जलिपुटाः सर्वा निरीक्षन्ते स्म देवताः ॥

tato dvaipāyanasutaṃ bahumānātsamantataḥ | kṛtāñjalipuṭāḥ sarvā nirīkṣante sma devatāḥ

तब सब देवता हाथ जोड़कर बड़े आदर से चारों ओर से द्वैपायन के पुत्र को देखने लगे।

श्लोक 27 (12.340.27)

अब्रवीत्तास्तदा वाक्यं शुकः परमधर्मवित् । पिता यद्यनुगच्छेन्मां क्रोशमानः शुकेति वै ॥

abravīttāstadā vākyaṃ śukaḥ paramadharmavit | pitā yadyanugacchenmāṃ krośamānaḥ śuketi vai

तब परम धर्म को जानने वाले शुक ने उनसे कहा: "यदि मेरे पिता 'शुक!' पुकारते हुए मेरे पीछे आएँ,

शुक उवाच

श्लोक 28 (12.340.28)

तस्य प्रतिवचो देयं सर्वैरेव समाहितैः । एतन्मे स्नेहतः सर्वे वचनं कर्तुमर्हथ ॥

tasya prativaco deyaṃ sarvaireva samāhitaiḥ | etanme snehataḥ sarve vacanaṃ kartumarhatha

"तो आप सब सावधान होकर उन्हें उत्तर देना। मेरे प्रति स्नेह के कारण आप सब मेरा यह वचन पूरा करें।"

भीष्म उवाच

श्लोक 29 (12.340.29)

शुकस्य वचनं श्रुत्वा दिशः सजलकाननाः । समुद्राः सरितः शैलाः प्रत्यूचुस्तं समन्ततः ॥

śukasya vacanaṃ śrutvā diśaḥ sajalakānanāḥ | samudrāḥ saritaḥ śailāḥ pratyūcustaṃ samantataḥ

शुक की बात सुनकर जल और वनों वाली दिशाओं, समुद्रों, नदियों और पर्वतों ने सब ओर से उन्हें उत्तर दिया।

दिशः समुद्राः सरितः शैलाश्चोचुः

श्लोक 30 (12.340.30)

यथा ज्ञापयसे विप्र बाढमेवं भविष्यति । ऋषेर्व्याहरतो वाक्यं प्रतिवक्ष्यामहे वयम् ॥

yathā jñāpayase vipra bāḍhamevaṃ bhaviṣyati | ṛṣervyāharato vākyaṃ prativakṣyāmahe vayam

"हे विप्र, आप जैसी आज्ञा करते हैं, वैसा ही होगा। जब ऋषि पुकारेंगे, तब हम उन्हें उत्तर देंगे।"

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