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शान्ति पर्व · अध्याय 372

नाग द्वारा सूर्य के आश्चर्यों का वर्णन

ब्राह्मण उस नाग से पूछता है, जो अपनी बारी पर सूर्य का एकचक्र रथ ढोता है, कि क्या उसने वहाँ कोई आश्चर्य देखा है। नाग पहले सूर्य को अनेक आश्चर्यों का आधार बताता है — वायु, वर्षा करने वाले मेघ और पृथ्वी को धारण करने वाला बीज। फिर वह बताता है कि दोपहर में एक दूसरा तेज आया, उसने सूर्य से हाथ मिलाया और उसके मण्डल में समा गया; नागों को संदेह हुआ कि सूर्य कौन है, और उन्होंने सूर्य से पूछा।

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ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (12.372.1)

विवस्वतो गच्छति पर्ययेण । वोडुं भवांस्तं रथमेकचक्रम् । आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचि । द्दृष्टं त्वयाशंसितुमर्हसि त्वम् ॥

vivasvato gacchati paryayeṇa | voḍuṃ bhavāṃstaṃ rathamekacakram | āścaryabhūtaṃ yadi tatra kiṃci | ddṛṣṭaṃ tvayāśaṃsitumarhasi tvam

अपनी बारी आने पर आप विवस्वान् के एकचक्र रथ को ढोने जाते हैं। वहाँ यदि आपने कोई आश्चर्य की बात देखी हो, तो आप उसे बताइए।

नाग उवाच

श्लोक 2 (12.372.2)

आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान्रविः । यतो भूताः प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसंमताः ॥

āścaryāṇāmanekānāṃ pratiṣṭhā bhagavānraviḥ | yato bhūtāḥ pravartante sarve trailokyasaṃmatāḥ

भगवान् सूर्य अनेक आश्चर्यों के आधार हैं; उन्हीं से तीनों लोकों में सम्मानित सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 3 (12.372.3)

यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहंगमाः । वसन्त्याश्रित्य मुनयः संसिद्धा दैवतैः सह ॥

yasya raśmisahasreṣu śākhāsviva vihaṃgamāḥ | vasantyāśritya munayaḥ saṃsiddhā daivataiḥ saha

जिनकी हज़ारों किरणों में, वृक्ष की शाखाओं पर पक्षियों की तरह, सिद्ध मुनि देवताओं के साथ आश्रय लेकर रहते हैं।

श्लोक 4 (12.372.4)

यतो वायुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान् । विजृम्भत्यम्बरे तत्र किमाश्चर्यमतः परम् ॥

yato vāyurviniḥsṛtya sūryaraśmyāśrito mahān | vijṛmbhatyambare tatra kimāścaryamataḥ param

उन्हीं से निकलकर महान् वायु सूर्य की किरणों के आश्रय से आकाश में फैलता है। इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 5 (12.372.5)

विभज्य तं तु विप्रर्षे प्रजानां हितकाम्यया । तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ॥

vibhajya taṃ tu viprarṣe prajānāṃ hitakāmyayā | toyaṃ sṛjati varṣāsu kimāścaryamataḥ param

हे विप्रश्रेष्ठ, प्राणियों के हित की इच्छा से उस वायु को विभक्त करके वे वर्षा ऋतु में जल बरसाते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 6 (12.372.6)

यस्य मण्डलमध्यस्थो महात्मा परमत्विषा । दीप्तः समीक्षते लोकान्किमाश्चर्यमतः परम् ॥

yasya maṇḍalamadhyastho mahātmā paramatviṣā | dīptaḥ samīkṣate lokānkimāścaryamataḥ param

जिनके मण्डल के मध्य में स्थित महात्मा परम तेज से दीप्त होकर लोकों को देखते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 7 (12.372.7)

शुक्रो नामासितः पादो यश्च वारिधरोऽम्बरे । तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ॥

śukro nāmāsitaḥ pādo yaśca vāridharo'mbare | toyaṃ sṛjati varṣāsu kimāścaryamataḥ param

उनका शुक्र नामक श्याम अंग, जो आकाश में जल धारण करने वाला मेघ बनकर वर्षा ऋतु में जल बरसाता है — इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 8 (12.372.8)

योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोक्षितं पयः । प्रत्यादत्ते पुनः काले किमाश्चर्यमतः परम् ॥

yo'ṣṭamāsāṃstu śucinā kiraṇenokṣitaṃ payaḥ | pratyādatte punaḥ kāle kimāścaryamataḥ param

जो आठ महीनों तक अपनी निर्मल किरण से, जो जल बरसाया गया था, उसे समय आने पर फिर खींच लेते हैं — इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 9 (12.372.9)

यस्य तेजोविशेषेषु स्वयमात्मा प्रतिष्ठितः । यतो बीजं मही चेयं धार्यते सचराचरम् ॥

yasya tejoviśeṣeṣu svayamātmā pratiṣṭhitaḥ | yato bījaṃ mahī ceyaṃ dhāryate sacarācaram

जिनके विशिष्ट तेजों में स्वयं आत्मा प्रतिष्ठित है, और जिनसे वह बीज मिलता है जिससे यह पृथ्वी चर और अचर सहित धारण की जाती है।

श्लोक 10 (12.372.10)

यत्र देवो महाबाहुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः । अनादिनिधनो विप्र किमाश्चर्यमतः परम् ॥

yatra devo mahābāhuḥ śāśvataḥ puruṣottamaḥ | anādinidhano vipra kimāścaryamataḥ param

जिनमें महाबाहु देव, शाश्वत पुरुषोत्तम, जो आदि और अन्त से रहित हैं, निवास करते हैं। हे विप्र, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा?

श्लोक 11 (12.372.11)

आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु । विमले यन्मया दृष्टमम्बरे सूर्यसंश्रयात् ॥

āścaryāṇāmivāścaryamidamekaṃ tu me śṛṇu | vimale yanmayā dṛṣṭamambare sūryasaṃśrayāt

आश्चर्यों में भी आश्चर्य रूप यह एक बात मुझसे सुनिए, जो मैंने निर्मल आकाश में सूर्य के पास देखी थी।

श्लोक 12 (12.372.12)

पुरा मध्याह्नसमये लोकांस्तपति भास्करे । प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः समदृश्यत ॥

purā madhyāhnasamaye lokāṃstapati bhāskare | pratyādityapratīkāśaḥ sarvataḥ samadṛśyata

एक बार दोपहर के समय, जब सूर्य लोकों को तपा रहे थे, चारों ओर दूसरे सूर्य के समान एक तेज दिखाई दिया।

श्लोक 13 (12.372.13)

स लोकांस्तेजसा सर्वान्स्वभासा निर्विभासयन् । आदित्याधिमुखोऽभ्येति गगनं पाटयन्निव ॥

sa lokāṃstejasā sarvānsvabhāsā nirvibhāsayan | ādityādhimukho'bhyeti gaganaṃ pāṭayanniva

अपने प्रकाश से सब लोकों को फीका करता हुआ वह तेज आकाश को चीरता हुआ-सा सूर्य की ओर आया।

श्लोक 14 (12.372.14)

हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः । अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय इव भास्करः ॥

hutāhutiriva jyotirvyāpya tejomarīcibhiḥ | anirdeśyena rūpeṇa dvitīya iva bhāskaraḥ

आहुति पाई हुई अग्नि की ज्वाला की तरह अपनी तेजोमय किरणों से आकाश को भरता हुआ, वह अवर्णनीय रूप में मानो दूसरा सूर्य था।

श्लोक 15 (12.372.15)

तस्याभिगमनप्राप्तौ हस्तौ दत्तौ विवस्वता । तेनापि दक्षिणो हस्तो दत्तः प्रत्यर्चितार्थिना ॥

tasyābhigamanaprāptau hastau dattau vivasvatā | tenāpi dakṣiṇo hasto dattaḥ pratyarcitārthinā

जब वह पास आया, तो विवस्वान् ने उसकी ओर अपने हाथ बढ़ाए; और उसने भी प्रत्युत्तर में सम्मान करने की इच्छा से अपना दायाँ हाथ दिया।

श्लोक 16 (12.372.16)

ततो भित्त्वैव गगनं प्रविष्टो रश्मिमण्डलम् । एकीभूतं च तत्तेजः क्षणेनादित्यतां गतम् ॥

tato bhittvaiva gaganaṃ praviṣṭo raśmimaṇḍalam | ekībhūtaṃ ca tattejaḥ kṣaṇenādityatāṃ gatam

तब आकाश को भेदकर वह किरणों के मण्डल में प्रविष्ट हो गया, और वह तेज एक होकर क्षण भर में सूर्य के रूप को प्राप्त हो गया।

श्लोक 17 (12.372.17)

तत्र नः संशयो जातस्तयोस्तेजः समागमे । अनयोः को भवेत्सूर्यो रथस्थो योऽयमागतः ॥

tatra naḥ saṃśayo jātastayostejaḥ samāgame | anayoḥ ko bhavetsūryo rathastho yo'yamāgataḥ

तब उन दोनों के तेजों के मिल जाने पर हमारे मन में संशय हुआ: इन दोनों में सूर्य कौन है — रथ पर स्थित, या यह जो आया है?

श्लोक 18 (12.372.18)

ते वयं जातसंदेहाः पर्यपृच्छामहे रविम् । क एष दिवमाक्रम्य गतः सूर्य इवापरः ॥

te vayaṃ jātasaṃdehāḥ paryapṛcchāmahe ravim | ka eṣa divamākramya gataḥ sūrya ivāparaḥ

तब संदेह में पड़े हुए हम लोगों ने सूर्य से पूछा: "यह कौन है, जो आकाश को पार करके दूसरे सूर्य के समान चला गया?"

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