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शान्ति पर्व · अध्याय 352

कृष्ण द्वारा अपने नामों की व्याख्या; रुद्र और नारायण का युद्ध

श्रीभगवान् (कृष्ण) अर्जुन को अपने अनेक नामों, जैसे हृषीकेश, हरि, गोविन्द, शिपिविष्ट, अच्युत, अधोक्षज, वृषाकपि और खण्डपरशु का अर्थ बताते हैं और हर नाम को अपने किसी कर्म या स्वभाव से जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि दक्ष का यज्ञ नष्ट करने के बाद रुद्र ने नर-नारायण पर त्रिशूल चलाया, दोनों में युद्ध हुआ और ब्रह्मा ने आकर सन्धि कराई; नारायण और रुद्र ने एक-दूसरे को चिह्न देकर मित्रता की। अन्त में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि युद्ध में उनके आगे चलनेवाला रुद्र ही था।

अध्याय 351अध्याय-सूचीअध्याय 353

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 1 (12.352.1)

सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत्केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः । बोधयंस्तापयंश्चैव जगदुत्तिष्ठतः पृथक् ॥

sūryācandramasau śaśvatkeśairme aṃśusañjñitaiḥ | bodhayaṃstāpayaṃścaiva jagaduttiṣṭhataḥ pṛthak

मेरे जिन केशों को किरणें कहा जाता है, उनसे सूर्य और चन्द्रमा सदा अलग-अलग जगत् को जगाते और तपाते रहते हैं, जब वह उठ खड़ा होता है।

श्लोक 2 (12.352.2)

बोधनात्तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत् । अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन ॥

bodhanāttāpanāccaiva jagato harṣaṇaṃ bhavet | agnīṣomakṛtairebhiḥ karmabhiḥ pāṇḍunandana

हे पाण्डुनन्दन! इस जगाने और तपाने से जगत् को आनन्द मिलता है। यह सब अग्नि और सोम द्वारा किए गए मेरे ही कर्म हैं।

श्लोक 3 (12.352.3)

हृषीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावनः ॥

hṛṣīkeśo'hamīśāno varado lokabhāvanaḥ

मैं हृषीकेश हूँ, ईशान हूँ, वर देनेवाला और लोकों को उत्पन्न करनेवाला हूँ।

श्लोक 4 (12.352.4)

इडोपहूतयोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम् । वर्णश्च मे हरिश्रेष्ठस्तस्माद्धरिरहं स्मृतः ॥

iḍopahūtayogena hare bhāgaṃ kratuṣvaham | varṇaśca me hariśreṣṭhastasmāddharirahaṃ smṛtaḥ

इडा के आह्वान के साथ मैं यज्ञों में अपना भाग ग्रहण करता (हरण करता) हूँ, और मेरा वर्ण हरि अर्थात् पीताभ रंगों में श्रेष्ठ है; इसीलिए मैं हरि कहलाता हूँ।

श्लोक 5 (12.352.5)

धाम सारो हि लोकानामृतं चैव विचारितम् । ऋतधामा ततो विप्रैः सत्यश्चाहं प्रकीर्तितः ॥

dhāma sāro hi lokānāmṛtaṃ caiva vicāritam | ṛtadhāmā tato vipraiḥ satyaścāhaṃ prakīrtitaḥ

धाम लोकों का सार है और ऋत का भी विचार किया गया है; इसलिए विद्वान् ब्राह्मण मुझे ऋतधामा और सत्य कहकर पुकारते हैं।

श्लोक 6 (12.352.6)

नष्टां च धरणीं पूर्वमविन्दं वै गुहागताम् । गोविन्द इति मां देवा वाग्भिः समभितुष्टुवुः ॥

naṣṭāṃ ca dharaṇīṃ pūrvamavindaṃ vai guhāgatām | govinda iti māṃ devā vāgbhiḥ samabhituṣṭuvuḥ

पूर्वकाल में मैंने गुफा में जा छिपी हुई, खोई हुई पृथ्वी को पा लिया था; इसलिए देवताओं ने अपनी वाणी से मेरी स्तुति करके मुझे गोविन्द कहा।

श्लोक 7 (12.352.7)

शिपिविष्टेति चाख्यायां हीनरोमा च यो भवेत् । तेनाविष्टं हि यत्किञ्चिच्छिपिविष्टं हि तत्स्मृतम् ॥

śipiviṣṭeti cākhyāyāṃ hīnaromā ca yo bhavet | tenāviṣṭaṃ hi yatkiñcicchipiviṣṭaṃ hi tatsmṛtam

'शिपिविष्ट' नाम में 'शिपि' उसे कहते हैं जो रोमरहित हो; उससे जो कुछ व्याप्त (आविष्ट) है, वह शिपिविष्ट कहा गया है।

श्लोक 8 (12.352.8)

यास्को मामृषिरव्यग्रो नैकयज्ञेषु गीतवान् । शिपिविष्ट इति ह्यस्माद्गुह्यनामधरो ह्यहम् ॥

yāsko māmṛṣiravyagro naikayajñeṣu gītavān | śipiviṣṭa iti hyasmādguhyanāmadharo hyaham

शान्तचित्त ऋषि यास्क ने अनेक यज्ञों में मेरा गान किया है; इसी कारण मैं 'शिपिविष्ट' इस गुह्य नाम को धारण करनेवाला हूँ।

श्लोक 9 (12.352.9)

स्तुत्वा मां शिपिविष्टेति यास्को ऋषिरुदारधीः । मत्प्रसादादधो नष्टं निरुक्तमभिजग्मिवान् ॥

stutvā māṃ śipiviṣṭeti yāsko ṛṣirudāradhīḥ | matprasādādadho naṣṭaṃ niruktamabhijagmivān

उदार बुद्धिवाले ऋषि यास्क ने मुझे 'शिपिविष्ट' कहकर स्तुति की और मेरी कृपा से नीचे खोए हुए निरुक्त को पुनः प्राप्त किया।

श्लोक 10 (12.352.10)

न हि जातो न जायेऽहं न जनिष्ये कदाचन । क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां तस्मादहमजः स्मृतः ॥

na hi jāto na jāye'haṃ na janiṣye kadācana | kṣetrajñaḥ sarvabhūtānāṃ tasmādahamajaḥ smṛtaḥ

मैं न कभी जन्मा था, न अब जन्मता हूँ और न कभी जन्मूँगा। मैं सब प्राणियों का क्षेत्रज्ञ हूँ; इसीलिए मैं 'अज' कहा गया हूँ।

श्लोक 11 (12.352.11)

नोक्तपूर्वं मया क्षुद्रमश्लीलं वा कदाचन । ऋता ब्रह्मसुता सा मे सत्या देवी सरस्वती ॥

noktapūrvaṃ mayā kṣudramaślīlaṃ vā kadācana | ṛtā brahmasutā sā me satyā devī sarasvatī

मैंने कभी कोई क्षुद्र या अश्लील बात नहीं कही। ब्रह्मा की पुत्री देवी सरस्वती मेरे लिए ऋत और सत्य स्वरूपा है।

श्लोक 12 (12.352.12)

सच्चासच्चैव कौन्तेय मयावेशितमात्मनि । पौष्करे ब्रह्मसदने सत्यं मामृषयो विदुः ॥

saccāsaccaiva kaunteya mayāveśitamātmani | pauṣkare brahmasadane satyaṃ māmṛṣayo viduḥ

हे कुन्तीपुत्र! सत् और असत् दोनों को मैंने अपने भीतर बसा रखा है; इसलिए पुष्कर में, ब्रह्मा के निवास में, ऋषि मुझे सत्य के रूप में जानते हैं।

श्लोक 13 (12.352.13)

सत्त्वान्न च्युतपूर्वोऽहं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम् । जन्मनीहाभवत्सत्त्वं पौर्विकं मे धनञ्जय ॥

sattvānna cyutapūrvo'haṃ sattvaṃ vai viddhi matkṛtam | janmanīhābhavatsattvaṃ paurvikaṃ me dhanañjaya

मैं सत्त्व से कभी च्युत नहीं हुआ; जान लो कि सत्त्व मेरा ही रचा हुआ है। हे धनंजय! इस जन्म में भी मेरा पहले का सत्त्व प्रकट हुआ।

श्लोक 14 (12.352.14)

निराशीःकर्मसंयुक्तं सात्वतं मां प्रकल्पय । सात्वतज्ञानदृष्टोऽहं सात्वतः सात्वतां पतिः ॥

nirāśīḥkarmasaṃyuktaṃ sātvataṃ māṃ prakalpaya | sātvatajñānadṛṣṭo'haṃ sātvataḥ sātvatāṃ patiḥ

मुझे सात्वत समझो, जो फल की आशा के बिना कर्म में लगा रहता है। सात्वत ज्ञान से मेरा दर्शन होता है; मैं सात्वत हूँ और सात्वतों का स्वामी हूँ।

श्लोक 15 (12.352.15)

कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान् । कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात्तस्मात्कृष्णोऽहमर्जुन ॥

kṛṣāmi medinīṃ pārtha bhūtvā kārṣṇāyaso mahān | kṛṣṇo varṇaśca me yasmāttasmātkṛṣṇo'hamarjuna

हे पार्थ! मैं काले लोहे का विशाल हल बनकर पृथ्वी को जोतता हूँ, और मेरा वर्ण काला है; इसलिए हे अर्जुन, मैं कृष्ण हूँ।

श्लोक 16 (12.352.16)

मया संश्लेषिता भूमिरद्भिर्व्योम च वायुना । वायुश्च तेजसा सार्धं वैकुण्ठत्वं ततो मम ॥

mayā saṃśleṣitā bhūmiradbhirvyoma ca vāyunā | vāyuśca tejasā sārdhaṃ vaikuṇṭhatvaṃ tato mama

मैंने पृथ्वी को जल से, आकाश को वायु से और वायु को तेज से जोड़ दिया है; इसीलिए मेरा नाम वैकुण्ठ है।

श्लोक 17 (12.352.17)

निर्वाणं परमं सौख्यं धर्मोऽसौ पर उच्यते । तस्मान्न च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा ॥

nirvāṇaṃ paramaṃ saukhyaṃ dharmo'sau para ucyate | tasmānna cyutapūrvo'hamacyutastena karmaṇā

निर्वाण परम सुख है और वही परम धर्म कहा जाता है; उससे मैं कभी च्युत नहीं हुआ, इस कर्म के कारण मैं अच्युत हूँ।

श्लोक 18 (12.352.18)

पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वलौकिके । तयोः सन्धारणार्थं हि मामधोक्षजमञ्जसा ॥

pṛthivīnabhasī cobhe viśrute viśvalaukike | tayoḥ sandhāraṇārthaṃ hi māmadhokṣajamañjasā

पृथ्वी और आकाश दोनों प्रसिद्ध हैं और सारे संसार में फैले हुए हैं; उन दोनों को धारण करने के लिए ही मुझे अधोक्षज कहा जाता है।

श्लोक 19 (12.352.19)

निरुक्तं वेदविदुषो ये च शब्दार्थचिन्तकाः । ते मां गायन्ति प्राग्वंशे अधोक्षज इति स्थितिः ॥

niruktaṃ vedaviduṣo ye ca śabdārthacintakāḥ | te māṃ gāyanti prāgvaṃśe adhokṣaja iti sthitiḥ

वेद और निरुक्त के जाननेवाले तथा शब्द और अर्थ का चिन्तन करनेवाले लोग यज्ञशाला में मुझे 'अधोक्षज' कहकर गाते हैं; यही स्थिति है।

श्लोक 20 (12.352.20)

शब्द एकमतैरेष व्याहृतः परमर्षिभिः । नान्यो ह्यधोक्षजो लोके ऋते नारायणं प्रभुम् ॥

śabda ekamataireṣa vyāhṛtaḥ paramarṣibhiḥ | nānyo hyadhokṣajo loke ṛte nārāyaṇaṃ prabhum

महर्षियों ने एकमत होकर यह शब्द कहा है; संसार में प्रभु नारायण के सिवा दूसरा कोई अधोक्षज नहीं है।

श्लोक 21 (12.352.21)

घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम् । घृतार्चिरहमव्यग्रैर्वेदज्ञैः परिकीर्तितः ॥

ghṛtaṃ mamārciṣo loke jantūnāṃ prāṇadhāraṇam | ghṛtārcirahamavyagrairvedajñaiḥ parikīrtitaḥ

संसार में प्राणियों के प्राण को धारण करनेवाला घी मेरी ज्वालाओं का है; इसलिए शान्त वेदज्ञ मुझे 'घृतार्चि' कहते हैं।

श्लोक 22 (12.352.22)

त्रयो हि धातवः ख्याताः कर्मजा इति च स्मृताः । पित्तं श्लेष्मा च वायुश्च एष सङ्घात उच्यते ॥

trayo hi dhātavaḥ khyātāḥ karmajā iti ca smṛtāḥ | pittaṃ śleṣmā ca vāyuśca eṣa saṅghāta ucyate

तीन धातुएँ प्रसिद्ध हैं और वे कर्म से उत्पन्न मानी गई हैं: पित्त, कफ और वायु। इन्हीं का संघात कहलाता है।

श्लोक 23 (12.352.23)

एतैश्च धार्यते जन्तुरेतैः क्षीणैश्च क्षीयते । आयुर्वेदविदस्तस्मात्त्रिधातुं मां प्रचक्षते ॥

etaiśca dhāryate janturetaiḥ kṣīṇaiśca kṣīyate | āyurvedavidastasmāttridhātuṃ māṃ pracakṣate

इन्हीं से प्राणी धारण किया जाता है और इनके क्षीण होने पर क्षीण हो जाता है; इसलिए आयुर्वेद के जाननेवाले मुझे 'त्रिधातु' कहते हैं।

श्लोक 24 (12.352.24)

वृषो हि भगवान्धर्मः ख्यातो लोकेषु भारत । नैघण्टुकपदाख्यातं विद्धि मां वृषमुत्तमम् ॥

vṛṣo hi bhagavāndharmaḥ khyāto lokeṣu bhārata | naighaṇṭukapadākhyātaṃ viddhi māṃ vṛṣamuttamam

हे भारत! भगवान् धर्म लोकों में 'वृष' नाम से प्रसिद्ध है। नैघण्टुक पदों की व्याख्या के अनुसार मुझे परम वृष समझो।

श्लोक 25 (12.352.25)

कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते । तस्माद्वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापतिः ॥

kapirvarāhaḥ śreṣṭhaśca dharmaśca vṛṣa ucyate | tasmādvṛṣākapiṃ prāha kaśyapo māṃ prajāpatiḥ

'कपि' का अर्थ श्रेष्ठ वराह है और धर्म को 'वृष' कहा जाता है; इसीलिए प्रजापति कश्यप ने मुझे 'वृषाकपि' कहा।

श्लोक 26 (12.352.26)

न चादिं न मध्यं तथा नैव चान्तं; कदाचिद्विदन्ते सुराश्चासुराश्च । अनाद्यो ह्यमध्यस्तथा चाप्यनन्तः; प्रगीतोऽहमीशो विभुर्लोकसाक्षी ॥

na cādiṃ na madhyaṃ tathā naiva cāntaṃ; kadācidvidante surāścāsurāśca | anādyo hyamadhyastathā cāpyanantaḥ; pragīto'hamīśo vibhurlokasākṣī

देवता और असुर मेरा न आदि जानते हैं, न मध्य, न अन्त। मैं अनादि, मध्यरहित और अनन्त हूँ; इसीलिए ईश, विभु और लोकों का साक्षी कहकर गाया जाता हूँ।

श्लोक 27 (12.352.27)

शुचीनि श्रवणीयानि शृणोमीह धनञ्जय । न च पापानि गृह्णामि ततोऽहं वै शुचिश्रवाः ॥

śucīni śravaṇīyāni śṛṇomīha dhanañjaya | na ca pāpāni gṛhṇāmi tato'haṃ vai śuciśravāḥ

हे धनंजय! मैं यहाँ केवल पवित्र और सुनने योग्य बातें सुनता हूँ और पाप की बातें ग्रहण नहीं करता; इसलिए मैं 'शुचिश्रवा' हूँ।

श्लोक 28 (12.352.28)

एकशृङ्गः पुरा भूत्वा वराहो दिव्यदर्शनः । इमामुद्धृतवान्भूमिमेकशृङ्गस्ततो ह्यहम् ॥

ekaśṛṅgaḥ purā bhūtvā varāho divyadarśanaḥ | imāmuddhṛtavānbhūmimekaśṛṅgastato hyaham

पूर्वकाल में मैंने दिव्य रूपवाला, एक सींगवाला वराह बनकर इस पृथ्वी का उद्धार किया था; इसलिए मैं 'एकशृंग' हूँ।

श्लोक 29 (12.352.29)

तथैवासं त्रिककुदो वाराहं रूपमास्थितः । त्रिककुत्तेन विख्यातः शरीरस्य तु मापनात् ॥

tathaivāsaṃ trikakudo vārāhaṃ rūpamāsthitaḥ | trikakuttena vikhyātaḥ śarīrasya tu māpanāt

उसी प्रकार मैं वराह का रूप धारण करके तीन ककुदों (डिल्लों) वाला हुआ; शरीर के माप के कारण मैं 'त्रिककुत्' नाम से विख्यात हूँ।

श्लोक 30 (12.352.30)

विरिञ्च इति यः प्रोक्तः कपिलज्ञानचिन्तकैः । स प्रजापतिरेवाहं चेतनात्सर्वलोककृत् ॥

viriñca iti yaḥ proktaḥ kapilajñānacintakaiḥ | sa prajāpatirevāhaṃ cetanātsarvalokakṛt

कपिल के ज्ञान का चिन्तन करनेवाले जिसे 'विरिञ्चि' कहते हैं, वह प्रजापति मैं ही हूँ, जो संकल्प मात्र से सब लोकों की रचना करता है।

श्लोक 31 (12.352.31)

विद्यासहायवन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् । कपिलं प्राहुराचार्याः साङ्ख्या निश्चितनिश्चयाः ॥

vidyāsahāyavantaṃ māmādityasthaṃ sanātanam | kapilaṃ prāhurācāryāḥ sāṅkhyā niścitaniścayāḥ

दृढ़ निश्चयवाले सांख्य के आचार्य मुझे 'कपिल' कहते हैं, जो विद्या को सहायक बनाए हुए, सूर्य में स्थित और सनातन है।

श्लोक 32 (12.352.32)

हिरण्यगर्भो द्युतिमानेष यश्छन्दसि स्तुतः । योगैः सम्पूज्यते नित्यं स एवाहं विभुः स्मृतः ॥

hiraṇyagarbho dyutimāneṣa yaśchandasi stutaḥ | yogaiḥ sampūjyate nityaṃ sa evāhaṃ vibhuḥ smṛtaḥ

वेद के छन्दों में जिसकी स्तुति की गई है और योगों के द्वारा जिसकी नित्य पूजा होती है, वह तेजस्वी हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ। इसी रूप में विभु मेरा स्मरण किया गया है।

श्लोक 33 (12.352.33)

एकविंशतिशाखं च ऋग्वेदं मां प्रचक्षते । सहस्रशाखं यत्साम ये वै वेदविदो जनाः ॥

ekaviṃśatiśākhaṃ ca ṛgvedaṃ māṃ pracakṣate | sahasraśākhaṃ yatsāma ye vai vedavido janāḥ

वे मुझे इक्कीस शाखाओं वाला ऋग्वेद कहते हैं, और हज़ार शाखाओं वाला जो साम है, उसे वेद के जाननेवाले जो लोग

श्लोक 34 (12.352.34)

गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्भक्तास्तेऽपि दुर्लभाः ॥

gāyantyāraṇyake viprā madbhaktāste'pi durlabhāḥ

आरण्यक में गाते हैं, वे ब्राह्मण मेरे भक्त हैं; और वे भी दुर्लभ हैं।

श्लोक 35 (12.352.35)

षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत । यस्मिञ्शाखा यजुर्वेदे सोऽहमाध्वर्यवे स्मृतः ॥

ṣaṭpañcāśatamaṣṭau ca saptatriṃśatamityuta | yasmiñśākhā yajurvede so'hamādhvaryave smṛtaḥ

छप्पन, आठ और सैंतीस, इतनी शाखाएँ जिस यजुर्वेद में हैं, उस अध्वर्यु के वेद में मैं वही स्मरण किया गया हूँ।

श्लोक 36 (12.352.36)

पञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभिः परिबृंहितम् । कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा ॥

pañcakalpamatharvāṇaṃ kṛtyābhiḥ paribṛṃhitam | kalpayanti hi māṃ viprā atharvāṇavidastathā

पाँच कल्पों वाले और कृत्याओं से बढ़े हुए अथर्ववेद के रूप में अथर्व को जाननेवाले ब्राह्मण भी मेरी कल्पना करते हैं।

श्लोक 37 (12.352.37)

शाखाभेदाश्च ये केचिद्याश्च शाखासु गीतयः । स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वांस्तान्विद्धि मत्कृतान् ॥

śākhābhedāśca ye kecidyāśca śākhāsu gītayaḥ | svaravarṇasamuccārāḥ sarvāṃstānviddhi matkṛtān

शाखाओं के जो भी भेद हैं, शाखाओं में जो भी गान हैं, और स्वर, वर्ण तथा उच्चारण के प्रकार हैं, उन सबको मेरा ही किया हुआ जानो।

श्लोक 38 (12.352.38)

यत्तद्धयशिरः पार्थ समुदेति वरप्रदम् । सोऽहमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित् ॥

yattaddhayaśiraḥ pārtha samudeti varapradam | so'hamevottare bhāge kramākṣaravibhāgavit

हे पार्थ! जो वर देनेवाला हयशिर प्रकट होता है, वह मैं ही हूँ; और उत्तर भाग में मैं क्रम तथा अक्षर-विभाग का जाननेवाला हूँ।

श्लोक 39 (12.352.39)

रामादेशितमार्गेण मत्प्रसादान्महात्मना । पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तस्तस्माद्भूतात्सनातनात् ॥

rāmādeśitamārgeṇa matprasādānmahātmanā | pāñcālena kramaḥ prāptastasmādbhūtātsanātanāt

राम के बताए मार्ग से और मेरी कृपा से महात्मा पाञ्चाल ने उस सनातन भूत से क्रम प्राप्त किया।

श्लोक 40 (12.352.40)

बाभ्रव्यगोत्रः स बभौ प्रथमः क्रमपारगः ॥

bābhravyagotraḥ sa babhau prathamaḥ kramapāragaḥ

बाभ्रव्य गोत्र का वह पुरुष क्रम में पारंगत होकर सबसे पहले शोभित हुआ।

श्लोक 41 (12.352.41)

नारायणाद्वरं लब्ध्वा प्राप्य योगमनुत्तमम् । क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालवः ॥

nārāyaṇādvaraṃ labdhvā prāpya yogamanuttamam | kramaṃ praṇīya śikṣāṃ ca praṇayitvā sa gālavaḥ

नारायण से वर पाकर और सर्वोत्तम योग को प्राप्त करके उस गालव ने क्रम की रचना की और शिक्षा का प्रणयन किया।

श्लोक 42 (12.352.42)

कण्डरीकोऽथ राजा च ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । जातीमरणजं दुःखं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥

kaṇḍarīko'tha rājā ca brahmadattaḥ pratāpavān | jātīmaraṇajaṃ duḥkhaṃ smṛtvā smṛtvā punaḥ punaḥ

फिर कण्डरीक और प्रतापी राजा ब्रह्मदत्त, जन्म और मृत्यु से उत्पन्न दुःख को बार-बार स्मरण करके,

श्लोक 43 (12.352.43)

सप्तजातिषु मुख्यत्वाद्योगानां सम्पदं गतः ॥

saptajātiṣu mukhyatvādyogānāṃ sampadaṃ gataḥ

सात जन्मों में प्रधान होने के कारण योगों की सम्पदा को प्राप्त हुए।

श्लोक 44 (12.352.44)

पुराहमात्मजः पार्थ प्रथितः कारणान्तरे । धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मजः स्मृतः ॥

purāhamātmajaḥ pārtha prathitaḥ kāraṇāntare | dharmasya kuruśārdūla tato'haṃ dharmajaḥ smṛtaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ! पूर्वकाल में किसी दूसरे कारण से मैं धर्म का पुत्र प्रसिद्ध हुआ; इसलिए मैं 'धर्मज' कहा गया हूँ।

श्लोक 45 (12.352.45)

नरनारायणौ पूर्वं तपस्तेपतुरव्ययम् । धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने ॥

naranārāyaṇau pūrvaṃ tapastepaturavyayam | dharmayānaṃ samārūḍhau parvate gandhamādane

पूर्वकाल में नर और नारायण धर्मरूपी यान पर आरूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत पर अविनाशी तप कर रहे थे।

श्लोक 46 (12.352.46)

तत्कालसमयं चैव दक्षयज्ञो बभूव ह । न चैवाकल्पयद्भागं दक्षो रुद्रस्य भारत ॥

tatkālasamayaṃ caiva dakṣayajño babhūva ha | na caivākalpayadbhāgaṃ dakṣo rudrasya bhārata

उसी समय दक्ष का यज्ञ हुआ, और हे भारत! दक्ष ने रुद्र के लिए कोई भाग नहीं रखा।

श्लोक 47 (12.352.47)

ततो दधीचिवचनाद्दक्षयज्ञमपाहरत् । ससर्ज शूलं क्रोधेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः ॥

tato dadhīcivacanāddakṣayajñamapāharat | sasarja śūlaṃ krodhena prajvalantaṃ muhurmuhuḥ

तब दधीचि के कहने से रुद्र ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और क्रोध से बार-बार जलता हुआ त्रिशूल छोड़ा।

श्लोक 48 (12.352.48)

तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम् । आवयोः सहसागच्छद्बदर्याश्रममन्तिकात् ॥

tacchūlaṃ bhasmasātkṛtvā dakṣayajñaṃ savistaram | āvayoḥ sahasāgacchadbadaryāśramamantikāt

वह त्रिशूल दक्ष के विस्तृत यज्ञ को भस्म करके सहसा हम दोनों के पास बदरिकाश्रम की ओर आया,

श्लोक 49 (12.352.49)

वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि ॥

vegena mahatā pārtha patannārāyaṇorasi

और हे पार्थ! बड़े वेग से नारायण की छाती पर आ गिरा।

श्लोक 50 (12.352.50)

ततः स्वतेजसाविष्टाः केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुञ्जवर्णास्तु ततोऽहं मुञ्जकेशवान् ॥

tataḥ svatejasāviṣṭāḥ keśā nārāyaṇasya ha | babhūvurmuñjavarṇāstu tato'haṃ muñjakeśavān

तब अपने ही तेज से भर जाने के कारण नारायण के केश मूँज के रंग के हो गए; इसलिए मैं 'मुञ्जकेशवान्' हूँ।

श्लोक 51 (12.352.51)

तच्च शूलं विनिर्धूतं हुङ्कारेण महात्मना । जगाम शङ्करकरं नारायणसमाहतम् ॥

tacca śūlaṃ vinirdhūtaṃ huṅkāreṇa mahātmanā | jagāma śaṅkarakaraṃ nārāyaṇasamāhatam

और उस महात्मा के हुंकार से धक्का खाया हुआ तथा नारायण से टकराया हुआ वह त्रिशूल शंकर के हाथ में लौट गया।

श्लोक 52 (12.352.52)

अथ रुद्र उपाधावत्तावृषी तपसान्वितौ । तत एनं समुद्धूतं कण्ठे जग्राह पाणिना ॥

atha rudra upādhāvattāvṛṣī tapasānvitau | tata enaṃ samuddhūtaṃ kaṇṭhe jagrāha pāṇinā

तब रुद्र तप से सम्पन्न उन दोनों ऋषियों पर झपटा; तब उड़कर आते हुए उसे नारायण ने हाथ से गले में पकड़ लिया।

श्लोक 53 (12.352.53)

नारायणः स विश्वात्मा तेनास्य शितिकण्ठता ॥

nārāyaṇaḥ sa viśvātmā tenāsya śitikaṇṭhatā

वे नारायण विश्वात्मा हैं; इसी से इसका कण्ठ नीला हुआ।

श्लोक 54 (12.352.54)

अथ रुद्रविघातार्थमिषीकां जगृहे नरः । मन्त्रैश्च संयुयोजाशु सोऽभवत्परशुर्महान् ॥

atha rudravighātārthamiṣīkāṃ jagṛhe naraḥ | mantraiśca saṃyuyojāśu so'bhavatparaśurmahān

तब रुद्र को मारने के लिए नर ने एक सींक उठाई और शीघ्र उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया; वह एक बड़ा परशु बन गया।

श्लोक 55 (12.352.55)

क्षिप्तश्च सहसा रुद्रे खण्डनं प्राप्तवांस्तदा । ततोऽहं खण्डपरशुः स्मृतः परशुखण्डनात् ॥

kṣiptaśca sahasā rudre khaṇḍanaṃ prāptavāṃstadā | tato'haṃ khaṇḍaparaśuḥ smṛtaḥ paraśukhaṇḍanāt

वह रुद्र पर सहसा फेंका गया और टूट गया; परशु के टूटने के कारण मैं 'खण्डपरशु' कहा गया हूँ।

अर्जुन उवाच

श्लोक 56 (12.352.56)

अस्मिन्युद्धे तु वार्ष्णेय त्रैलोक्यमथने तदा । जयं कः प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन ॥

asminyuddhe tu vārṣṇeya trailokyamathane tadā | jayaṃ kaḥ prāptavāṃstatra śaṃsaitanme janārdana

हे वार्ष्णेय! तीनों लोकों को मथ डालनेवाले उस युद्ध में वहाँ विजय किसे मिली? हे जनार्दन! यह मुझे बताइए।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 57 (12.352.57)

तयोः संलग्नयोर्युद्धे रुद्रनारायणात्मनोः । उद्विग्नाः सहसा कृत्स्ना लोकाः सर्वेऽभवंस्तदा ॥

tayoḥ saṃlagnayoryuddhe rudranārāyaṇātmanoḥ | udvignāḥ sahasā kṛtsnā lokāḥ sarve'bhavaṃstadā

जब रुद्र और नारायण युद्ध में भिड़ गए, तब सभी लोक सहसा व्याकुल हो उठे।

श्लोक 58 (12.352.58)

नागृह्णात्पावकः शुभ्रं मखेषु सुहुतं हविः । वेदा न प्रतिभान्ति स्म ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥

nāgṛhṇātpāvakaḥ śubhraṃ makheṣu suhutaṃ haviḥ | vedā na pratibhānti sma ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām

यज्ञों में अच्छी तरह दी गई उज्ज्वल आहुति को अग्नि ने ग्रहण नहीं किया, और शुद्ध आत्मावाले ऋषियों को वेद स्फुरित नहीं हुए।

श्लोक 59 (12.352.59)

देवान्रजस्तमश्चैव समाविविशतुस्तदा । वसुधा सञ्चकम्पेऽथ नभश्च विपफाल ह ॥

devānrajastamaścaiva samāviviśatustadā | vasudhā sañcakampe'tha nabhaśca vipaphāla ha

देवताओं में रजोगुण और तमोगुण प्रवेश कर गए; पृथ्वी काँप उठी और आकाश फट गया।

श्लोक 60 (12.352.60)

निष्प्रभाणि च तेजांसि ब्रह्मा चैवासनाच्च्युतः । अगाच्छोषं समुद्रश्च हिमवांश्च व्यशीर्यत ॥

niṣprabhāṇi ca tejāṃsi brahmā caivāsanāccyutaḥ | agācchoṣaṃ samudraśca himavāṃśca vyaśīryata

तेज निष्प्रभ हो गए और ब्रह्मा अपने आसन से गिर पड़े; समुद्र सूख गया और हिमालय टूटकर बिखर गया।

श्लोक 61 (12.352.61)

तस्मिन्नेवं समुत्पन्ने निमित्ते पाण्डुनन्दन । ब्रह्मा वृतो देवगणैरृषिभिश्च महात्मभिः ॥

tasminnevaṃ samutpanne nimitte pāṇḍunandana | brahmā vṛto devagaṇairṛṣibhiśca mahātmabhiḥ

हे पाण्डुनन्दन! जब ऐसा अपशकुन उत्पन्न हुआ,

श्लोक 62 (12.352.62)

आजगामाशु तं देशं यत्र युद्धमवर्तत ॥

ājagāmāśu taṃ deśaṃ yatra yuddhamavartata

तब देवगणों और महात्मा ऋषियों से घिरे हुए ब्रह्मा शीघ्र ही उस स्थान पर आए जहाँ युद्ध हो रहा था।

श्लोक 63 (12.352.63)

साञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तगः । उवाच वचनं रुद्रं लोकानामस्तु वै शिवम् ॥

sāñjalipragraho bhūtvā caturvaktro niruktagaḥ | uvāca vacanaṃ rudraṃ lokānāmastu vai śivam

हाथ जोड़कर और आगे बढ़ाकर, निरुक्त के ज्ञाता चतुर्मुख ब्रह्मा ने रुद्र से कहा, 'लोकों का कल्याण हो।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 64 (12.352.64)

न्यस्यायुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया ॥

nyasyāyudhāni viśveśa jagato hitakāmyayā

हे विश्वेश्वर! जगत् के हित की कामना से अपने आयुध रख दीजिए।

श्लोक 65 (12.352.65)

यदक्षरमथाव्यक्तमीशं लोकस्य भावनम् । कूटस्थं कर्तृनिर्द्वंद्वमकर्तेति च यं विदुः ॥

yadakṣaramathāvyaktamīśaṃ lokasya bhāvanam | kūṭasthaṃ kartṛnirdvaṃdvamakarteti ca yaṃ viduḥ

जो अक्षर और अव्यक्त है, ईश्वर है, लोक की उत्पत्ति का कारण है, कूटस्थ है, द्वन्द्वों से रहित कर्ता है और जिसे अकर्ता भी जानते हैं,

श्लोक 66 (12.352.66)

व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शिवा । नरो नारायणश्चैव जातौ धर्मकुलोद्वहौ ॥

vyaktibhāvagatasyāsya ekā mūrtiriyaṃ śivā | naro nārāyaṇaścaiva jātau dharmakulodvahau

व्यक्त भाव में आए हुए उसी की यह एक कल्याणमयी मूर्ति है: नर और नारायण, जो धर्म के कुल को धारण करनेवाले रूप में उत्पन्न हुए हैं,

श्लोक 67 (12.352.67)

तपसा महता युक्तौ देवश्रेष्ठौ महाव्रतौ । अहं प्रसादजस्तस्य कस्मिंश्चित्कारणान्तरे ॥

tapasā mahatā yuktau devaśreṣṭhau mahāvratau | ahaṃ prasādajastasya kasmiṃścitkāraṇāntare

महान् तप से युक्त, देवताओं में श्रेष्ठ और महाव्रती हैं। मैं किसी अवसर पर उन्हीं की कृपा से उत्पन्न हुआ हूँ,

श्लोक 68 (12.352.68)

त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातनः ॥

tvaṃ caiva krodhajastāta pūrvasarge sanātanaḥ

और हे तात! तुम पूर्व सृष्टि में उनके क्रोध से उत्पन्न हुए हो, तुम सनातन हो।

श्लोक 69 (12.352.69)

मया च सार्धं वरदं विबुधैश्च महर्षिभिः । प्रसादयाशु लोकानां शान्तिर्भवतु माचिरम् ॥

mayā ca sārdhaṃ varadaṃ vibudhaiśca maharṣibhiḥ | prasādayāśu lokānāṃ śāntirbhavatu māciram

मेरे साथ, देवताओं और महर्षियों के साथ वर देनेवाले को शीघ्र प्रसन्न कीजिए, जिससे लोकों में शान्ति बिना देर के हो।'

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 70 (12.352.70)

ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् । प्रसादयामास ततो देवं नारायणं प्रभुम् ॥

brahmaṇā tvevamuktastu rudraḥ krodhāgnimutsṛjan | prasādayāmāsa tato devaṃ nārāyaṇaṃ prabhum

ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर रुद्र ने क्रोध की अग्नि को छोड़कर प्रभु देव नारायण को प्रसन्न किया,

श्लोक 71 (12.352.71)

शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं हरिम् ॥

śaraṇaṃ ca jagāmādyaṃ vareṇyaṃ varadaṃ harim

और उन आदि, श्रेष्ठ और वर देनेवाले हरि की शरण ली।

श्लोक 72 (12.352.72)

ततोऽथ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रियः । प्रीतिमानभवत्तत्र रुद्रेण सह सङ्गतः ॥

tato'tha varado devo jitakrodho jitendriyaḥ | prītimānabhavattatra rudreṇa saha saṅgataḥ

तब क्रोध और इन्द्रियों को जीतनेवाले वरदाता देव रुद्र से मिलकर वहाँ प्रसन्न हो गए,

श्लोक 73 (12.352.73)

ऋषिभिर्ब्रह्मणा चैव विबुधैश्च सुपूजितः । उवाच देवमीशानमीशः स जगतो हरिः ॥

ṛṣibhirbrahmaṇā caiva vibudhaiśca supūjitaḥ | uvāca devamīśānamīśaḥ sa jagato hariḥ

ऋषियों, ब्रह्मा और देवताओं से भलीभाँति पूजित होकर जगत् के स्वामी उन हरि ने देव ईशान से कहा:

नारायण उवाच

श्लोक 74 (12.352.74)

यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किञ्चिन्मा ते भूद्बुद्धिरन्यथा ॥

yastvāṃ vetti sa māṃ vetti yastvāmanu sa māmanu | nāvayorantaraṃ kiñcinmā te bhūdbuddhiranyathā

'जो तुम्हें जानता है वह मुझे जानता है; जो तुम्हारा अनुसरण करता है वह मेरा अनुसरण करता है। हम दोनों में कुछ भी भेद नहीं है; तुम्हारी बुद्धि अन्यथा न हो।

श्लोक 75 (12.352.75)

अद्य प्रभृति श्रीवत्सः शूलाङ्कोऽयं भवत्वयम् । मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि ॥

adya prabhṛti śrīvatsaḥ śūlāṅko'yaṃ bhavatvayam | mama pāṇyaṅkitaścāpi śrīkaṇṭhastvaṃ bhaviṣyasi

आज से यह श्रीवत्स शूल के चिह्न से अंकित हो, और तुम मेरे हाथ से अंकित होकर 'श्रीकण्ठ' होगे।'

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 76 (12.352.76)

एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा । सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी ॥

evaṃ lakṣaṇamutpādya parasparakṛtaṃ tadā | sakhyaṃ caivātulaṃ kṛtvā rudreṇa sahitāvṛṣī

इस प्रकार एक-दूसरे का चिह्न बनाकर और अनुपम मित्रता स्थापित करके,

श्लोक 77 (12.352.77)

तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकसः ॥

tapastepaturavyagrau visṛjya tridivaukasaḥ

दोनों ऋषि रुद्र के साथ स्वर्गवासियों को विदा करके निश्चिन्त होकर फिर तप करने लगे।

श्लोक 78 (12.352.78)

एष ते कथितः पार्थ नारायणजयो मृधे । नामानि चैव गुह्यानि निरुक्तानि च भारत ॥

eṣa te kathitaḥ pārtha nārāyaṇajayo mṛdhe | nāmāni caiva guhyāni niruktāni ca bhārata

हे पार्थ! यह मैंने तुम्हें युद्ध में नारायण की विजय का वृत्तान्त बताया, और हे भारत! गुह्य नामों को उनकी व्याख्याओं सहित भी,

श्लोक 79 (12.352.79)

ऋषिभिः कथितानीह यानि सङ्कीर्तितानि ते ॥

ṛṣibhiḥ kathitānīha yāni saṅkīrtitāni te

जो ऋषियों ने कहे हैं और जिनका मैंने यहाँ तुम्हारे सामने कीर्तन किया।

श्लोक 80 (12.352.80)

एवं बहुविधै रूपैश्चरामीह वसुन्धराम् । ब्रह्मलोकं च कौन्तेय गोलोकं च सनातनम् ॥

evaṃ bahuvidhai rūpaiścarāmīha vasundharām | brahmalokaṃ ca kaunteya golokaṃ ca sanātanam

हे कुन्तीपुत्र! इस प्रकार अनेक रूपों में मैं पृथ्वी पर विचरता हूँ, तथा ब्रह्मलोक और सनातन गोलोक में भी;

श्लोक 81 (12.352.81)

मया त्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तवाञ्जयम् ॥

mayā tvaṃ rakṣito yuddhe mahāntaṃ prāptavāñjayam

मैंने ही युद्ध में तुम्हारी रक्षा की, और तुमने महान् विजय पाई।

श्लोक 82 (12.352.82)

यस्तु ते सोऽग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते । तं विद्धि रुद्रं कौन्तेय देवदेवं कपर्दिनम् ॥

yastu te so'grato yāti yuddhe sampratyupasthite | taṃ viddhi rudraṃ kaunteya devadevaṃ kapardinam

युद्ध उपस्थित होने पर जो तुम्हारे आगे-आगे चलता है, हे कौन्तेय! उसे देवों के देव जटाधारी रुद्र जानो।

श्लोक 83 (12.352.83)

कालः स एव कथितः क्रोधजेति मया तव । निहतांस्तेन वै पूर्वं हतवानसि वै रिपून् ॥

kālaḥ sa eva kathitaḥ krodhajeti mayā tava | nihatāṃstena vai pūrvaṃ hatavānasi vai ripūn

वही काल है, जिसे मैंने तुमसे 'क्रोध से उत्पन्न' कहा है; जिन्हें उसने पहले ही मार रखा था, उन्हीं शत्रुओं को तुमने मारा है।

श्लोक 84 (12.352.84)

अप्रमेयप्रभावं तं देवदेवमुमापतिम् । नमस्व देवं प्रयतो विश्वेशं हरमव्ययम् ॥

aprameyaprabhāvaṃ taṃ devadevamumāpatim | namasva devaṃ prayato viśveśaṃ haramavyayam

उन अपार प्रभाववाले, देवों के देव, उमापति, विश्वेश्वर, अविनाशी हर देव को संयत होकर प्रणाम करो।

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