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शान्ति पर्व · अध्याय 358

एकान्ति-धर्म की उत्पत्ति और परम्परा

जनमेजय पूछते हैं कि नारायण के एकान्त भक्तों का धर्म सबसे पहले किसने कहा और वह कैसे चलता आया। वैशम्पायन, नारद ने व्यास और युधिष्ठिर को जो सुनाया था उसे दोहराते हुए, ब्रह्मा के सात जन्मों के माध्यम से इसकी परम्परा बताते हैं: नारायण से ब्रह्मा, मनु, स्वारोचिष, सनत्कुमार, दक्ष, विवस्वान् और इक्ष्वाकु तक, तथा यह भी कि यह धर्म बार-बार लुप्त होता और लौटता रहा। वे तीन प्रकृतियाँ, मोक्ष को पाने वाला सात्त्विक पुरुष, तथा सांख्य, योग, आरण्यक और पाञ्चरात्र का एक ही उपदेश के अंग होकर नारायण में समाप्त होना समझाते हैं, और अन्त में कहते हैं कि यह धर्म कितना दुर्लभ और कठिन है।

अध्याय 357अध्याय-सूचीअध्याय 359

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (12.358.1)

अहो ह्येकान्तिनः सर्वान्प्रीणाति भगवान्हरिः । विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति शिरसा स्वयम् ॥

aho hyekāntinaḥ sarvānprīṇāti bhagavānhariḥ | vidhiprayuktāṃ pūjāṃ ca gṛhṇāti śirasā svayam

अहो, भगवान् हरि अपने सभी एकान्त भक्तों को कैसे प्रसन्न करते हैं! विधिपूर्वक अर्पित की गई पूजा को वे स्वयं अपने शिर पर ग्रहण करते हैं।

श्लोक 2 (12.358.2)

ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः । तेषां च या हि निर्दिष्टा पारम्पर्यागता गतिः ॥

ye tu dagdhendhanā loke puṇyapāpavivarjitāḥ | teṣāṃ ca yā hi nirdiṣṭā pāramparyāgatā gatiḥ

और संसार में जिनका ईंधन जल चुका है, जो पुण्य और पाप दोनों से मुक्त हैं, उनके लिए जो गति बताई गई है, जो गुरु-परम्परा से चली आई है,

श्लोक 3 (12.358.3)

चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् । एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम् ॥

caturthyāṃ caiva te gatyāṃ gacchanti puruṣottamam | ekāntinastu puruṣā gacchanti paramaṃ padam

वे भी चौथी गति से पुरुषोत्तम को प्राप्त होते हैं; किन्तु एकान्ती पुरुष परम पद को पहुँचते हैं।

श्लोक 4 (12.358.4)

नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः । अगत्वा गतयस्तिस्रो यद्गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥

nūnamekāntadharmo'yaṃ śreṣṭho nārāyaṇapriyaḥ | agatvā gatayastisro yadgacchatyavyayaṃ harim

निश्चय ही नारायण को प्रिय यह एकान्त धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि यह तीनों गतियों से न जाकर सीधे अविनाशी हरि को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (12.358.5)

सहोपनिषदान्वेदान्ये विप्राः सम्यगास्थिताः । पठन्ति विधिमास्थाय ये चापि यतिधर्मिणः ॥

sahopaniṣadānvedānye viprāḥ samyagāsthitāḥ | paṭhanti vidhimāsthāya ye cāpi yatidharmiṇaḥ

जो ब्राह्मण उपनिषदों सहित वेदों में भली-भाँति स्थित हैं और विधिपूर्वक उनका पाठ करते हैं, तथा जो यतिधर्म का पालन करते हैं,

श्लोक 6 (12.358.6)

तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् । केनैष धर्मः कथितो देवेन ऋषिणाऽपि वा ॥

tebhyo viśiṣṭāṃ jānāmi gatimekāntināṃ nṛṇām | kenaiṣa dharmaḥ kathito devena ṛṣiṇā'pi vā

उनसे भी ऊँची मैं एकान्तियों की गति को मानता हूँ। यह धर्म किसने कहा था, किसी देवता ने अथवा किसी ऋषि ने?

श्लोक 7 (12.358.7)

एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो । एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ॥

ekāntināṃ ca kā caryā kadā cotpāditā vibho | etanme saṃśayaṃ chindhi paraṃ kautūhalaṃ hi me

और एकान्तियों का आचरण क्या है, तथा हे विभो, यह कब उत्पन्न हुआ? मेरे इस संशय को काट दीजिए, क्योंकि मुझे बहुत बड़ी उत्सुकता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (12.358.8)

समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोर्मृधे । अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥

samupoḍheṣvanīkeṣu kurupāṇḍavayormṛdhe | arjune vimanaske ca gītā bhagavatā svayam

जब कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं और अर्जुन का मन खिन्न हो गया, तब भगवान् ने स्वयं गीता का गान किया।

श्लोक 9 (12.358.9)

आगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया । गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥

āgatiśca gatiścaiva pūrvaṃ te kathitā mayā | gahano hyeṣa dharmo vai durvijñeyo'kṛtātmabhiḥ

आगति और गति दोनों मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ। यह धर्म गहन है और अपरिष्कृत आत्मा वालों के लिए समझना कठिन है।

श्लोक 10 (12.358.10)

संमितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः । धार्यते स्वयमीशेन राजन्नारायणेन ह ॥

saṃmitaḥ sāmavedena puraivādiyuge kṛtaḥ | dhāryate svayamīśena rājannārāyaṇena ha

यह सामवेद के अनुकूल है, आदि युग के आरम्भ में ही स्थापित हुआ था, और हे राजन्, स्वयं भगवान् नारायण इसे धारण करते हैं।

श्लोक 11 (12.358.11)

एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः । ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ॥

etadarthaṃ mahārāja pṛṣṭaḥ pārthena nāradaḥ | ṛṣimadhye mahābhāgaḥ śṛṇvatoḥ kṛṣṇabhīṣmayoḥ

हे महाराज, इसी विषय में पार्थ ने ऋषियों के बीच महाभाग नारद से पूछा था, जब कृष्ण और भीष्म सुन रहे थे।

श्लोक 12 (12.358.12)

गुरुणा च मयाऽप्येव कथितो नृपसत्तम । यथा तत्कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ॥

guruṇā ca mayā'pyeva kathito nṛpasattama | yathā tatkathitaṃ tatra nāradena tathā śṛṇu

हे नृपश्रेष्ठ, मेरे गुरु ने भी मुझे यह सुनाया था। नारद ने वहाँ जैसा कहा था, वैसा ही तुम सुनो।

श्लोक 13 (12.358.13)

यदाऽऽसीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् । ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ॥

yadā''sīnmānasaṃ janma nārāyaṇamukhodgatam | brahmaṇaḥ pṛthivīpāla tadā nārāyaṇaḥ svayam

हे पृथ्वीपाल, जब नारायण के मुख से निकला हुआ ब्रह्मा का मानस जन्म हुआ, तब स्वयं नारायण ने

श्लोक 14 (12.358.14)

तेन धर्मेण कृतवान्दैवं पित्र्यं च भारत । फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ॥

tena dharmeṇa kṛtavāndaivaṃ pitryaṃ ca bhārata | phenapā ṛṣayaścaiva taṃ dharmaṃ pratipedire

उसी धर्म से देवकर्म और पितृकर्म किया, हे भारत; और फेनप ऋषियों ने उस धर्म को प्राप्त किया।

श्लोक 15 (12.358.15)

वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे । वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ॥

vaikhānasāḥ phenapebhyo dharmaṃ taṃ pratipedire | vaikhānasebhyaḥ somastu tataḥ so'ntardadhe punaḥ

वैखानसों ने फेनपों से उस धर्म को प्राप्त किया; वैखानसों से वह सोम को मिला, और फिर वह अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 16 (12.358.16)

यदाऽऽसीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप । यदा पितामहेनैव सोमाद्धर्मः परिश्रुतः ॥

yadā''sīccākṣuṣaṃ janma dvitīyaṃ brahmaṇo nṛpa | yadā pitāmahenaiva somāddharmaḥ pariśrutaḥ

हे राजन्, जब ब्रह्मा का दूसरा, चाक्षुष जन्म हुआ, तब पितामह ने सोम से इस धर्म को सुना।

श्लोक 17 (12.358.17)

नारायणात्मको राजन्रुद्राय प्रददौ च तम् । ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ॥

nārāyaṇātmako rājanrudrāya pradadau ca tam | tato yogasthito rudraḥ purā kṛtayuge nṛpa

नारायणात्मक उन्होंने, हे राजन्, इसे रुद्र को दिया। तब योग में स्थित रुद्र ने, हे राजन्, पूर्वकाल में कृतयुग में

श्लोक 18 (12.358.18)

वालखिल्यानृषीन्सर्वान्धर्ममेनमपाठयत् । अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ॥

vālakhilyānṛṣīnsarvāndharmamenamapāṭhayat | antardadhe tato bhūyastasya devasya māyayā

सभी वालखिल्य ऋषियों को यह धर्म पढ़ाया। फिर उस देवता की माया से वह पुनः अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 19 (12.358.19)

तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद्वाचिकं महत् । तत्रैष धर्मः संभूतः स्वयं नारायणान्नृप ॥

tṛtīyaṃ brahmaṇo janma yadāsīdvācikaṃ mahat | tatraiṣa dharmaḥ saṃbhūtaḥ svayaṃ nārāyaṇānnṛpa

जब ब्रह्मा का तीसरा, वाचिक महान् जन्म हुआ, तब हे राजन्, वहाँ यह धर्म स्वयं नारायण से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 20 (12.358.20)

सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान्पुरुषोत्तमात् । तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ॥

suparṇo nāma tamṛṣiḥ prāptavānpuruṣottamāt | tapasā vai sutaptena damena niyamena ca

सुपर्ण नामक ऋषि ने भली-भाँति तपे हुए तप, दम और नियम के द्वारा पुरुषोत्तम से इसे प्राप्त किया।

श्लोक 21 (12.358.21)

त्रिः परिक्रान्तवानेतत्सुपर्णो धर्ममुत्तमम् । यस्मात्तस्माद्व्रतं ह्येतत्त्रिसौपर्णमिहोच्येत ॥

triḥ parikrāntavānetatsuparṇo dharmamuttamam | yasmāttasmādvrataṃ hyetattrisauparṇamihocyeta

क्योंकि सुपर्ण ने इस उत्तम धर्म का तीन बार अनुष्ठान किया, इसलिए यहाँ यह व्रत 'त्रिसौपर्ण' कहलाता है।

श्लोक 22 (12.358.22)

ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् । सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातनः ॥

ṛgvedapāṭhapaṭhitaṃ vratametaddhi duścaram | suparṇāccāpyadhigato dharma eṣa sanātanaḥ

ऋग्वेद के पाठ में पढ़ा गया यह व्रत दुश्चर है। सुपर्ण से यह सनातन धर्म आगे प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (12.358.23)

वायुना द्विपदां श्रेष्ठ प्रथितो जगदायुषा । वायोः सकाशात्प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ॥

vāyunā dvipadāṃ śreṣṭha prathito jagadāyuṣā | vāyoḥ sakāśātprāptaśca ṛṣibhirvighasāśibhiḥ

हे नरश्रेष्ठ, जगत् के प्राणस्वरूप वायु ने इसे प्रसिद्ध किया; और वायु से इसे विघसाशी ऋषियों ने प्राप्त किया।

श्लोक 24 (12.358.24)

तेभ्यो महोदधिश्चैव प्राप्तवान्धर्ममुत्तमम् । अन्तर्दधे ततो भूयो नारायणसमाहृतः ॥

tebhyo mahodadhiścaiva prāptavāndharmamuttamam | antardadhe tato bhūyo nārāyaṇasamāhṛtaḥ

उनसे महासागर ने उस उत्तम धर्म को प्राप्त किया; फिर नारायण द्वारा समेट लिए जाने पर वह पुनः अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 25 (12.358.25)

यदा भूयः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः । ब्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तयतः शृणु ॥

yadā bhūyaḥ śravaṇajā sṛṣṭirāsīnmahātmanaḥ | brahmaṇaḥ puruṣavyāghra tatra kīrtayataḥ śṛṇu

हे पुरुषव्याघ्र, जब महात्मा ब्रह्मा की श्रवण से उत्पन्न होने वाली सृष्टि फिर हुई, तब की कथा कहता हूँ, सुनो।

श्लोक 26 (12.358.26)

जगत्स्रष्टुमना देवो हरिर्नारायणः स्वयम् । चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम् ॥

jagatsraṣṭumanā devo harirnārāyaṇaḥ svayam | cintayāmāsa puruṣaṃ jagatsargakaraṃ prabhum

जगत् की सृष्टि करने की इच्छा से स्वयं देव हरि नारायण ने जगत् की रचना करने वाले एक समर्थ पुरुष का चिन्तन किया।

श्लोक 27 (12.358.27)

अथ चिन्तयतस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः स्मृतः । प्रजासर्गकरो ब्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ॥

atha cintayatastasya karṇābhyāṃ puruṣaḥ smṛtaḥ | prajāsargakaro brahmā tamuvāca jagatpatiḥ

तब चिन्तन करते हुए उनके कानों से एक पुरुष प्रकट हुआ, जो प्रजा की सृष्टि करने वाला ब्रह्मा था। जगत्पति ने उससे कहा।

नारायण उवाच

श्लोक 28 (12.358.28)

सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा । श्रेयस्तव विधास्यामि बलं तेजश्च सुव्रत ॥

sṛja prajāḥ putra sarvā mukhataḥ pādatastathā | śreyastava vidhāsyāmi balaṃ tejaśca suvrata

हे पुत्र, मुख से और वैसे ही चरणों से सब प्रजा की सृष्टि करो। हे सुव्रत, मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा और तुम्हें बल और तेज दूँगा।

श्लोक 29 (12.358.29)

धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः । तेन सृष्टं कृतयुगं स्थापयस्व यथाविधि ॥

dharmaṃ ca matto gṛhṇīṣva sātvataṃ nāma nāmataḥ | tena sṛṣṭaṃ kṛtayugaṃ sthāpayasva yathāvidhi

और मुझसे सात्वत नामक धर्म ग्रहण करो। उसी से रचे हुए कृतयुग को विधिपूर्वक स्थापित करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (12.358.30)

ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे देवाय हरिमेधसे । धर्मं चाग्र्यं स जग्राह सरहस्यं ससंग्रहम् ॥

tato brahmā namaścakre devāya harimedhase | dharmaṃ cāgryaṃ sa jagrāha sarahasyaṃ sasaṃgraham

तब ब्रह्मा ने हरि की बुद्धि वाले उस देवता को नमस्कार किया और रहस्य तथा संग्रह सहित उस श्रेष्ठ धर्म को ग्रहण किया।

श्लोक 31 (12.358.31)

आरण्यकेन सहितं नारायणमुखोद्गतम् । उपदिश्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे ॥

āraṇyakena sahitaṃ nārāyaṇamukhodgatam | upadiśya tato dharmaṃ brahmaṇe'mitatejase

अपरिमित तेज वाले ब्रह्मा को आरण्यक सहित, नारायण के मुख से निकले हुए उस धर्म का उपदेश देकर,

श्लोक 32 (12.358.32)

तं कार्तयुगधर्माणं निराशीः कर्मसंज्ञितम् । जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ॥

taṃ kārtayugadharmāṇaṃ nirāśīḥ karmasaṃjñitam | jagāma tamasaḥ pāraṃ yatrāvyaktaṃ vyavasthitam

वे अन्धकार के उस पार चले गए, जहाँ अव्यक्त स्थित है; वह कृतयुग का धर्म फलकामना से रहित और कर्म नाम से जाना जाता है।

श्लोक 33 (12.358.33)

ततोऽथ वरदो देवो ब्रह्मा लोकपितामहः । असृजत्स ततो लोकान्कृत्स्नान्स्थावरजङ्गमान् ॥

tato'tha varado devo brahmā lokapitāmahaḥ | asṛjatsa tato lokānkṛtsnānsthāvarajaṅgamān

तब वर देने वाले देव लोकपितामह ब्रह्मा ने स्थावर और जंगम समस्त लोकों की सृष्टि की।

श्लोक 34 (12.358.34)

ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतयुगं शुभम् । ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ॥

tataḥ prāvartata tadā ādau kṛtayugaṃ śubham | tato hi sātvato dharmo vyāpya lokānavasthitaḥ

तब आदि में शुभ कृतयुग आरम्भ हुआ, और सात्वत धर्म लोकों में व्याप्त होकर स्थित हो गया।

श्लोक 35 (12.358.35)

तेनैवाद्येन धर्मेण ब्रह्मा लोकविसर्गकृत् । पूजयामास देवेशं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥

tenaivādyena dharmeṇa brahmā lokavisargakṛt | pūjayāmāsa deveśaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ prabhum

उसी आदि धर्म से लोकों की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा ने देवेश्वर प्रभु हरि नारायण की पूजा की।

श्लोक 36 (12.358.36)

धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः । अध्यापयामास तदा लोकानां हितकाम्यया ॥

dharmapratiṣṭhāhetośca manuṃ svārociṣaṃ tataḥ | adhyāpayāmāsa tadā lokānāṃ hitakāmyayā

फिर धर्म की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने लोकों के हित की कामना से स्वारोचिष मनु को यह पढ़ाया।

श्लोक 37 (12.358.37)

ततः स्वारोचिषः पुत्रं स्वयं शङ्खपदं नृप । अध्यापयत्पुराऽव्यग्रः सर्वलोकपतिर्विभुः ॥

tataḥ svārociṣaḥ putraṃ svayaṃ śaṅkhapadaṃ nṛpa | adhyāpayatpurā'vyagraḥ sarvalokapatirvibhuḥ

तब स्वारोचिष ने, जो शान्तचित्त और सब लोकों के स्वामी थे, हे राजन्, अपने पुत्र शंखपद को स्वयं यह पढ़ाया।

श्लोक 38 (12.358.38)

ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् । दिशापालं सुधर्माणमध्यापयत भारत । सोऽन्तर्दधे ततो भूयः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ॥

tataḥ śaṅkhapadaścāpi putramātmajamaurasam | diśāpālaṃ sudharmāṇamadhyāpayata bhārata | so'ntardadhe tato bhūyaḥ prāpte tretāyuge punaḥ

फिर शंखपद ने भी अपने औरस पुत्र दिशापाल सुधर्मा को, हे भारत, यह पढ़ाया। तत्पश्चात् त्रेतायुग के पुनः आने पर वह फिर अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 39 (12.358.39)

नासत्ये जन्मनि पुरा ब्रह्मणः पार्थिवोत्तम । धर्ममेतं स्वयं देवो हरिर्नारायणः प्रभुः ॥

nāsatye janmani purā brahmaṇaḥ pārthivottama | dharmametaṃ svayaṃ devo harirnārāyaṇaḥ prabhuḥ

हे पार्थिवश्रेष्ठ, पूर्वकाल में ब्रह्मा के नासत्य नामक जन्म में देव हरि नारायण प्रभु ने स्वयं इस धर्म को

श्लोक 40 (12.358.40)

तज्जगादारविन्दाक्षो ब्रह्मणः पश्यतस्तदा । सनत्कुमारो भगवांस्ततः प्राधीतवान्नृप ॥

tajjagādāravindākṣo brahmaṇaḥ paśyatastadā | sanatkumāro bhagavāṃstataḥ prādhītavānnṛpa

कहा; कमलनयन ने ब्रह्मा के देखते हुए उसे कहा। तब भगवान् सनत्कुमार ने, हे राजन्, उसे पढ़ा।

श्लोक 41 (12.358.41)

सनत्कुमारादपि च वीरणो वै प्रजापतिः । कृतादौ कुरुशार्दूल धर्ममेतदधीतवान् ॥

sanatkumārādapi ca vīraṇo vai prajāpatiḥ | kṛtādau kuruśārdūla dharmametadadhītavān

और हे कुरुशार्दूल, कृतयुग के आदि में सनत्कुमार से प्रजापति वीरण ने इस धर्म को सीखा।

श्लोक 42 (12.358.42)

वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रैभ्याय मुनये ददौ । रैभ्यः पुत्राय शुद्धाय सुव्रताय सुमेधसे ॥

vīraṇaścāpyadhītyainaṃ raibhyāya munaye dadau | raibhyaḥ putrāya śuddhāya suvratāya sumedhase

वीरण ने भी इसे सीखकर मुनि रैभ्य को दिया; और रैभ्य ने अपने शुद्ध, दृढ़ व्रत वाले और उत्तम बुद्धि वाले पुत्र को दिया,

श्लोक 43 (12.358.43)

कुक्षिपालाय च ददौ विशालाय च धर्मिणे । ततोऽप्यन्तर्दधे भूयो नारायणमुखोद्गतः ॥

kukṣipālāya ca dadau viśālāya ca dharmiṇe | tato'pyantardadhe bhūyo nārāyaṇamukhodgataḥ

और उसने इसे कुक्षिपाल को तथा धर्मात्मा विशाल को दिया। तब नारायण के मुख से निकला हुआ वह धर्म फिर अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 44 (12.358.44)

अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये । एष धर्मः समुद्भूतो नारायणमुखात्पुनः ॥

aṇḍaje janmani punarbrahmaṇe hariyonaye | eṣa dharmaḥ samudbhūto nārāyaṇamukhātpunaḥ

अण्डज जन्म में, हरि से उत्पन्न ब्रह्मा के लिए, यह धर्म नारायण के मुख से फिर प्रकट हुआ।

श्लोक 45 (12.358.45)

गृहीतो ब्रह्मणा राजन्प्रयुक्तश्च यथाविधि । अध्यापिताश्च मुनयो नाम्ना बर्हिषदो नृप ॥

gṛhīto brahmaṇā rājanprayuktaśca yathāvidhi | adhyāpitāśca munayo nāmnā barhiṣado nṛpa

हे राजन्, ब्रह्मा ने इसे ग्रहण किया और विधिपूर्वक इसका प्रयोग किया; और हे राजन्, बर्हिषद नामक मुनियों को यह पढ़ाया गया।

श्लोक 46 (12.358.46)

बर्हिषद्भ्यश्च संप्राप्तः सामवेदान्तगं द्विजम् । ज्येष्ठं नामाभिविख्यातं ज्येष्ठसामव्रतो हरिः ॥

barhiṣadbhyaśca saṃprāptaḥ sāmavedāntagaṃ dvijam | jyeṣṭhaṃ nāmābhivikhyātaṃ jyeṣṭhasāmavrato hariḥ

बर्हिषदों से यह सामवेद के पारंगत एक द्विज को प्राप्त हुआ, जो ज्येष्ठ नाम से प्रसिद्ध थे, ज्येष्ठसाम व्रत धारण करने वाले हरि।

श्लोक 47 (12.358.47)

ज्येष्ठाच्चाप्यनुसंक्रान्तो राजानमविकम्पनम् । अन्तर्दधे ततो राजन्नेष धर्मः प्रभो हरेः ॥

jyeṣṭhāccāpyanusaṃkrānto rājānamavikampanam | antardadhe tato rājanneṣa dharmaḥ prabho hareḥ

ज्येष्ठ से यह राजा अविकम्पन को प्राप्त हुआ। तब हे राजन्, भगवान् हरि का यह धर्म फिर अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 48 (12.358.48)

यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप । तत्रैष धर्मः कथितः स्वयं नारायणेन ह ॥

yadidaṃ saptamaṃ janma padmajaṃ brahmaṇo nṛpa | tatraiṣa dharmaḥ kathitaḥ svayaṃ nārāyaṇena ha

हे राजन्, ब्रह्मा का यह जो सातवाँ, पद्म से उत्पन्न जन्म है, इसमें यह धर्म स्वयं नारायण ने कहा।

श्लोक 49 (12.358.49)

पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे । पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ददौ ॥

pitāmahāya śuddhāya yugādau lokadhāriṇe | pitāmahaśca dakṣāya dharmametaṃ purā dadau

युग के आदि में लोकों को धारण करने वाले शुद्ध पितामह को; और पितामह ने पूर्वकाल में यह धर्म दक्ष को दिया।

श्लोक 50 (12.358.50)

ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद्दक्षो नृपोत्तम । आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वाञ्जगृहे ततः ॥

tato jyeṣṭhe tu dauhitre prādāddakṣo nṛpottama | āditye saviturjyeṣṭhe vivasvāñjagṛhe tataḥ

तब हे नृपश्रेष्ठ, दक्ष ने इसे अपने ज्येष्ठ दौहित्र को दिया, उस आदित्य को जो सविता से बड़ा था; और तब विवस्वान् ने इसे ग्रहण किया।

श्लोक 51 (12.358.51)

त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान्मनवे ददौ । मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥

tretāyugādau ca tato vivasvānmanave dadau | manuśca lokabhūtyarthaṃ sutāyekṣvākave dadau

त्रेतायुग के आदि में विवस्वान् ने इसे मनु को दिया; और मनु ने लोक के कल्याण के लिए अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया।

श्लोक 52 (12.358.52)

इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः । गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप ॥

ikṣvākuṇā ca kathito vyāpya lokānavasthitaḥ | gamiṣyati kṣayānte ca punarnārāyaṇaṃ nṛpa

इक्ष्वाकु द्वारा कहा जाकर यह लोकों में व्याप्त होकर स्थित रहा; और हे राजन्, कल्प के अन्त में यह फिर नारायण में चला जाएगा।

श्लोक 53 (12.358.53)

यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥

yatīnāṃ cāpi yo dharmaḥ sa te pūrvaṃ nṛpottama | kathito harigītāsu samāsavidhikalpitaḥ

और हे नृपश्रेष्ठ, यतियों का जो धर्म है, वह तुम्हें पहले हरिगीताओं में संक्षेप की विधि से कहा जा चुका है।

श्लोक 54 (12.358.54)

नारदेन सुसंप्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः । एष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप ॥

nāradena susaṃprāptaḥ sarahasyaḥ sasaṃgrahaḥ | eṣa dharmo jagannāthātsākṣānnārāyaṇānnṛpa

हे राजन्, रहस्य और संग्रह सहित यह धर्म नारद ने जगन्नाथ साक्षात् नारायण से प्राप्त किया।

श्लोक 55 (12.358.55)

एवमेव महान्धर्म आद्यो राजन्सनातनः । दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ॥

evameva mahāndharma ādyo rājansanātanaḥ | durvijñeyo duṣkaraśca sātvatairdhāryate sadā

इस प्रकार, हे राजन्, यह महान् धर्म आदि और सनातन है; यह दुर्विज्ञेय और दुष्कर है, और सात्वतों द्वारा सदा धारण किया जाता है।

श्लोक 56 (12.358.56)

धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रयुक्तेन कर्मणा । अहिंसाधर्मयुक्तेन प्रीयते हरिरीश्वरः ॥

dharmajñānena caitena suprayuktena karmaṇā | ahiṃsādharmayuktena prīyate harirīśvaraḥ

इस धर्मज्ञान से, भली-भाँति प्रयुक्त कर्म से और अहिंसा-धर्म से युक्त होने पर भगवान् हरि प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 57 (12.358.57)

एकव्यूहविभागो वा क्वचिद्द्विव्यूहसंज्ञितः । त्रिव्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ॥

ekavyūhavibhāgo vā kvaciddvivyūhasaṃjñitaḥ | trivyūhaścāpi saṃkhyātaścaturvyūhaśca dṛśyate

यह कभी एक व्यूह के विभाग वाला कहा जाता है, कभी दो व्यूह वाला; तीन व्यूह वाला भी गिना गया है और चार व्यूह वाला भी दिखाई देता है।

श्लोक 58 (12.358.58)

हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा । जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ॥

harireva hi kṣetrajño nirmamo niṣkalastathā | jīvaśca sarvabhūteṣu pañcabhūtaguṇātigaḥ

हरि ही क्षेत्रज्ञ हैं, ममता से रहित और निष्कल; वे सब प्राणियों में जीव हैं और पाँच भूतों के गुणों से परे हैं।

श्लोक 59 (12.358.59)

मनश्च प्रथितं राजन्पञ्चेन्द्रियसमीरणम् । एष लोकनिधिः श्रीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥

manaśca prathitaṃ rājanpañcendriyasamīraṇam | eṣa lokanidhiḥ śrīmāneṣa lokavisargakṛt

और हे राजन्, मन भी पाँचों इन्द्रियों को चलाने वाला प्रसिद्ध है। वे श्रीमान् लोकों के निधि हैं; वे ही लोकों की सृष्टि करने वाले हैं।

श्लोक 60 (12.358.60)

अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च । यथेच्छति तथा राजन्क्रीडते पुरुषोऽव्ययः ॥

akartā caiva kartā ca kāryaṃ kāraṇameva ca | yathecchati tathā rājankrīḍate puruṣo'vyayaḥ

वे अकर्ता भी हैं और कर्ता भी, कार्य भी हैं और कारण भी; हे राजन्, अविनाशी पुरुष जैसी इच्छा करते हैं, वैसे ही क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 61 (12.358.61)

एष एकान्तिधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम । मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥

eṣa ekāntidharmaste kīrtito nṛpasattama | mayā guruprasādena durvijñeyo'kṛtātmabhiḥ

हे नृपश्रेष्ठ, यह एकान्ति-धर्म मैंने गुरु की कृपा से तुम्हें बताया है; अपरिष्कृत आत्मा वालों के लिए इसे समझना कठिन है।

श्लोक 62 (12.358.62)

एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत्स्यात्कुरुनन्दन ॥

ekāntino hi puruṣā durlabhā bahavo nṛpa | yadyekāntibhirākīrṇaṃ jagatsyātkurunandana

हे राजन्, एकान्ती पुरुष बहुत संख्या में मिलना दुर्लभ है। यदि, हे कुरुनन्दन, जगत् एकान्तियों से भरा होता,

श्लोक 63 (12.358.63)

अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः । भवेत्कृतयुगप्राप्तिराशीः कर्मविवर्जिता ॥

ahiṃsakairātmavidbhiḥ sarvabhūtahite rataiḥ | bhavetkṛtayugaprāptirāśīḥ karmavivarjitā

जो अहिंसक, आत्मज्ञानी और सब प्राणियों के हित में रत होते, तो कामनायुक्त कर्म से रहित कृतयुग की प्राप्ति हो जाती।

श्लोक 64 (12.358.64)

एवं स भगवान्व्यासो गुरुर्मम विशांपते । कथयामास धर्मज्ञो धर्मराजे द्विजोत्तमः ॥

evaṃ sa bhagavānvyāso gururmama viśāṃpate | kathayāmāsa dharmajño dharmarāje dvijottamaḥ

हे विशाम्पते, इस प्रकार मेरे गुरु धर्मज्ञ द्विजश्रेष्ठ भगवान् व्यास ने धर्मराज को यह सुनाया।

श्लोक 65 (12.358.65)

ऋषीणां संनिधौ राजञ्शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः । तस्याप्यकथयत्पूर्वं नारदः सुमहातपाः ॥

ṛṣīṇāṃ saṃnidhau rājañśṛṇvatoḥ kṛṣṇabhīṣmayoḥ | tasyāpyakathayatpūrvaṃ nāradaḥ sumahātapāḥ

हे राजन्, यह ऋषियों के सामने कहा गया, जब कृष्ण और भीष्म सुन रहे थे; और उन्हें पहले महातपस्वी नारद ने सुनाया था।

श्लोक 66 (12.358.66)

देवं परमकं ब्रह्म श्वेतं चन्द्राभमच्युतम् । यत्र चैकान्तिनो यान्ति नारायणपरायणाः । तदेव परमं स्थानं मुक्तानां केवलं भवेत् ॥

devaṃ paramakaṃ brahma śvetaṃ candrābhamacyutam | yatra caikāntino yānti nārāyaṇaparāyaṇāḥ | tadeva paramaṃ sthānaṃ muktānāṃ kevalaṃ bhavet

वे देव परम ब्रह्म हैं, श्वेत, चन्द्रमा की आभा वाले और अच्युत, जिनके पास नारायण-परायण एकान्ती जाते हैं; वही मुक्तों का एकमात्र परम स्थान होगा।

जनमेजय उवाच

श्लोक 67 (12.358.67)

एवं बहुविधं धर्मं प्रविबुद्धैर्निषेवितम् । न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिताः ॥

evaṃ bahuvidhaṃ dharmaṃ pravibuddhairniṣevitam | na kurvanti kathaṃ viprā anye nānāvrate sthitāḥ

प्रबुद्ध पुरुषों से सेवित इस अनेक प्रकार के धर्म को दूसरे ब्राह्मण, जो नाना व्रतों में स्थित हैं, क्यों नहीं करते?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (12.358.68)

तिस्रः प्रकृतयो राजन्देहबन्धेषु निर्मिताः । सात्विकी राजसी चैव तामसी चैव भारत ॥

tisraḥ prakṛtayo rājandehabandheṣu nirmitāḥ | sātvikī rājasī caiva tāmasī caiva bhārata

हे राजन्, देह के बन्धनों में तीन प्रकृतियाँ रची गई हैं: सात्त्विकी, राजसी और तामसी, हे भारत।

श्लोक 69 (12.358.69)

देहबन्धेषु पुरुषः श्रेष्ठः कुरुकुलोद्वह । सात्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षाय निश्चितः ॥

dehabandheṣu puruṣaḥ śreṣṭhaḥ kurukulodvaha | sātvikaḥ puruṣavyāghra bhavenmokṣāya niścitaḥ

हे कुरुकुलोद्वह, देहधारियों में श्रेष्ठ पुरुष सात्त्विक है; हे पुरुषव्याघ्र, वह मोक्ष के लिए निश्चय वाला होता है।

श्लोक 70 (12.358.70)

अत्रापि स विजानाति पुरुषं ब्रह्मवित्तमम् । नारायणं परं मोक्षे ततो वै सात्विकः स्मृतः ॥

atrāpi sa vijānāti puruṣaṃ brahmavittamam | nārāyaṇaṃ paraṃ mokṣe tato vai sātvikaḥ smṛtaḥ

इसमें भी वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष को जानता है, और मोक्ष में नारायण को परम जानता है; इसीलिए वह सात्त्विक कहा गया है।

श्लोक 71 (12.358.71)

मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन्पुरुषोत्तमम् । एकान्तभक्तः सततं नारायणपरायणः ॥

manīṣitaṃ ca prāpnoti cintayanpuruṣottamam | ekāntabhaktaḥ satataṃ nārāyaṇaparāyaṇaḥ

वह पुरुषोत्तम का चिन्तन करता हुआ अपना अभीष्ट पाता है; वह एकनिष्ठ भक्त होता है और सदा नारायण-परायण रहता है।

श्लोक 72 (12.358.72)

मनीषिणो हि ये केचिद्यतयो मोक्षधर्मिणः । तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥

manīṣiṇo hi ye kecidyatayo mokṣadharmiṇaḥ | teṣāṃ vicchinnatṛṣṇānāṃ yogakṣemavaho hariḥ

और जो कोई मनीषी यती मोक्षधर्म का पालन करते हैं और जिनकी तृष्णा कट चुकी है, उनके योगक्षेम का भार हरि वहन करते हैं।

श्लोक 73 (12.358.73)

जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः । सात्विकस्तु स विज्ञेयो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ॥

jāyamānaṃ hi puruṣaṃ yaṃ paśyenmadhusūdanaḥ | sātvikastu sa vijñeyo bhavenmokṣe ca niścitaḥ

उत्पन्न होते समय जिस पुरुष को मधुसूदन देख लेते हैं, उसे सात्त्विक और मोक्ष के लिए निश्चय वाला जानना चाहिए।

श्लोक 74 (12.358.74)

साङ्ख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तिसेवितः । नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिं ॥

sāṅkhyayogena tulyo hi dharma ekāntisevitaḥ | nārāyaṇātmake mokṣe tato yānti parāṃ gatiṃ

एकान्तियों द्वारा सेवित धर्म सांख्य और योग के तुल्य है; नारायणस्वरूप मोक्ष के द्वारा वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 75 (12.358.75)

नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो भवेत्पुमान् । एवमात्मेच्छया राजन्प्रतिबुद्धो न जायते ॥

nārāyaṇena dṛṣṭaśca pratibuddho bhavetpumān | evamātmecchayā rājanpratibuddho na jāyate

जिस पुरुष को नारायण देख लेते हैं, वह प्रबुद्ध हो जाता है। और इस प्रकार, हे राजन्, अपनी इच्छा से प्रबुद्ध हुआ पुरुष फिर जन्म नहीं लेता।

श्लोक 76 (12.358.76)

राजसी तामसी चैव व्यामिश्रे प्रकृती स्मृते । तदात्मकं हि पुरुषं जायमानं विशांपते । प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वयम् ॥

rājasī tāmasī caiva vyāmiśre prakṛtī smṛte | tadātmakaṃ hi puruṣaṃ jāyamānaṃ viśāṃpate | pravṛttilakṣaṇairyuktaṃ nāvekṣati hariḥ svayam

राजसी और तामसी प्रकृतियाँ मिश्रित कही गई हैं। हे विशाम्पते, उस स्वभाव वाले, प्रवृत्ति के लक्षणों से युक्त उत्पन्न होते पुरुष की ओर हरि स्वयं नहीं देखते।

श्लोक 77 (12.358.77)

पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा लोकपितामहः । रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ॥

paśyatyenaṃ jāyamānaṃ brahmā lokapitāmahaḥ | rajasā tamasā caiva mānasaṃ samabhiplutam

लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न होते हुए ऐसे पुरुष को देखते हैं, जिसका मन रजोगुण और तमोगुण से भरा होता है।

श्लोक 78 (12.358.78)

कामं देवाश्च ऋषयः सत्वस्था नृपसत्तम । हीनाः सत्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः ॥

kāmaṃ devāśca ṛṣayaḥ satvasthā nṛpasattama | hīnāḥ satvena sūkṣmeṇa tato vaikārikāḥ smṛtāḥ

हे नृपश्रेष्ठ, देवता और ऋषि यथेच्छ सत्त्व में स्थित हैं, पर सूक्ष्म सत्त्व से हीन हैं; इसीलिए वे वैकारिक कहे गए हैं।

जनमेजय उवाच

श्लोक 79 (12.358.79)

कथं वैकारिको गच्छेत्पुरुषः पुरुषोत्तमम् । वद सर्वं यथादृष्टं प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ॥

kathaṃ vaikāriko gacchetpuruṣaḥ puruṣottamam | vada sarvaṃ yathādṛṣṭaṃ pravṛttiṃ ca yathākramam

वैकारिक पुरुष पुरुषोत्तम को कैसे प्राप्त कर सकता है? जैसा आपने देखा है, वह सब बताइए, और प्रवृत्ति का भी क्रमपूर्वक वर्णन कीजिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 80 (12.358.80)

सुसूक्ष्मं तत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरैः । पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियं पञ्चविंशकम् ॥

susūkṣmaṃ tattvasaṃyuktaṃ saṃyuktaṃ tribhirakṣaraiḥ | puruṣaḥ puruṣaṃ gacchenniṣkriyaṃ pañcaviṃśakam

अत्यन्त सूक्ष्म, तत्त्वों से और तीन अक्षरों से संयुक्त पुरुष उस निष्क्रिय पच्चीसवें पुरुष को प्राप्त होता है।

श्लोक 81 (12.358.81)

एवमेकं साङ्ख्ययोगं वेदारण्यकमेव च । परस्पराङ्गान्येतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ॥

evamekaṃ sāṅkhyayogaṃ vedāraṇyakameva ca | parasparāṅgānyetāni pāñcarātraṃ ca kathyate

इस प्रकार सांख्य और योग एक हैं, और वेद, आरण्यक तथा पाञ्चरात्र भी कहे जाते हैं; ये सब एक-दूसरे के अंग हैं।

श्लोक 82 (12.358.82)

एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ॥

eṣa ekāntināṃ dharmo nārāyaṇaparātmakaḥ

यह एकान्तियों का धर्म है, जिसका परम स्वरूप नारायण है।

श्लोक 83 (12.358.83)

यथा समुद्रात्प्रसृता जलौघा । स्तमेव राजन्पुनराविशन्ति । इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा । नारायणं वै पुनराविशन्ति ॥

yathā samudrātprasṛtā jalaughā | stameva rājanpunarāviśanti | ime tathā jñānamahājalaughā | nārāyaṇaṃ vai punarāviśanti

हे राजन्, जैसे समुद्र से निकली हुई जलधाराएँ फिर उसी समुद्र में प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही ज्ञान की ये महान् धाराएँ फिर नारायण में प्रवेश करती हैं।

श्लोक 84 (12.358.84)

एष ते कथितो धर्मः सात्वतो यदुबान्धव । कुरुष्वैनं यथान्यायं यदि शक्तोसि भारत ॥

eṣa te kathito dharmaḥ sātvato yadubāndhava | kuruṣvainaṃ yathānyāyaṃ yadi śaktosi bhārata

हे यदुबान्धव, यह सात्वत धर्म तुम्हें बता दिया गया। हे भारत, यदि समर्थ हो तो इसका यथोचित पालन करो।

श्लोक 85 (12.358.85)

एवं हि स महाभागो नारदो गुरवे मम । श्वेतानां यतिनां चाह एकान्तगतिमव्ययाम् ॥

evaṃ hi sa mahābhāgo nārado gurave mama | śvetānāṃ yatināṃ cāha ekāntagatimavyayām

इस प्रकार महाभाग नारद ने मेरे गुरु से श्वेतों और यतियों की तथा एकान्तियों की अविनाशी गति की बात कही।

श्लोक 86 (12.358.86)

व्यासश्चाकथयत्प्रीत्या धर्मपुत्राय धीमते । स एवायं मया तुभ्यमाख्यातः प्रसृतो गुरोः ॥

vyāsaścākathayatprītyā dharmaputrāya dhīmate | sa evāyaṃ mayā tubhyamākhyātaḥ prasṛto guroḥ

और व्यास ने प्रेम से बुद्धिमान धर्मपुत्र को यह सुनाया। वही यह उपदेश, गुरु से चला आया हुआ, मैंने अब तुम्हें सुनाया है।

श्लोक 87 (12.358.87)

इत्थं हि दुश्चरो धर्म एष पार्थिवसत्तम । यथैव त्वं तथैवान्ये न भजन्ति च मोहिताः ॥

itthaṃ hi duścaro dharma eṣa pārthivasattama | yathaiva tvaṃ tathaivānye na bhajanti ca mohitāḥ

हे नृपश्रेष्ठ, यह धर्म इसी प्रकार दुश्चर है। जैसे तुम हो, वैसे ही दूसरे लोग भी मोह में पड़कर इसका सेवन नहीं करते।

श्लोक 88 (12.358.88)

कृष्ण एव हि लोकानां भावनो मोहनस्तथा । संहारकारकश्चैव कारणं च विशांपते ॥

kṛṣṇa eva hi lokānāṃ bhāvano mohanastathā | saṃhārakārakaścaiva kāraṇaṃ ca viśāṃpate

हे विशाम्पते, कृष्ण ही लोकों के उत्पन्न करने वाले हैं और उन्हें मोह में डालने वाले भी, वे ही संहार करने वाले हैं और कारण भी।

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