शान्ति पर्व · अध्याय 370
नाग का क्रोध शान्त करना और ब्राह्मण के पास जाना
पद्मनाभ पत्नी से पूछता है कि आगन्तुक मनुष्य है या देवता, क्योंकि मनुष्यों का नागों को देखना उचित नहीं माना जाता। वह उत्तर देती है कि वह देवता नहीं, केवल एक आतुर प्रार्थी है, और पति से आग्रह करती है कि क्रोध छोड़कर उससे मिले, क्योंकि आशा लेकर आए अतिथि को लौटाना भ्रूणहत्या के समान पाप है। पद्मनाभ मानता है कि क्रोध उसे जन्म से मिला है, रावण और कार्तवीर्य के पुत्रों को क्रोध के शिकार बताता है, कहता है कि उसने क्रोध को रोक लिया है, और ब्राह्मण से मिलने चल पड़ता है।
नाग उवाच
श्लोक 1 (12.370.1)
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि । मानुषं केवलं विप्रं देवं वाऽथ शुचिस्मिते ॥
atha brāhmaṇarūpeṇa kaṃ taṃ samanupaśyasi | mānuṣaṃ kevalaṃ vipraṃ devaṃ vā'tha śucismite
हे सुन्दर मुस्कानवाली, ब्राह्मण के रूप में आए उस व्यक्ति को तुम क्या समझती हो: केवल मनुष्य, केवल ब्राह्मण, या कोई देवता?
श्लोक 2 (12.370.2)
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि । संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥
ko hi māṃ mānuṣaḥ śakto draṣṭukāmo yaśasvini | saṃdarśanarucirvākyamājñāpūrvaṃ vadiṣyati
हे यशस्विनी, कौन-सा मनुष्य मुझे देखने की इच्छा करने में समर्थ होगा? दर्शन की रुचि रखनेवाला तो आज्ञा के ढंग से बात करेगा।
श्लोक 3 (12.370.3)
सुरासुरगणानां च देवर्षीणां च भामिनि । ननु नागा महावीर्याः सौरभेयास्तरस्विनः ॥
surāsuragaṇānāṃ ca devarṣīṇāṃ ca bhāmini | nanu nāgā mahāvīryāḥ saurabheyāstarasvinaḥ
हे भामिनी, क्या देवताओं और असुरों के समूहों तथा देवर्षियों की दृष्टि में भी नाग, दिव्य गन्ध धारण करनेवाले, महापराक्रमी और वेगवान् नहीं माने जाते?
श्लोक 4 (12.370.4)
वन्दनीयाश्च वरदा वयमप्यनुयायिनः । मनुष्याणां विशेषेण नावेक्ष्या इति मे मतिः ॥
vandanīyāśca varadā vayamapyanuyāyinaḥ | manuṣyāṇāṃ viśeṣeṇa nāvekṣyā iti me matiḥ
हम वन्दनीय हैं, वर देनेवाले हैं और हमारे अपने अनुयायी भी हैं; और मेरा मत है कि मनुष्यों के लिए विशेष रूप से हम देखने योग्य नहीं हैं।
नागभार्योवाच
श्लोक 5 (12.370.5)
आर्जवेन विजानामि नासौ देवोऽनिलाशन । एकं तस्मिन्विजानामि भक्तिमानतिरोषण ॥
ārjavena vijānāmi nāsau devo'nilāśana | ekaṃ tasminvijānāmi bhaktimānatiroṣaṇa
हे वायुभक्षी, उसकी सरलता से मैं जानती हूँ कि वह देवता नहीं है। उसके विषय में एक बात मैं जानती हूँ: वह भक्ति से भरा है, हे अत्यन्त क्रोधी।
श्लोक 6 (12.370.6)
स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा । वर्षं वर्षप्रियः पक्षी दर्शनं तव काङ्क्षते ॥
sa hi kāryāntarākāṅkṣī jalepsuḥ stokako yathā | varṣaṃ varṣapriyaḥ pakṣī darśanaṃ tava kāṅkṣate
वह अपने प्रयोजन से आया है और जल चाहनेवाले स्तोकक (चातक) पक्षी की तरह वर्षा-प्रेमी बनकर वर्षा की प्रतीक्षा करता है; वैसे ही वह आपके दर्शन की इच्छा करता है।
श्लोक 7 (12.370.7)
हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद्विघ्नं न प्रतिपालयेत् । तुल्योप्यभिजने जातो न कश्चित्पर्युपासते ॥
hitvā tvaddarśanaṃ kiṃcidvighnaṃ na pratipālayet | tulyopyabhijane jāto na kaścitparyupāsate
आपके दर्शन को छोड़कर वह किसी बाधा की परवाह नहीं करेगा; और आपके बराबर के कुल में जन्मा होने पर भी वह किसी दूसरे की उपासना नहीं करता।
श्लोक 8 (12.370.8)
तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि । आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥
tadroṣaṃ sahajaṃ tyaktvā tvamenaṃ draṣṭumarhasi | āśācchedena tasyādya nātmānaṃ dagdhumarhasi
इसलिए अपना जन्मजात क्रोध छोड़कर आप उसे देखने जाइए। आज उसकी आशा काटकर आप स्वयं को मत जलाइए।
श्लोक 9 (12.370.9)
आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाऽश्रुप्रमार्जनम् । राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥
āśayā hyabhipannānāmakṛtvā'śrupramārjanam | rājā vā rājaputro vā bhrūṇahatyaiva yujyate
आशा लेकर आए हुए लोगों के आँसू पोंछे बिना लौटा देनेवाला चाहे राजा हो या राजपुत्र, भ्रूणहत्या के दोष का भागी होता है।
श्लोक 10 (12.370.10)
मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् । वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥
maune jñānaphalāvāptirdānena ca yaśo mahat | vāgmitvaṃ satyavākyena paratra ca mahīyate
मौन से ज्ञान का फल मिलता है, दान से महान यश; सत्यवाणी से वाक्पटुता आती है और वह परलोक में भी सम्मान पाता है।
श्लोक 11 (12.370.11)
भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसंमिताम् । न्याय्यस्यार्थस्य संप्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्रुते ॥
bhūpradānena ca gatiṃ labhatyāśramasaṃmitām | nyāyyasyārthasya saṃprāptiṃ kṛtvā phalamupāśrute
भूमि-दान से मनुष्य आश्रमों के समान गति पाता है; और न्याययुक्त धन की प्राप्ति कराकर वह उसका फल भोगता है।
श्लोक 12 (12.370.12)
अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् । न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥
abhipretāmasaṃśliṣṭāṃ kṛtvā cātmahitāṃ kriyām | na yāti nirayaṃ kaściditi dharmavido viduḥ
अपनी इच्छा के अनुकूल, बन्धन-रहित और अपने लिए हितकारी कर्म करके कोई नरक में नहीं जाता, ऐसा धर्म को जानने वाले कहते हैं।
नाग उवाच
श्लोक 13 (12.370.13)
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् । रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥
abhimānairna māno me jātidoṣeṇa vai mahān | roṣaḥ saṃkalpajaḥ sādhvi dagdho vāgagninā tvayā
मेरा बड़ा मान अभिमान से नहीं, मेरे जन्म के दोष से है; और हे साध्वी, संकल्प से उत्पन्न मेरे क्रोध को तुमने वाणी की अग्नि से जला दिया है।
श्लोक 14 (12.370.14)
न च रोषादहं साध्वि पश्येयमधिकं तमः । तस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ॥
na ca roṣādahaṃ sādhvi paśyeyamadhikaṃ tamaḥ | tasya vaktavyatāṃ yānti viśeṣeṇa bhujaṅgamāḥ
हे साध्वी, क्रोध के कारण मैं इससे बड़ा अन्धकार नहीं देखूँगा; इसी के कारण नाग विशेष रूप से निन्दा के पात्र बनते हैं।
श्लोक 15 (12.370.15)
रोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् । तथा शक्रप्रतिस्पर्धी हतो रामेण संयुगे ॥
roṣasya hi vaśaṃ gatvā daśagrīvaḥ pratāpavān | tathā śakrapratispardhī hato rāmeṇa saṃyuge
क्रोध के वश में पड़कर इन्द्र का प्रतिस्पर्धी, प्रतापी दशग्रीव रावण युद्ध में राम के हाथों मारा गया।
श्लोक 16 (12.370.16)
अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हृतम् । धर्षणाद्रोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ॥
antaḥpuragataṃ vatsaṃ śrutvā rāmeṇa nirhṛtam | dharṣaṇādroṣasaṃvignāḥ kārtavīryasutā hatāḥ
अन्तःपुर में पहुँचे हुए बछड़े को राम द्वारा हर लिया गया सुनकर, उस अपमान के क्रोध से व्याकुल कार्तवीर्य के पुत्र मारे गए।
श्लोक 17 (12.370.17)
जामदग्न्येन रामेण सहस्रनयनोपमः । संयुगे निहतो रोषात्कार्तवीर्यो महाबलः ॥
jāmadagnyena rāmeṇa sahasranayanopamaḥ | saṃyuge nihato roṣātkārtavīryo mahābalaḥ
जमदग्नि के पुत्र राम ने सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र के समान महाबली कार्तवीर्य को क्रोध के कारण युद्ध में मार डाला।
श्लोक 18 (12.370.18)
तदेष तपसां शत्रुः श्रेयसां विनिपातकः । निगृहीतो मया रोषः श्रुत्वैवं वचनं तव ॥
tadeṣa tapasāṃ śatruḥ śreyasāṃ vinipātakaḥ | nigṛhīto mayā roṣaḥ śrutvaivaṃ vacanaṃ tava
यह क्रोध तपस्याओं का शत्रु और कल्याण का नाश करनेवाला है। तुम्हारी बात सुनकर मैंने अपने क्रोध को रोक लिया है।
श्लोक 19 (12.370.19)
आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपायिनि । यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या गुणसमन्विता ॥
ātmānaṃ ca viśeṣeṇa praśaṃsāmyanapāyini | yasya me tvaṃ viśālākṣi bhāryā guṇasamanvitā
हे अनघे, मैं अपनी विशेष रूप से प्रशंसा करता हूँ कि तुम जैसी गुणवती मेरी पत्नी हो।
श्लोक 20 (12.370.20)
एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः । सर्वथा चोक्तवान्वाक्यं स कृतार्थः प्रयास्यति ॥
eṣa tatraiva gacchāmi yatra tiṣṭhatyasau dvijaḥ | sarvathā coktavānvākyaṃ sa kṛtārthaḥ prayāsyati
मैं अभी वहीं जाता हूँ जहाँ वह ब्राह्मण ठहरा है; अपनी बात कहकर वह निश्चय ही कृतार्थ होकर जाएगा।