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शान्ति पर्व · अध्याय 360

ब्रह्मा और रुद्र का संवाद: एक पुरुष

जनमेजय पूछते हैं कि पुरुष अनेक हैं या एक। वैशंपायन व्यास को नमस्कार करके ब्रह्मा और शिव का एक पुराना संवाद सुनाते हैं: क्षीरसागर के बीच वैजयन्त नामक स्वर्णिम पर्वत पर ब्रह्मा अकेले बैठे हैं कि उनके पुत्र रुद्र आकाश से उतर आते हैं। रुद्र पूछते हैं कि ब्रह्मा अपना धाम छोड़कर यहाँ किसका चिन्तन करते हैं; ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि वे अनेक पुरुषों के उस एकमात्र आधार को बताएँगे जिसमें गुणों से मुक्त होकर सब प्रवेश करते हैं।

अध्याय 359अध्याय-सूचीअध्याय 361

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (12.360.1)

बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु । को ह्यत्र पुरुषः श्रेष्ठः को वा योनिरिहोच्यते ॥

bahavaḥ puruṣā brahmannutāho eka eva tu | ko hyatra puruṣaḥ śreṣṭhaḥ ko vā yonirihocyate

हे ब्रह्मन्! पुरुष अनेक हैं या केवल एक? इनमें कौन-सा पुरुष श्रेष्ठ है, और यहाँ उनका मूल (योनि) किसे कहा जाता है?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (12.360.2)

बहवः पुरुषा लोके साङ्ख्ययोगविचारणे । नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ॥

bahavaḥ puruṣā loke sāṅkhyayogavicāraṇe | naitadicchanti puruṣamekaṃ kurukulodvaha

हे कुलश्रेष्ठ! सांख्य और योग के विचार में लोक में बहुत-से पुरुष माने जाते हैं; वे एक ही पुरुष को स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 3 (12.360.3)

बहूनां पुरुषाणां च यथैका योनिरुच्यते । तथा तं पुरुषं विश्वं व्याख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥

bahūnāṃ puruṣāṇāṃ ca yathaikā yonirucyate | tathā taṃ puruṣaṃ viśvaṃ vyākhyāsyāmi guṇādhikam

जैसे अनेक पुरुषों का एक ही मूल कहा जाता है, वैसे ही मैं गुणों में सबसे बढ़कर उस विश्वरूप पुरुष की व्याख्या करूँगा।

श्लोक 4 (12.360.4)

नमस्कृत्वा च गुरवे व्यासाय विदितात्मने । तपोयुक्ताय दान्ताय वन्द्याय परमर्षये ॥

namaskṛtvā ca gurave vyāsāya viditātmane | tapoyuktāya dāntāya vandyāya paramarṣaye

आत्मज्ञानी, तपस्वी, जितेन्द्रिय, वन्दनीय और परम ऋषि अपने गुरु व्यास को नमस्कार करके,

श्लोक 5 (12.360.5)

इदं पुरुषसूक्तं हि सर्ववेदेषु पार्थिव । ऋतं सत्यं च विख्यातमृषिसिंहेन चिन्तितम् ॥

idaṃ puruṣasūktaṃ hi sarvavedeṣu pārthiva | ṛtaṃ satyaṃ ca vikhyātamṛṣisiṃhena cintitam

हे राजन्! सब वेदों में मिलने वाला यह पुरुषसूक्त, जो ऋत और सत्य के रूप में प्रसिद्ध है, उन ऋषिसिंह द्वारा चिन्तन किया गया है।

श्लोक 6 (12.360.6)

उत्सर्गेणापवादेन ऋषिभिः कपिलादिभिः । अध्यात्मचिन्तामाश्रित्य शास्त्राण्युक्तानि भारत ॥

utsargeṇāpavādena ṛṣibhiḥ kapilādibhiḥ | adhyātmacintāmāśritya śāstrāṇyuktāni bhārata

हे भारत! कपिल आदि ऋषियों ने अध्यात्म-चिन्तन का आश्रय लेकर उत्सर्ग (सामान्य नियम) और अपवाद दोनों रीतियों से शास्त्र कहे हैं।

श्लोक 7 (12.360.7)

समासतस्तु यद्व्यासः पुरुषैकत्वमुक्तवान् । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि प्रसादादमितौजसः ॥

samāsatastu yadvyāsaḥ puruṣaikatvamuktavān | tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi prasādādamitaujasaḥ

व्यास ने संक्षेप में पुरुष की एकता के विषय में जो कहा, वह मैं अमित बल वाले उन्हीं की कृपा से आपको बताऊँगा।

श्लोक 8 (12.360.8)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्रह्मणा सह संवादं त्र्यम्बकस्य विशांपते ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | brahmaṇā saha saṃvādaṃ tryambakasya viśāṃpate

इसी विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं: ब्रह्मा और त्र्यम्बक (शिव) का संवाद, हे राजन्।

श्लोक 9 (12.360.9)

क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः । वैजयन्त इति ख्यातः पर्वतप्रवरो नृप ॥

kṣīrodasya samudrasya madhye hāṭakasaprabhaḥ | vaijayanta iti khyātaḥ parvatapravaro nṛpa

क्षीरसागर के बीच सोने के समान चमकने वाला वैजयन्त नाम से प्रसिद्ध श्रेष्ठ पर्वत है, हे राजन्।

श्लोक 10 (12.360.10)

तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तयन् । वैराजसदनान्नित्यं वैजयन्तं निपेवते ॥

tatrādhyātmagatiṃ deva ekākī pravicintayan | vairājasadanānnityaṃ vaijayantaṃ nipevate

वहाँ देव अकेले आत्मा की गति का चिन्तन करते हुए अपने वैराज धाम से निकलकर नित्य वैजयन्त का सेवन करते हैं।

श्लोक 11 (12.360.11)

अथ तत्राऽऽसतस्तस्य चतुर्वक्रस्य धीमतः । ललाटप्रभवः पुत्रः शिव आगाद्यदृच्छया । आकाशेन महायोगी पुरा त्रिनयनः प्रभुः ॥

atha tatrā''satastasya caturvakrasya dhīmataḥ | lalāṭaprabhavaḥ putraḥ śiva āgādyadṛcchayā | ākāśena mahāyogī purā trinayanaḥ prabhuḥ

वहाँ बैठे हुए बुद्धिमान् चतुर्मुख के ललाट से उत्पन्न पुत्र शिव अपनी इच्छा से आकाश-मार्ग से वहाँ आए, वे महायोगी, त्रिनेत्र प्रभु।

श्लोक 12 (12.360.12)

ततः खान्निपपाताशु धरणीधरमूर्धनि । अग्रतश्चाभवत्प्रीतो ववन्दे चापि पादयोः ॥

tataḥ khānnipapātāśu dharaṇīdharamūrdhani | agrataścābhavatprīto vavande cāpi pādayoḥ

तब वे आकाश से शीघ्र ही पर्वत की चोटी पर उतरे, प्रसन्न होकर उनके सामने खड़े हुए और उनके चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 13 (12.360.13)

तं पादयोर्निपतितं दृष्ट्वा सव्येन पाणिना । उत्थापयामास तदा प्रभुरेकः प्रजापतिः । उवाच चैनं भगवांश्चिरस्यागतमात्मजम् ॥

taṃ pādayornipatitaṃ dṛṣṭvā savyena pāṇinā | utthāpayāmāsa tadā prabhurekaḥ prajāpatiḥ | uvāca cainaṃ bhagavāṃścirasyāgatamātmajam

उन्हें चरणों में पड़ा देखकर एकमात्र प्रभु प्रजापति ने बाएँ हाथ से उन्हें उठाया, और भगवान् ने चिरकाल बाद आए अपने पुत्र से कहा:

पितामह उवाच

श्लोक 14 (12.360.14)

स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोसि मेऽन्तिकम् । कच्चित्ते कुशलं पुत्र स्वाध्यायतपसोः सदा । नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ॥

svāgataṃ te mahābāho diṣṭyā prāptosi me'ntikam | kaccitte kuśalaṃ putra svādhyāyatapasoḥ sadā | nityamugratapāstvaṃ hi tataḥ pṛcchāmi te punaḥ

"स्वागत है, महाबाहो! सौभाग्य से तुम मेरे पास आए हो। हे पुत्र! तुम्हारे स्वाध्याय और तप में सदा कुशल तो है? तुम नित्य उग्र तप करने वाले हो, इसीलिए मैं तुमसे फिर पूछता हूँ।"

रुद्र उवाच

श्लोक 15 (12.360.15)

त्वत्प्रसादेन भगवन्स्वाध्यायतपसोर्मम । कुशलं चाव्ययं चैव सर्वस्य जगतस्त्वथ ॥

tvatprasādena bhagavansvādhyāyatapasormama | kuśalaṃ cāvyayaṃ caiva sarvasya jagatastvatha

"हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरे स्वाध्याय और तप में कुशल है, और सारे जगत् का भी अविनाशी कल्याण है।

श्लोक 16 (12.360.16)

चिरदृष्टोसि भगवन्वैराजसदने मया । ततोऽहं पर्वतं प्राप्तस्त्विमं त्वत्पादसेवितम् ॥

ciradṛṣṭosi bhagavanvairājasadane mayā | tato'haṃ parvataṃ prāptastvimaṃ tvatpādasevitam

भगवन्! वैराज धाम में मैंने आपको बहुत समय पहले देखा था; इसलिए मैं आपके चरणों से सेवित इस पर्वत पर आया हूँ।

श्लोक 17 (12.360.17)

कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते । नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ॥

kautūhalaṃ cāpi hi me ekāntagamanena te | naitatkāraṇamalpaṃ hi bhaviṣyati pitāmaha

आपके अकेले यहाँ चले आने से मुझे कौतूहल भी है; हे पितामह! इसका कारण छोटा नहीं हो सकता।

श्लोक 18 (12.360.18)

किंनु तत्सदनं श्रेष्ठं क्षुत्पिपासाविवर्जितम् । सुरासुरैरध्युपितमृषिभिश्चामितप्रभैः ॥

kiṃnu tatsadanaṃ śreṣṭhaṃ kṣutpipāsāvivarjitam | surāsurairadhyupitamṛṣibhiścāmitaprabhaiḥ

भूख-प्यास से रहित, सुरों-असुरों और अपार तेज वाले ऋषियों से बसा हुआ वह श्रेष्ठ धाम कहाँ गया,

श्लोक 19 (12.360.19)

गन्धर्वैरेप्सरोभिश्च सततं संनिषेवितम् । उत्सृज्येमं गिरिवरमेकाकी प्राप्तवानसि ॥

gandharvairepsarobhiśca satataṃ saṃniṣevitam | utsṛjyemaṃ girivaramekākī prāptavānasi

जिसकी गन्धर्व और अप्सराएँ सदा सेवा करती हैं? उसे छोड़कर आप अकेले इस श्रेष्ठ पर्वत पर क्यों आ गए?"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 20 (12.360.20)

वैजयन्तो गिरिवरः सततं सेव्यते मया । अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ॥

vaijayanto girivaraḥ satataṃ sevyate mayā | atraikāgreṇa manasā puruṣaścintyate virāṭ

"मैं सदा इस श्रेष्ठ पर्वत वैजयन्त का सेवन करता हूँ। यहाँ एकाग्र मन से विराट् पुरुष का चिन्तन किया जाता है।"

रुद्र उवाच

श्लोक 21 (12.360.21)

बहवः पुरुषा ब्रह्मंस्त्वया सृष्टाः स्वयंभुव । सृज्यन्ते चापरे ब्रह्मन्स चैकः पुरुषो विराट् ॥

bahavaḥ puruṣā brahmaṃstvayā sṛṣṭāḥ svayaṃbhuva | sṛjyante cāpare brahmansa caikaḥ puruṣo virāṭ

"हे स्वयम्भू ब्रह्मन्! आपने अनेक पुरुष रचे हैं और दूसरे अब भी रचे जा रहे हैं; और वह एक विराट् पुरुष है।

श्लोक 22 (12.360.22)

को ह्यसौ चिन्त्यते ब्रह्मंस्त्वयैकः पुरुषोत्तमः । एतन्मे संशयं छिन्धि महत्कौतूहलं हि मे ॥

ko hyasau cintyate brahmaṃstvayaikaḥ puruṣottamaḥ | etanme saṃśayaṃ chindhi mahatkautūhalaṃ hi me

हे ब्रह्मन्! वह एक पुरुषोत्तम कौन है जिसका आप चिन्तन करते हैं? मेरा यह संशय दूर कीजिए, मुझे बहुत कौतूहल है।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 23 (12.360.23)

बहवः पुरुषाः पुत्र त्वया ये समुदाहृताः । एवमेतदतिक्रान्तं द्रष्टव्यं नैवमित्यपि ॥

bahavaḥ puruṣāḥ putra tvayā ye samudāhṛtāḥ | evametadatikrāntaṃ draṣṭavyaṃ naivamityapi

"पुत्र! तुमने जिन अनेक पुरुषों की बात कही, वह ऐसी ही है, पर उसे पार किया जा चुका है; उसे ऐसा भी देखना चाहिए और ऐसा नहीं भी।

श्लोक 24 (12.360.24)

आधारं तु प्रवक्ष्यामि एकस्य पुरुषस्य ते । बहूनां पुरुषाणां स यथैका योनिरुच्यते ॥

ādhāraṃ tu pravakṣyāmi ekasya puruṣasya te | bahūnāṃ puruṣāṇāṃ sa yathaikā yonirucyate

मैं तुम्हें उस एक पुरुष का आधार बताऊँगा, जिस रूप में उसे अनेक पुरुषों का एकमात्र मूल कहा जाता है।

श्लोक 25 (12.360.25)

तथा तं पुरुषं विश्वं परमं सुमहत्तमम् । निर्गुणं निर्गुणा भूत्वा प्रविशन्ति सनातनम् ॥

tathā taṃ puruṣaṃ viśvaṃ paramaṃ sumahattamam | nirguṇaṃ nirguṇā bhūtvā praviśanti sanātanam

इसी प्रकार वे सब गुणों से रहित होकर उस विश्वरूप, परम, महत्तम, निर्गुण और सनातन पुरुष में प्रवेश करते हैं।"

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