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शान्ति पर्व · अध्याय 366

ब्राह्मण का नागराज के निवास की ओर प्रस्थान

गृहस्थ अनेक उपमाएँ देकर अतिथि को धन्यवाद देता है, क्योंकि उसके वचनों से उसके मन का भार उतर गया है। वह अतिथि से रात वहीं बिताने का आग्रह करता है, और दोनों सारी रात धर्म की चर्चा करते हैं। प्रातःकाल गृहस्थ अतिथि का सत्कार करता है, अपने स्वजनों से आज्ञा लेता है और बताए हुए मार्ग से नागराज के निवास की ओर चल पड़ता है।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (12.366.1)

अतिभारोद्यतस्यैव भारावतरणं महत् । पराश्वासकरं वाक्यमिदं मे भवतः श्रुतम् ॥

atibhārodyatasyaiva bhārāvataraṇaṃ mahat | parāśvāsakaraṃ vākyamidaṃ me bhavataḥ śrutam

अत्यन्त भारी बोझ उठाए हुए मनुष्य के लिए बोझ उतर जाना जैसे बड़ी राहत है, वैसे ही आपके ये वचन, जो मैंने सुने, मुझे गहरा आश्वासन देनेवाले हैं।

श्लोक 2 (12.366.2)

अध्वक्लान्तस्य शयनं स्थानक्लान्तस्य चासनम् । तृषितस्येव पानीयं क्षुधार्तस्येव भोजनम् ॥

adhvaklāntasya śayanaṃ sthānaklāntasya cāsanam | tṛṣitasyeva pānīyaṃ kṣudhārtasyeva bhojanam

ये वचन मार्ग से थके हुए के लिए शय्या, खड़े-खड़े थके हुए के लिए आसन, प्यासे के लिए पानी और भूखे के लिए भोजन के समान हैं,

श्लोक 3 (12.366.3)

ईप्सितस्येव संप्राप्तिरर्थस्य समयेऽतिथे । एषितस्यात्मनः काले वृद्धस्यैव सुता यथा ॥

īpsitasyeva saṃprāptirarthasya samaye'tithe | eṣitasyātmanaḥ kāle vṛddhasyaiva sutā yathā

हे अतिथि, ये उचित समय पर मनचाही वस्तु के मिलने के समान हैं, या ऐसे वृद्ध पुरुष को, जो सन्तान चाहता रहा हो, ठीक समय पर कन्या के जन्म के समान,

श्लोक 4 (12.366.4)

मनसा चिन्तितस्येव प्रीतिस्निग्धस्य दर्शनम् । प्रह्लादयति मां वाक्यं भवता यदुदीरितम् ॥

manasā cintitasyeva prītisnigdhasya darśanam | prahlādayati māṃ vākyaṃ bhavatā yadudīritam

या मन में बहुत सोचे हुए किसी प्रिय, स्नेही मित्र के दर्शन के समान: आपने जो वचन कहे, वे मुझे आनन्द देते हैं।

श्लोक 5 (12.366.5)

मनश्चक्षुरिवाकाशे पश्यामि विमृशामि च । प्रज्ञानवचनाद्योयमुपदेशो हि मे कृतः ॥

manaścakṣurivākāśe paśyāmi vimṛśāmi ca | prajñānavacanādyoyamupadeśo hi me kṛtaḥ

मैं मन की आँख से मानो आकाश में उसे देखता और उस पर विचार करता हूँ: विवेक-भरे वचनों से आपने मुझे जो उपदेश दिया है।

श्लोक 6 (12.366.6)

वाढमेवं करिष्यामि यथा मे भाषते भवान् । इमां हि रजनीं साधो निवसस्व मया सह ॥

vāḍhamevaṃ kariṣyāmi yathā me bhāṣate bhavān | imāṃ hi rajanīṃ sādho nivasasva mayā saha

आप जैसा कहते हैं, मैं निश्चय ही वैसा ही करूँगा। परन्तु हे साधो, आज की रात आप मेरे साथ यहीं ठहरिए।

श्लोक 7 (12.366.7)

प्रभाते यास्यति भवान्पर्याश्वस्तः सुखोषितः । असौ हि भगवान्सूर्यो मन्दरश्मिरवाङ्मुखः ॥

prabhāte yāsyati bhavānparyāśvastaḥ sukhoṣitaḥ | asau hi bhagavānsūryo mandaraśmiravāṅmukhaḥ

प्रातःकाल आप विश्राम पाकर और सुखपूर्वक रात बिताकर चले जाइएगा; क्योंकि अब भगवान् सूर्य की किरणें मन्द हैं और वे नीचे की ओर झुके हुए हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (12.366.8)

ततस्तेन कृतातिथ्यः सोऽतिथिः शत्रुसूदन । उवास किल तां रात्रिं सह तेन द्विजेन वै ॥

tatastena kṛtātithyaḥ so'tithiḥ śatrusūdana | uvāsa kila tāṃ rātriṃ saha tena dvijena vai

हे शत्रुसूदन, तब उस ब्राह्मण से आतिथ्य पाकर वह अतिथि उसी द्विज के साथ वह रात बिताने लगा।

श्लोक 9 (12.366.9)

तत्वं च धर्मसंयुक्तं तयोः कथयतोस्तदा । व्यतीता सा निशा कृत्स्ना सुखेन दिवसोपमा ॥

tatvaṃ ca dharmasaṃyuktaṃ tayoḥ kathayatostadā | vyatītā sā niśā kṛtsnā sukhena divasopamā

धर्म से जुड़े तत्त्व की चर्चा करते हुए उन दोनों की वह सारी रात दिन के समान सुखपूर्वक बीत गई।

श्लोक 10 (12.366.10)

ततः प्रभातसमये सोऽतिथिस्तेन पूजितः । ब्राह्मणेन यथाशक्त्या स्वकार्यमभिकाङ्क्षता ॥

tataḥ prabhātasamaye so'tithistena pūjitaḥ | brāhmaṇena yathāśaktyā svakāryamabhikāṅkṣatā

तब प्रभात के समय अपने कार्य की सिद्धि चाहनेवाले उस ब्राह्मण ने यथाशक्ति उस अतिथि का सत्कार किया।

श्लोक 11 (12.366.11)

ततः स विप्रः कृतकर्मनिश्चयः । कृताभ्यनुज्ञः स्वजनेन धर्मकृत् । यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रयं । जगाम काले सुकृतैकनिश्चयः ॥

tataḥ sa vipraḥ kṛtakarmaniścayaḥ | kṛtābhyanujñaḥ svajanena dharmakṛt | yathopadiṣṭaṃ bhujagendrasaṃśrayaṃ | jagāma kāle sukṛtaikaniścayaḥ

तब कर्तव्य में निश्चय कर चुके, धर्मपरायण उस ब्राह्मण ने अपने स्वजनों से विदा ली और केवल सत्कर्मों का ही निश्चय रखकर, बताए हुए ढंग से, उचित समय पर नागराज के निवास की ओर प्रस्थान किया।

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