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शान्ति पर्व · अध्याय 342

नारद का प्रश्न और नारायण का उत्तर

युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि सिद्धि चाहने वाला किस देवता का यजन करे, मोक्ष क्या है, और देवताओं का देवता तथा पितरों का पिता कौन है। भीष्म नारद और नारायण का एक पुराना संवाद सुनाते हैं: बदरिकाश्रम में नर-नारायण को देव-पितृ कर्म करते देखकर विस्मित नारद उनसे पूछते हैं कि वे किसकी पूजा करते हैं। श्रीभगवान् उत्तर देते हैं कि वे उस आत्मा की पूजा करते हैं जो अव्यक्त क्षेत्रज्ञ है, जिससे प्रकृति और वे स्वयं उत्पन्न हुए हैं, और जिसने देव-पितृ कर्म की मर्यादा बाँधी है, जिसका इक्कीस प्रजापति आदर करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि मुक्त जन उसी को प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त उसी में प्रवेश करते हैं।

अध्याय 341अध्याय-सूचीअध्याय 343

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.342.1)

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । य इच्छेत्सिद्धिमास्थातुं देवतां कां यजेत सः ॥

gṛhastho brahmacārī vā vānaprastho'tha bhikṣukaḥ | ya icchetsiddhimāsthātuṃ devatāṃ kāṃ yajeta saḥ

गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो, वानप्रस्थ हो या भिक्षु, जो सिद्धि पाना चाहे वह किस देवता का यजन करे?

श्लोक 2 (12.342.2)

कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम् । विधिना केन जुहुयाद्दैवं पित्र्यं तथैव च ॥

kuto hyasya dhruvaḥ svargaḥ kuto naiḥśreyasaṃ param | vidhinā kena juhuyāddaivaṃ pitryaṃ tathaiva ca

उसे निश्चित स्वर्ग कहाँ से मिलता है और परम कल्याण कहाँ से? देवकर्म और पितृकर्म की आहुति वह किस विधि से दे?

श्लोक 3 (12.342.3)

मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः । स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद्येन न च्यवते दिवः ॥

muktaśca kāṃ gatiṃ gacchenmokṣaścaiva kimātmakaḥ | svargataścaiva kiṃ kuryādyena na cyavate divaḥ

मुक्त पुरुष किस गति को जाता है और मोक्ष का स्वरूप क्या है? और स्वर्ग पहुँचा हुआ मनुष्य क्या करे कि वह स्वर्ग से च्युत न हो?

श्लोक 4 (12.342.4)

देवतानां च को देवः पितॄणां च पिता तथा । तस्मात्परतरं यच्च तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

devatānāṃ ca ko devaḥ pitṝṇāṃ ca pitā tathā | tasmātparataraṃ yacca tanme brūhi pitāmaha

देवताओं का देवता कौन है और पितरों का पिता कौन? और उससे भी परे जो है, हे पितामह, वह मुझे बताइए।

श्लोक 5 (12.342.5)

गूढं मां प्रश्नवित्प्रश्नं पृच्छसे त्वमिहानघ । न ह्येतत्तर्कया शक्यं वक्तुं वर्षशतैरपि ॥

gūḍhaṃ māṃ praśnavitpraśnaṃ pṛcchase tvamihānagha | na hyetattarkayā śakyaṃ vaktuṃ varṣaśatairapi

हे अनघ, तुम प्रश्न के जानकार हो और मुझसे एक गूढ़ प्रश्न पूछ रहे हो। यह तर्क से सैकड़ों वर्षों में भी नहीं समझाया जा सकता।

श्लोक 6 (12.342.6)

ऋते देवप्रसादाद्वा राजञ्ज्ञानागमेन वा । गहनं ह्येतदाख्यानं व्याख्यातव्यं तवारिहन् ॥

ṛte devaprasādādvā rājañjñānāgamena vā | gahanaṃ hyetadākhyānaṃ vyākhyātavyaṃ tavārihan

हे राजन्, देवता की कृपा के बिना या ज्ञान-परम्परा के बिना यह नहीं कहा जा सकता; हे शत्रुनाशन, यह आख्यान गहन है और तुम्हारे लिए समझाने योग्य है।

श्लोक 7 (12.342.7)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradasya ca saṃvādamṛṣernārāyaṇasya ca

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास कहते हैं: नारद और ऋषि नारायण का संवाद।

श्लोक 8 (12.342.8)

नारायणो हि विश्वात्मा चतुर्मूर्तिः सनातनः । धर्मात्मजः संबभूव पितैवं मेऽभ्यभाषत ॥

nārāyaṇo hi viśvātmā caturmūrtiḥ sanātanaḥ | dharmātmajaḥ saṃbabhūva pitaivaṃ me'bhyabhāṣata

विश्वात्मा, सनातन और चतुर्मूर्ति नारायण धर्म के पुत्र रूप में प्रकट हुए; ऐसा मेरे पिता ने मुझसे कहा था।

श्लोक 9 (12.342.9)

कृते युगे महाराज पुरा स्वायंभुवेऽन्तरे । नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णस्तथैव च ॥

kṛte yuge mahārāja purā svāyaṃbhuve'ntare | naro nārāyaṇaścaiva hariḥ kṛṣṇastathaiva ca

हे महाराज, पूर्वकाल में सत्ययुग में, स्वायम्भुव मन्वन्तर में नर, नारायण, हरि और कृष्ण थे।

श्लोक 10 (12.342.10)

तेषां नारायणनरौ तपस्तेपतुरव्ययौ । बदर्याश्रममासाद्य शकटे कनकामये ॥

teṣāṃ nārāyaṇanarau tapastepaturavyayau | badaryāśramamāsādya śakaṭe kanakāmaye

उनमें से अविनाशी नारायण और नर ने बदरिकाश्रम में पहुँचकर एक सुनहरे शकट में तप किया।

श्लोक 11 (12.342.11)

अष्टचक्रं हि तद्यानं भूतयुक्तं मनोरमम् । तत्राद्यौ लोकनाथौ तौ कृशौ धमनिसंततौ ॥

aṣṭacakraṃ hi tadyānaṃ bhūtayuktaṃ manoramam | tatrādyau lokanāthau tau kṛśau dhamanisaṃtatau

वह आठ पहियों वाला, प्राणियों से युक्त और मनोहर वाहन था; उसमें वे दोनों आदि लोकनाथ, कृश और नसों से उभरे हुए शरीर वाले, विराजमान थे।

श्लोक 12 (12.342.12)

तपसा तेजसा चैव दुर्निरीक्ष्यौ सुरैरपि । यस्य प्रसादं कुर्वाते स देवौ द्रष्टुमर्हति ॥

tapasā tejasā caiva durnirīkṣyau surairapi | yasya prasādaṃ kurvāte sa devau draṣṭumarhati

तप और तेज के कारण वे देवताओं के लिए भी दुर्दर्श थे; वे दोनों जिस पर कृपा करें, वही उन दोनों देवों को देख सकता है।

श्लोक 13 (12.342.13)

नूनं तयोरनुमते हृदि हृच्छयचोदितः । महामेरोर्गिरेः शृङ्गात्प्रच्युतो गन्धमादनम् ॥

nūnaṃ tayoranumate hṛdi hṛcchayacoditaḥ | mahāmerorgireḥ śṛṅgātpracyuto gandhamādanam

निश्चय ही उन दोनों की अनुमति से और हृदय में बसने वाले की प्रेरणा से वे महामेरु पर्वत के शिखर से उतरकर गन्धमादन पहुँचे।

श्लोक 14 (12.342.14)

नारदः सुमहद्भूतं सर्वलोकानचीचरत् । तं देशमगमद्राजन्वदर्याश्रममाशुगः ॥

nāradaḥ sumahadbhūtaṃ sarvalokānacīcarat | taṃ deśamagamadrājanvadaryāśramamāśugaḥ

हे राजन्, सब लोकों में विचरने वाले महान् प्राणी नारद शीघ्र ही उस स्थान, बदरिकाश्रम, में पहुँचे।

श्लोक 15 (12.342.15)

तयोराह्निकवेलायां तस्य कौतूहलं त्वभूत् । इदं तदास्पदं कृत्स्नं यस्मिँल्लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥

tayorāhnikavelāyāṃ tasya kautūhalaṃ tvabhūt | idaṃ tadāspadaṃ kṛtsnaṃ yasmim̐llokāḥ pratiṣṭhitāḥ

उन दोनों देवों के दैनिक कर्म के समय उनके मन में कुतूहल हुआ: 'यह वह सम्पूर्ण आश्रय है जिसमें सब लोक प्रतिष्ठित हैं,

श्लोक 16 (12.342.16)

सदेवासुरगन्धर्वाः सकिन्नरमहोरगाः । एका मूर्तिरियं पूर्वं जाता भूयश्चतुर्विधा ॥

sadevāsuragandharvāḥ sakinnaramahoragāḥ | ekā mūrtiriyaṃ pūrvaṃ jātā bhūyaścaturvidhā

देवों, असुरों, गन्धर्वों, किन्नरों और महानागों सहित। यह एक ही मूर्ति पहले उत्पन्न हुई थी और फिर चार रूपों में हो गई।

श्लोक 17 (12.342.17)

धर्मस्य कुलसंताने धर्मादेभिर्विवर्धितः । अहो ह्यनुगृहीतोऽद्य धर्म एभिः सुरैरिह ॥

dharmasya kulasaṃtāne dharmādebhirvivardhitaḥ | aho hyanugṛhīto'dya dharma ebhiḥ surairiha

धर्म के कुल की परम्परा में, धर्म से इन दोनों द्वारा बढ़ाई हुई; अहो, आज यहाँ धर्म इन देवों पर कैसा अनुगृहीत है,

श्लोक 18 (12.342.18)

नरनारायणाभ्यां च कृष्णेन हरिणा तथा । अत्र कृष्णो हरिश्चैव कस्मिंश्चित्कारणान्तरे ॥

naranārāyaṇābhyāṃ ca kṛṣṇena hariṇā tathā | atra kṛṣṇo hariścaiva kasmiṃścitkāraṇāntare

नर-नारायण पर, और कृष्ण तथा हरि पर। यहाँ कृष्ण और हरि किसी दूसरे प्रयोजन से

श्लोक 19 (12.342.19)

स्थितौ धर्मसुतावेतौ तथा तपसि धिष्ठितौ । एतौ हि परमं धाम काऽनयोराह्निकक्रिया ॥

sthitau dharmasutāvetau tathā tapasi dhiṣṭhitau | etau hi paramaṃ dhāma kā'nayorāhnikakriyā

धर्म के पुत्र बनकर रहते हैं और इस प्रकार तप में लगे हैं। ये दोनों परम धाम हैं; इनका दैनिक कर्म क्या है?

श्लोक 20 (12.342.20)

पितरौ सर्वभूतानां दैवतं च यशस्विनौ । कां देवतां तु यजतः पितॄन्वा कान्महामती ॥

pitarau sarvabhūtānāṃ daivataṃ ca yaśasvinau | kāṃ devatāṃ tu yajataḥ pitṝnvā kānmahāmatī

ये सब प्राणियों के माता-पिता और स्वयं देवता हैं, यशस्वी हैं; ये दोनों महामति किस देवता का यजन करते हैं, या किन पितरों का?'

श्लोक 21 (12.342.21)

इति संचिन्त्य मनसा भक्त्या नारायणस्य तु । सहसा प्रादुरभवत्समीपे देवयोस्तदा ॥

iti saṃcintya manasā bhaktyā nārāyaṇasya tu | sahasā prādurabhavatsamīpe devayostadā

यह सोचकर नारायण के प्रति भक्ति से वे सहसा उन दोनों देवों के समीप प्रकट हो गए।

श्लोक 22 (12.342.22)

कृते दैवे च पित्र्ये च ततस्ताभ्यां निरीक्षितः । पूजितश्चैव विधिना यथाप्रोक्तेन शास्त्रतः ॥

kṛte daive ca pitrye ca tatastābhyāṃ nirīkṣitaḥ | pūjitaścaiva vidhinā yathāproktena śāstrataḥ

देवकर्म और पितृकर्म पूरा हो जाने पर उन दोनों ने उन्हें देखा और शास्त्र में कहे अनुसार विधिपूर्वक उनका पूजन किया।

श्लोक 23 (12.342.23)

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यमपूर्वं विधिविस्तरम् । उपोपविष्टः सुप्रीतो नारदो भगवानृषिः ॥

taddṛṣṭvā mahadāścaryamapūrvaṃ vidhivistaram | upopaviṣṭaḥ suprīto nārado bhagavānṛṣiḥ

उस अपूर्व, महान् और विस्तृत विधि-कर्म को देखकर भगवान् देवर्षि नारद अत्यन्त प्रसन्न होकर पास बैठ गए।

श्लोक 24 (12.342.24)

नारायणं संनिरीक्ष्य प्रसन्नेनान्तरात्मना । नमस्कृत्य महादेवमिदं वचनमब्रवीत् ॥

nārāyaṇaṃ saṃnirīkṣya prasannenāntarātmanā | namaskṛtya mahādevamidaṃ vacanamabravīt

प्रसन्न अन्तःकरण से नारायण को देखकर और महादेव को प्रणाम करके उन्होंने यह वचन कहा।

नारद उवाच

श्लोक 25 (12.342.25)

वेदेषु सपुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु गीयसे । त्वमजः शाश्वतो धाता माता मृतमनुत्तमम् ॥

vedeṣu sapurāṇeṣu sāṅgopāṅgeṣu gīyase | tvamajaḥ śāśvato dhātā mātā mṛtamanuttamam

वेदों में, पुराणों सहित, अंगों और उपांगों सहित, आपका गान किया जाता है। आप अजन्मा, शाश्वत, धाता, माता और परम मृत्यु हैं।

श्लोक 26 (12.342.26)

प्रतिष्ठितं भूतभव्यं त्वयि सर्वमिदं जगत् । चत्वारो ह्याश्रमा देव सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ॥

pratiṣṭhitaṃ bhūtabhavyaṃ tvayi sarvamidaṃ jagat | catvāro hyāśramā deva sarve gārhasthyamūlakāḥ

भूत और भविष्य का यह सारा जगत् आप में प्रतिष्ठित है। हे देव, चारों आश्रम गृहस्थ-आश्रम को ही मूल मानते हैं

श्लोक 27 (12.342.27)

यजन्ते त्वामहरहर्नानामूर्तिसमास्थितम् । पिता माता च सर्वस्य देवतानां च शाश्वतम् । कं त्वद्य यजसे देवं पितरं कं न विद्महे ॥

yajante tvāmaharaharnānāmūrtisamāsthitam | pitā mātā ca sarvasya devatānāṃ ca śāśvatam | kaṃ tvadya yajase devaṃ pitaraṃ kaṃ na vidmahe

और नाना रूपों में स्थित आपका प्रतिदिन यजन करते हैं। आप सबके पिता-माता और देवताओं के शाश्वत देव हैं। आज आप स्वयं किस देव का यजन करते हैं? हम तो आपसे बढ़कर किसी पिता को नहीं जानते।

श्लोक 28 (12.342.28)

कमर्चसि महाभाग तन्मे प्रब्रूहि पृच्छतः ॥

kamarcasi mahābhāga tanme prabrūhi pṛcchataḥ

हे महाभाग, आप किसकी पूजा करते हैं? मुझ पूछने वाले को बताइए।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 29 (12.342.29)

अवाच्यमेतद्वक्तव्यमात्मगुह्यं सनातनम् । तव भक्तिमतो ब्रह्मन्वक्ष्यामि तु यथातथम् ॥

avācyametadvaktavyamātmaguhyaṃ sanātanam | tava bhaktimato brahmanvakṣyāmi tu yathātatham

यह न कहने योग्य है, फिर भी कहना पड़ेगा; यह आत्मा का सनातन रहस्य है। हे ब्रह्मन्, तुम भक्तिमान् हो, इसलिए मैं तुम्हें यथार्थ रूप में बताऊँगा।

श्लोक 30 (12.342.30)

यत्तत्सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम् । इन्द्रियैन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम् ॥

yattatsūkṣmamavijñeyamavyaktamacalaṃ dhruvam | indriyaindriyārthaiśca sarvabhūtaiśca varjitam

जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त, अचल और ध्रुव है, जो इन्द्रियों, इन्द्रिय-विषयों और सब प्राणियों से रहित है,

श्लोक 31 (12.342.31)

स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते । त्रिगुणव्यतिरिक्तो वै पुरुषश्चेति कल्पितः ॥

sa hyantarātmā bhūtānāṃ kṣetrajñaśceti kathyate | triguṇavyatirikto vai puruṣaśceti kalpitaḥ

वही प्राणियों का अन्तरात्मा है और क्षेत्रज्ञ कहलाता है; वह तीन गुणों से परे है और पुरुष के रूप में कल्पित किया गया है।

श्लोक 32 (12.342.32)

तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम । अव्यक्ताव्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया ॥

tasmādavyaktamutpannaṃ triguṇaṃ dvijasattama | avyaktāvyaktabhāvasthā yā sā prakṛtiravyayā

हे द्विजश्रेष्ठ, उससे तीन गुणों वाला अव्यक्त उत्पन्न हुआ। जो अव्यक्त और व्यक्त दोनों अवस्थाओं में स्थित है, वही अविनाशिनी प्रकृति है।

श्लोक 33 (12.342.33)

तां योनिमावयोर्विद्धि योऽसौ सदसदात्मकः । आवाभ्यां पूज्यते यो हि दैवे पित्र्ये च कल्प्यते ॥

tāṃ yonimāvayorviddhi yo'sau sadasadātmakaḥ | āvābhyāṃ pūjyate yo hi daive pitrye ca kalpyate

उसे हम दोनों की योनि जानो, और उसे भी जानो जो सत् और असत् दोनों स्वरूप है। वही हम दोनों द्वारा पूजित है और देवकर्म तथा पितृकर्म में उसी का विधान है।

श्लोक 34 (12.342.34)

नास्ति तस्मात्परोऽन्यो हि पिता देवोऽथवा द्विज । आत्मा हि नौ स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयावहे ॥

nāsti tasmātparo'nyo hi pitā devo'thavā dvija | ātmā hi nau sa vijñeyastatastaṃ pūjayāvahe

हे ब्रह्मन्, उससे बढ़कर न कोई पिता है, न देवता। वह हम दोनों का आत्मा जानना चाहिए, इसीलिए हम उसका पूजन करते हैं।

श्लोक 35 (12.342.35)

तेनैषा प्रथिता ब्रह्मन्मर्यादा लोकमाविनी । दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति तस्यानुशासनम् ॥

tenaiṣā prathitā brahmanmaryādā lokamāvinī | daivaṃ pitryaṃ ca kartavyamiti tasyānuśāsanam

हे ब्रह्मन्, उसी ने लोक में फैलने वाली यह मर्यादा स्थापित की कि देवकर्म और पितृकर्म करना चाहिए; यही उसका अनुशासन है।

श्लोक 36 (12.342.36)

ब्रह्मा स्थाणुर्मनुर्दक्षो भृगुर्धर्मस्तथा यमः । मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥

brahmā sthāṇurmanurdakṣo bhṛgurdharmastathā yamaḥ | marīciraṅgirāścātriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ

ब्रह्मा, स्थाणु, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म और यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु,

श्लोक 37 (12.342.37)

वसिष्ठः परमेष्ठी च विवस्वान्सोम एव च । कर्दमश्चापि यः प्रोक्तः क्रोधो विक्रीत एव च ॥

vasiṣṭhaḥ parameṣṭhī ca vivasvānsoma eva ca | kardamaścāpi yaḥ proktaḥ krodho vikrīta eva ca

वसिष्ठ, परमेष्ठी, विवस्वान् और सोम, तथा कर्दम, जिसे भी कहा गया है, और क्रोध तथा विक्रीत।

श्लोक 38 (12.342.38)

एकविंशतिरुत्पन्नास्ते प्रजापतयः स्मृताः । तस्य देवस्य मर्यादां पूजयन्तः सनातनीम् ॥

ekaviṃśatirutpannāste prajāpatayaḥ smṛtāḥ | tasya devasya maryādāṃ pūjayantaḥ sanātanīm

ये इक्कीस प्रजापति उत्पन्न हुए बताए गए हैं, जो उस देव की सनातन मर्यादा का आदर करते हैं।

श्लोक 39 (12.342.39)

दैवं पित्र्यं च सततं तस्य विज्ञाय तत्त्वतः । आत्मप्राप्तानि च ततो जानन्ति द्विजसत्तमाः ॥

daivaṃ pitryaṃ ca satataṃ tasya vijñāya tattvataḥ | ātmaprāptāni ca tato jānanti dvijasattamāḥ

उसके देवकर्म और पितृकर्म को यथार्थ रूप से जानकर वे द्विजश्रेष्ठ फिर आत्मा से प्राप्त होने वाली बातों को जान लेते हैं।

श्लोक 40 (12.342.40)

स्वर्गस्था अपि ये केचित्तान्नमस्यन्ति देहिनः । ते तत्प्रसादाद्गच्छन्ति तेनादिष्टफलां गतिम् ॥

svargasthā api ye kecittānnamasyanti dehinaḥ | te tatprasādādgacchanti tenādiṣṭaphalāṃ gatim

स्वर्ग में रहने वाले जो भी देहधारी उन्हें नमस्कार करते हैं, वे उसकी कृपा से उसके बताए फल वाली गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 41 (12.342.41)

ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च । कलाः पञ्चदश त्यक्त्वा ते मुक्ता इति निश्चयः ॥

ye hīnāḥ saptadaśabhirguṇaiḥ karmabhireva ca | kalāḥ pañcadaśa tyaktvā te muktā iti niścayaḥ

जो सत्रह गुणों से रहित और कर्मों से भी रहित हैं, पन्द्रह कलाओं को त्यागकर वे मुक्त हैं, यह निश्चित है।

श्लोक 42 (12.342.42)

मुक्तानां तु गतिर्ब्रह्मन्क्षेत्रज्ञ इति कल्पिता । स हि सर्वगतिश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते ॥

muktānāṃ tu gatirbrahmankṣetrajña iti kalpitā | sa hi sarvagatiścaiva nirguṇaścaiva kathyate

हे ब्रह्मन्, मुक्तों की गति क्षेत्रज्ञ ही मानी गई है। वह सर्वगत भी कहा जाता है और निर्गुण भी।

श्लोक 43 (12.342.43)

दृश्यते ज्ञानयोगेन आवां च प्रसृतौ ततः । एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयावः सनातनम् ॥

dṛśyate jñānayogena āvāṃ ca prasṛtau tataḥ | evaṃ jñātvā tamātmānaṃ pūjayāvaḥ sanātanam

वह ज्ञानयोग से देखा जाता है, और हम दोनों उसी से प्रकट हुए हैं। इस प्रकार उस सनातन आत्मा को जानकर हम उसका पूजन करते हैं।

श्लोक 44 (12.342.44)

तं वेदाश्चाश्रमाश्चैव नानातनुसमाश्रितम् । भक्त्या संपूजयन्त्यद्य गतिं चैषां ददाति सः ॥

taṃ vedāścāśramāścaiva nānātanusamāśritam | bhaktyā saṃpūjayantyadya gatiṃ caiṣāṃ dadāti saḥ

अनेक शरीरों में स्थित उसकी वेद और आश्रम आज भी भक्ति से पूजा करते हैं, और वह उन्हें उनकी गति देता है।

श्लोक 45 (12.342.45)

ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं प्रविशन्त्युत ॥

ye tu tadbhāvitā loke hyekāntitvaṃ samāsthitāḥ | etadabhyadhikaṃ teṣāṃ yatte taṃ praviśantyuta

जो लोक में उसकी भावना से भावित होकर एकान्त भक्ति में स्थित हैं, उनके लिए यह और अधिक है कि वे उसी में प्रवेश कर जाते हैं।

श्लोक 46 (12.342.46)

इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्तितः । भक्त्या प्रेम्णा च विप्रर्षे अस्मद्भक्त्या च ते श्रुतः ॥

iti guhyasamuddeśastava nārada kīrtitaḥ | bhaktyā premṇā ca viprarṣe asmadbhaktyā ca te śrutaḥ

हे नारद, इस प्रकार यह गुह्य उपदेश तुम्हें बताया गया है; हे विप्रर्षि, तुमने इसे भक्ति, प्रेम और हमारे प्रति अपनी भक्ति से सुना है।

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