शान्ति पर्व · अध्याय 354
नर-नारायण द्वारा परमधाम का वर्णन
नर और नारायण नारद से कहते हैं कि वे धन्य हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं भगवान् के दर्शन किए, और बताते हैं कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और मन उन्हीं देव से कैसे उत्पन्न होते हैं। वे मुक्तों के मार्ग का वर्णन करते हैं, जो सूर्य के द्वार से अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षण होते हुए अन्त में क्षेत्रज्ञ वासुदेव में प्रवेश करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने श्वेतद्वीप में नारद को देखा था और भविष्य की सब बातें जानते हैं। इसके बाद नारद नर-नारायण के आश्रम में एक हजार दिव्य वर्ष तक नारायण-मन्त्रों का जप करते हैं।
नरनारायणावूचतुः
श्लोक 1 (12.354.1)
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यत्ते दृष्टः स्वयंप्रभुः । न हि तं दृष्टवान्कश्चित्पद्मयोनिरपि स्वयम् ॥
dhanyo'syanugṛhīto'si yatte dṛṣṭaḥ svayaṃprabhuḥ | na hi taṃ dṛṣṭavānkaścitpadmayonirapi svayam
आप धन्य हैं और अनुगृहीत हैं, क्योंकि आपने स्वयंप्रभु के दर्शन किए; कमलयोनि ब्रह्मा ने भी स्वयं उन्हें नहीं देखा।
श्लोक 2 (12.354.2)
अव्यक्तयोनिर्भगवान्दुर्दर्शः पुरुषोत्तमः । नारदैतद्धि नौ सत्यं वचनं समुदाहृतम् ॥
avyaktayonirbhagavāndurdarśaḥ puruṣottamaḥ | nāradaitaddhi nau satyaṃ vacanaṃ samudāhṛtam
अव्यक्त जिनका मूल है, वे भगवान् पुरुषोत्तम दुर्दर्श हैं। हे नारद! हम दोनों ने यह जो बात कही है, वह सत्य है।
श्लोक 3 (12.354.3)
नास्य भक्तात्प्रियतरो लोके कश्चन विद्यते । ततः स्वयं दर्शितवान्स्वमात्मानं द्विजोत्तम ॥
nāsya bhaktātpriyataro loke kaścana vidyate | tataḥ svayaṃ darśitavānsvamātmānaṃ dvijottama
लोक में उन्हें भक्त से बढ़कर प्रिय कोई नहीं है; इसीलिए हे द्विजोत्तम! उन्होंने स्वयं आपको अपना आत्मरूप दिखाया।
श्लोक 4 (12.354.4)
तपो हि तप्यतस्तस्य यत्स्थानं परमात्मनः । न तत्संप्राप्नुते कश्चिदृते ह्यावां द्विजोत्तम ॥
tapo hi tapyatastasya yatsthānaṃ paramātmanaḥ | na tatsaṃprāpnute kaścidṛte hyāvāṃ dvijottama
तप करते हुए उन परमात्मा का जो धाम है, उसे हम दोनों को छोड़कर कोई प्राप्त नहीं करता, हे द्विजश्रेष्ठ।
श्लोक 5 (12.354.5)
या हि सूर्यसहस्रस्य समस्तस्य भवेद्द्युतिः । स्थानस्य सा भवेत्तस्य स्वयं तेन विराजता ॥
yā hi sūryasahasrasya samastasya bhaveddyutiḥ | sthānasya sā bhavettasya svayaṃ tena virājatā
समस्त सहस्र सूर्यों की जो द्युति हो, वही उस धाम की द्युति होगी — वह भी वहाँ स्वयं उन्हीं के विराजने से।
श्लोक 6 (12.354.6)
तस्मादुत्तिष्ठते विप्र देवाद्विश्वभुवः पतेः । क्षमा क्षमावतां श्रेष्ठ यया भूमिस्तु युज्यते ॥
tasmāduttiṣṭhate vipra devādviśvabhuvaḥ pateḥ | kṣamā kṣamāvatāṃ śreṣṭha yayā bhūmistu yujyate
हे विप्र! विश्व के स्वामी उन देव से क्षमा उत्पन्न होती है, हे क्षमावानों में श्रेष्ठ, जिससे पृथ्वी युक्त है।
श्लोक 7 (12.354.7)
तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात्सर्वभूतहिताद्रसः । आपो हि तेन युज्यन्ते द्रवत्वं प्राप्नुवन्ति च ॥
tasmāccottiṣṭhate devātsarvabhūtahitādrasaḥ | āpo hi tena yujyante dravatvaṃ prāpnuvanti ca
समस्त प्राणियों के हितकारी उन देव से रस उत्पन्न होता है, जिससे जल युक्त होते हैं और द्रवत्व पाते हैं।
श्लोक 8 (12.354.8)
तस्मादेव समुद्भूतं तेजो रूपगुणात्मकम् । येन संयुज्यते सूर्यस्ततो लोके विराजते ॥
tasmādeva samudbhūtaṃ tejo rūpaguṇātmakam | yena saṃyujyate sūryastato loke virājate
उन्हीं से रूप-गुण वाला तेज उत्पन्न हुआ, जिससे युक्त होकर सूर्य लोक में प्रकाशित होता है।
श्लोक 9 (12.354.9)
तस्माद्देवात्समुद्भूतः स्पर्शस्तु पुरुषोत्तमात् । येन स्म युज्यते वायुस्ततो लोकान्विवात्यसौ ॥
tasmāddevātsamudbhūtaḥ sparśastu puruṣottamāt | yena sma yujyate vāyustato lokānvivātyasau
उन पुरुषोत्तम देव से स्पर्श उत्पन्न हुआ, जिससे युक्त होकर यह वायु लोकों में बहती है।
श्लोक 10 (12.354.10)
तस्माच्चोत्तिष्ठते शब्दः सर्वलोकेश्वरात्प्रभोः । आकाशं युज्यते येन ततस्तिष्ठत्यसंवृतम् ॥
tasmāccottiṣṭhate śabdaḥ sarvalokeśvarātprabhoḥ | ākāśaṃ yujyate yena tatastiṣṭhatyasaṃvṛtam
सब लोकों के ईश्वर उन प्रभु से शब्द उत्पन्न होता है, जिससे आकाश युक्त है और इसीलिए खुला (अनावृत) रहता है।
श्लोक 11 (12.354.11)
तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात्सर्वभूतगतं मनः । चन्द्रमा येन संयुक्तः प्रकाशगुणधारणः ॥
tasmāccottiṣṭhate devātsarvabhūtagataṃ manaḥ | candramā yena saṃyuktaḥ prakāśaguṇadhāraṇaḥ
उन्हीं देव से सब प्राणियों में रहने वाला मन उत्पन्न होता है, जिससे युक्त होकर चन्द्रमा प्रकाश का गुण धारण करता है।
श्लोक 12 (12.354.12)
सद्भूतोत्पादकं नाम तत्स्थानं वेदसंज्ञितम् । विद्यासहायो यत्रास्ते भगवान्हव्यकव्यभुक् ॥
sadbhūtotpādakaṃ nāma tatsthānaṃ vedasaṃjñitam | vidyāsahāyo yatrāste bhagavānhavyakavyabhuk
वह धाम 'वेद' नाम से प्रसिद्ध है और प्राणियों को उत्पन्न करने वाला है; वहाँ हव्य-कव्य के भोक्ता भगवान् विद्या को सहायक बनाकर रहते हैं।
श्लोक 13 (12.354.13)
ये हि निष्कल्मषा लोके पुण्यपापविवर्जिताः । तेषां वै क्षेममध्वानं गच्छतां द्विजसत्तम ॥
ye hi niṣkalmaṣā loke puṇyapāpavivarjitāḥ | teṣāṃ vai kṣemamadhvānaṃ gacchatāṃ dvijasattama
संसार में जो निष्कलुष हैं और पुण्य-पाप से रहित हैं, उनके लिए, हे द्विजश्रेष्ठ, कल्याणकारी मार्ग पर चलते हुए,
श्लोक 14 (12.354.14)
सर्वलोके तमोहन्ता आदित्यो द्वारमुच्यते । ज्वालामाली महातेजा येनेदं धार्यते जगत् ॥
sarvaloke tamohantā ādityo dvāramucyate | jvālāmālī mahātejā yenedaṃ dhāryate jagat
सब लोकों का अन्धकार हरने वाला आदित्य, जो ज्वालाओं की माला पहने महातेजस्वी है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है, द्वार कहा जाता है।
श्लोक 15 (12.354.15)
आदित्यदग्धसर्वाङ्गा अदृश्याः केनचित्क्वचित् । परमाणुभूता भूत्वा तु तं देवं प्रविशन्त्युत ॥
ādityadagdhasarvāṅgā adṛśyāḥ kenacitkvacit | paramāṇubhūtā bhūtvā tu taṃ devaṃ praviśantyuta
आदित्य से जिनके सब अंग जल चुके हैं और जो कहीं किसी को दिखाई नहीं देते, वे परमाणु-रूप होकर उन देव में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 16 (12.354.16)
तस्मादपि च निर्मुक्ता अनिरुद्धतनौ स्थिताः । मनोभूतास्ततो भूत्वा प्रद्युम्नं प्रविशन्त्युत ॥
tasmādapi ca nirmuktā aniruddhatanau sthitāḥ | manobhūtāstato bhūtvā pradyumnaṃ praviśantyuta
वहाँ से भी मुक्त होकर वे अनिरुद्ध के शरीर में स्थित हो जाते हैं; फिर मनःस्वरूप होकर प्रद्युम्न में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 17 (12.354.17)
प्रद्युम्नाच्चापि निर्मुक्ता जीवं संकर्षणं ततः । विशन्ति विप्रप्रवराः साङ्ख्या भागवतैः सह ॥
pradyumnāccāpi nirmuktā jīvaṃ saṃkarṣaṇaṃ tataḥ | viśanti viprapravarāḥ sāṅkhyā bhāgavataiḥ saha
प्रद्युम्न से भी मुक्त होकर वे श्रेष्ठ विप्र — साङ्ख्य-अनुयायी, भागवतों के साथ — जीवरूप संकर्षण में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 18 (12.354.18)
ततस्त्रैगुण्यहीनास्ते परमात्मानमञ्जसा । प्रविशन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्षेत्रज्ञं निर्गुणात्मकम् । सर्वावासं वासुदेवं क्षेत्रज्ञं विद्धि तत्त्वतः ॥
tatastraiguṇyahīnāste paramātmānamañjasā | praviśanti dvijaśreṣṭhāḥ kṣetrajñaṃ nirguṇātmakam | sarvāvāsaṃ vāsudevaṃ kṣetrajñaṃ viddhi tattvataḥ
तब तीनों गुणों से रहित होकर वे, हे द्विजश्रेष्ठ, गुणहीन क्षेत्रज्ञ परमात्मा में सहज ही प्रवेश करते हैं। सबके निवासरूप वासुदेव को ही तत्त्वतः क्षेत्रज्ञ जानो।
श्लोक 19 (12.354.19)
समाहितमनस्काश्च नियताः संयतेन्द्रियाः । एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते ॥
samāhitamanaskāśca niyatāḥ saṃyatendriyāḥ | ekāntabhāvopagatā vāsudevaṃ viśanti te
जिनका मन समाहित है, जो नियमित और संयतेन्द्रिय हैं, वे एकान्त-भाव को प्राप्त होकर वासुदेव में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 20 (12.354.20)
आवामपि च धर्मस्य गृहे जातौ द्विजोत्तम । रम्यां विशालामाश्रित्य तप उग्रं समास्थितौ ॥
āvāmapi ca dharmasya gṛhe jātau dvijottama | ramyāṃ viśālāmāśritya tapa ugraṃ samāsthitau
हम दोनों भी, हे द्विजोत्तम, धर्म के घर में उत्पन्न हुए हैं और रमणीय विशाला (बदरी) में रहकर उग्र तप में लगे हैं।
श्लोक 21 (12.354.21)
ये तु तस्यैव देवस्य प्रादुर्भावाः सुरप्रियाः । भविष्यन्ति त्रिलोकस्थास्तेषां स्वस्तीत्यथो द्विज ॥
ye tu tasyaiva devasya prādurbhāvāḥ surapriyāḥ | bhaviṣyanti trilokasthāsteṣāṃ svastītyatho dvija
उन्हीं देव के जो देवप्रिय अवतार तीनों लोकों में होंगे, उनका कल्याण हो, हे द्विज।
श्लोक 22 (12.354.22)
विधिना स्वेन युक्ताभ्यां यथापूर्वं द्विजोत्तम । आस्थिताभ्यां सर्वकृच्छ्रं व्रतं सम्यगनुत्तमम् ॥
vidhinā svena yuktābhyāṃ yathāpūrvaṃ dvijottama | āsthitābhyāṃ sarvakṛcchraṃ vrataṃ samyaganuttamam
हे द्विजोत्तम! पहले की भाँति हम दोनों अपने नियम से युक्त होकर सर्वकृच्छ्र नामक अनुपम व्रत का भलीभाँति पालन कर रहे हैं।
श्लोक 23 (12.354.23)
स्वार्थेन विधिना युक्तः सर्वकृच्छ्रव्रते स्थितः । आवाभ्यामपि दृष्टस्त्वं श्वेतद्वीपे तपोधन ॥
svārthena vidhinā yuktaḥ sarvakṛcchravrate sthitaḥ | āvābhyāmapi dṛṣṭastvaṃ śvetadvīpe tapodhana
अपने विधान से युक्त और सर्वकृच्छ्र व्रत में स्थित हम दोनों ने भी, हे तपोधन, श्वेतद्वीप में आपको देखा था।
श्लोक 24 (12.354.24)
समागतो भगवता संकल्पं कृतवांस्तथा । सर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥
samāgato bhagavatā saṃkalpaṃ kṛtavāṃstathā | sarvaṃ hi nau saṃviditaṃ trailokye sacarācare
आप भगवान् से मिले और आपने संकल्प किया। चर-अचर सहित तीनों लोकों की सब बात हमें ज्ञात है —
श्लोक 25 (12.354.25)
यद्भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम् । सर्वं स ते कथितवान्देवदेवो महामुने ॥
yadbhaviṣyati vṛttaṃ vā vartate vā śubhāśubham | sarvaṃ sa te kathitavāndevadevo mahāmune
जो होने वाला है, जो हो चुका है या जो हो रहा है — शुभ या अशुभ — वह सब देवाधिदेव ने, हे महामुने, आपसे कह दिया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (12.354.26)
एतच्छ्रुत्वा तयोर्वाक्यं तपस्युग्रे च वर्ततोः । नारदः प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणपरायणः ॥
etacchrutvā tayorvākyaṃ tapasyugre ca vartatoḥ | nāradaḥ prāñjalirbhūtvā nārāyaṇaparāyaṇaḥ
तप में उग्र रूप से लगे हुए उन दोनों की यह बात सुनकर नारद ने हाथ जोड़े और नारायण-परायण हो गए।
श्लोक 27 (12.354.27)
जजाप विधिवन्मन्त्रान्नारायणगतान्बहून् । दिव्यं वर्षसहस्रं हि नरनारायणाश्रमे ॥
jajāpa vidhivanmantrānnārāyaṇagatānbahūn | divyaṃ varṣasahasraṃ hi naranārāyaṇāśrame
उन्होंने नर-नारायण के आश्रम में दिव्य एक हजार वर्ष तक विधिपूर्वक नारायण-सम्बन्धी बहुत-से मन्त्रों का जप किया।
श्लोक 28 (12.354.28)
अवसत्स महातेजा नारदो भगवानृषिः । तावेवाभ्यर्चयन्देवौ नरनारायणौ च तौ ॥
avasatsa mahātejā nārado bhagavānṛṣiḥ | tāvevābhyarcayandevau naranārāyaṇau ca tau
महातेजस्वी भगवान् ऋषि नारद वहीं रहे और उन दोनों देवों, नर और नारायण, की पूजा करते रहे।