शान्ति पर्व · अध्याय 357
हयग्रीव द्वारा मधु-कैटभ से वेदों का उद्धार
शौनक पूछते हैं कि अश्वशिर देव को देखकर ब्रह्मा ने क्या किया, और सौति जनमेजय का वैशम्पायन से किया प्रश्न दोहराते हैं। वैशम्पायन बताते हैं कि प्रलय के बाद नारायण जल पर सोए और उनके कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जबकि जल की दो बूँदों से जन्मे असुर मधु और कैटभ ने वेद चुरा लिए। ब्रह्मा की स्तुति पर हरि ने हयशिर रूप धारण किया, रसातल से वेद लाकर ब्रह्मा को लौटाए और फिर दोनों असुरों का वध किया। अध्याय का अन्त नारायण को सब वस्तुओं का परम लक्ष्य बताने वाली स्तुति से होता है।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (12.357.1)
श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः । जन्मधर्मगृहे चैव नरनारायणात्मकम् ॥
śrutaṃ bhagavatastasya māhātmyaṃ paramātmanaḥ | janmadharmagṛhe caiva naranārāyaṇātmakam
हमने उन परमात्मा भगवान का माहात्म्य सुना, और धर्म के घर में नर-नारायण रूप में उनका जन्म भी सुना।
श्लोक 2 (12.357.2)
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः ॥
mahāvarāhasṛṣṭā ca piṇḍotpattiḥ purātanī | pravṛttau ca nivṛttau ca yo yathā parikalpitaḥ
महावराह द्वारा रचित पिण्डों की प्राचीन उत्पत्ति भी हमने सुनी, और यह भी कि प्रवृत्ति और निवृत्ति के मार्ग में कौन-सा कर्म किस प्रकार नियत किया गया।
श्लोक 3 (12.357.3)
तथा स नः श्रुतो ब्रह्मन्कथ्यमानस्त्वयाऽनघ । हव्यकव्यभुजो विष्णुरुदक्पूर्वे महोदधौ ॥
tathā sa naḥ śruto brahmankathyamānastvayā'nagha | havyakavyabhujo viṣṇurudakpūrve mahodadhau
हे निष्पाप ब्राह्मण! आपके कहने से हमने उन्हें उसी रूप में सुना: देवों और पितरों की आहुति के भोक्ता विष्णु, जो पूर्वोत्तर दिशा के महासागर में हैं।
श्लोक 4 (12.357.4)
यच्च तत्कथितं पूर्वं त्वया हयशिरो महत् । तच्च दृष्टं भगवता ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥
yacca tatkathitaṃ pūrvaṃ tvayā hayaśiro mahat | tacca dṛṣṭaṃ bhagavatā brahmaṇā parameṣṭhinā
और जिस महान् हयशिर का आपने पहले वर्णन किया, उसे भगवान् परमेष्ठी ब्रह्मा ने देखा था।
श्लोक 5 (12.357.5)
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा । रूपं प्रभावं महतामपूर्वं धीमतांवर ॥
kiṃ tadutpāditaṃ pūrvaṃ hariṇā lokadhāriṇā | rūpaṃ prabhāvaṃ mahatāmapūrvaṃ dhīmatāṃvara
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! लोकों को धारण करने वाले हरि ने पहले जो रूप और प्रभाव प्रकट किया, वह पहले कभी न देखा हुआ क्या था?
श्लोक 6 (12.357.6)
दृष्ट्वा हि विबुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् । तदश्वशिरसं पुण्यं ब्रह्मा किमकरोन्मुने ॥
dṛṣṭvā hi vibudhaśreṣṭhamapūrvamamitaujasam | tadaśvaśirasaṃ puṇyaṃ brahmā kimakaronmune
देवों में श्रेष्ठ, अपूर्व और अमित तेज वाले उस पुण्यमय अश्वशिर को देखकर ब्रह्मा ने क्या किया, हे मुने?
श्लोक 7 (12.357.7)
एतन्नः संशयं ब्रह्मन्पुराणं ब्रह्मसंभवम् । कथयस्वोत्तममते महापुरुषसंश्रितम् । पाविताः स्म त्वया ब्रह्मन्पुण्याः कथय ताः कथाः ॥
etannaḥ saṃśayaṃ brahmanpurāṇaṃ brahmasaṃbhavam | kathayasvottamamate mahāpuruṣasaṃśritam | pāvitāḥ sma tvayā brahmanpuṇyāḥ kathaya tāḥ kathāḥ
हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा से उत्पन्न उस पुरातन आख्यान के विषय में हमें संशय है। हे उत्तम बुद्धि वाले! उसे कहिए; वह महापुरुष के आश्रित है। हे ब्रह्मन्! आपने हमें पवित्र कर दिया है; वे पुण्य कथाएँ कहिए।
सौतिरुवाच
श्लोक 8 (12.357.8)
कथयिष्यामि ते सर्वं पुराणं वेदसंमितम् । जगौ यद्भगवान्व्यासो राज्ञः पारिक्षितस्य वै ॥
kathayiṣyāmi te sarvaṃ purāṇaṃ vedasaṃmitam | jagau yadbhagavānvyāso rājñaḥ pārikṣitasya vai
वह सारा पुरातन आख्यान, जो वेद के समान है और जिसे भगवान् व्यास ने परीक्षित के पुत्र राजा को सुनाया था, मैं तुम्हें सुनाऊँगा।
श्लोक 9 (12.357.9)
श्रुत्वाऽश्वशिरसो मूर्तिं देवस्य हरिमेधसः । उत्पन्नसंशयो राजा एतदेवमचोदयत् ॥
śrutvā'śvaśiraso mūrtiṃ devasya harimedhasaḥ | utpannasaṃśayo rājā etadevamacodayat
हरि की बुद्धि वाले उन अश्वशिर देव की मूर्ति के विषय में सुनकर राजा के मन में संशय उत्पन्न हुआ और उसने उनसे यह प्रश्न किया।
जनमेजय उवाच
श्लोक 10 (12.357.10)
यत्तद्दर्शितवान्ब्रह्मा देवं हयशिरोधरम् । किमर्थं तत्समभवद्वपुर्देवोपकल्पितम् ॥
yattaddarśitavānbrahmā devaṃ hayaśirodharam | kimarthaṃ tatsamabhavadvapurdevopakalpitam
ब्रह्मा ने जिस अश्वशिरधारी देव को दिखाया, देव द्वारा रचा गया वह शरीर किसलिए प्रकट हुआ?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (12.357.11)
यत्किंचिदिह लोके वै देहबद्धं विशांपते । सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥
yatkiṃcidiha loke vai dehabaddhaṃ viśāṃpate | sarvaṃ pañcabhirāviṣṭaṃ bhūtairīśvarabuddhijaiḥ
हे प्रजापालक! इस लोक में जो कुछ भी देहधारी है, वह सब ईश्वर की बुद्धि से उत्पन्न पाँच भूतों से व्याप्त है।
श्लोक 12 (12.357.12)
ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोपि च ॥
īśvaro hi jagatsraṣṭā prabhurnārāyaṇo virāṭ | bhūtāntarātmā varadaḥ saguṇo nirguṇopi ca
जगत् के स्रष्टा ईश्वर प्रभु नारायण हैं, जो विराट् हैं, भूतों के अन्तरात्मा हैं, वर देने वाले हैं, और सगुण होते हुए भी निर्गुण हैं।
श्लोक 13 (12.357.13)
भूतप्रलयमव्यक्तं शृणुष्व नृपसत्तम ॥
bhūtapralayamavyaktaṃ śṛṇuṣva nṛpasattama
हे नृपश्रेष्ठ! भूतों के अव्यक्त में लीन होने की बात सुनो।
श्लोक 14 (12.357.14)
धरण्यामथ लीनायामप्सु चैकार्णवे पुरा । ज्योतिर्भूते जले चापि लीने ज्योतिषि चानिले ॥
dharaṇyāmatha līnāyāmapsu caikārṇave purā | jyotirbhūte jale cāpi līne jyotiṣi cānile
पूर्वकाल में जब पृथ्वी जल में लीन हो गई थी और सब कुछ एक ही समुद्र था, जब जल ज्योति बन गया था और ज्योति वायु में लीन हो गई थी,
श्लोक 15 (12.357.15)
वायौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोनुगे । व्यक्ते मनसि संलीने व्यक्ते चाव्यक्ततां गते ॥
vāyau cākāśasaṃlīne ākāśe ca manonuge | vyakte manasi saṃlīne vyakte cāvyaktatāṃ gate
जब वायु आकाश में लीन हो गया था और मन का अनुगामी आकाश मन में, जब व्यक्त मन में लीन हो गया था और व्यक्त अव्यक्त अवस्था को प्राप्त हो गया था,
श्लोक 16 (12.357.16)
अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च । तम एवाभवत्सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥
avyakte puruṣaṃ yāte puṃsi sarvagate'pi ca | tama evābhavatsarvaṃ na prājñāyata kiṃcana
जब अव्यक्त पुरुष में चला गया था और पुरुष सर्वव्यापी था, तब सब कुछ अन्धकार ही था और कुछ भी जाना नहीं जाता था।
श्लोक 17 (12.357.17)
तमसो ब्रह्मसंभूतं तमोमूलमृतात्मकम् । तद्विश्वभावसंज्ञान्तं पौरुषीं तनुमाश्रितम् ॥
tamaso brahmasaṃbhūtaṃ tamomūlamṛtātmakam | tadviśvabhāvasaṃjñāntaṃ pauruṣīṃ tanumāśritam
अन्धकार से ब्रह्म उत्पन्न हुआ, जिसका मूल अन्धकार है और जिसका स्वरूप ऋत (सत्य) है। विश्व के भाव के नाम से अन्त होने वाले उस तत्त्व ने पुरुष के शरीर का आश्रय लिया।
श्लोक 18 (12.357.18)
सोऽनिरुद्ध इति प्रोक्तस्तत्प्रधानं प्रचक्षते । तदव्यक्तमिति ज्ञेयं त्रिगुणं नृपसत्तम ॥
so'niruddha iti proktastatpradhānaṃ pracakṣate | tadavyaktamiti jñeyaṃ triguṇaṃ nṛpasattama
वह अनिरुद्ध कहा गया है, और उसी को प्रधान कहते हैं। हे नृपश्रेष्ठ! उसे तीन गुणों वाला अव्यक्त जानना चाहिए।
श्लोक 19 (12.357.19)
विद्यासहायवान्देवो विष्वक्सेनो हरिः प्रभुः । आदिकर्ता स भूतानामप्रमेयो हरिः प्रभुः ॥
vidyāsahāyavāndevo viṣvakseno hariḥ prabhuḥ | ādikartā sa bhūtānāmaprameyo hariḥ prabhuḥ
विद्या को सहायक बनाए हुए देव विष्वक्सेन हरि प्रभु, जो भूतों के आदिकर्ता और अप्रमेय हैं,
श्लोक 20 (12.357.20)
अप्स्वेव शयनं चक्रे निद्रायोगमुपागतः । जगतश्चिन्तयन्सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम् ॥
apsveva śayanaṃ cakre nidrāyogamupāgataḥ | jagataścintayansṛṣṭiṃ citrāṃ bahuguṇodbhavām
जल पर ही शयन करने लगे और योगनिद्रा में स्थित होकर अनेक गुणों से उत्पन्न, विचित्र जगत्-सृष्टि का चिन्तन करने लगे।
श्लोक 21 (12.357.21)
तस्य चिन्तयतः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः । अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः । हिरण्यगर्भो भगवान्सर्वलोकपितामहः ॥
tasya cintayataḥ sṛṣṭiṃ mahānātmaguṇaḥ smṛtaḥ | ahaṃkārastato jāto brahmā śubhacaturmukhaḥ | hiraṇyagarbho bhagavānsarvalokapitāmahaḥ
सृष्टि का चिन्तन करते हुए उनसे आत्मा का महान् गुण 'महत्' उत्पन्न हुआ, ऐसा स्मरण किया जाता है; उससे अहंकार उत्पन्न हुआ, जो चार सुन्दर मुखों वाले ब्रह्मा हैं, हिरण्यगर्भ भगवान्, सब लोकों के पितामह।
श्लोक 22 (12.357.22)
पद्मेऽनिरुद्धात्संभूतस्तदा पद्मनिभेक्षणः । सहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्टः सनातनः ॥
padme'niruddhātsaṃbhūtastadā padmanibhekṣaṇaḥ | sahasrapatre dyutimānupaviṣṭaḥ sanātanaḥ
तब अनिरुद्ध से कमल में कमल-नयन उत्पन्न हुए; वे तेजस्वी सनातन पुरुष हज़ार पंखुड़ियों वाले कमल पर विराजमान हुए।
श्लोक 23 (12.357.23)
ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानाप्याययन्प्रभुः । सत्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान्सृजन् ॥
dadṛśe'dbhutasaṃkāśo lokānāpyāyayanprabhuḥ | satvasthaḥ parameṣṭhī sa tato bhūtagaṇānsṛjan
अद्भुत रूप वाले वे प्रभु दिखाई दिए, लोकों को तृप्त करते हुए; सत्त्व में स्थित परमेष्ठी ने तब भूतगणों की सृष्टि आरम्भ की।
श्लोक 24 (12.357.24)
पूर्वमेव च पद्मस्य पत्रे सूर्यांशुसप्रभे । नारायणकृतौ बिन्दू अपामास्तां गुणोत्तरौ ॥
pūrvameva ca padmasya patre sūryāṃśusaprabhe | nārāyaṇakṛtau bindū apāmāstāṃ guṇottarau
इससे पहले ही सूर्य की किरणों के समान प्रभा वाले कमल के पत्ते पर नारायण के रचे हुए, श्रेष्ठ गुणों वाले जल के दो बिन्दु थे।
श्लोक 25 (12.357.25)
तावपश्यत्स भगवाननादिनिधनोऽच्युतः । एकस्तत्राभवद्विन्दुर्मध्वाभो रुचिरप्रभः ॥
tāvapaśyatsa bhagavānanādinidhano'cyutaḥ | ekastatrābhavadvindurmadhvābho ruciraprabhaḥ
आदि और अन्त से रहित अच्युत भगवान् ने उन दोनों को देखा। उनमें एक बिन्दु मधु के रंग का और सुन्दर कान्ति वाला था।
श्लोक 26 (12.357.26)
स तामसो मधुर्जातस्तदा नारायणाज्ञया । कठिनस्त्वपरो विन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ॥
sa tāmaso madhurjātastadā nārāyaṇājñayā | kaṭhinastvaparo vinduḥ kaiṭabho rājasastu saḥ
नारायण की आज्ञा से वह तमोगुणी मधु बना; दूसरा बिन्दु कठोर था, और वही रजोगुणी कैटभ हुआ।
श्लोक 27 (12.357.27)
तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमोरजगुणान्वितौ । बलवन्तौ गदाहस्तौ पद्मनालानुसारिणौ ॥
tāvabhyadhāvatāṃ śreṣṭhau tamorajaguṇānvitau | balavantau gadāhastau padmanālānusāriṇau
तमोगुण और रजोगुण से युक्त वे दोनों श्रेष्ठ दैत्य, बलवान्, हाथ में गदा लिए, कमल की नाल के सहारे दौड़ पड़े।
श्लोक 28 (12.357.28)
ददृशातेऽरविन्दस्थं ब्रह्माणममितप्रभवम् । सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ॥
dadṛśāte'ravindasthaṃ brahmāṇamamitaprabhavam | sṛjantaṃ prathamaṃ vedāṃścaturaścāruvigrahān
उन दोनों ने कमल पर बैठे अमित प्रभाव वाले ब्रह्मा को देखा, जो सबसे पहले सुन्दर रूप वाले चारों वेदों की रचना कर रहे थे।
श्लोक 29 (12.357.29)
ततो विग्रहवन्तस्तान्वेदान्दृष्ट्वाऽसुरोत्तमौ । सहसा जगृहतुर्वेदान्ब्रह्मणः पश्यतस्तदा ॥
tato vigrahavantastānvedāndṛṣṭvā'surottamau | sahasā jagṛhaturvedānbrahmaṇaḥ paśyatastadā
तब देहधारी वेदों को देखकर उन दोनों श्रेष्ठ असुरों ने ब्रह्मा के देखते-देखते सहसा वेदों को छीन लिया।
श्लोक 30 (12.357.30)
अथ तौ दानवश्रेष्ठौ वेदान्गृह्य सनातनान् । रसां विविशतुस्तूर्णमुदक्पूर्वे महोदधौ ॥
atha tau dānavaśreṣṭhau vedāngṛhya sanātanān | rasāṃ viviśatustūrṇamudakpūrve mahodadhau
तब उन दोनों श्रेष्ठ दानवों ने सनातन वेदों को लेकर पूर्वोत्तर दिशा के महासागर में रसातल में शीघ्र प्रवेश किया।
श्लोक 31 (12.357.31)
ततो हृतेषु वेदेषु ब्रह्मा कश्मलमाविशत् । ततो वचनमीशानं प्राह वेदैर्विनाकृतः ॥
tato hṛteṣu vedeṣu brahmā kaśmalamāviśat | tato vacanamīśānaṃ prāha vedairvinākṛtaḥ
वेदों के हर लिए जाने पर ब्रह्मा मोह में पड़ गए, और वेदों से रहित होकर उन्होंने ईश्वर से ये वचन कहे।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 32 (12.357.32)
वेदा मे परमं चक्षुर्वेदा मे परमं बलम् । वेदा मे परमं धाम वेदा मे ब्रह्म चोत्तरम् ॥
vedā me paramaṃ cakṣurvedā me paramaṃ balam | vedā me paramaṃ dhāma vedā me brahma cottaram
वेद मेरी परम आँख हैं, वेद मेरा परम बल हैं, वेद मेरा परम धाम हैं, वेद मेरे उत्कृष्ट ब्रह्म हैं।
श्लोक 33 (12.357.33)
मम वेदा हृताः सर्वे दानवाभ्यां बलादितः । अन्धकारा हि मे लोका जाता वेदैर्विना कृताः ॥
mama vedā hṛtāḥ sarve dānavābhyāṃ balāditaḥ | andhakārā hi me lokā jātā vedairvinā kṛtāḥ
दो दानव मेरे सब वेद यहाँ से बलपूर्वक हर ले गए हैं। वेदों से रहित हुए मेरे लोक अन्धकार से भर गए हैं।
श्लोक 34 (12.357.34)
वेदानृते हि किं कुर्या लोकानां सृष्टिमुत्तमाम् । अहो बत महद्दुःखं वेदनाशनजं मम ॥
vedānṛte hi kiṃ kuryā lokānāṃ sṛṣṭimuttamām | aho bata mahadduḥkhaṃ vedanāśanajaṃ mama
वेदों के बिना मैं लोकों की उत्तम सृष्टि कैसे करूँ? हाय, वेदों के नष्ट होने से मुझे बड़ा दुःख हुआ है।
श्लोक 35 (12.357.35)
प्राप्तं दुनोति हृदयं तीव्रं शोकपरायणम् । को हि शोकार्णवे मग्नं मामितोऽद्य समुद्धरेत् ॥
prāptaṃ dunoti hṛdayaṃ tīvraṃ śokaparāyaṇam | ko hi śokārṇave magnaṃ māmito'dya samuddharet
यह तीव्र शोक मुझ पर आ पड़ा है और मेरे हृदय को जला रहा है। शोक के सागर में डूबे हुए मुझे आज यहाँ से कौन उबारेगा?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (12.357.36)
वेदांस्तांश्चानयेन्नष्टान्कस्य चाहं प्रियो भवे । इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम ॥
vedāṃstāṃścānayennaṣṭānkasya cāhaṃ priyo bhave | ityevaṃ bhāṣamāṇasya brahmaṇo nṛpasattama
उन खोए हुए वेदों को कौन वापस लाएगा, और मैं किसका प्रिय हूँ? हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मा जब इस प्रकार कह रहे थे,
श्लोक 37 (12.357.37)
हरेः स्तोत्रार्थमुद्भूता बुद्धिर्बुद्धिमतां वर । ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रहः प्रभुः ॥
hareḥ stotrārthamudbhūtā buddhirbuddhimatāṃ vara | tato jagau paraṃ japyaṃ sāñjalipragrahaḥ prabhuḥ
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! उनके मन में हरि की स्तुति करने की बुद्धि उत्पन्न हुई। तब प्रभु ने हाथ जोड़कर यह परम जप्य मन्त्र पढ़ा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 38 (12.357.38)
ॐ नमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज । लोकाद्यभुवनश्रेष्ठ साङ्ख्ययोगनिधे प्रभो ॥
ॐ namaste brahmahṛdaya namaste mama pūrvaja | lokādyabhuvanaśreṣṭha sāṅkhyayoganidhe prabho
ॐ। हे ब्रह्म के हृदय, आपको नमस्कार; हे मेरे पूर्वज, आपको नमस्कार। हे लोकों के आदि, भुवनों में श्रेष्ठ, सांख्य और योग के निधि प्रभु!
श्लोक 39 (12.357.39)
व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थितः । विश्वभुक्सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज । अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयंभुवः ॥
vyaktāvyaktakarācintya kṣemaṃ panthānamāsthitaḥ | viśvabhuksarvabhūtānāmantarātmannayonija | ahaṃ prasādajastubhyaṃ lokadhāma svayaṃbhuvaḥ
हे व्यक्त और अव्यक्त के रचयिता, हे अचिन्त्य, कल्याण के मार्ग में स्थित, विश्व के भोक्ता, सब भूतों के अन्तरात्मा, अयोनिज! मैं आपकी कृपा से उत्पन्न हूँ, आप जो लोकों के आधार और स्वयम्भू हैं।
श्लोक 40 (12.357.40)
त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् । चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत्पुरातनम् ॥
tvatto me mānasaṃ janma prathamaṃ dvijapūjitam | cākṣuṣaṃ vai dvitīyaṃ me janma cāsītpurātanam
आपसे मेरा पहला जन्म हुआ, मानस जन्म, जो द्विजों द्वारा पूजित है; और मेरा दूसरा जन्म पूर्वकाल में चाक्षुष हुआ।
श्लोक 41 (12.357.41)
त्वत्प्रसादात्तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् । त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ॥
tvatprasādāttu me janma tṛtīyaṃ vācikaṃ mahat | tvattaḥ śravaṇajaṃ cāpi caturthaṃ janma me vibho
आपकी कृपा से मेरा तीसरा महान् जन्म वाचिक हुआ; और हे विभो! आपसे मेरा चौथा जन्म श्रवण से हुआ।
श्लोक 42 (12.357.42)
नासत्यं चापि मे जन्म त्वत्तः पञ्चममुच्यते । अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितं ॥
nāsatyaṃ cāpi me janma tvattaḥ pañcamamucyate | aṇḍajaṃ cāpi me janma tvattaḥ ṣaṣṭhaṃ vinirmitaṃ
आपसे मेरा पाँचवाँ जन्म नासत्य कहा जाता है, और छठा जन्म आपसे अण्डज रूप में रचा गया।
श्लोक 43 (12.357.43)
इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो । सर्गेसर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ॥
idaṃ ca saptamaṃ janma padmajanmeti vai prabho | sargesarge hyahaṃ putrastava triguṇavarjita
और हे प्रभो! यह मेरा सातवाँ जन्म है, कमल से उत्पन्न। हे त्रिगुणरहित! प्रत्येक सृष्टि में मैं आपका पुत्र होता हूँ।
श्लोक 44 (12.357.44)
प्रथमः पुण्डरीकाक्षः प्रधानगुणकल्पितः । त्वमीश्वरः स्वभावश्च भूतानां त्वं प्रभावन ॥
prathamaḥ puṇḍarīkākṣaḥ pradhānaguṇakalpitaḥ | tvamīśvaraḥ svabhāvaśca bhūtānāṃ tvaṃ prabhāvana
आप प्रथम हैं, कमल-नयन हैं, प्रधान के गुणों से कल्पित हैं; आप ईश्वर हैं, स्वभाव हैं और भूतों के उत्पन्न करने वाले हैं।
श्लोक 45 (12.357.45)
त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिग । ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोस्मि जागृहि । ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोसि मे ॥
tvayā vinirmito'haṃ vai vedacakṣurvayotiga | te me vedā hṛtāścakṣurandho jātosmi jāgṛhi | dadasva cakṣūṃṣi mama priyo'haṃ te priyosi me
हे आयु से परे! आपने मुझे वेदरूपी नेत्रों वाला बनाया था। मेरे वे वेद हर लिए गए, मैं अन्धा हो गया हूँ। जागिए! मुझे नेत्र दीजिए; मैं आपका प्रिय हूँ और आप मेरे प्रिय हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 46 (12.357.46)
एवं स्तुतः स भगवान्पुरुषः सर्वतोमुखः । जहौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः ॥
evaṃ stutaḥ sa bhagavānpuruṣaḥ sarvatomukhaḥ | jahau nidrāmatha tadā vedakāryārthamudyataḥ
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर सब ओर मुख वाले भगवान् पुरुष ने निद्रा त्याग दी और वेदों के कार्य के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 47 (12.357.47)
ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थितः । सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा । कृत्वा हयशिरः शुभ्रं वेदानामालयं प्रभुः ॥
aiśvaryeṇa prayogeṇa dvitīyāṃ tanumāsthitaḥ | sunāsikena kāyena bhūtvā candraprabhastadā | kṛtvā hayaśiraḥ śubhraṃ vedānāmālayaṃ prabhuḥ
अपने ऐश्वर्य और योग के प्रयोग से उन्होंने दूसरा शरीर धारण किया। सुन्दर नासिका वाले शरीर से चन्द्रमा के समान कान्तिमान् होकर प्रभु ने वेदों के निवास-रूप उज्ज्वल हयशिर की रचना की।
श्लोक 48 (12.357.48)
तस्य मूर्धा समभवद्द्यौः सनक्षत्रतारकाः । केशाश्चास्याभवन्दीर्घा रवेरंशुसमप्रभाः ॥
tasya mūrdhā samabhavaddyauḥ sanakṣatratārakāḥ | keśāścāsyābhavandīrghā raveraṃśusamaprabhāḥ
उनका मस्तक नक्षत्रों और तारों सहित आकाश हुआ, और उनके लम्बे केश सूर्य की किरणों के समान प्रभा वाले थे।
श्लोक 49 (12.357.49)
कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी । गङ्गासरस्वती पुण्ये भ्रुवावास्तां महाद्युती ॥
karṇāvākāśapātāle lalāṭaṃ bhūtadhāriṇī | gaṅgāsarasvatī puṇye bhruvāvāstāṃ mahādyutī
आकाश और पाताल उनके कान थे, भूतों को धारण करने वाली पृथ्वी उनका ललाट थी, और महातेजस्विनी पुण्य गंगा तथा सरस्वती उनकी भौंहें थीं।
श्लोक 50 (12.357.50)
चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुनः स्मृता । ॐकारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ॥
cakṣuṣī somasūryau te nāsā saṃdhyā punaḥ smṛtā | ॐkārastvatha saṃskāro vidyujjihvā ca nirmitā
चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र थे, और सन्ध्या उनकी नासिका मानी गई; ॐकार उनका संस्कार था और बिजली उनकी जीभ बनी।
श्लोक 51 (12.357.51)
दन्ताश्च पितरो राजन्सोमपा इति विश्रुताः । गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः । ग्रीवा चास्याभवद्राजन्कालरात्रिर्गुणोत्तरा ॥
dantāśca pitaro rājansomapā iti viśrutāḥ | goloko brahmalokaśca oṣṭhāvāstāṃ mahātmanaḥ | grīvā cāsyābhavadrājankālarātrirguṇottarā
हे राजन्! उनके दाँत सोमपान करने वाले पितर थे, जो इसी नाम से प्रसिद्ध हैं; गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्मा के दोनों होंठ थे; और हे राजन्! उनकी ग्रीवा श्रेष्ठ गुणों वाली कालरात्रि थी।
श्लोक 52 (12.357.52)
एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् । अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः ॥
etaddhayaśiraḥ kṛtvā nānāmūrtibhirāvṛtam | antardadhau sa viśveśo viveśa ca rasāṃ prabhuḥ
अनेक मूर्तियों से आवृत इस हयशिर को धारण करके विश्वेश्वर प्रभु अन्तर्धान हो गए और रसातल में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 53 (12.357.53)
रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः । शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत्स्वरम् ॥
rasāṃ punaḥ praviṣṭaśca yogaṃ paramamāsthitaḥ | śaikṣyaṃ svaraṃ samāsthāya udgītaṃ prāsṛjatsvaram
फिर रसातल में प्रविष्ट होकर और परम योग में स्थित होकर उन्होंने शिक्षा के स्वर का आश्रय लिया और उद्गीथ का स्वर प्रवाहित किया।
श्लोक 54 (12.357.54)
सस्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च । बभूवान्तर्जलगतः सर्वभूतगुणोदितः ॥
sasvaraḥ sānunādī ca sarvaśaḥ snigdha eva ca | babhūvāntarjalagataḥ sarvabhūtaguṇoditaḥ
स्वर और प्रतिध्वनि से युक्त, सब ओर से स्निग्ध, वे जल के भीतर स्थित हुए, जिनमें सब भूतों के गुण प्रकट थे।
श्लोक 55 (12.357.55)
ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान्समयबन्धनान् । रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ ॥
tatastāvasurau kṛtvā vedānsamayabandhanān | rasātale vinikṣipya yataḥ śabdastato drutau
तब वे दोनों असुर वेदों को मानो प्रतिज्ञा के बन्धन में बाँधकर रसातल में डालकर उस ओर दौड़े जिधर से शब्द आ रहा था।
श्लोक 56 (12.357.56)
एतस्मिन्नन्तरे राजन्देवो हयशिरोधरः । जग्राह वेदानखिलान्रसातलगतान्हरिः ॥
etasminnantare rājandevo hayaśirodharaḥ | jagrāha vedānakhilānrasātalagatānhariḥ
इसी बीच, हे राजन्! हयशिर धारण करने वाले देव हरि ने रसातल में पड़े सब वेदों को उठा लिया।
श्लोक 57 (12.357.57)
प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ॥
prādācca brahmaṇe bhūyastataḥ svāṃ prakṛtiṃ gataḥ
उन्होंने उन्हें फिर ब्रह्मा को दे दिया और तब अपने स्वरूप में लौट गए।
श्लोक 58 (12.357.58)
स्थापयित्वा हयशिरा उदक्पूर्वे महोदधौ । वेदानामालयश्चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ॥
sthāpayitvā hayaśirā udakpūrve mahodadhau | vedānāmālayaścāpi babhūvāśvaśirāstataḥ
पूर्वोत्तर दिशा के महासागर में हयशिर रूप से स्थित होकर वे उसके बाद वेदों के निवास अश्वशिर बन गए।
श्लोक 59 (12.357.59)
अथ किंचिदपश्यन्तौ दानवौ मधुकैटभौ । यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत्स्थानं शून्यमेव च ॥
atha kiṃcidapaśyantau dānavau madhukaiṭabhau | yatra vedā vinikṣiptāstatsthānaṃ śūnyameva ca
तब मधु और कैटभ दोनों दानवों ने कुछ भी न देखा; जहाँ वेद छिपाए गए थे वह स्थान सूना था।
श्लोक 60 (12.357.60)
तत उत्तममास्थाय वेगं बलवतां वरौ । पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालयात्तदा ॥
tata uttamamāsthāya vegaṃ balavatāṃ varau | punaruttasthatuḥ śīghraṃ rasānāmālayāttadā
तब बलवानों में श्रेष्ठ वे दोनों परम वेग धारण करके रस के उस निवास से शीघ्र फिर ऊपर उठे।
श्लोक 61 (12.357.61)
ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् । श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् । भूयोप्यमितविक्रान्तं निद्रायोगमुपागतम् ॥
dadṛśāte ca puruṣaṃ tamevādikaraṃ prabhum | śvetaṃ candraviśuddhābhamaniruddhatanau sthitam | bhūyopyamitavikrāntaṃ nidrāyogamupāgatam
उन्होंने उसी आदिकर्ता प्रभु पुरुष को देखा, जो श्वेत वर्ण के, निर्मल चन्द्रमा के समान आभा वाले, अनिरुद्ध के शरीर में स्थित और अमित पराक्रमी थे, और फिर योगनिद्रा में लेटे थे,
श्लोक 62 (12.357.62)
आत्मप्रमाणरचिते अपामुपरि कल्पिते । शयने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ॥
ātmapramāṇaracite apāmupari kalpite | śayane nāgabhogāḍhye jvālāmālāsamāvṛte
अपने ही माप की, जल के ऊपर बनाई गई, नाग के कुण्डलों से भरी और ज्वाला-मालाओं से घिरी शय्या पर,
श्लोक 63 (12.357.63)
निष्कल्मषेण सत्वेन संपन्नं रुचिरप्रभम् । तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ॥
niṣkalmaṣeṇa satvena saṃpannaṃ ruciraprabham | taṃ dṛṣṭvā dānavendrau tau mahāhāsamamuñcatām
निर्मल सत्त्व से सम्पन्न और सुन्दर कान्ति वाले। उन्हें देखकर वे दोनों दानवेन्द्र ठहाका मारकर हँस पड़े।
श्लोक 64 (12.357.64)
ऊचतुश्च समाविष्टौ रजसा तमसा च तौ । अयं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ॥
ūcatuśca samāviṣṭau rajasā tamasā ca tau | ayaṃ sa puruṣaḥ śvetaḥ śete nidrāmupāgataḥ
रजोगुण और तमोगुण से आविष्ट होकर वे दोनों बोले, "यह वही श्वेत पुरुष है, जो निद्रा में पड़ा सोया है।"
श्लोक 65 (12.357.65)
अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् । कस्यैष कोनु खल्वेष किंच स्वपिति भोगवान् । इत्युच्चारितवाक्यौ तौ बोधयामासतुर्हरिम् ॥
anena nūnaṃ vedānāṃ kṛtamāharaṇaṃ rasāt | kasyaiṣa konu khalveṣa kiṃca svapiti bhogavān | ityuccāritavākyau tau bodhayāmāsaturharim
"निश्चय ही इसी ने रसातल से वेदों का हरण किया है। यह किसका है? यह कौन है? और यह नागशय्या पर सोने वाला क्यों सो रहा है?" ऐसा कहकर उन दोनों ने हरि को जगा दिया।
श्लोक 66 (12.357.66)
युद्धार्थिनौ हि विज्ञाय विबुद्धः पुरुषोत्तमः । निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनोदधे ॥
yuddhārthinau hi vijñāya vibuddhaḥ puruṣottamaḥ | nirīkṣya cāsurendrau tau tato yuddhe manodadhe
उन्हें युद्ध की इच्छा वाला जानकर पुरुषोत्तम जाग गए और उन दोनों असुरेन्द्रों को देखकर उन्होंने युद्ध करने का मन बनाया।
श्लोक 67 (12.357.67)
अथ युद्धं समभवत्तयोर्नारायणस्य वै ॥
atha yuddhaṃ samabhavattayornārāyaṇasya vai
तब उन दोनों और नारायण के बीच युद्ध हुआ।
श्लोक 68 (12.357.68)
रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभौ । ब्रह्मणोपचितिं कुर्वञ्जघान मधुसूदनः ॥
rajastamoviṣṭatanū tāvubhau madhukaiṭabhau | brahmaṇopacitiṃ kurvañjaghāna madhusūdanaḥ
रजस् और तमस् से भरे शरीर वाले उन दोनों, मधु और कैटभ, को मधुसूदन ने ब्रह्मा का सम्मान करते हुए मार डाला।
श्लोक 69 (12.357.69)
ततस्तयोर्वधेनाशु वेदापहरणेन च । शोकापनयनं चक्रे ब्रह्मणः पुरुषोत्तमः ॥
tatastayorvadhenāśu vedāpaharaṇena ca | śokāpanayanaṃ cakre brahmaṇaḥ puruṣottamaḥ
तब उन दोनों के वध से और वेदों का हरण मिटाने से पुरुषोत्तम ने ब्रह्मा का शोक दूर कर दिया।
श्लोक 70 (12.357.70)
ततः परिवृतो ब्रह्मा हरिणा वेदसत्कृतः । निर्ममे स तदा लोकान्कृत्स्नान्स्थावरजङ्गमान् ॥
tataḥ parivṛto brahmā hariṇā vedasatkṛtaḥ | nirmame sa tadā lokānkṛtsnānsthāvarajaṅgamān
तब हरि से घिरे हुए और वेदों से सत्कृत ब्रह्मा ने स्थावर और जंगम सब लोकों की रचना की।
श्लोक 71 (12.357.71)
दत्त्वा पितामहायाग्र्यां मतिं लोकविसर्गिकीम् । तत्रैवान्तर्दधे देवो यत एवागतो हरिः ॥
dattvā pitāmahāyāgryāṃ matiṃ lokavisargikīm | tatraivāntardadhe devo yata evāgato hariḥ
पितामह को लोकों की सृष्टि करने की श्रेष्ठ बुद्धि देकर वे देव वहीं अन्तर्धान हो गए जहाँ से हरि आए थे।
श्लोक 72 (12.357.72)
तौ दानवौ हरिर्हत्वा कृत्वा हयशिरस्तनुम् । पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ॥
tau dānavau harirhatvā kṛtvā hayaśirastanum | punaḥ pravṛttidharmārthaṃ tāmeva vidadhe tanum
उन दोनों दानवों को मारकर हयशिर शरीर धारण किए हुए हरि ने प्रवृत्ति-धर्म के लिए फिर उसी शरीर को धारण किया।
श्लोक 73 (12.357.73)
एवमेष महाभागो बभूवाश्वशिरा हरिः । पौराणमेतत्प्रख्यातं रूपं वरदमैश्वरम् ॥
evameṣa mahābhāgo babhūvāśvaśirā hariḥ | paurāṇametatprakhyātaṃ rūpaṃ varadamaiśvaram
इस प्रकार महाभाग हरि अश्वशिरा हुए। यह प्राचीन, प्रसिद्ध, वर देने वाला ऐश्वर्यमय रूप कहा गया।
श्लोक 74 (12.357.74)
यो ह्येतद्ब्राह्मणो नित्यं शृणुयाद्धारयीत वा । न तस्याध्ययनं नाशमुपगच्छेत्कदाचन ॥
yo hyetadbrāhmaṇo nityaṃ śṛṇuyāddhārayīta vā | na tasyādhyayanaṃ nāśamupagacchetkadācana
जो ब्राह्मण इसे नित्य सुनता या धारण करता है, उसका अध्ययन कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 75 (12.357.75)
आराध्य तपसोग्रेण देवं हयशिरोधरम् । पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तो रामेण पथि देशिते ॥
ārādhya tapasogreṇa devaṃ hayaśirodharam | pāñcālena kramaḥ prāpto rāmeṇa pathi deśite
हयशिर धारण करने वाले देव की उग्र तप से आराधना करके पाञ्चाल ने, राम द्वारा मार्ग दिखाए जाने पर, क्रम-पाठ प्राप्त किया।
श्लोक 76 (12.357.76)
एतद्धयशिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् । पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
etaddhayaśiro rājannākhyānaṃ tava kīrtitam | purāṇaṃ vedasamitaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
हे राजन्! यह हयशिर का आख्यान तुम्हें सुनाया गया; यह वेद के समान पुरातन आख्यान है, जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे थे।
श्लोक 77 (12.357.77)
यांयामिच्छेत्तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् । तातां कुर्याद्विकुर्वाणः स्वयमात्मानमात्मना ॥
yāṃyāmicchettanuṃ devaḥ kartuṃ kāryavidhau kvacit | tātāṃ kuryādvikurvāṇaḥ svayamātmānamātmanā
कार्य के अवसर पर देव जिस-जिस शरीर को धारण करना चाहते हैं, उस-उस शरीर को वे स्वयं अपने द्वारा अपना रूप बदलकर रच लेते हैं।
श्लोक 78 (12.357.78)
एष वेदनिधिः श्रीमानेष वै तपसोनिधिः । एष योगश्च साङ्ख्यं च ब्रह्म चाग्र्यं हविर्विभुः ॥
eṣa vedanidhiḥ śrīmāneṣa vai tapasonidhiḥ | eṣa yogaśca sāṅkhyaṃ ca brahma cāgryaṃ havirvibhuḥ
वे वेदों के निधि हैं, श्रीमान् हैं, तप के निधि हैं; वे योग और सांख्य हैं, परम ब्रह्म हैं, हवि हैं और सर्वव्यापी प्रभु हैं।
श्लोक 79 (12.357.79)
नारायणपरा वेदा याज्ञा नारायणात्मकाः । तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥
nārāyaṇaparā vedā yājñā nārāyaṇātmakāḥ | tapo nārāyaṇaparaṃ nārāyaṇaparā gatiḥ
वेदों के परम लक्ष्य नारायण हैं; यज्ञ नारायणस्वरूप हैं; तप का परम लक्ष्य नारायण है; नारायण ही परम गति हैं।
श्लोक 80 (12.357.80)
नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम् । नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः ॥
nārāyaṇaparaṃ satyamṛtaṃ nārāyaṇātmakam | nārāyaṇaparo dharmaḥ punarāvṛttidurlabhaḥ
सत्य का परम लक्ष्य नारायण है और ऋत नारायणस्वरूप है; धर्म का परम लक्ष्य नारायण है, और उससे पुनरावृत्ति दुर्लभ है।
श्लोक 81 (12.357.81)
प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः । नारायणात्मको गन्धो भूमौ श्रेष्ठतमः स्मृतः ॥
pravṛttilakṣaṇaścaiva dharmo nārāyaṇātmakaḥ | nārāyaṇātmako gandho bhūmau śreṣṭhatamaḥ smṛtaḥ
प्रवृत्ति-लक्षण धर्म भी नारायणस्वरूप है। पृथ्वी में सबसे श्रेष्ठ गुण गन्ध भी नारायणस्वरूप माना गया है।
श्लोक 82 (12.357.82)
अपां चापि गुणा राजन्रसा नारायणात्मकाः । ज्योतिषां च परं रूपं स्मृतं नारायणात्मकम् ॥
apāṃ cāpi guṇā rājanrasā nārāyaṇātmakāḥ | jyotiṣāṃ ca paraṃ rūpaṃ smṛtaṃ nārāyaṇātmakam
हे राजन्! जल के गुण रस भी नारायणस्वरूप हैं, और ज्योतियों का परम रूप भी नारायणस्वरूप माना गया है।
श्लोक 83 (12.357.83)
नारायणात्मकश्चापि स्पर्शो वायुगुणः स्मृतः । नारायणात्मकश्चैव शब्द आकाशसंभवः ॥
nārāyaṇātmakaścāpi sparśo vāyuguṇaḥ smṛtaḥ | nārāyaṇātmakaścaiva śabda ākāśasaṃbhavaḥ
वायु का गुण स्पर्श भी नारायणस्वरूप माना गया है, और आकाश से उत्पन्न शब्द भी नारायणस्वरूप है।
श्लोक 84 (12.357.84)
मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् । नारायणपरं कालो ज्योतिषामयनं च यत् ॥
manaścāpi tato bhūtamavyaktaguṇalakṣaṇam | nārāyaṇaparaṃ kālo jyotiṣāmayanaṃ ca yat
मन भी उसके बाद का भूत है, जो अव्यक्त के गुणों के लक्षण वाला है। काल और ज्योतियों का मार्ग, इन सबका परम लक्ष्य नारायण है।
श्लोक 85 (12.357.85)
नारायणपरा कीर्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च देवताः । नारायणपरं साङ्ख्यं योगो नारायणात्मकः ॥
nārāyaṇaparā kīrtiḥ śrīśca lakṣmīśca devatāḥ | nārāyaṇaparaṃ sāṅkhyaṃ yogo nārāyaṇātmakaḥ
कीर्ति, श्री, लक्ष्मी और देवताओं का परम लक्ष्य नारायण है; सांख्य का परम लक्ष्य नारायण है; योग नारायणस्वरूप है।
श्लोक 86 (12.357.86)
कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् । स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ॥
kāraṇaṃ puruṣo hyeṣāṃ pradhānaṃ cāpi kāraṇam | svabhāvaścaiva karmāṇi daivaṃ yeṣāṃ ca kāraṇam
इन सबका कारण पुरुष है, और प्रधान भी कारण है; स्वभाव, कर्म और दैव उन्हीं के कारण हैं।
श्लोक 87 (12.357.87)
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham | vividhā ca tathā ceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam
अधिष्ठान, कर्ता, अनेक प्रकार के करण, अनेक प्रकार की चेष्टा, और इनमें पाँचवाँ दैव।
श्लोक 88 (12.357.88)
पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः । तत्त्वं विज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ॥
pañcakāraṇasaṃkhyāto niṣṭhā sarvatra vai hariḥ | tattvaṃ vijñāsamānānāṃ hetubhiḥ sarvatomukhaiḥ
पाँच कारणों से जाना जाने वाला हरि ही सर्वत्र अन्तिम आश्रय है, उनके लिए जो सब ओर के हेतुओं से तत्त्व जानना चाहते हैं।
श्लोक 89 (12.357.89)
तत्त्वमेको महायोगी हरिर्नारायणः प्रभुः । ब्रह्मादीनां सलोकानामृषीणां च महात्मनाम् ॥
tattvameko mahāyogī harirnārāyaṇaḥ prabhuḥ | brahmādīnāṃ salokānāmṛṣīṇāṃ ca mahātmanām
ब्रह्मा आदि के लिए, उनके लोकों सहित, और महात्मा ऋषियों के लिए प्रभु हरि नारायण महायोगी ही एकमात्र तत्त्व हैं,
श्लोक 90 (12.357.90)
साङ्ख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् । मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ॥
sāṅkhyānāṃ yogināṃ cāpi yatīnāmātmavedinām | manīṣitaṃ vijānāti keśavo na tu tasya te
सांख्यों, योगियों, यतियों और आत्मज्ञानियों के लिए भी: केशव उनके मन की बात जानते हैं, पर वे उनकी बात नहीं जानते।
श्लोक 91 (12.357.91)
ये केचित्सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते । दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ॥
ye kecitsarvalokeṣu daivaṃ pitryaṃ ca kurvate | dānāni ca prayacchanti tapyante ca tapo mahat
जो कोई भी सब लोकों में देव और पितृ कर्म करते हैं, दान देते हैं और महान् तप करते हैं,
श्लोक 92 (12.357.92)
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः । सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ॥
sarveṣāmāśrayo viṣṇuraiśvaraṃ vidhimāsthitaḥ | sarvabhūtakṛtāvāso vāsudeveti cocyate
उन सबके आश्रय विष्णु हैं, जो ऐश्वर्यमय विधि में स्थित हैं; सब भूतों में निवास करने वाले वे वासुदेव कहे जाते हैं।
श्लोक 93 (12.357.93)
अयं हि नित्यः परमो महर्षिर् । महाविभूतिर्गुणवान्गुणाख्यः । गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं । कालो यथर्तावृतुसंप्रयुक्तः ॥
ayaṃ hi nityaḥ paramo maharṣir | mahāvibhūtirguṇavānguṇākhyaḥ | guṇaiśca saṃyogamupaiti śīghraṃ | kālo yathartāvṛtusaṃprayuktaḥ
वे नित्य हैं, परम हैं, महर्षि हैं, महान् विभूति वाले हैं, गुणवान् हैं और गुणों के नाम से जाने जाते हैं; वे शीघ्र ही गुणों से संयोग को प्राप्त होते हैं, जैसे काल अपने-अपने ऋतु से युक्त होता है।
श्लोक 94 (12.357.94)
नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो । न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति । ज्ञानात्मकाः संयमिनो महर्षयः । पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ॥
naivāsya vindanti gatiṃ mahātmano | na cāgatiṃ kaścidihānupaśyati | jñānātmakāḥ saṃyamino maharṣayaḥ | paśyanti nityaṃ puruṣaṃ guṇādhikam
उन महात्मा की गति कोई नहीं पाता, और यहाँ कोई उनके अनागमन को भी नहीं देखता। ज्ञानस्वरूप, संयमी महर्षि गुणों से परे उस पुरुष को सदा देखते हैं।