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शान्ति पर्व · अध्याय 367

अनुपस्थित नाग की प्रतीक्षा में गोमती-तट पर ब्राह्मण

वन, तीर्थ और सरोवरों से होकर यात्रा करते हुए ब्राह्मण को एक मुनि से नाग के निवास का पता मिलता है और वह उसके घर पहुँचता है। पद्मनाभ की पतिव्रता पत्नी उसका स्वागत करती है, और ब्राह्मण उसके स्वामी से मिलने की इच्छा बताता है। वह कहती है कि नाग अपने मास की बारी में सूर्य का रथ ढोने गया है और सात-आठ दिन में लौटेगा। ब्राह्मण सन्देश छोड़कर परिमित आहार के साथ गोमती के तट पर प्रतीक्षा करने चला जाता है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.367.1)

स वनानि विचित्राणि तीर्थानि च सरांसि च । अभिगच्छन्क्रमेण स्म कंचिन्मुनिमुपस्थितः ॥

sa vanāni vicitrāṇi tīrthāni ca sarāṃsi ca | abhigacchankrameṇa sma kaṃcinmunimupasthitaḥ

विचित्र वनों, तीर्थों और सरोवरों से होकर क्रम से जाते हुए वह किसी मुनि के पास पहुँचा।

श्लोक 2 (12.367.2)

तं स तेन यथोद्दिष्टं नागं विप्रेण ब्राह्मणः । पर्यपृच्छद्यथान्यायं श्रुत्वैव च जगाम सः ॥

taṃ sa tena yathoddiṣṭaṃ nāgaṃ vipreṇa brāhmaṇaḥ | paryapṛcchadyathānyāyaṃ śrutvaiva ca jagāma saḥ

उस अन्य ब्राह्मण ने जिस नाग का वर्णन किया था, उसके विषय में उसने उस मुनि से विधिपूर्वक पूछा, और उत्तर सुनकर वह आगे चल पड़ा।

श्लोक 3 (12.367.3)

सोऽभिगम्य यथान्यायं नागायतनमर्थवित् । प्रोक्तवानहमस्मीति भोःशब्दालंकृतं वचः ॥

so'bhigamya yathānyāyaṃ nāgāyatanamarthavit | proktavānahamasmīti bhoḥśabdālaṃkṛtaṃ vacaḥ

अर्थ को जाननेवाले उस ब्राह्मण ने विधिपूर्वक नाग के निवास के पास जाकर "अरे! मैं आया हूँ" यह "भोः" शब्द से सजा हुआ वचन कहा।

श्लोक 4 (12.367.4)

तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रूपिणी धर्मवत्सला । दर्शयामास तं विप्रं नागपत्नी पतिव्रता ॥

tattasya vacanaṃ śrutvā rūpiṇī dharmavatsalā | darśayāmāsa taṃ vipraṃ nāgapatnī pativratā

उसके वचन सुनकर धर्म से प्रेम करनेवाली पतिव्रता नागपत्नी ने रूप धारण कर उस ब्राह्मण को दर्शन दिए।

श्लोक 5 (12.367.5)

सा तस्मै विधिवत्पूजां चक्रे धर्मपरायणा । स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाब्रवीत् ॥

sā tasmai vidhivatpūjāṃ cakre dharmaparāyaṇā | svāgatenāgataṃ kṛtvā kiṃ karomīti cābravīt

धर्म में तत्पर उस नागी ने उसकी विधिवत् पूजा की, "स्वागत है" कहकर उसका अभिनन्दन किया और पूछा, "मैं क्या करूँ?"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 6 (12.367.6)

विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णया गिरा । द्रष्टुमिच्छामि भवति देवं नागमनुत्तमम् ॥

viśrānto'bhyarcitaścāsmi bhavatyā ślakṣṇayā girā | draṣṭumicchāmi bhavati devaṃ nāgamanuttamam

हे देवी, आपके मधुर वचनों से मेरा विश्राम और सत्कार हो चुका है। मैं आपके स्वामी, उन परम श्रेष्ठ नाग के दर्शन करना चाहता हूँ।

श्लोक 7 (12.367.7)

एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे परमीप्सितम् । अनेन चार्थेनास्म्यद्य संप्राप्तः पन्नगाश्रमम् ॥

etaddhi paramaṃ kāryametanme paramīpsitam | anena cārthenāsmyadya saṃprāptaḥ pannagāśramam

यही मेरा सबसे बड़ा कार्य है और यही मेरी परम अभीष्ट बात है; इसी प्रयोजन से मैं आज नाग के आश्रम में आया हूँ।

नागभार्योवाच

श्लोक 8 (12.367.8)

आर्यः सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः । सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शयिष्यत्यसंशयम् ॥

āryaḥ sūryarathaṃ voḍhuṃ gato'sau māsacārikaḥ | saptāṣṭabhirdinairvipra darśayiṣyatyasaṃśayam

मेरे स्वामी मास की बारी में सूर्य का रथ ढोने गए हैं। हे विप्र, सात-आठ दिन में वे निःसन्देह आपको दर्शन देंगे।

श्लोक 9 (12.367.9)

एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं तव । भर्तुर्भवतु किंचान्यत्क्रियतां तद्वदस्व मे ॥

etadviditamāryasya vivāsakaraṇaṃ tava | bharturbhavatu kiṃcānyatkriyatāṃ tadvadasva me

मेरे स्वामी के बाहर रहने का कारण अब आप जान गए। मेरे पति के विषय में और जो कुछ करना हो, वह कीजिए, मुझे बताइए।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 10 (12.367.10)

अनेन निश्चयेनाहं साध्वि संप्राप्तवानिह । प्रतीक्षन्नागमं देवि वत्स्याम्यस्मिन्महावने ॥

anena niścayenāhaṃ sādhvi saṃprāptavāniha | pratīkṣannāgamaṃ devi vatsyāmyasminmahāvane

हे साध्वी, इसी निश्चय से मैं यहाँ आया हूँ। हे देवी, उनके आने की प्रतीक्षा करता हुआ मैं इसी महावन में रहूँगा।

श्लोक 11 (12.367.11)

संप्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः । मयाभिगमनं प्राप्तो वाच्यश्च वचनं त्वया ॥

saṃprāptasyaiva cāvyagramāvedyo'hamihāgataḥ | mayābhigamanaṃ prāpto vācyaśca vacanaṃ tvayā

उनके लौटते ही उन्हें शान्ति से बता दीजिए कि मैं यहाँ आया हूँ। उनसे कहिए कि मैं उनसे मिलने आया था, और मेरा सन्देश भी उन्हें सुना दीजिए।

श्लोक 12 (12.367.12)

अहमप्यत्र वत्स्यामि गोमत्याः पुलिने शुभे । कालं परिमिताहारो यथोक्तं परिपालयन् ॥

ahamapyatra vatsyāmi gomatyāḥ puline śubhe | kālaṃ parimitāhāro yathoktaṃ paripālayan

मैं भी गोमती के सुन्दर तट पर परिमित आहार लेते हुए, जैसा कहा है उसका पालन करता हुआ रहूँगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (12.367.13)

ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय पुनःपुनः । वेदवित्पुलिनं नद्याः प्रययौ ब्राह्मणर्षभः ॥

tataḥ sa viprastāṃ nāgīṃ samādhāya punaḥpunaḥ | vedavitpulinaṃ nadyāḥ prayayau brāhmaṇarṣabhaḥ

तब वेद को जाननेवाला वह ब्राह्मणश्रेष्ठ उस नागी को बार-बार आश्वस्त करके नदी के उसी तट की ओर चला गया।

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