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शान्ति पर्व · अध्याय 355

पितर 'पिण्ड' क्यों कहलाते हैं

देवकर्म और पितृकर्म करने के बाद नारद से धर्म के ज्येष्ठ पुत्र पूछते हैं कि इन कर्मों में किसकी पूजा होती है; नारद उत्तर देते हैं कि केवल नारायण की, और पूछते हैं कि पितर 'पिण्ड' नाम से कैसे कहलाए। नर और नारायण बताते हैं कि वराह रूप में भगवान् ने पृथ्वी को जल से उठाया और अपनी दाढ़ों से तीन पिण्ड झटके; उन्हें कुश पर रखकर उन्होंने अपने ही उद्देश्य से पितृकर्म किया और उन्हें सनातन पितर घोषित किया। अन्त में वे सिखाते हैं कि जो देवों, पितरों, गुरुओं, अतिथियों, गौओं, ब्राह्मणों और माता-पिता का यजन करता है, वह सबके आत्मा विष्णु का ही यजन करता है।

अध्याय 354अध्याय-सूचीअध्याय 356

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.355.1)

कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदः परमेष्ठिजः । दैवं कृत्वा यथान्यायं पित्र्यं चक्रे ततः परम् ॥

kasyacittvatha kālasya nāradaḥ parameṣṭhijaḥ | daivaṃ kṛtvā yathānyāyaṃ pitryaṃ cakre tataḥ param

कुछ समय बाद ब्रह्मा से उत्पन्न नारद ने विधिपूर्वक देवकर्म करके उसके बाद पितृकर्म किया।

श्लोक 2 (12.355.2)

ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः । क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ॥

tatastaṃ vacanaṃ prāha jyeṣṭho dharmātmajaḥ prabhuḥ | ka ijyate dvijaśreṣṭha daive pitrye ca kalpite

तब धर्म के ज्येष्ठ पुत्र प्रभु ने उनसे कहा: "हे द्विजश्रेष्ठ! देवकर्म और पितृकर्म के विधान में किसकी पूजा की जाती है?"

धर्मात्मज उवाच

श्लोक 3 (12.355.3)

त्वया मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथातथम् । किमेतत्क्रियते कर्म फलं वाऽस्य किमिष्यते ॥

tvayā matimatāṃ śreṣṭha tanme śaṃsa yathātatham | kimetatkriyate karma phalaṃ vā'sya kimiṣyate

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! आप मुझे यह ठीक-ठीक बताइए — यह कर्म क्यों किया जाता है और इसका क्या फल चाहा जाता है?

नारद उवाच

श्लोक 4 (12.355.4)

त्वयैतत्कथितं पूर्वं दैवं कर्तव्यमित्यपि । दैवतं च परो ज्ञेयः परमात्मा सनातनः ॥

tvayaitatkathitaṃ pūrvaṃ daivaṃ kartavyamityapi | daivataṃ ca paro jñeyaḥ paramātmā sanātanaḥ

आपने ही पहले कहा था कि देवकर्म करना चाहिए, और जानने योग्य देवता सनातन परमात्मा परमेश्वर ही हैं।

श्लोक 5 (12.355.5)

ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम् । तस्माच्च प्रसृतः पूर्वं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

tatastadbhāvito nityaṃ yaje vaikuṇṭhamavyayam | tasmācca prasṛtaḥ pūrvaṃ brahmā lokapitāmahaḥ

इसलिए सदा उन्हीं की भावना से युक्त होकर मैं अविनाशी वैकुण्ठ का यजन करता हूँ। उन्हीं से पहले लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 6 (12.355.6)

मम वै पितरं प्रीतः परमेष्ठ्यप्यजीजनत् । अहं संकल्पजस्तस्य पुत्रः प्रथमकल्पितः ॥

mama vai pitaraṃ prītaḥ parameṣṭhyapyajījanat | ahaṃ saṃkalpajastasya putraḥ prathamakalpitaḥ

परमेष्ठी ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर मेरे पिता को भी उत्पन्न किया; मैं उनके संकल्प से उत्पन्न पुत्र हूँ, जिसकी कल्पना सबसे पहले हुई।

श्लोक 7 (12.355.7)

यजामि वै पितॄन्साधो नारायणविधौ कृते । एवं स एव भगवान्पिता माता पितामहः ॥

yajāmi vai pitṝnsādho nārāyaṇavidhau kṛte | evaṃ sa eva bhagavānpitā mātā pitāmahaḥ

हे साधु! नारायण की विधि से कर्म करते हुए मैं पितरों का यजन करता हूँ। इस प्रकार वही भगवान् पिता, माता और पितामह हैं।

श्लोक 8 (12.355.8)

इज्यते पितृयज्ञेषु मया नित्यं जगत्पतिः । श्रुतिश्चाप्यपरा देवाः पुत्रान्हि पितरोऽयजन् ॥

ijyate pitṛyajñeṣu mayā nityaṃ jagatpatiḥ | śrutiścāpyaparā devāḥ putrānhi pitaro'yajan

पितृयज्ञों में मैं सदा जगत्पति की ही पूजा करता हूँ। एक और श्रुति भी है — देवरूप पितरों ने अपने पुत्रों का यजन किया।

श्लोक 9 (12.355.9)

वेदश्रुतिः प्रनष्टा च पुनरध्यापिता सुतैः । ततस्ते मन्त्रदाः पुत्राः पितॄणामिति वैदिकम् ॥

vedaśrutiḥ pranaṣṭā ca punaradhyāpitā sutaiḥ | tataste mantradāḥ putrāḥ pitṝṇāmiti vaidikam

वेदश्रुति नष्ट हो गई थी और पुत्रों ने उसे फिर पढ़ाया; इसी कारण वे मन्त्र देने वाले पुत्र पितरों के भी पितर कहलाए — ऐसा वैदिक कथन है।

श्लोक 10 (12.355.10)

नूनं सुरैस्तद्विदितं युवयोर्भावितात्मनोः । पुत्राश्च पितरश्चैव परस्परमपूजयन् ॥

nūnaṃ suraistadviditaṃ yuvayorbhāvitātmanoḥ | putrāśca pitaraścaiva parasparamapūjayan

निश्चय ही यह आप दोनों भावितात्मा को, और देवताओं को भी ज्ञात है कि पुत्रों और पितरों ने परस्पर एक-दूसरे का पूजन किया।

श्लोक 11 (12.355.11)

त्रीन्पिण्डान्न्यस्य वै पित्र्यान्पूर्वं दत्त्वा कुशानिति । कथं तु पिण्डसंज्ञां ते पितरो लेभिरे पुरा ॥

trīnpiṇḍānnyasya vai pitryānpūrvaṃ dattvā kuśāniti | kathaṃ tu piṇḍasaṃjñāṃ te pitaro lebhire purā

पहले कुश बिछाकर तीन पिण्ड पितरों के निमित्त रखे जाते हैं; तो उन पितरों ने प्राचीन काल में 'पिण्ड' नाम कैसे पाया?

नरनारायणावूचतुः

श्लोक 12 (12.355.12)

इमां हि धरणीं पूर्वं नष्टां सागरमेखलाम् । गोविन्द उज्जहाराशु वाराहं रूपमास्थितः ॥

imāṃ hi dharaṇīṃ pūrvaṃ naṣṭāṃ sāgaramekhalām | govinda ujjahārāśu vārāhaṃ rūpamāsthitaḥ

पहले जब समुद्र से घिरी यह पृथ्वी नष्ट हो गई थी, तब गोविन्द ने वराह रूप धारण करके शीघ्र उसका उद्धार किया।

श्लोक 13 (12.355.13)

स्थापयित्वा तु धरणीं स्वे स्थाने पुरुषोत्तमः । जलकर्दमलिप्ताङ्गो लोककार्यार्थमुद्यतः ॥

sthāpayitvā tu dharaṇīṃ sve sthāne puruṣottamaḥ | jalakardamaliptāṅgo lokakāryārthamudyataḥ

पृथ्वी को अपने स्थान पर स्थापित करके पुरुषोत्तम, जल और कीचड़ से लिप्त अंगों वाले, लोक के कार्य के लिए तत्पर हो गए।

श्लोक 14 (12.355.14)

प्राप्ते चाह्निककाले तु मध्यदेशगते रवौ । दंष्ट्राविलग्नांस्त्रीन्पिण्डान्विधूय सहसा प्रभुः ॥

prāpte cāhnikakāle tu madhyadeśagate ravau | daṃṣṭrāvilagnāṃstrīnpiṇḍānvidhūya sahasā prabhuḥ

जब दोपहर का समय आया और सूर्य आकाश के मध्य में पहुँचा, तब प्रभु ने अपनी दाढ़ों में चिपके तीन पिण्डों को सहसा झटककर गिरा दिया,

श्लोक 15 (12.355.15)

स्थापयामास वै पृथ्व्यां कुशानास्तीर्य नारद । स तेष्वात्मानमुद्दिश्य पित्र्यं चक्रे यथाविधि ॥

sthāpayāmāsa vai pṛthvyāṃ kuśānāstīrya nārada | sa teṣvātmānamuddiśya pitryaṃ cakre yathāvidhi

और, हे नारद, कुश बिछाकर उन्हें पृथ्वी पर रख दिया। फिर उन पिण्डों में अपने ही को लक्ष्य करके उन्होंने विधिपूर्वक पितृकर्म किया।

श्लोक 16 (12.355.16)

संकल्पयित्वा त्रीन्पिण्डान्स्वेनैव विधिना प्रभुः । आत्मगात्रोष्मसंभूतैः स्नेहगर्भैस्तिलैरपि ॥

saṃkalpayitvā trīnpiṇḍānsvenaiva vidhinā prabhuḥ | ātmagātroṣmasaṃbhūtaiḥ snehagarbhaistilairapi

प्रभु ने अपनी ही विधि से तीनों पिण्डों का संकल्प किया — अपने शरीर की ऊष्मा से उत्पन्न और भीतर से स्नेह (चिकनाई) से भरे तिलों के साथ —

श्लोक 17 (12.355.17)

प्रोक्ष्यापसव्यं देवेशः प्राङ्मुखः कृतवान्स्वयम् । मर्यादास्थापनार्थं च ततो वचनमुक्तवान् ॥

prokṣyāpasavyaṃ deveśaḥ prāṅmukhaḥ kṛtavānsvayam | maryādāsthāpanārthaṃ ca tato vacanamuktavān

देवेश ने अपसव्य रीति से जल छिड़ककर पूर्व की ओर मुख करके स्वयं कर्म किया, और फिर मर्यादा स्थापित करने के लिए यह वचन कहा।

वृषाकपिरुवाच

श्लोक 18 (12.355.18)

अहं हि पितरः स्रष्टुमुद्यतो लोककृत्स्वयम् । तस्य चिन्तयतः सद्यः पितृकार्यविधीन्परान् ॥

ahaṃ hi pitaraḥ sraṣṭumudyato lokakṛtsvayam | tasya cintayataḥ sadyaḥ pitṛkāryavidhīnparān

मैं, लोक का रचयिता, स्वयं पितरों की सृष्टि करने को उद्यत था; और मेरे उसी क्षण परम पितृकर्म-विधियों का चिन्तन करते ही

श्लोक 19 (12.355.19)

दंष्ट्राभ्यां प्रविनिर्धूता ममैते दक्षिणां दिशम् । आश्रिता धरणीं पीड्य तस्मात्पितर एव ते ॥

daṃṣṭrābhyāṃ pravinirdhūtā mamaite dakṣiṇāṃ diśam | āśritā dharaṇīṃ pīḍya tasmātpitara eva te

मेरी दाढ़ों से झटककर गिराए गए ये पिण्ड दक्षिण दिशा में पृथ्वी को दबाकर टिक गए; इसलिए वे ही पितर हैं।

श्लोक 20 (12.355.20)

त्रयो मूर्तिविहीना वै पिण्डमूर्तिधरास्त्विमे । भवन्तु पितरो लोके मया सृष्टाः सनातनाः ॥

trayo mūrtivihīnā vai piṇḍamūrtidharāstvime | bhavantu pitaro loke mayā sṛṣṭāḥ sanātanāḥ

ये तीन, जो मूर्तिरहित हैं और पिण्ड-रूप मूर्ति धारण करते हैं, मेरे द्वारा रचे गए सनातन पितर बनकर लोक में रहें।

श्लोक 21 (12.355.21)

पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । अहमेवात्र विज्ञेयस्त्रिषु पिण्डेषु संस्थितः । नास्ति मत्तोऽधिकः कश्चित्को वान्योऽर्च्यो मया स्वयं ॥

pitā pitāmahaścaiva tathaiva prapitāmahaḥ | ahamevātra vijñeyastriṣu piṇḍeṣu saṃsthitaḥ | nāsti matto'dhikaḥ kaścitko vānyo'rcyo mayā svayaṃ

पिता, पितामह और प्रपितामह — इन तीनों पिण्डों में स्थित यहाँ केवल मुझे ही जानना चाहिए। मुझसे बढ़कर कोई नहीं है; मेरे अतिरिक्त और किसकी मैं स्वयं पूजा करूँ?

श्लोक 22 (12.355.22)

अहमेव पिता लोके अहमेव पितामहः । पितामहपिता चैव अहमेवात्र कारणम् ॥

ahameva pitā loke ahameva pitāmahaḥ | pitāmahapitā caiva ahamevātra kāraṇam

लोक में मैं ही पिता हूँ, मैं ही पितामह हूँ, और पितामह के पिता भी मैं ही हूँ — यहाँ मैं ही कारण हूँ।

नरनारायणावूचतुः

श्लोक 23 (12.355.23)

इत्येतदुक्त्वा वचनं देवदेवो वृषाकपिः । वराहपर्वते विप्र दत्त्वा पिण्डान्सविस्तरान् । आत्मानं पूजयित्वैव तत्रैवादर्शनं गतः ॥

ityetaduktvā vacanaṃ devadevo vṛṣākapiḥ | varāhaparvate vipra dattvā piṇḍānsavistarān | ātmānaṃ pūjayitvaiva tatraivādarśanaṃ gataḥ

यह वचन कहकर देवों के देव वृषाकपि ने, हे विप्र, वराह पर्वत पर विस्तारपूर्वक पिण्ड अर्पित किए, अपनी ही पूजा की और वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 24 (12.355.24)

एतदर्थं शुभमते पितरः पिण्डसंज्ञिताः । लभन्ते सततं पूजां वृषाकपिवचो यथा ॥

etadarthaṃ śubhamate pitaraḥ piṇḍasaṃjñitāḥ | labhante satataṃ pūjāṃ vṛṣākapivaco yathā

हे शुभ बुद्धि वाले! इसी कारण पितर 'पिण्ड' नाम से कहे जाते हैं और वृषाकपि के वचन के अनुसार निरन्तर पूजा पाते हैं।

श्लोक 25 (12.355.25)

ये यजन्ति पितॄन्देवान्गुरूंश्चैवातिथींस्तथा । गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पितरं मातरं तथा ॥

ye yajanti pitṝndevāngurūṃścaivātithīṃstathā | gāścaiva dvijamukhyāṃśca pitaraṃ mātaraṃ tathā

जो पितरों, देवताओं, गुरुओं, अतिथियों, गौओं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा माता-पिता का यजन करते हैं,

श्लोक 26 (12.355.26)

कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते । अन्तर्गतः स भगवान्सर्वसत्वशरीरगः ॥

karmaṇā manasā vācā viṣṇumeva yajanti te | antargataḥ sa bhagavānsarvasatvaśarīragaḥ

वे कर्म, मन और वाणी से विष्णु का ही यजन करते हैं; क्योंकि वे भगवान् सब प्राणियों के शरीर में बसे हुए, उनके भीतर स्थित हैं।

श्लोक 27 (12.355.27)

समः सर्वेषु भूतेषु ईश्वरः सुखदुःखयोः । महान्महात्मा सर्वात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥

samaḥ sarveṣu bhūteṣu īśvaraḥ sukhaduḥkhayoḥ | mahānmahātmā sarvātmā nārāyaṇa iti śrutiḥ

वे सब प्राणियों में सम हैं, सुख-दुःख के ईश्वर हैं, महान्, महात्मा और सर्वात्मा हैं; श्रुति उन्हें नारायण कहती है।

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