शान्ति पर्व · अध्याय 353
बदरी में नर-नारायण के पास नारद
शौनक नारायण की कथा की प्रशंसा करके पूछते हैं कि श्वेतद्वीप में भगवान् के दर्शन के बाद नारद बदरी क्यों गए; राजा जनमेजय भी व्यास से यही प्रश्न करते हैं और व्यास वैशम्पायन को कथा कहने की आज्ञा देते हैं। वैशम्पायन बताते हैं कि नारद बदरी में उतरे, पुरातन ऋषियों नर और नारायण के दर्शन किए और उनसे सत्कार पाया। नारद उन्हें अपने प्राप्त दर्शन की बात बताकर सदा उनके साथ रहने का संकल्प प्रकट करते हैं।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (12.353.1)
सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् । यच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ॥
saute sumahadākhyānaṃ bhavatā parikīrtitam | yacchrutvā munayaḥ sarve vismayaṃ paramaṃ gatāḥ
सौति! आपने एक अत्यन्त विशाल आख्यान सुनाया है, जिसे सुनकर सभी मुनि परम विस्मय को प्राप्त हो गए हैं।
श्लोक 2 (12.353.2)
सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा फलदं सौते नारायणकथा यथा ॥
sarvāśramābhigamanaṃ sarvatīrthāvagāhanam | na tathā phaladaṃ saute nārāyaṇakathā yathā
सौति! सभी आश्रमों में जाना और सभी तीर्थों में स्नान करना भी वैसा फल नहीं देता, जैसा फल नारायण की कथा देती है।
श्लोक 3 (12.353.3)
पाविताङ्गाः स्म संवृत्ताः श्रुत्वेमामादितः कथाम् । नारायणाश्रयां पुण्यां सर्वपापप्रमोचनीम् ॥
pāvitāṅgāḥ sma saṃvṛttāḥ śrutvemāmāditaḥ kathām | nārāyaṇāśrayāṃ puṇyāṃ sarvapāpapramocanīm
नारायण के आश्रित, सब पापों से छुड़ाने वाली इस पुण्य कथा को आरम्भ से सुनकर हम पवित्र अंगों वाले हो गए हैं।
श्लोक 4 (12.353.4)
दुर्दर्शो भगवान्देवः सर्वलोकनमस्कृतः । सब्रह्मकैः सुरैः कृत्स्नैरन्यैश्चैव महर्षिभिः ॥
durdarśo bhagavāndevaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ | sabrahmakaiḥ suraiḥ kṛtsnairanyaiścaiva maharṣibhiḥ
सब लोकों से नमस्कृत भगवान् देव दुर्दर्श हैं; ब्रह्मा सहित सभी देवताओं और अन्य महर्षियों के लिए भी उनका दर्शन कठिन है।
श्लोक 5 (12.353.5)
दृष्टवान्नारदो यत्तु देवं नारायणं हरिम् । नूनमेतद्ध्यनुमतं तस्य देवस्य सूतज ॥
dṛṣṭavānnārado yattu devaṃ nārāyaṇaṃ harim | nūnametaddhyanumataṃ tasya devasya sūtaja
नारद ने जो देव नारायण हरि के दर्शन किए, वह निश्चय ही उन देव की अनुमति से ही हुआ, हे सूतपुत्र।
श्लोक 6 (12.353.6)
यद्दृष्टवाञ्जगन्नाथमनिरुद्धतनौ स्थितम् । यत्प्राद्रवत्पुनर्भूयो नारदो देवसत्तमौ । नरनारायणौ द्रष्टुं कारणं तद्ब्रवीहि मे ॥
yaddṛṣṭavāñjagannāthamaniruddhatanau sthitam | yatprādravatpunarbhūyo nārado devasattamau | naranārāyaṇau draṣṭuṃ kāraṇaṃ tadbravīhi me
नारद ने जगत् के स्वामी को अनिरुद्ध के शरीर में स्थित देखा था; उसके बाद वे देवश्रेष्ठ नर और नारायण को देखने के लिए फिर क्यों दौड़ पड़े — वह कारण मुझे बताइए।
सौतिरुवाच
श्लोक 7 (12.353.7)
तस्मिन्यज्ञे वर्तमाने राज्ञः पारिक्षितस्य वै । कर्मान्तरेषु विधिवद्वर्तमानेषु शौनक ॥
tasminyajñe vartamāne rājñaḥ pārikṣitasya vai | karmāntareṣu vidhivadvartamāneṣu śaunaka
शौनक! राजा परीक्षित् के पुत्र जनमेजय का वह यज्ञ चल रहा था और बीच-बीच के कर्म विधिपूर्वक हो रहे थे,
श्लोक 8 (12.353.8)
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषिं वेदनिधिं प्रभुम् । परिपप्रच्छ राजेन्द्रः पितामहपितामहम् ॥
kṛṣṇadvaipāyanaṃ vyāsamṛṣiṃ vedanidhiṃ prabhum | paripapraccha rājendraḥ pitāmahapitāmaham
तब राजेन्द्र ने वेदों के निधि, प्रभु ऋषि कृष्णद्वैपायन व्यास से, जो उनके पितामह के पितामह थे, पूछा।
जनमेजय उवाच
श्लोक 9 (12.353.9)
श्वेतद्वीपान्निवृत्तेन नारदेन सुरर्षिणा । ध्यायता भगवद्वाक्यं चेष्टितं किमतः परम् ॥
śvetadvīpānnivṛttena nāradena surarṣiṇā | dhyāyatā bhagavadvākyaṃ ceṣṭitaṃ kimataḥ param
देवर्षि नारद श्वेतद्वीप से लौटकर, भगवान् के वचन का ध्यान करते हुए, इसके बाद क्या करते रहे?
श्लोक 10 (12.353.10)
बदर्याश्रममागम्य समागम्य च तावृषी । कियन्तं कालमवसत्कां कथां पृष्टवांश्च सः ॥
badaryāśramamāgamya samāgamya ca tāvṛṣī | kiyantaṃ kālamavasatkāṃ kathāṃ pṛṣṭavāṃśca saḥ
बदरिकाश्रम पहुँचकर और उन दोनों ऋषियों से मिलकर वे कितने समय वहाँ रहे और उनसे कौन-सी कथा पूछी?
श्लोक 11 (12.353.11)
इदं शतसहस्राद्धि भारताख्यानविस्तरात् । आमन्थ्य मतिमन्थेन ज्ञानोदधिमनुत्तमम् ॥
idaṃ śatasahasrāddhi bhāratākhyānavistarāt | āmanthya matimanthena jñānodadhimanuttamam
एक लाख श्लोकों वाले भारत-आख्यान के विस्तार से आपने बुद्धिरूपी मथानी से मथकर यह अनुपम ज्ञान-सागर निकाला है —
श्लोक 12 (12.353.12)
नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा । आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधीभ्योऽमृतं यथा । समुद्धृतमिदं ब्रह्मन्कथामृतमिदं तथा ॥
navanītaṃ yathā dadhno malayāccandanaṃ yathā | āraṇyakaṃ ca vedebhya oṣadhībhyo'mṛtaṃ yathā | samuddhṛtamidaṃ brahmankathāmṛtamidaṃ tathā
जैसे दही से मक्खन, मलय पर्वत से चन्दन, वेदों से आरण्यक और ओषधियों से अमृत निकाला जाता है, वैसे ही, हे ब्रह्मन्, यह कथामृत निकाला गया है।
श्लोक 13 (12.353.13)
तपोनिधे त्वयोक्तं हि नारायणकथाश्रयम् । स ईशो भगवान्देवः सर्वभूतात्मभावनः ॥
taponidhe tvayoktaṃ hi nārāyaṇakathāśrayam | sa īśo bhagavāndevaḥ sarvabhūtātmabhāvanaḥ
हे तपोनिधि! आपने जो कथा कही, वह नारायण पर आश्रित है; वे भगवान् ईश्वर देव सब प्राणियों के आत्मा और उनके उत्पादक हैं।
श्लोक 14 (12.353.14)
अहो नारायणं तेजो दुर्दर्शं द्विजसत्तम । यत्राविशन्ति कल्पान्ते सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ॥
aho nārāyaṇaṃ tejo durdarśaṃ dvijasattama | yatrāviśanti kalpānte sarve brahmādayaḥ surāḥ
अहो! नारायण का तेज कैसा दुर्दर्श है, हे द्विजश्रेष्ठ! कल्प के अन्त में ब्रह्मा आदि सभी देवता उसी में प्रवेश कर जाते हैं,
श्लोक 15 (12.353.15)
ऋषयश्च सगन्धर्वा यच्च किंचिच्चराचरम् । न ततोऽस्ति परं मन्ये पावनं दिवि चेह च ॥
ṛṣayaśca sagandharvā yacca kiṃciccarācaram | na tato'sti paraṃ manye pāvanaṃ divi ceha ca
और ऋषि, गन्धर्व तथा जो कुछ चर-अचर है, वे भी। मैं मानता हूँ कि स्वर्ग में और यहाँ भी उससे बढ़कर पवित्र करने वाला कुछ नहीं है।
श्लोक 16 (12.353.16)
सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा फलदं चापि नारायणकथा यथा ॥
sarvāśramābhigamanaṃ sarvatīrthāvagāhanam | na tathā phaladaṃ cāpi nārāyaṇakathā yathā
सब आश्रमों में जाना और सब तीर्थों में स्नान करना भी वैसा फल नहीं देता, जैसा नारायण की कथा देती है।
श्लोक 17 (12.353.17)
सर्वथा पाविताः स्मेह श्रुत्वेमामादितः कथाम् । हरेर्विश्वेश्वरस्येह सर्वपापप्रणाशनीम् ॥
sarvathā pāvitāḥ smeha śrutvemāmāditaḥ kathām | harerviśveśvarasyeha sarvapāpapraṇāśanīm
विश्वेश्वर हरि की इस सर्वपापनाशिनी कथा को आदि से सुनकर हम यहाँ सर्वथा पवित्र हो गए हैं।
श्लोक 18 (12.353.18)
न चित्रं कृतवांस्तत्र यदार्यो मे धनंजयः । वासुदेवसहायो यः प्राप्तवाञ्जयमुत्तमम् ॥
na citraṃ kṛtavāṃstatra yadāryo me dhanaṃjayaḥ | vāsudevasahāyo yaḥ prāptavāñjayamuttamam
इसमें आश्चर्य नहीं कि मेरे पूज्य पूर्वज धनंजय ने, वासुदेव को सहायक पाकर, परम विजय प्राप्त की।
श्लोक 19 (12.353.19)
न चास्य किंचिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । त्रैलोक्यनाथो विष्णुः स यथाऽसीत्साह्यकृत्सखा ॥
na cāsya kiṃcidaprāpyaṃ manye lokeṣvapi triṣu | trailokyanātho viṣṇuḥ sa yathā'sītsāhyakṛtsakhā
तीनों लोकों में मुझे उनके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं लगता, क्योंकि त्रिलोकीनाथ विष्णु उनके सखा और सहायक थे।
श्लोक 20 (12.353.20)
धन्याश्च सर्व एवासन्ब्रह्मंस्ते मम पूर्वजाः । हिताय श्रेयसे चैव येषामासीज्जनार्दनः ॥
dhanyāśca sarva evāsanbrahmaṃste mama pūrvajāḥ | hitāya śreyase caiva yeṣāmāsījjanārdanaḥ
हे ब्रह्मन्! मेरे वे सभी पूर्वज धन्य थे, जिनके हित और कल्याण के लिए जनार्दन उनके साथ थे।
श्लोक 21 (12.353.21)
तपसाऽप्यथ दुर्दर्शो भगवाँल्लोकपूजितः । यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ॥
tapasā'pyatha durdarśo bhagavām̐llokapūjitaḥ | yaṃ dṛṣṭavantaste sākṣācchrīvatsāṅkavibhūṣaṇam
लोकपूजित भगवान् तप से भी दुर्दर्श हैं, फिर भी उन्होंने श्रीवत्स-चिह्न से विभूषित उन्हें साक्षात् देखा।
श्लोक 22 (12.353.22)
तेभ्यो धन्यतरश्चैव नारदः परमेष्ठिजः । दृष्टवान्यो हरिं देवं नारायणमजं विभुम् ॥
tebhyo dhanyataraścaiva nāradaḥ parameṣṭhijaḥ | dṛṣṭavānyo hariṃ devaṃ nārāyaṇamajaṃ vibhum
उनसे भी अधिक धन्य ब्रह्मा के पुत्र नारद हैं, जिन्होंने अजन्मा, सर्वव्यापी देव हरि नारायण को देखा।
श्लोक 23 (12.353.23)
न चाल्पतेजसमृषिं वेद्मि नारदमव्ययम् । श्वेतद्वीपं समासाद्य येन दृष्टः स्वयं हरिः ॥
na cālpatejasamṛṣiṃ vedmi nāradamavyayam | śvetadvīpaṃ samāsādya yena dṛṣṭaḥ svayaṃ hariḥ
मैं अविनाशी ऋषि नारद को अल्प तेज वाला नहीं मानता, जिन्होंने श्वेतद्वीप पहुँचकर स्वयं हरि को देखा।
श्लोक 24 (12.353.24)
देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत्तस्य दर्शनम् । यद्दृष्टवांस्तदा देवमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥
devaprasādānugataṃ vyaktaṃ tattasya darśanam | yaddṛṣṭavāṃstadā devamaniruddhatanau sthitam
उनका वह दर्शन स्पष्ट ही देव की कृपा से हुआ था, क्योंकि उन्होंने देव को अनिरुद्ध के शरीर में स्थित देखा।
श्लोक 25 (12.353.25)
बदरीमाश्रमं यत्तु नारदः प्राद्रवत्पुनः । नरनारायणौ द्रष्टुं किं नु तत्कारणं मुने ॥
badarīmāśramaṃ yattu nāradaḥ prādravatpunaḥ | naranārāyaṇau draṣṭuṃ kiṃ nu tatkāraṇaṃ mune
हे मुने! नारद फिर नर-नारायण को देखने के लिए बदरिकाश्रम की ओर क्यों दौड़ पड़े — उसका कारण क्या था?
श्लोक 26 (12.353.26)
श्वेतद्वीपान्निवृत्तश्च नारदः परमेष्ठिजः । बदरीमाश्रमं प्राप्य समागम्य च तावृषी । कियन्तं कालमवसत्प्रश्नान्कान्पृष्टवांश्च ह ॥
śvetadvīpānnivṛttaśca nāradaḥ parameṣṭhijaḥ | badarīmāśramaṃ prāpya samāgamya ca tāvṛṣī | kiyantaṃ kālamavasatpraśnānkānpṛṣṭavāṃśca ha
ब्रह्मा के पुत्र नारद श्वेतद्वीप से लौटकर बदरिकाश्रम पहुँचे और उन दोनों ऋषियों से मिले; वे कितने समय वहाँ रहे और उन्होंने कौन-से प्रश्न पूछे?
श्लोक 27 (12.353.27)
श्वेतद्वीपादुपावृत्ते तस्मिन्वा सुमहात्मनि । किमब्रूतां महात्मानौ नरनारायणावृषी । तदेतन्मे यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि ॥
śvetadvīpādupāvṛtte tasminvā sumahātmani | kimabrūtāṃ mahātmānau naranārāyaṇāvṛṣī | tadetanme yathātattvaṃ sarvamākhyātumarhasi
उन महात्मा के श्वेतद्वीप से लौट आने पर उन दोनों महात्मा ऋषियों, नर और नारायण, ने क्या कहा? यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताने की कृपा कीजिए।
सौतिरुवाच
श्लोक 28 (12.353.28)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा । शशास शिष्यमासीनं वैशंपायनमन्तिके । तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā kṛṣṇadvaipāyanastadā | śaśāsa śiṣyamāsīnaṃ vaiśaṃpāyanamantike | tadasmai sarvamācakṣva yanmattaḥ śrutavānasi
उसका यह वचन सुनकर कृष्णद्वैपायन ने पास बैठे अपने शिष्य वैशम्पायन को आज्ञा दी: "मुझसे तुमने जो कुछ सुना है, वह सब इन्हें सुना दो।"
श्लोक 29 (12.353.29)
गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्षभस्तदा । आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ॥
gurorvacanamājñāya sa tu viprarṣabhastadā | ācacakṣe tataḥ sarvamitihāsaṃ purātanam
गुरु की आज्ञा समझकर उन विप्रश्रेष्ठ ने तब वह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह सुनाया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 30 (12.353.30)
नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे । यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ॥
namo bhagavate tasmai vyāsāyāmitatejase | yasya prasādādvakṣyāmi nārāyaṇakathāmimām
अमित तेज वाले भगवान् व्यास को नमस्कार, जिनकी कृपा से मैं यह नारायण-कथा कहूँगा।
श्लोक 31 (12.353.31)
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् । निवृत्तो नारदो राजस्तरसा मेरुमागमत् । हृदयेनोद्वहन्भारं यदुक्तं परमात्मना ॥
prāpya śvetaṃ mahādvīpaṃ dṛṣṭvā ca harimavyayam | nivṛtto nārado rājastarasā merumāgamat | hṛdayenodvahanbhāraṃ yaduktaṃ paramātmanā
श्वेत महाद्वीप पहुँचकर और अविनाशी हरि को देखकर नारद, हे राजन्, लौट आए और शीघ्र ही मेरु पर्वत पर पहुँचे; परमात्मा ने जो कहा था, उसका भार वे हृदय में उठाए हुए थे।
श्लोक 32 (12.353.32)
पश्चादस्याभवद्राजन्नात्मनः साध्वसं महत् । यद्गत्वा दूरमध्वानं क्षेमी पुनरिहागतः ॥
paścādasyābhavadrājannātmanaḥ sādhvasaṃ mahat | yadgatvā dūramadhvānaṃ kṣemī punarihāgataḥ
हे राजन्! तब उन्हें अपने विषय में बड़ा विस्मय-मिश्रित भय हुआ कि इतनी दूर का मार्ग तय करके वे कुशलपूर्वक यहाँ फिर लौट आए हैं।
श्लोक 33 (12.353.33)
मेरोः प्रचक्राम ततः पर्वतं गन्धमादनम् । निपपात च खात्तूर्णं विशालां बदरीमनु ॥
meroḥ pracakrāma tataḥ parvataṃ gandhamādanam | nipapāta ca khāttūrṇaṃ viśālāṃ badarīmanu
फिर वे मेरु से चलकर गन्धमादन पर्वत पर गए और आकाश से शीघ्र ही विशाल बदरी के पास उतर आए।
श्लोक 34 (12.353.34)
ततः स ददृशे देवौ पुराणावृषिसत्तमौ । तपश्चरन्तौ सुमहदात्मनिष्ठौ महाव्रतौ ॥
tataḥ sa dadṛśe devau purāṇāvṛṣisattamau | tapaścarantau sumahadātmaniṣṭhau mahāvratau
वहाँ उन्होंने उन दो पुरातन देवरूप श्रेष्ठ ऋषियों को देखा, जो महान् तप कर रहे थे, आत्मनिष्ठ थे और महाव्रती थे।
श्लोक 35 (12.353.35)
तेजसाऽभ्यधिकौ सूर्यात्सर्वलोकविरोचनात् । श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ ॥
tejasā'bhyadhikau sūryātsarvalokavirocanāt | śrīvatsalakṣaṇau pūjyau jaṭāmaṇḍaladhāriṇau
वे सब लोकों को प्रकाशित करने वाले सूर्य से भी अधिक तेजस्वी थे, श्रीवत्स-चिह्न से युक्त, पूजनीय और जटाओं का मण्डल धारण किए हुए थे।
श्लोक 36 (12.353.36)
जालपादभुजौ तौ तु पादयोश्चक्रलक्षणौ । व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ तथा मुष्कचतुष्किणौ ॥
jālapādabhujau tau tu pādayoścakralakṣaṇau | vyūḍhoraskau dīrghabhujau tathā muṣkacatuṣkiṇau
उनके हाथ-पाँव जालयुक्त थे, पैरों में चक्र का चिह्न था, वक्ष विशाल और भुजाएँ लम्बी थीं, और वे चार मुष्कों वाले थे।
श्लोक 37 (12.353.37)
षष्टिदन्तावष्टदंष्ट्रौ मेघौघसदृशस्वनौ । स्वास्यौ पृथुललाटौ च सुभ्रूसुहनुनासिकौ । आतपत्रेण सदृशे शिरसी देवयोस्तयोः ॥
ṣaṣṭidantāvaṣṭadaṃṣṭrau meghaughasadṛśasvanau | svāsyau pṛthulalāṭau ca subhrūsuhanunāsikau | ātapatreṇa sadṛśe śirasī devayostayoḥ
उनके साठ दाँत और आठ दाढ़ें थीं, स्वर मेघ-समूह की गर्जना जैसा था; मुख सुन्दर, ललाट चौड़ा तथा भौंहें, ठुड्डी और नासिका सुघड़ थीं; उन दोनों देवों के सिर छत्र के समान थे।
श्लोक 38 (12.353.38)
एवं लक्षणसंपन्नौ महापुरुषसंज्ञितौ । तौ दृष्ट्वा नारदो हृष्टस्ताभ्यां च प्रतिपूजितः ॥
evaṃ lakṣaṇasaṃpannau mahāpuruṣasaṃjñitau | tau dṛṣṭvā nārado hṛṣṭastābhyāṃ ca pratipūjitaḥ
इस प्रकार के लक्षणों से सम्पन्न, 'महापुरुष' नाम से प्रसिद्ध उन दोनों को देखकर नारद प्रसन्न हुए, और उन दोनों ने भी उनका सत्कार किया।
श्लोक 39 (12.353.39)
स्वागतेनाभिभाष्याथ पृष्टश्चानामयं तथा । बभूवान्तर्गतमतिर्निरीक्ष्य पुरुषोत्तमौ ॥
svāgatenābhibhāṣyātha pṛṣṭaścānāmayaṃ tathā | babhūvāntargatamatirnirīkṣya puruṣottamau
स्वागत-वचनों से अभिनन्दित होकर और कुशल-क्षेम पूछे जाने पर वे उन दोनों पुरुषोत्तमों को देखकर मन-ही-मन विचार में डूब गए।
श्लोक 40 (12.353.40)
सदोगतास्तत्र ये वै सर्वभूतनमस्कृताः । श्वेतद्वीपे मया दृष्टास्तादृशावृषिसत्तमौ ॥
sadogatāstatra ye vai sarvabhūtanamaskṛtāḥ | śvetadvīpe mayā dṛṣṭāstādṛśāvṛṣisattamau
जो लोग वहाँ सभा में उपस्थित थे और जिन्हें सब प्राणी नमस्कार करते हैं, वैसे ही दो श्रेष्ठ ऋषि मैंने श्वेतद्वीप में देखे थे।
श्लोक 41 (12.353.41)
इति संचिन्त्य मनसा कृत्वा चाभिप्रदक्षिणाम् । स चोपविविशे तत्र पीठे कुशमये शुभे ॥
iti saṃcintya manasā kṛtvā cābhipradakṣiṇām | sa copaviviśe tatra pīṭhe kuśamaye śubhe
ऐसा मन में विचार कर, प्रदक्षिणा करके वे वहीं कुश के बने सुन्दर आसन पर बैठ गए।
श्लोक 42 (12.353.42)
ततस्तौ तपसां वासौ यशसां तेजसामपि । ऋषी शमदमोपेतौ कृत्वा पौर्वाह्णिकं विधिम् ॥
tatastau tapasāṃ vāsau yaśasāṃ tejasāmapi | ṛṣī śamadamopetau kṛtvā paurvāhṇikaṃ vidhim
तब तप, यश और तेज के निवासरूप, शम-दम से युक्त उन दोनों ऋषियों ने प्रातःकाल का नित्यकर्म पूरा करके,
श्लोक 43 (12.353.43)
पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्ध्याभ्यामथार्चतः । पीठयोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप ॥
paścānnāradamavyagrau pādyārdhyābhyāmathārcataḥ | pīṭhayoścopaviṣṭau tau kṛtātithyāhnikau nṛpa
फिर शान्त भाव से नारद का पाद्य और अर्घ्य से पूजन किया, और अतिथि-सत्कार तथा दैनिक कर्म पूरे करके, हे राजन्, वे दोनों अपने आसनों पर बैठे।
श्लोक 44 (12.353.44)
तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोऽभिव्यराजत । भ्राज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटो यथाऽग्निभिः ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu sa deśo'bhivyarājata | bhrājyāhutimahājvālairyajñavāṭo yathā'gnibhiḥ
उन तीनों के वहाँ बैठ जाने पर वह स्थान ऐसा शोभित हुआ जैसे घी की आहुतियों से प्रज्वलित महाज्वालाओं वाली अग्नियों से यज्ञशाला शोभित होती है।
श्लोक 45 (12.353.45)
अथ नारायणस्तत्र नारदं वाक्यमब्रवीत् । सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुखस्थितम् ॥
atha nārāyaṇastatra nāradaṃ vākyamabravīt | sukhopaviṣṭaṃ viśrāntaṃ kṛtātithyaṃ sukhasthitam
तब नारायण ने सुखपूर्वक बैठे, विश्राम कर चुके, अतिथि-सत्कार पाए हुए और सुखी नारद से कहा —
नारायण उवाच
श्लोक 46 (12.353.46)
अपीदानीं स भगवान्परमात्मा सनातनः । श्वेतद्वीपे त्वया दृष्ट आवयोः प्रकृतिः परा ॥
apīdānīṃ sa bhagavānparamātmā sanātanaḥ | śvetadvīpe tvayā dṛṣṭa āvayoḥ prakṛtiḥ parā
क्या तुमने अब श्वेतद्वीप में उन भगवान् सनातन परमात्मा के दर्शन किए, जो हम दोनों की परम प्रकृति हैं?
नारद उवाच
श्लोक 47 (12.353.47)
दृष्टो मे पुरुषः श्रीमान्विश्वरूपधरोऽव्ययः । सर्वे लोका हि तत्रस्थास्तथा देवाः सहर्षिभिः ॥
dṛṣṭo me puruṣaḥ śrīmānviśvarūpadharo'vyayaḥ | sarve lokā hi tatrasthāstathā devāḥ saharṣibhiḥ
मैंने उन श्रीमान् अविनाशी पुरुष को देखा है, जो विश्वरूप धारण किए हैं; समस्त लोक और ऋषियों सहित देवता उन्हीं में स्थित हैं।
श्लोक 48 (12.353.48)
अद्यापि चैनं पश्यामि युवां पश्यन्सनातनौ ॥
adyāpi cainaṃ paśyāmi yuvāṃ paśyansanātanau
आप दोनों सनातनों को देखते हुए मैं आज भी उन्हीं को देख रहा हूँ।
श्लोक 49 (12.353.49)
यैर्लक्षणैरुपेतः स हरिरव्यक्तरूपधृक् । तैर्लक्षणैरुपेतौ हि व्यक्तरूपधरौ युवाम् ॥
yairlakṣaṇairupetaḥ sa hariravyaktarūpadhṛk | tairlakṣaṇairupetau hi vyaktarūpadharau yuvām
जिन लक्षणों से अव्यक्त रूप धारण करने वाले वे हरि युक्त हैं, उन्हीं लक्षणों से व्यक्त रूप धारण करने वाले आप दोनों युक्त हैं।
श्लोक 50 (12.353.50)
दृष्टौ युवां मया तत्र तस्य देवस्य पार्श्वतः । इहैव चागतोऽस्म्यद्य विसृष्टः परमात्मना ॥
dṛṣṭau yuvāṃ mayā tatra tasya devasya pārśvataḥ | ihaiva cāgato'smyadya visṛṣṭaḥ paramātmanā
मैंने वहाँ उन देव के पास आप दोनों को देखा था; और आज परमात्मा से विदा पाकर मैं यहाँ आ पहुँचा हूँ।
श्लोक 51 (12.353.51)
को हि नाम भवेत्तस्य तेजसा यशसा श्रिया । सदृशस्त्रिषु लोकेषु ऋते धर्मात्मजौ युवाम् ॥
ko hi nāma bhavettasya tejasā yaśasā śriyā | sadṛśastriṣu lokeṣu ṛte dharmātmajau yuvām
तेज, यश और श्री में तीनों लोकों में आप दोनों धर्मपुत्रों को छोड़कर उनके समान कौन हो सकता है?
श्लोक 52 (12.353.52)
तेन मे कथितः कृत्स्नो धर्मः क्षेत्रज्ञसंज्ञितः । प्रादुर्भावाश्च कथिता भविष्या इह ये यथा ॥
tena me kathitaḥ kṛtsno dharmaḥ kṣetrajñasaṃjñitaḥ | prādurbhāvāśca kathitā bhaviṣyā iha ye yathā
उन्होंने मुझे 'क्षेत्रज्ञ' नाम से कहा गया सम्पूर्ण धर्म बताया, और यह भी कि इस लोक में भविष्य में जो अवतार होंगे, वे किस प्रकार होंगे।
श्लोक 53 (12.353.53)
तत्र ये पुरुषाः श्वेताः पञ्चेन्द्रियविवर्जिताः । प्रतिबुद्धाश्च ते सर्वे भक्ताश्च पुरुषोत्तमम् ॥
tatra ye puruṣāḥ śvetāḥ pañcendriyavivarjitāḥ | pratibuddhāśca te sarve bhaktāśca puruṣottamam
वहाँ जो श्वेत वर्ण के पुरुष हैं और पाँचों इन्द्रियों से रहित हैं, वे सब प्रबुद्ध हैं और पुरुषोत्तम के भक्त हैं।
श्लोक 54 (12.353.54)
तेऽर्चयन्ति सदा देवं तैः सार्धं रमते च सः । प्रियभक्तो हि भगवान्परमात्मा द्विजप्रियः ॥
te'rcayanti sadā devaṃ taiḥ sārdhaṃ ramate ca saḥ | priyabhakto hi bhagavānparamātmā dvijapriyaḥ
वे सदा देव की अर्चना करते हैं और वे उनके साथ रमण करते हैं; परमात्मा भगवान् को भक्त और ब्राह्मण प्रिय हैं।
श्लोक 55 (12.353.55)
रमते सोऽर्च्यमानो हि सदा भागवतप्रियः । विश्वभुक्सर्वगो देवो माधवो भक्तवत्सलः ॥
ramate so'rcyamāno hi sadā bhāgavatapriyaḥ | viśvabhuksarvago devo mādhavo bhaktavatsalaḥ
पूजित होने पर वे सदा आनन्दित होते हैं; वे भागवतों के प्रिय, विश्व के भोक्ता, सर्वव्यापी देव, माधव और भक्तवत्सल हैं।
श्लोक 56 (12.353.56)
स कर्ता कारणं चैव कार्यं चातिबलद्युतिः । हेतुश्चाज्ञाविधानं च तत्त्वं चैव महायशाः ॥
sa kartā kāraṇaṃ caiva kāryaṃ cātibaladyutiḥ | hetuścājñāvidhānaṃ ca tattvaṃ caiva mahāyaśāḥ
वे ही कर्ता, कारण और कार्य हैं, अत्यन्त बल और तेज वाले हैं; वे हेतु हैं, आज्ञा का विधान हैं और तत्त्व हैं — महायशस्वी।
श्लोक 57 (12.353.57)
तपसा योज्य सोऽऽत्मानं श्वेतद्वीपात्परं हि यत् । तेज इत्यभिविख्यातं स्वयं भासावभासितम् ॥
tapasā yojya so''tmānaṃ śvetadvīpātparaṃ hi yat | teja ityabhivikhyātaṃ svayaṃ bhāsāvabhāsitam
तप से अपने को उस तेज से युक्त करके, जो श्वेतद्वीप से भी परे है, 'तेज' नाम से प्रसिद्ध है और स्वयं अपने प्रकाश से प्रकाशित है,
श्लोक 58 (12.353.58)
शान्तिः सा त्रिषु लोकेषु विहिता भावितात्मना । एतया शुभया बुद्ध्या नैष्ठिकं व्रतमास्थितः ॥
śāntiḥ sā triṣu lokeṣu vihitā bhāvitātmanā | etayā śubhayā buddhyā naiṣṭhikaṃ vratamāsthitaḥ
वह शान्ति तीनों लोकों में भावित आत्मा वाले ने विहित की है; इसी शुभ बुद्धि से उन्होंने नैष्ठिक व्रत धारण किया है।
श्लोक 59 (12.353.59)
न तत्र सूर्यस्तपति न सोमोऽभिविराजते । न वायुर्वाति देवेशे तपश्चरति दुश्चरम् ॥
na tatra sūryastapati na somo'bhivirājate | na vāyurvāti deveśe tapaścarati duścaram
वहाँ न सूर्य तपता है, न चन्द्रमा शोभित होता है, न वायु बहती है; देवेश्वर वहाँ अति कठिन तप कर रहे हैं।
श्लोक 60 (12.353.60)
वेदीमष्टनलोत्सेधां भूमावास्थाय विश्वकृत् । एकपादस्थितो देव ऊर्ध्वबाहुरुदङ्मुखः ॥
vedīmaṣṭanalotsedhāṃ bhūmāvāsthāya viśvakṛt | ekapādasthito deva ūrdhvabāhurudaṅmukhaḥ
विश्व के रचयिता भूमि पर आठ नल ऊँची वेदी बनाकर एक पैर पर खड़े हैं, भुजाएँ ऊपर उठाए हैं और उत्तर की ओर मुख किए हैं;
श्लोक 61 (12.353.61)
साङ्गानावर्तयन्वेदांस्तपस्तेपे सुदुश्चरम् । यद्ब्रह्मा ऋषयश्चैव स्वयं पशुपतिश्च यत् ॥
sāṅgānāvartayanvedāṃstapastepe suduścaram | yadbrahmā ṛṣayaścaiva svayaṃ paśupatiśca yat
वे अंगों सहित वेदों का आवर्तन करते हुए अत्यन्त कठिन तप कर रहे हैं। जो कुछ ब्रह्मा, ऋषि और स्वयं पशुपति,
श्लोक 62 (12.353.62)
शेषाश्च विबुधश्रेष्ठा दैत्यदानवराक्षसाः । नागाः सुपर्णा गन्धर्वाः सिद्धा राजर्षयश्च ते ॥
śeṣāśca vibudhaśreṣṭhā daityadānavarākṣasāḥ | nāgāḥ suparṇā gandharvāḥ siddhā rājarṣayaśca te
शेष तथा श्रेष्ठ देवता, दैत्य, दानव, राक्षस, नाग, सुपर्ण, गन्धर्व, सिद्ध और राजर्षि —
श्लोक 63 (12.353.63)
हव्यं कव्यं च सततं विधियुक्तं प्रयुञ्जते । कृत्स्नं तु तस्य देवस्य चरणावुपतिष्ठति ॥
havyaṃ kavyaṃ ca satataṃ vidhiyuktaṃ prayuñjate | kṛtsnaṃ tu tasya devasya caraṇāvupatiṣṭhati
विधिपूर्वक निरन्तर जो हव्य और कव्य अर्पित करते हैं, वह सब उन देव के चरणों तक पहुँचता है।
श्लोक 64 (12.353.64)
याः क्रियाः संप्रयुक्ताश्च एकान्तगतबुद्धिभिः । ताः सर्वाः शिरसा देवः प्रतिगृह्णाति वै स्वयं ॥
yāḥ kriyāḥ saṃprayuktāśca ekāntagatabuddhibhiḥ | tāḥ sarvāḥ śirasā devaḥ pratigṛhṇāti vai svayaṃ
एकनिष्ठ बुद्धि वाले जो कर्म अर्पित करते हैं, उन सबको देव स्वयं सिर पर धारण करके स्वीकार करते हैं।
श्लोक 65 (12.353.65)
न तस्यान्यः प्रियतरः प्रतिबुद्धैर्महात्मभिः । विद्यते त्रिषु लोकेषु ततोऽस्म्यैकान्तिकं गतः ॥
na tasyānyaḥ priyataraḥ pratibuddhairmahātmabhiḥ | vidyate triṣu lokeṣu tato'smyaikāntikaṃ gataḥ
तीनों लोकों में प्रबुद्ध महात्माओं को उनसे अधिक प्रिय कोई दूसरा नहीं; इसीलिए मैं एकान्त-भक्ति को प्राप्त हुआ हूँ।
श्लोक 66 (12.353.66)
इह चैवागतोऽस्म्यद्य विसृष्टः परमात्मना । एवं मे भगवान्देवः स्वयमाख्यातवान्हरिः ॥
iha caivāgato'smyadya visṛṣṭaḥ paramātmanā | evaṃ me bhagavāndevaḥ svayamākhyātavānhariḥ
और आज परमात्मा से विदा पाकर मैं यहाँ आ गया हूँ। इस प्रकार भगवान् हरि ने स्वयं मुझसे कहा।
श्लोक 67 (12.353.67)
आसिष्ये तत्परो भूत्वा युवाभ्यां सह नित्यशः ॥
āsiṣye tatparo bhūtvā yuvābhyāṃ saha nityaśaḥ
उन्हीं में परायण होकर मैं आप दोनों के साथ सदा निवास करूँगा।