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शान्ति पर्व · अध्याय 361

ब्रह्मा द्वारा रुद्र को परम पुरुष का वर्णन

ब्रह्मा रुद्र को उस शाश्वत, अविनाशी पुरुष के विषय में बताते हैं जो बिना शरीर के सब शरीरों में निवास करता है, जो क्षेत्रज्ञ है और जिसे न ब्रह्मा देख सकते हैं, न रुद्र। वे उस एक पुरुष की तुलना एक अग्नि, एक सूर्य, एक वायु और एक समुद्र से करते हैं, और निर्गुण पुरुष, सबके आत्मा नारायण, तथा कर्म से बँधे दूसरे आत्मा का वर्णन करते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि देवता और ऋषि उन्हीं के यज्ञ-भाग का सेवन करते हैं और ब्रह्मा सहित सब उन्हीं से उत्पन्न हैं; अन्त में वे कहते हैं कि सांख्य और योग के अनुसार रुद्र का पूछा हुआ सब बता दिया गया।

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ब्रह्मोवाच

श्लोक 1 (12.361.1)

शृणु पुत्र यथाह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः । अक्षयश्चाप्रमेयश्च सर्वगश्च निरुच्यते ॥

śṛṇu putra yathāhyeṣa puruṣaḥ śāśvato'vyayaḥ | akṣayaścāprameyaśca sarvagaśca nirucyate

पुत्र! सुनो, यह पुरुष जैसा बताया जाता है: शाश्वत, अविनाशी, अक्षय, अप्रमेय और सर्वव्यापी।

श्लोक 2 (12.361.2)

न स शक्यस्त्वया द्रष्टुं मयाऽन्यैर्वाऽपि सत्तम । सगुणैर्निर्गुणैर्विश्वो ज्ञानदृश्यो ह्यसौ स्मृतः ॥

na sa śakyastvayā draṣṭuṃ mayā'nyairvā'pi sattama | saguṇairnirguṇairviśvo jñānadṛśyo hyasau smṛtaḥ

हे सज्जन! न तुम उसे देख सकते हो, न मैं, न दूसरे, चाहे सगुण हों या निर्गुण; वह विश्वरूप केवल ज्ञान से ही दिखाई देने वाला माना गया है।

श्लोक 3 (12.361.3)

अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ । वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥

aśarīraḥ śarīreṣu sarveṣu nivasatyasau | vasannapi śarīreṣu na sa lipyati karmabhiḥ

वह शरीर-रहित होकर भी सब शरीरों में निवास करता है; शरीरों में रहते हुए भी कर्मों से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 4 (12.361.4)

ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंज्ञिताः । सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥

mamāntarātmā tava ca ye cānye dehasaṃjñitāḥ | sarveṣāṃ sākṣibhūto'sau na grāhyaḥ kenacitkvacit

वह मेरा, तुम्हारा और देह नाम से कहे जाने वाले अन्य सबका अन्तरात्मा है; सबका साक्षी होकर भी वह किसी के द्वारा कहीं ग्रहण नहीं किया जा सकता।

श्लोक 5 (12.361.5)

विश्वमूर्धा विश्वभुजो विश्वपादाक्षिनासिकः । एकश्चरति क्षेत्रेषु स्वैरचारी यथासुखम् ॥

viśvamūrdhā viśvabhujo viśvapādākṣināsikaḥ | ekaścarati kṣetreṣu svairacārī yathāsukham

विश्व ही उसका सिर, भुजाएँ, पैर, आँखें और नाक है; वह अकेला क्षेत्रों में स्वेच्छा से, सुखपूर्वक विचरण करता है।

श्लोक 6 (12.361.6)

क्षेत्राणि हि शरीराणि बीजं चापि शुभाशुभम् । तानि वेत्ति स योगात्मा ततः क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥

kṣetrāṇi hi śarīrāṇi bījaṃ cāpi śubhāśubham | tāni vetti sa yogātmā tataḥ kṣetrajña ucyate

शरीर क्षेत्र हैं और शुभ-अशुभ बीज; उन्हें वह योगात्मा जानता है, इसीलिए क्षेत्रज्ञ कहलाता है।

श्लोक 7 (12.361.7)

नागतिर्न गतिस्तस्य ज्ञेया भूतेषु केनचित् । साङ्ख्येन विधिना चैव योगेन च यथाक्रमम् ॥

nāgatirna gatistasya jñeyā bhūteṣu kenacit | sāṅkhyena vidhinā caiva yogena ca yathākramam

प्राणियों में कोई भी उसकी गति या अगति को नहीं जान सकता, न सांख्य की विधि से और न क्रमपूर्वक योग से।

श्लोक 8 (12.361.8)

चिन्तयामि गतिं चास्य न गतिं वेद्मि चोत्तराम् । यथाज्ञानं तु वक्ष्यामि पुरुषं तु सनातनम् ॥

cintayāmi gatiṃ cāsya na gatiṃ vedmi cottarām | yathājñānaṃ tu vakṣyāmi puruṣaṃ tu sanātanam

मैं उसकी गति का चिन्तन करता हूँ, फिर भी उसकी परम गति को नहीं जानता। जैसा मैं जानता हूँ, उसी के अनुसार उस सनातन पुरुष के विषय में कहूँगा।

श्लोक 9 (12.361.9)

तस्यैकत्वं महत्त्वं च स चैकः पुरुषः स्मृतः । महापुरुषशब्दं स बिभर्त्येकः सनातनः ॥

tasyaikatvaṃ mahattvaṃ ca sa caikaḥ puruṣaḥ smṛtaḥ | mahāpuruṣaśabdaṃ sa bibhartyekaḥ sanātanaḥ

उसकी एकता और महत्ता के कारण ही वह एक पुरुष कहा जाता है; वह अकेला सनातन महापुरुष नाम धारण करता है।

श्लोक 10 (12.361.10)

एको हुताशो बहुधा समिध्यते । एकः सूर्यस्तपसां योनिरेका । एको वायुर्बहुधा वाति लोके । महोदधिश्चाम्भसां योनिरेकः । पुरुषश्चैको निर्गुणो विश्वरूप । स्तं निर्गुणं पुरुषं चाविशन्ति ॥

eko hutāśo bahudhā samidhyate | ekaḥ sūryastapasāṃ yonirekā | eko vāyurbahudhā vāti loke | mahodadhiścāmbhasāṃ yonirekaḥ | puruṣaścaiko nirguṇo viśvarūpa | staṃ nirguṇaṃ puruṣaṃ cāviśanti

एक ही अग्नि अनेक रूपों में प्रज्वलित होती है; एक ही सूर्य तापों का एकमात्र उद्गम है; एक ही वायु लोक में अनेक प्रकार से बहती है; महासागर ही जलों का एकमात्र उद्गम है; वैसे ही पुरुष भी एक है, निर्गुण और विश्वरूप, और उसी निर्गुण पुरुष में सब प्रवेश करते हैं।

श्लोक 11 (12.361.11)

हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म हित्वा शुभाशुभम् । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा एवं भवति निर्गुणः ॥

hitvā guṇamayaṃ sarvaṃ karma hitvā śubhāśubham | ubhe satyānṛte tyaktvā evaṃ bhavati nirguṇaḥ

गुणों से बना सब कुछ छोड़कर, शुभ और अशुभ कर्म छोड़कर, तथा सत्य और असत्य दोनों का त्याग करके मनुष्य इस प्रकार निर्गुण हो जाता है।

श्लोक 12 (12.361.12)

अचिन्त्यं चापि तं ज्ञात्वा भावसूक्ष्मं चतुष्टयम् । विचरेद्योऽसमुन्नद्धः स गच्छेत्पुरुषं शुभम् ॥

acintyaṃ cāpi taṃ jñātvā bhāvasūkṣmaṃ catuṣṭayam | vicaredyo'samunnaddhaḥ sa gacchetpuruṣaṃ śubham

उसे अचिन्त्य, भाव में सूक्ष्म और चतुर्विध जानकर जो अहंकार-रहित होकर विचरता है, वह कल्याणकारी पुरुष को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (12.361.13)

एकं हि परमात्मानं केचिदिच्छन्ति पण्डिताः । एकात्मानं तथाऽऽत्मानमपरेध्यात्मचिन्तकाः ॥

ekaṃ hi paramātmānaṃ kecidicchanti paṇḍitāḥ | ekātmānaṃ tathā''tmānamaparedhyātmacintakāḥ

कुछ पण्डित एक ही परमात्मा मानते हैं; दूसरे अध्यात्म-चिन्तक आत्मा को भी एक ही आत्मा मानते हैं।

श्लोक 14 (12.361.14)

तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः । स हि नारायणो ज्ञेयः सर्वात्मा पुरुषो हि सः ॥

tatra yaḥ paramātmā hi sa nityo nirguṇaḥ smṛtaḥ | sa hi nārāyaṇo jñeyaḥ sarvātmā puruṣo hi saḥ

उनमें जो परमात्मा है वह नित्य और निर्गुण कहा गया है; उसे ही नारायण जानना चाहिए, वही सबका आत्मा और वही पुरुष है।

श्लोक 15 (12.361.15)

न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा । कर्मात्मा त्वपरो योसौ मोक्षबन्धैः स युज्यते ॥

na lipyate phalaiścāpi padmapatramivāmbhasā | karmātmā tvaparo yosau mokṣabandhaiḥ sa yujyate

वह फलों से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं होता। पर जो दूसरा कर्मात्मा है, वह बन्धन और मोक्ष से जुड़ता है।

श्लोक 16 (12.361.16)

ससप्तदशकेनापि राशिना युज्यते च सः । एवं बहुविधः प्रोक्तः पुरुषस्ते यथाक्रमम् ॥

sasaptadaśakenāpi rāśinā yujyate ca saḥ | evaṃ bahuvidhaḥ proktaḥ puruṣaste yathākramam

वह सत्रह तत्त्वों की राशि से भी जुड़ा होता है। इस प्रकार पुरुष का अनेक रूपों में क्रम से वर्णन तुमसे किया गया।

श्लोक 17 (12.361.17)

यत्तत्कृत्स्नं लोकतन्त्रस्य धाम । वेद्यं परं बोधनीयं च वेदैः । मन्ता मन्तव्यं प्राशिता प्राशनीयं । घ्राता घ्रेयं स्पर्शिता स्पर्शनीयम् ॥

yattatkṛtsnaṃ lokatantrasya dhāma | vedyaṃ paraṃ bodhanīyaṃ ca vedaiḥ | mantā mantavyaṃ prāśitā prāśanīyaṃ | ghrātā ghreyaṃ sparśitā sparśanīyam

जो लोक-व्यवस्था का सम्पूर्ण आश्रय है, जो परम ज्ञेय है और वेदों से जानने योग्य है; जो मनन करने वाला और मनन का विषय है, चखने वाला और चखने योग्य, सूँघने वाला और सूँघने योग्य, छूने वाला और छूने योग्य है;

श्लोक 18 (12.361.18)

द्रष्टा द्रष्टव्यं श्राविता श्रावणीयं । ज्ञाता ज्ञेयं सगुणं निर्गुणं च । यद्वै प्रोक्तं तात सम्यक्प्रधानं । नित्यं चैतच्छाश्वतं चाव्ययं च ॥

draṣṭā draṣṭavyaṃ śrāvitā śrāvaṇīyaṃ | jñātā jñeyaṃ saguṇaṃ nirguṇaṃ ca | yadvai proktaṃ tāta samyakpradhānaṃ | nityaṃ caitacchāśvataṃ cāvyayaṃ ca

द्रष्टा और दृश्य, श्रोता और श्रवणीय, ज्ञाता और ज्ञेय, सगुण और निर्गुण: हे तात! जिसे ठीक-ठीक प्रधान कहा गया है, वह नित्य, शाश्वत और अविनाशी है।

श्लोक 19 (12.361.19)

यद्वै सूते धातुराद्यं विधानं । तद्वै विप्राः प्रवदन्तेऽनिरुद्धम् । यद्वै लोके वैदिकं कर्म साधु । आशीर्युक्तं तद्धि तस्योपभोग्यम् ॥

yadvai sūte dhāturādyaṃ vidhānaṃ | tadvai viprāḥ pravadante'niruddham | yadvai loke vaidikaṃ karma sādhu | āśīryuktaṃ taddhi tasyopabhogyam

जो धाता के आदि विधान को उत्पन्न करता है, उसे ज्ञानी अनिरुद्ध कहते हैं; और लोक में जो भी उत्तम वैदिक कर्म आशीर्वचनों से युक्त होकर किया जाता है, वह उसी के भोग के लिए है।

श्लोक 20 (12.361.20)

देवाः सर्वे मुनयः साधु दान्ता । स्तं प्राग्वंशे यज्ञभागं भजन्ते । अहं ब्रह्मा आद्य ईशः प्रजानां । तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ॥

devāḥ sarve munayaḥ sādhu dāntā | staṃ prāgvaṃśe yajñabhāgaṃ bhajante | ahaṃ brahmā ādya īśaḥ prajānāṃ | tasmājjātastvaṃ ca mattaḥ prasūtaḥ

सब देवता और संयमी, श्रेष्ठ मुनि प्राग्वंश (यज्ञशाला) में उसी के यज्ञ-भाग का सेवन करते हैं। मैं ब्रह्मा, प्रजाओं का आदि स्वामी, उसी से उत्पन्न हुआ हूँ, और तुम भी उसी से जन्मे तथा मुझसे उत्पन्न हुए हो।

श्लोक 21 (12.361.21)

मत्तो जगज्जङ्गमं स्थावरं च । सर्वे वेदाः सरहस्या हि पुत्र ॥

matto jagajjaṅgamaṃ sthāvaraṃ ca | sarve vedāḥ sarahasyā hi putra

मुझसे ही चर और अचर जगत् उत्पन्न हुआ है, और हे पुत्र! रहस्यों सहित सब वेद भी।

श्लोक 22 (12.361.22)

चतुर्विभक्तः पुरुषः स क्रीडति यथेच्छति । एवं स भगवान्देवः स्वेन ज्ञानेन बोधयत् ॥

caturvibhaktaḥ puruṣaḥ sa krīḍati yathecchati | evaṃ sa bhagavāndevaḥ svena jñānena bodhayat

चार रूपों में विभक्त पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार क्रीड़ा करता है। इस प्रकार वे भगवान् देव अपने ही ज्ञान से सबको जगाते हैं।

श्लोक 23 (12.361.23)

एतत्ते कथितं पुत्र यथावदनुपृच्छतः । साङ्ख्यज्ञाने तथा योगे यथावदनुवर्णितम् ॥

etatte kathitaṃ putra yathāvadanupṛcchataḥ | sāṅkhyajñāne tathā yoge yathāvadanuvarṇitam

पुत्र! तुम्हारे पूछने पर यह सब मैंने यथार्थ रूप से बता दिया; जैसा सांख्य-ज्ञान और योग में वर्णित है, वैसा ही यथार्थ कहा गया है।

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