Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 341

शुक का परमपद-गमन और रुद्र द्वारा व्यास का सांत्वन

भीष्म बताते हैं कि शुक ने सब गुणों को त्यागकर ब्रह्म में प्रतिष्ठा पाई; उस समय पृथ्वी पर अनेक उत्पात हुए और शुक दो शिखरों वाले पर्वत को बिना रुकावट भेदकर निकल गए। व्यास उनके पीछे गए और उनका नाम पुकारा; शुक ने सर्वत्र से 'भो' अक्षर से उत्तर दिया, इसी से आज भी प्रतिध्वनि उत्तर देती है। फिर महादेव ने शोकाकुल व्यास को सान्त्वना दी और वर दिया कि जब तक पर्वत और सागर रहेंगे तब तक उनकी कीर्ति रहेगी तथा वे सदा पुत्र-सदृश छाया को देखेंगे। अन्त में भीष्म इस इतिहास को धारण करने का फल बताते हैं।

अध्याय 340अध्याय-सूचीअध्याय 342

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.341.1)

इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्मर्षिः सुमहातपाः । प्रातिष्ठत शुकः सिद्धिं हित्वा दोषांश्चतुर्विधान् ॥

ityevamuktvā vacanaṃ brahmarṣiḥ sumahātapāḥ | prātiṣṭhata śukaḥ siddhiṃ hitvā doṣāṃścaturvidhān

यह वचन कहकर महान् तपस्वी ब्रह्मर्षि शुक चार प्रकार के दोषों को छोड़कर सिद्धि की ओर चल पड़े।

श्लोक 2 (12.341.2)

तमो ह्यष्टगुणं हित्वा जहौ पञ्चविधं रजः । ततः सत्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tamo hyaṣṭaguṇaṃ hitvā jahau pañcavidhaṃ rajaḥ | tataḥ satvaṃ jahau dhīmāṃstadadbhutamivābhavat

आठ गुणों वाले तमस् को त्यागकर उन्होंने पाँच प्रकार के रजस् को छोड़ा; फिर उन धीर ने सत्त्व को भी छोड़ दिया, और यह एक आश्चर्य जैसा हुआ।

श्लोक 3 (12.341.3)

ततस्तस्मिन्पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते । ब्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत्स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

tatastasminpade nitye nirguṇe liṅgavarjite | brahmaṇi pratyatiṣṭhatsa vidhūmo'gniriva jvalan

तब उस नित्य, निर्गुण और चिह्नरहित पद में, धूमरहित अग्नि के समान जाज्वल्यमान होकर, वे ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो गए।

श्लोक 4 (12.341.4)

उत्कापाता दिशां दाहो भूमिकम्पस्तथैव च । प्रादुर्भूताः क्षणे तस्मिंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

utkāpātā diśāṃ dāho bhūmikampastathaiva ca | prādurbhūtāḥ kṣaṇe tasmiṃstadadbhutamivābhavat

उस क्षण उल्कापात हुए, दिशाओं में दाह हुआ और भूकम्प आया; यह आश्चर्य जैसा हुआ।

श्लोक 5 (12.341.5)

द्रुमाः शाखाश्च मुमुचुः शिखराणि च पर्वताः । निर्घातशब्दैर्गुरुभिर्भूमिर्व्यादीर्यतेव ह ॥

drumāḥ śākhāśca mumucuḥ śikharāṇi ca parvatāḥ | nirghātaśabdairgurubhirbhūmirvyādīryateva ha

वृक्षों ने शाखाएँ और पर्वतों ने शिखर गिरा दिए; भारी वज्र-ध्वनियों के साथ पृथ्वी मानो फटने लगी।

श्लोक 6 (12.341.6)

न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः । ह्रदाश्च सरितश्चैव चुक्षुभुः सागरास्तथा ॥

na babhāse sahasrāṃśurna jajvāla ca pāvakaḥ | hradāśca saritaścaiva cukṣubhuḥ sāgarāstathā

सहस्र किरणों वाला सूर्य नहीं चमका, अग्नि नहीं जली, और सरोवर, नदियाँ तथा समुद्र क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 7 (12.341.7)

ववर्ष वासवस्तोयं रसवच्च सुगन्धि च । ववौ समीरणश्चापि दिव्यगन्धवहः शुचिः ॥

vavarṣa vāsavastoyaṃ rasavacca sugandhi ca | vavau samīraṇaścāpi divyagandhavahaḥ śuciḥ

इन्द्र ने रसयुक्त और सुगन्धित जल बरसाया, और दिव्य गन्ध ढोने वाली पवित्र वायु बहने लगी।

श्लोक 8 (12.341.8)

स शृङ्गेऽप्रतिमे दिव्ये हिमवन्मेरुसंनिभे । संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमये शुभे ॥

sa śṛṅge'pratime divye himavanmerusaṃnibhe | saṃśliṣṭe śvetapīte dve rukmarūpyamaye śubhe

उन्होंने दो अनुपम, दिव्य और सुन्दर शिखर देखे, जो हिमालय और मेरु के समान थे, परस्पर सटे हुए थे, एक श्वेत और एक पीत, चाँदी और सोने के बने हुए,

श्लोक 9 (12.341.9)

शतयोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वं च भारत । उदीचीं दिशमास्थाय रुचिरे संददर्श ह ॥

śatayojanavistāre tiryagūrdhvaṃ ca bhārata | udīcīṃ diśamāsthāya rucire saṃdadarśa ha

जो सौ योजन चौड़े थे और आड़े तथा ऊपर की ओर फैले थे; हे भारत, वे उत्तर दिशा में स्थित और रमणीय थे।

श्लोक 10 (12.341.10)

सोऽविशङ्केन मनसा तथैवाभ्यपतच्छुकः ॥

so'viśaṅkena manasā tathaivābhyapatacchukaḥ

शुक निःशंक मन से सीधे उन पर जा गिरे।

श्लोक 11 (12.341.11)

ततः पर्वतशृङ्गे द्वे सहसैव द्विधाकृते । अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tataḥ parvataśṛṅge dve sahasaiva dvidhākṛte | adṛśyetāṃ mahārāja tadadbhutamivābhavat

तब वे दोनों पर्वत-शिखर सहसा दो टुकड़े हो गए और अदृश्य हो गए, हे महाराज; यह आश्चर्य जैसा हुआ।

श्लोक 12 (12.341.12)

ततः पर्वतशृङ्गाभ्यां सहसैव विनिःसृतः । न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः ॥

tataḥ parvataśṛṅgābhyāṃ sahasaiva viniḥsṛtaḥ | na ca pratijaghānāsya sa gatiṃ parvatottamaḥ

फिर वे सहसा दोनों शिखरों के बीच से निकल गए, और उस श्रेष्ठ पर्वत ने उनकी गति नहीं रोकी।

श्लोक 13 (12.341.13)

ततो महानभूच्छब्दो दिवि सर्वदिवौकसाम् । गन्धर्वाणामृषीणां च ये च शैलनिवासिनः ॥

tato mahānabhūcchabdo divi sarvadivaukasām | gandharvāṇāmṛṣīṇāṃ ca ye ca śailanivāsinaḥ

तब आकाश में सब देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों और पर्वतवासियों का बड़ा कोलाहल उठा।

श्लोक 14 (12.341.14)

दृष्ट्वा शुकमतिक्रान्तं पर्वतं च द्विधा कृतम् । साधुसाध्विति तत्रासीन्नादः सर्वत्र भारत ॥

dṛṣṭvā śukamatikrāntaṃ parvataṃ ca dvidhā kṛtam | sādhusādhviti tatrāsīnnādaḥ sarvatra bhārata

शुक को पार निकलते और पर्वत को दो भागों में बँटा देखकर, हे भारत, सर्वत्र 'साधु, साधु' की ध्वनि होने लगी।

श्लोक 15 (12.341.15)

स पूज्यमानो देवैश्च गन्धर्वैर्ऋषिभिस्तथा । यक्षराक्षससङ्घैश्च विद्याधरगणैस्तथा ॥

sa pūjyamāno devaiśca gandharvairṛṣibhistathā | yakṣarākṣasasaṅghaiśca vidyādharagaṇaistathā

देवता, गन्धर्व और ऋषि, यक्ष-राक्षसों के समूह तथा विद्याधरों के गण उनकी पूजा कर रहे थे।

श्लोक 16 (12.341.16)

दिव्यैः पुष्पैः समाकीर्णमन्तरिक्षं समन्ततः । आसीत्किल महाराज शुकाभिपतने तदा ॥

divyaiḥ puṣpaiḥ samākīrṇamantarikṣaṃ samantataḥ | āsītkila mahārāja śukābhipatane tadā

हे महाराज, कहते हैं कि शुक के उस प्रयाण के समय आकाश चारों ओर दिव्य पुष्पों से भर गया था।

श्लोक 17 (12.341.17)

ततो मन्दाकिनीं रम्यामुपरिष्टादभिव्रजन् । शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननाम् ॥

tato mandākinīṃ ramyāmupariṣṭādabhivrajan | śuko dadarśa dharmātmā puṣpitadrumakānanām

फिर रमणीय मन्दाकिनी के ऊपर से जाते हुए, धर्मात्मा शुक ने उसे देखा, जिसके तट पर फूले हुए वृक्षों के वन थे।

श्लोक 18 (12.341.18)

तस्यां क्रीडन्त्यभिरताः स्नान्ति चैवाप्सरोगणाः । शून्याकारं निराकाराः शुकं दृष्ट्वा विवाससः ॥

tasyāṃ krīḍantyabhiratāḥ snānti caivāpsarogaṇāḥ | śūnyākāraṃ nirākārāḥ śukaṃ dṛṣṭvā vivāsasaḥ

वहाँ अप्सराओं के समूह क्रीड़ा और स्नान में मग्न थे, वस्त्रहीन थे; शुक को, जो शून्य रूप जैसे दिखते थे, देखकर भी उनमें कोई विकार नहीं आया।

श्लोक 19 (12.341.19)

तं प्रक्रामन्तमाज्ञाय पिता स्नेहसमन्वितः । उत्तमां गतिमास्थाय पृष्ठतोऽनुससार ह ॥

taṃ prakrāmantamājñāya pitā snehasamanvitaḥ | uttamāṃ gatimāsthāya pṛṣṭhato'nusasāra ha

उन्हें प्रस्थान करते जानकर स्नेह से भरे पिता उत्तम गति का आश्रय लेकर उनके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 20 (12.341.20)

शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वान्तरिक्षगाम् । दर्शयित्वा प्रभावं स्वं सर्वभूतोऽभवत्तदा ॥

śukastu mārutādūrdhvaṃ gatiṃ kṛtvāntarikṣagām | darśayitvā prabhāvaṃ svaṃ sarvabhūto'bhavattadā

शुक वायु से भी ऊपर आकाशगामी मार्ग बनाकर और अपना प्रभाव दिखाकर उस समय सर्वभूतमय हो गए।

श्लोक 21 (12.341.21)

महायोगगतिं त्वग्र्यां व्यासोत्थाय महातपाः । निमेषान्तरमात्रेण शुकाभिपतनं ययौ ॥

mahāyogagatiṃ tvagryāṃ vyāsotthāya mahātapāḥ | nimeṣāntaramātreṇa śukābhipatanaṃ yayau

महातपस्वी व्यास उठकर महायोग की श्रेष्ठ गति से पलक झपकते ही उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ शुक शिखर को भेदकर गए थे।

श्लोक 22 (12.341.22)

स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् । शशंसुर्ऋषयस्तत्र कर्म पुत्रस्य तत्तदा ॥

sa dadarśa dvidhā kṛtvā parvatāgraṃ śukaṃ gatam | śaśaṃsurṛṣayastatra karma putrasya tattadā

उन्होंने पर्वत-शिखर को दो भागों में बँटा और शुक को गया हुआ देखा; वहाँ ऋषियों ने उन्हें उनके पुत्र का वह कार्य बताया।

श्लोक 23 (12.341.23)

ततः शुकेति दीर्घेण शब्देनाक्रन्दितस्तदा । स्वयं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रीँल्लोकाननुनाद्य वै ॥

tataḥ śuketi dīrgheṇa śabdenākranditastadā | svayaṃ pitrā svareṇoccaistrīm̐llokānanunādya vai

तब व्यास ने स्वयं ऊँचे स्वर में, लम्बी पुकार से 'शुक!' कहकर पुकारा और तीनों लोकों को गुँजा दिया।

श्लोक 24 (12.341.24)

शुकः सर्वगतो भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः । प्रत्यभाषत धर्मात्मा भोःशब्देनानुनादयन् ॥

śukaḥ sarvagato bhūtvā sarvātmā sarvatomukhaḥ | pratyabhāṣata dharmātmā bhoḥśabdenānunādayan

सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सर्वतोमुख होकर धर्मात्मा शुक ने सबको गुँजाते हुए 'भो' शब्द से उत्तर दिया।

श्लोक 25 (12.341.25)

तत एकाक्षरं नादं भोरित्येव समीरयन् । प्रत्याहरञ्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजङ्गमम् ॥

tata ekākṣaraṃ nādaṃ bhorityeva samīrayan | pratyāharañjagatsarvamuccaiḥ sthāvarajaṅgamam

तब उन्होंने 'भो' इस एक अक्षर की ध्वनि ही उच्चारित करके समस्त चराचर जगत् से ऊँचे स्वर में उसे लौटवाया।

श्लोक 26 (12.341.26)

ततःप्रभृति चाद्यापि शब्दानुच्चारितान्पृथक् । गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याहरन्ति शुकं प्रति ॥

tataḥprabhṛti cādyāpi śabdānuccāritānpṛthak | girigahvarapṛṣṭheṣu vyāharanti śukaṃ prati

तभी से आज भी, जो शब्द अलग-अलग बोले जाते हैं, उन्हें पर्वतों की कन्दराओं और ढलानों में शुक के प्रति उत्तर के रूप में लौटाया जाता है।

श्लोक 27 (12.341.27)

अन्तर्हितः प्रभावं तु दर्शयित्वा शुकस्तदा । गुणान्संत्यज्य शब्दादीन्पदमभ्यगमत्परम् ॥

antarhitaḥ prabhāvaṃ tu darśayitvā śukastadā | guṇānsaṃtyajya śabdādīnpadamabhyagamatparam

अपना प्रभाव दिखाकर शुक उस समय अन्तर्हित हो गए और शब्द आदि गुणों को त्यागकर परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 28 (12.341.28)

महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः । निषसाद गिरिप्रस्थे पुत्रमेवानुचिन्तयन् ॥

mahimānaṃ tu taṃ dṛṣṭvā putrasyāmitatejasaḥ | niṣasāda giriprasthe putramevānucintayan

अपरिमित तेज वाले अपने पुत्र की महिमा देखकर व्यास पर्वत की ढलान पर बैठ गए और केवल पुत्र का ही चिन्तन करने लगे।

श्लोक 29 (12.341.29)

ततो मन्दाकिनीतीरे क्रीडन्तोऽऽप्सरसां गणाः । आसाद्य तमृषिं सर्वाः संभ्रान्ता गतचेतसः ॥

tato mandākinītīre krīḍanto''psarasāṃ gaṇāḥ | āsādya tamṛṣiṃ sarvāḥ saṃbhrāntā gatacetasaḥ

तब मन्दाकिनी के तट पर क्रीड़ा करती हुई अप्सराओं की टोलियाँ उन ऋषि के पास आ पहुँचीं और सब घबराकर होश खो बैठीं।

श्लोक 30 (12.341.30)

जले निलिल्यिरे काश्चित्काश्चिद्गुल्मान्प्रपेदिरे । वसनान्याददुः काश्चित्तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमम् ॥

jale nililyire kāścitkāścidgulmānprapedire | vasanānyādaduḥ kāścittaṃ dṛṣṭvā munisattamam

उन श्रेष्ठ मुनि को देखकर कोई जल में छिप गईं, कोई झाड़ियों में जा घुसीं और कोई वस्त्र उठाने लगीं।

श्लोक 31 (12.341.31)

तां मुक्ततां तु विज्ञाय मुनिः पुत्रस्य वै तदा । सक्ततामात्मनश्चैव प्रीतोऽभूद्बीडितश्च ह ॥

tāṃ muktatāṃ tu vijñāya muniḥ putrasya vai tadā | saktatāmātmanaścaiva prīto'bhūdbīḍitaśca ha

पुत्र की उस मुक्त अवस्था और अपनी आसक्ति को जानकर मुनि प्रसन्न भी हुए और लज्जित भी।

श्लोक 32 (12.341.32)

तं देवगन्धर्ववृतो महर्षिगणपूजितः । पिनाकहस्तो भगवानभ्यागच्छत शंकरः ॥

taṃ devagandharvavṛto maharṣigaṇapūjitaḥ | pinākahasto bhagavānabhyāgacchata śaṃkaraḥ

तब देवताओं और गन्धर्वों से घिरे हुए तथा महर्षियों के समूहों से पूजित, पिनाकधारी भगवान् शंकर उनके पास आए।

श्लोक 33 (12.341.33)

तमुवाच महादेवः सान्त्वपूर्वमिदं वचः । पुत्रशोकाभिसंतप्तं कृष्णद्वैपायनं तदा ॥

tamuvāca mahādevaḥ sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ | putraśokābhisaṃtaptaṃ kṛṣṇadvaipāyanaṃ tadā

पुत्रशोक से सन्तप्त कृष्ण द्वैपायन से महादेव ने सान्त्वना भरे ये वचन कहे।

महादेव उवाच

श्लोक 34 (12.341.34)

अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य चैव ह । वीर्येण सदृशः पुत्रः पुरा मत्तस्त्वया वृतः ॥

agnerbhūmerapāṃ vāyorantarikṣasya caiva ha | vīryeṇa sadṛśaḥ putraḥ purā mattastvayā vṛtaḥ

'तुमने पूर्वकाल में मुझसे अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश के समान तेज वाला पुत्र माँगा था।

श्लोक 35 (12.341.35)

स तथालक्षणो जातस्तपसा तव संभृतः । मम चैव प्रसादेन ब्रह्मतेजोमयः शुचिः ॥

sa tathālakṣaṇo jātastapasā tava saṃbhṛtaḥ | mama caiva prasādena brahmatejomayaḥ śuciḥ

वह वैसे ही लक्षणों वाला उत्पन्न हुआ, तुम्हारे तप से पुष्ट हुआ और मेरी कृपा से ब्रह्मतेजोमय तथा पवित्र हुआ।

श्लोक 36 (12.341.36)

स गतिं परमां प्राप्तो दुष्प्रापामजितेन्द्रियैः । दैवतैरपि विप्रर्षे तं त्वं किमनुशोचसि ॥

sa gatiṃ paramāṃ prāpto duṣprāpāmajitendriyaiḥ | daivatairapi viprarṣe taṃ tvaṃ kimanuśocasi

वह परम गति को प्राप्त हुआ है, जो अजितेन्द्रिय देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। हे विप्रर्षि, तुम उसके लिए क्यों शोक करते हो?

श्लोक 37 (12.341.37)

यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावत्स्थास्यन्ति सागराः । तावत्तवाक्षया कीर्तिः सपुत्रस्य भविष्यति ॥

yāvatsthāsyanti girayo yāvatsthāsyanti sāgarāḥ | tāvattavākṣayā kīrtiḥ saputrasya bhaviṣyati

जब तक पर्वत स्थित रहेंगे और जब तक सागर रहेंगे, तब तक पुत्र सहित तुम्हारी कीर्ति अक्षय रहेगी।

श्लोक 38 (12.341.38)

छायां स्वपुत्रसदृशीं सर्वतोऽनपगां सदा । द्रक्ष्यसे त्वं च लोकेऽस्मिन्मत्प्रसादान्महामुने ॥

chāyāṃ svaputrasadṛśīṃ sarvato'napagāṃ sadā | drakṣyase tvaṃ ca loke'sminmatprasādānmahāmune

और हे महामुनि, मेरी कृपा से तुम इस लोक में अपने पुत्र के समान एक छाया को सदा देखोगे, जो सब ओर कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी।'

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (12.341.39)

सोऽनुगीतो भगवता स्वयं रुद्रेण भारत । छायां पश्यन्परावृत्तः स मुनिः परया मुदा ॥

so'nugīto bhagavatā svayaṃ rudreṇa bhārata | chāyāṃ paśyanparāvṛttaḥ sa muniḥ parayā mudā

हे भारत, स्वयं भगवान् रुद्र से इस प्रकार समझाए जाने पर वे मुनि उस छाया को देखते हुए परम आनन्द के साथ लौट आए।

श्लोक 40 (12.341.40)

इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ । विस्तरेण समाख्याता यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

iti janma gatiścaiva śukasya bharatarṣabha | vistareṇa samākhyātā yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार शुक का जन्म और उनकी गति मैंने विस्तार से कह दी, जो तुमने मुझसे पूछी थी।

श्लोक 41 (12.341.41)

एतदाचष्ट मे राजन्देवर्षिर्नारदः पुरा । व्यासश्चैव महायोगी संजल्पेषु पदेपदे ॥

etadācaṣṭa me rājandevarṣirnāradaḥ purā | vyāsaścaiva mahāyogī saṃjalpeṣu padepade

हे राजन्, यह मुझे बहुत पहले देवर्षि नारद ने बताया था, और महायोगी व्यास ने भी बातचीत में पग-पग पर यही कहा था।

श्लोक 42 (12.341.42)

इतिहासमिमं पुण्यं मोक्षधर्मार्थसंहितम् । धारयेद्यः शमपरः स गच्छेत्परमां गतिम् ॥

itihāsamimaṃ puṇyaṃ mokṣadharmārthasaṃhitam | dhārayedyaḥ śamaparaḥ sa gacchetparamāṃ gatim

जो शान्ति में तत्पर होकर मोक्षधर्म से युक्त इस पवित्र इतिहास को धारण करेगा, वह परम गति को प्राप्त करेगा।

अध्याय 340अध्याय-सूचीअध्याय 342