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शान्ति पर्व · अध्याय 363

महापद्म नगर का गृहस्थ ब्राह्मण परम कल्याण की खोज में

भीष्म भृगुवंश के एक विद्वान ब्राह्मण की कथा आरम्भ करते हैं, जो गंगा के दक्षिण तट पर महापद्म नगर में रहता है। समृद्ध, सदाचारी और अनेक पुत्रों वाला होकर भी वह यह तय नहीं कर पाता कि कौन-सा धर्ममार्ग उसे परम कल्याण तक पहुँचाएगा। एक दिन एक ब्राह्मण अतिथि आता है, और गृहस्थ आतिथ्य से उसका सत्कार करके उससे बात करने लगता है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.363.1)

आसीत्किल नरश्रेष्ठ महापद्मे पुरोत्तमे । गङ्गाया दक्षिणे तीरे कश्चिद्विप्रः समाहितः ॥

āsītkila naraśreṣṭha mahāpadme purottame | gaṅgāyā dakṣiṇe tīre kaścidvipraḥ samāhitaḥ

हे नरश्रेष्ठ, कहते हैं कि एक बार महापद्म नामक उत्तम नगर में, गंगा के दक्षिण तट पर, एकाग्रचित्त कोई ब्राह्मण रहता था।

श्लोक 2 (12.363.2)

सौम्यः सोमान्वये जातो जितात्मा गोत्रतो भृगुः । धर्मनित्यो जितक्रोधो नित्यतप्तो जितेन्द्रियः ॥

saumyaḥ somānvaye jāto jitātmā gotrato bhṛguḥ | dharmanityo jitakrodho nityatapto jitendriyaḥ

वह सौम्य स्वभाव का था, चन्द्रवंश में उत्पन्न हुआ था, आत्मजयी था और गोत्र से भृगुवंशी था। वह सदा धर्म में लगा रहता, क्रोध को जीत चुका था, निरन्तर तप करता और इन्द्रियों को वश में रखता था।

श्लोक 3 (12.363.3)

तपःस्वाध्यायनिरतः सत्यः सज्जनसंमतः । न्यायप्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वितः ॥

tapaḥsvādhyāyanirataḥ satyaḥ sajjanasaṃmataḥ | nyāyaprāptena vittena svena śīlena cānvitaḥ

वह तप और वेदाध्ययन में रमा रहता था, सत्यनिष्ठ था और सज्जनों में सम्मानित था। उसके पास न्याय से कमाया हुआ धन था और अपना उत्तम शील भी।

श्लोक 4 (12.363.4)

ज्ञातिसंबन्धिविपुले पुत्रपौत्रप्रतिष्ठिते । कुले महति विख्याते विशिष्टां वृत्तिमास्थितः ॥

jñātisaṃbandhivipule putrapautrapratiṣṭhite | kule mahati vikhyāte viśiṣṭāṃ vṛttimāsthitaḥ

वह एक महान और विख्यात कुल में था, जो जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों से भरा-पूरा था और पुत्र-पौत्रों से प्रतिष्ठित था; और वह श्रेष्ठ जीवन-वृत्ति अपनाए हुए था।

श्लोक 5 (12.363.5)

स पुत्रान्बहुलाँल्लब्ध्वा विपुले कर्मणि स्थितः । कुलधर्माश्रितो राजन्धर्मचर्यास्थितोऽभवत् ॥

sa putrānbahulām̐llabdhvā vipule karmaṇi sthitaḥ | kuladharmāśrito rājandharmacaryāsthito'bhavat

हे राजन्, बहुत-से पुत्र पाकर और बड़े-बड़े कर्मों में लगा हुआ वह कुलधर्म का आश्रय लेकर धर्माचरण में स्थिर हो गया।

श्लोक 6 (12.363.6)

ततः स धर्मं वेदोक्तं तथा शास्त्रोक्तमेव च । शिष्टाचीर्णं च धर्मं च त्रिविधं चिन्त्य चेतसा ॥

tataḥ sa dharmaṃ vedoktaṃ tathā śāstroktameva ca | śiṣṭācīrṇaṃ ca dharmaṃ ca trividhaṃ cintya cetasā

तब उसने मन में तीन प्रकार के धर्म पर विचार किया: वेद में कहा हुआ धर्म, शास्त्रों में बताया हुआ धर्म और शिष्टजनों द्वारा आचरित धर्म।

श्लोक 7 (12.363.7)

किंनु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम् । इत्येवं चिन्तयन्नित्यं न च याति विनिश्चयम् ॥

kiṃnu me syācchubhaṃ kṛtvā kiṃ kṛtaṃ kiṃ parāyaṇam | ityevaṃ cintayannityaṃ na ca yāti viniścayam

"मैं कौन-सा शुभ कर्म करूँ, और क्या करने पर वही मेरा आश्रय बनेगा?" ऐसा निरन्तर सोचते हुए भी वह किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाता था।

श्लोक 8 (12.363.8)

तस्यैवं चिन्त्यमानस्य धर्मं परममास्थितः । कदाचिदतिथिः प्राप्तो ब्राह्मणः सुसमाहितः ॥

tasyaivaṃ cintyamānasya dharmaṃ paramamāsthitaḥ | kadācidatithiḥ prāpto brāhmaṇaḥ susamāhitaḥ

परम धर्म में लगे हुए उसके इस प्रकार सोचते रहने पर, एक दिन अत्यन्त शान्तचित्त एक ब्राह्मण उसके यहाँ अतिथि बनकर आया।

श्लोक 9 (12.363.9)

स तस्मै सत्क्रियां चक्रे क्रियायुक्तेन हेतुना । विश्रान्तं सुसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥

sa tasmai satkriyāṃ cakre kriyāyuktena hetunā | viśrāntaṃ susamāsīnamidaṃ vacanamabravīt

गृहस्थ ने विधि के अनुसार और उचित प्रयोजन से उसका सत्कार किया; और जब अतिथि विश्राम कर चुका तथा सुखपूर्वक बैठ गया, तब उसने उससे ये वचन कहे।

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