शान्ति पर्व · अध्याय 356
नारद का लौटना और नारायणीय का उपसंहार
वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि नर-नारायण के आश्रम में एक हज़ार वर्ष रहकर नारद हिमालय में अपने आश्रम को लौट गए। वे चेताते हैं कि जो विष्णु से द्वेष करता है उसके दोनों लोक नष्ट होते हैं, क्योंकि विष्णु ही आत्मा हैं; वे यह भी कहते हैं कि व्यास स्वयं नारायण हैं और राजा से यज्ञ जारी रखने को कहते हैं। इसके बाद सौति बताते हैं कि यह नारायणीय शौनक और नैमिषारण्य के ऋषियों को सुनाया गया है, और हरि के आशीर्वाद के श्लोकों से समापन करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.356.1)
श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं नरनारायणेरितम् । अत्यन्तं भक्तिमान्देवे एकान्तित्वमुपेयिवान् ॥
śrutvaitannārado vākyaṃ naranārāyaṇeritam | atyantaṃ bhaktimāndeve ekāntitvamupeyivān
नर और नारायण के कहे इन वचनों को सुनकर नारद, जो उस देव के प्रति पहले से अत्यन्त भक्ति से भरे थे, उसी के अनन्य भक्त हो गए।
श्लोक 2 (12.356.2)
उषित्वा वर्षसाहस्रं नरनारायणाश्रमे । श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् । जगाम हिमवत्कुक्षावाश्रमं स्वं सुरार्चितम् ॥
uṣitvā varṣasāhasraṃ naranārāyaṇāśrame | śrutvā bhagavadākhyānaṃ dṛṣṭvā ca harimavyayam | jagāma himavatkukṣāvāśramaṃ svaṃ surārcitam
नर-नारायण के आश्रम में एक हज़ार वर्ष रहकर, भगवान की कथा सुनकर और अविनाशी हरि के दर्शन करके वे हिमालय की गोद में स्थित अपने देव-पूजित आश्रम को चले गए।
श्लोक 3 (12.356.3)
तावपि ख्यातयशसौ नरनारायणावृषी । तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् ॥
tāvapi khyātayaśasau naranārāyaṇāvṛṣī | tasminnevāśrame ramye tepatustapa uttamam
यशस्वी ऋषि नर और नारायण भी उसी रमणीय आश्रम में परम उत्तम तप करते रहे।
श्लोक 4 (12.356.4)
त्वमप्यमितविक्रान्तः पाण्डवानां कुलोद्वहः । पावितात्माऽद्य संवृत्तः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ॥
tvamapyamitavikrāntaḥ pāṇḍavānāṃ kulodvahaḥ | pāvitātmā'dya saṃvṛttaḥ śrutvemāmāditaḥ kathām
हे अमित पराक्रमी, पाण्डवों के कुल के धुरन्धर! तुम भी आज इस कथा को आरम्भ से सुनकर पवित्र हो गए हो।
श्लोक 5 (12.356.5)
नैव तस्यापरो लोको नायं पार्थिवसत्तम । कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद्विष्णुमव्ययम् ॥
naiva tasyāparo loko nāyaṃ pārthivasattama | karmaṇā manasā vācā yo dviṣyādviṣṇumavyayam
हे नृपश्रेष्ठ! जो कर्म, मन या वाणी से अविनाशी विष्णु से द्वेष करता है, उसके लिए न यह लोक है, न परलोक।
श्लोक 6 (12.356.6)
मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः । यो द्विष्याद्विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् ॥
majjanti pitarastasya narake śāśvatīḥ samāḥ | yo dviṣyādvibudhaśreṣṭhaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ harim
जो देवश्रेष्ठ नारायण हरि से द्वेष करता है, उसके पितर अनन्त वर्षों तक नरक में डूबे रहते हैं।
श्लोक 7 (12.356.7)
कथं नाम भवेद्द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् । आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति श्रुतिः ॥
kathaṃ nāma bhaveddveṣya ātmā lokasya kasyacit | ātmā hi puruṣavyāghra jñeyo viṣṇuriti śrutiḥ
भला किसी भी प्राणी का आत्मा द्वेष का पात्र कैसे हो सकता है? हे पुरुषसिंह! श्रुति कहती है कि आत्मा को विष्णु ही जानना चाहिए।
श्लोक 8 (12.356.8)
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः । तेनैतत्कथितं तात माहात्म्यं परमात्मनः । तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ॥
ya eṣa gururasmākamṛṣirgandhavatīsutaḥ | tenaitatkathitaṃ tāta māhātmyaṃ paramātmanaḥ | tasmācchrutaṃ mayā cedaṃ kathitaṃ ca tavānagha
गन्धवती के पुत्र ये ऋषि, जो हमारे गुरु हैं, उन्होंने ही परमात्मा का यह माहात्म्य कहा था, हे तात; उनसे मैंने इसे सुना और हे निष्पाप, तुम्हें सुना दिया।
श्लोक 9 (12.356.9)
नारदेन तु संप्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः । एष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप ॥
nāradena tu saṃprāptaḥ sarahasyaḥ sasaṃgrahaḥ | eṣa dharmo jagannāthātsākṣānnārāyaṇānnṛpa
हे राजन्! रहस्य और संक्षेप-सहित यह धर्म नारद ने जगत् के स्वामी साक्षात् नारायण से प्राप्त किया था।
श्लोक 10 (12.356.10)
एवमेष महान्धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥
evameṣa mahāndharmaḥ sa te pūrvaṃ nṛpottama | kathito harigītāsu samāsavidhikalpitaḥ
हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म संक्षेप की विधि से सजाकर 'हरिगीता' में पहले तुम्हें बताया जा चुका है।
श्लोक 11 (12.356.11)
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् । धर्मान्नानाविधांश्चैव को ब्रूयात्तमृते प्रभुम् ॥
kṛṣṇadvaipāyanaṃ vyāsaṃ viddhi nārāyaṇaṃ prabhum | ko hyanyaḥ puṇḍarīkākṣānmahābhāratakṛdbhavet | dharmānnānāvidhāṃścaiva ko brūyāttamṛte prabhum
कृष्णद्वैपायन व्यास को प्रभु नारायण ही जानो। उन कमलनयन के सिवा और कौन महाभारत का रचयिता हो सकता है? और उन प्रभु के बिना नाना प्रकार के धर्मों का उपदेश कौन दे सकता है?
श्लोक 12 (12.356.12)
वर्ततां ते महायज्ञो यथासंकल्पितस्त्वया । संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मा च तत्त्वतः ॥
vartatāṃ te mahāyajño yathāsaṃkalpitastvayā | saṃkalpitāśvamedhastvaṃ śrutadharmā ca tattvataḥ
तुमने जैसा संकल्प किया है, तुम्हारा वह महायज्ञ वैसे ही चलता रहे। तुमने अश्वमेध का संकल्प किया है और धर्म को तत्त्वतः सुन भी लिया है।
सौतिरुवाच
श्लोक 13 (12.356.13)
एतत्तु महदाख्यानं श्रुत्वा पारीक्षितो नृपः । ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ॥
etattu mahadākhyānaṃ śrutvā pārīkṣito nṛpaḥ | tato yajñasamāptyarthaṃ kriyāḥ sarvāḥ samārabhat
इस महान् आख्यान को सुनकर परीक्षित के पुत्र राजा ने यज्ञ की पूर्ति के लिए सारी क्रियाएँ आरम्भ कर दीं।
श्लोक 14 (12.356.14)
नारायणीयमाख्यानमेतत्ते कथितं मया । पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ॥
nārāyaṇīyamākhyānametatte kathitaṃ mayā | pṛṣṭena śaunakādyeha naimiṣāraṇyavāsiṣu
नैमिषारण्य में रहने वाले शौनक आदि के पूछने पर मैंने यहाँ यह नारायणीय आख्यान तुम्हें सुनाया है।
श्लोक 15 (12.356.15)
नारदेन पुरा यद्वै गुरवे तु निवेदितम् । ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ॥
nāradena purā yadvai gurave tu niveditam | ṛṣīṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca śṛṇvatoḥ kṛṣṇabhīṣmayoḥ
इसे पूर्वकाल में नारद ने गुरु को सुनाया था, जब ऋषि, पाण्डव तथा कृष्ण और भीष्म सुन रहे थे।
श्लोक 16 (12.356.16)
स हि परमर्षिर्जनभुवनपतिः । पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयपरः । शमनियमनिधिर्यमनियमपरो द्विजवर । सहितस्तव च भवतु गतिर्हरिरमरहितः ॥
sa hi paramarṣirjanabhuvanapatiḥ | pṛthudharaṇidharaḥ śrutivinayaparaḥ | śamaniyamanidhiryamaniyamaparo dvijavara | sahitastava ca bhavatu gatirhariramarahitaḥ
वे परम ऋषि लोकों और भुवनों के स्वामी हैं, विशाल पृथ्वी के धारण करने वाले हैं, श्रुति और विनय में तत्पर हैं, शम और नियम के निधि हैं, यम-नियम में निरत हैं। हे द्विजश्रेष्ठ! देवों के हितकारी हरि आपके और आपके साथियों के आश्रय हों।
श्लोक 17 (12.356.17)
तपसां निधिः सुमहतो महतो । यशसश्च भाजनमरिष्टकहा । भयदो मखभागहरोस्तु शरणं स ते ॥
tapasāṃ nidhiḥ sumahato mahato | yaśasaśca bhājanamariṣṭakahā | bhayado makhabhāgaharostu śaraṇaṃ sa te
वे तपों के निधि हैं, महान् यश के पात्र हैं, अरिष्ट के संहारक हैं। अभय देने वाले और यज्ञ-भाग ग्रहण करने वाले वे आपके शरण हों।
श्लोक 18 (12.356.18)
त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः । पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः । विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो । गतिरात्मवतां सुकृतिनामृषीणाम् ॥
triguṇo viguṇaścaturātmadharaḥ | pūrteṣṭayośca phalabhāgaharaḥ | vidadhātu nityamajito'ticalo | gatirātmavatāṃ sukṛtināmṛṣīṇām
वे तीन गुणों वाले होकर भी गुणों से परे हैं, चार आत्माओं को धारण करने वाले हैं, पूर्त और इष्ट कर्मों के फल का भाग ग्रहण करते हैं। वे अजेय और अतिवेगवान् प्रभु आत्मसंयमी, पुण्यात्मा ऋषियों की गति सदा सुनिश्चित करें।
श्लोक 19 (12.356.19)
तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं पुराणं । रविवर्णमीश्वरं गतिं बहुशः । प्रणमध्वमेकमतयो यतः । सलिलोद्भवोपि तमृषिं प्रणतः ॥
taṃ lokasākṣiṇamajaṃ puruṣaṃ purāṇaṃ | ravivarṇamīśvaraṃ gatiṃ bahuśaḥ | praṇamadhvamekamatayo yataḥ | salilodbhavopi tamṛṣiṃ praṇataḥ
लोकों के साक्षी, अजन्मा, पुराण पुरुष, सूर्य के समान वर्ण वाले, ईश्वर और बार-बार गति देने वाले उन प्रभु को एकमत होकर प्रणाम करो, क्योंकि जलजन्मा ब्रह्मा ने भी उन ऋषि को प्रणाम किया था।
श्लोक 20 (12.356.20)
स हि लोकयोनिरमृतस्य पदं । सूक्ष्मं परायणमचलं हि पदम् । तत्साङ्ख्ययोगिभिरुदाहृतं तं । बुद्ध्या यतात्मभिरिदं सनातनम् ॥
sa hi lokayoniramṛtasya padaṃ | sūkṣmaṃ parāyaṇamacalaṃ hi padam | tatsāṅkhyayogibhirudāhṛtaṃ taṃ | buddhyā yatātmabhiridaṃ sanātanam
वही लोक की योनि हैं, अमृत का स्थान हैं, सूक्ष्म हैं, परम आश्रय हैं और अचल पद हैं। सांख्य और योग के अनुयायियों ने उसी सनातन तत्त्व का वर्णन किया है, और संयतात्मा लोग बुद्धि से उसे जानते हैं।