शान्ति पर्व · अध्याय 56
राजा के कर्तव्य: उद्योग, मन्त्रणा और रक्षा
भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजा को कभी उद्योग नहीं छोड़ना चाहिए, और वे उशना, मरुत्त तथा मनु के श्लोक स्मरण कराते हैं: कुमार्ग पर चलने वाले गुरु का भी त्याग किया जा सकता है, जैसे सगर ने असमंजस को और उद्दालक ने श्वेतकेतु को त्यागा था। वे बताते हैं कि राजा कैसा हो और क्या करे: मन्त्रणा गुप्त रखे, चारों वर्णों के धर्मों की रक्षा करे, योग्य और निष्ठावान् सहायक चुने, न्याय और कोमलता से शासन करे, और सबसे बढ़कर लोक की रक्षा करे, क्योंकि राजा के बिना न पत्नी है, न धन।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.56.1)
नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर । प्रशस्यते न राजा हि नारीवोद्यमवर्जितः ॥
nityodyuktena vai rājñā bhavitavyaṃ yudhiṣṭhira | praśasyate na rājā hi nārīvodyamavarjitaḥ
हे युधिष्ठिर, राजा को सदा उद्योग में लगा रहना चाहिए। उद्यम से रहित राजा स्त्री के समान माना जाता है और उसकी प्रशंसा नहीं होती।
श्लोक 2 (12.56.2)
भगवानुशना चाह श्लोकमत्र विशांपते । तदिहैकमना राजन्गदतस्तं निबोध मे ॥
bhagavānuśanā cāha ślokamatra viśāṃpate | tadihaikamanā rājangadatastaṃ nibodha me
हे प्रजापालक, इसी विषय में भगवान् उशना (शुक्राचार्य) ने एक श्लोक कहा था। राजन्, मैं उसे कहता हूँ; तुम एकाग्र मन से सुनो।
श्लोक 3 (12.56.3)
द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥
dvāvimau grasate bhūmiḥ sarpo bilaśayāniva | rājānaṃ cāviroddhāraṃ brāhmaṇaṃ cāpravāsinam
जैसे साँप बिल में रहने वाले जीवों को निगल जाता है, वैसे ही पृथ्वी इन दो को निगल जाती है: शत्रु का विरोध न करने वाले राजा को और अध्ययन के लिए प्रवास न करने वाले ब्राह्मण को।
श्लोक 4 (12.56.4)
तदेतन्नरशार्दूल हृदि त्वं कर्तुमर्हसि । सन्धेयानभिसन्धत्स्व विरोध्यांश्च विरोधय ॥
tadetannaraśārdūla hṛdi tvaṃ kartumarhasi | sandheyānabhisandhatsva virodhyāṃśca virodhaya
हे नरश्रेष्ठ, इसे तुम्हें हृदय में रखना चाहिए: जिनसे सन्धि हो सकती है उनसे सन्धि करो, और जिनका विरोध करना उचित है उनका विरोध करो।
श्लोक 5 (12.56.5)
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य विपरीतं य आचरेत् । गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ॥
saptāṅgasya ca rājyasya viparītaṃ ya ācaret | gururvā yadi vā mitraṃ pratihantavya eva saḥ
जो कोई, चाहे गुरु हो या मित्र, सात अंगों वाले राज्य के विपरीत आचरण करे, उसे अवश्य दण्डित करके रोकना चाहिए।
श्लोक 6 (12.56.6)
मरुत्तेन हि राज्ञा वै गीतः श्लोकः पुरातनः । राज्याधिकारे राजेन्द्र बृहस्पतिमतः पुरा ॥
maruttena hi rājñā vai gītaḥ ślokaḥ purātanaḥ | rājyādhikāre rājendra bṛhaspatimataḥ purā
हे राजेन्द्र, पूर्वकाल में राजा मरुत्त ने राज्य के अधिकार के विषय में बृहस्पति के मत के अनुसार एक प्राचीन श्लोक गाया था।
श्लोक 7 (12.56.7)
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥
gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ | utpathaṃ pratipannasya parityāgo vidhīyate
जो गुरु भी घमण्ड में चूर हो, कर्तव्य और अकर्तव्य को न जानता हो और कुमार्ग पर चल पड़ा हो, उसका भी त्याग करने का विधान है।
श्लोक 8 (12.56.8)
बाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेण च धीमता । असमञ्जः सुतो ज्येष्ठस्त्यक्तः पौरहितैषिणा ॥
bāhoḥ putreṇa rājñā ca sagareṇa ca dhīmatā | asamañjaḥ suto jyeṣṭhastyaktaḥ paurahitaiṣiṇā
बाहु के पुत्र बुद्धिमान राजा सगर ने नगरवासियों का हित चाहते हुए अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजस को त्याग दिया था।
श्लोक 9 (12.56.9)
असमञ्जः सरय्वां स पौराणां बालकान्नृप । न्यमज्जयदतः पित्रा निर्भर्त्स्य स विवासितः ॥
asamañjaḥ sarayvāṃ sa paurāṇāṃ bālakānnṛpa | nyamajjayadataḥ pitrā nirbhartsya sa vivāsitaḥ
हे राजन्, असमंजस सरयू में नगरवासियों के बालकों को डुबो दिया करता था; इसलिए पिता ने उसे फटकारकर देश से निकाल दिया।
श्लोक 10 (12.56.10)
ऋषिणोद्दालकेनापि श्वेतकेतुर्महातपाः । मिथ्या विप्रानुपचरन्सन्त्यक्तो दयितः सुतः ॥
ṛṣiṇoddālakenāpi śvetaketurmahātapāḥ | mithyā viprānupacaransantyakto dayitaḥ sutaḥ
ऋषि उद्दालक ने भी अपने प्रिय पुत्र महातपस्वी श्वेतकेतु को, जो ब्राह्मणों की झूठी सेवा करता था, त्याग दिया था।
श्लोक 11 (12.56.11)
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः । सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ॥
lokarañjanamevātra rājñāṃ dharmaḥ sanātanaḥ | satyasya rakṣaṇaṃ caiva vyavahārasya cārjavam
यहाँ राजाओं का सनातन धर्म यही है: प्रजा को प्रसन्न रखना, सत्य की रक्षा करना और व्यवहार में सरल रहना।
श्लोक 12 (12.56.12)
न हिंस्यात्परवित्तानि देयं काले च दापयेत् । विक्रान्तः सत्यवाक्क्षान्तो नृपो न चलते पथः ॥
na hiṃsyātparavittāni deyaṃ kāle ca dāpayet | vikrāntaḥ satyavākkṣānto nṛpo na calate pathaḥ
वह दूसरों का धन न हरे और जो देय हो उसे समय पर दिलाए। पराक्रमी, सत्यवादी और क्षमाशील राजा अपने मार्ग से विचलित नहीं होता।
श्लोक 13 (12.56.13)
गुप्तमन्त्रो जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः । धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ॥
guptamantro jitakrodhaḥ śāstrārthakṛtaniścayaḥ | dharme cārthe ca kāme ca mokṣe ca satataṃ rataḥ
वह अपनी मन्त्रणा गुप्त रखता है, क्रोध को जीत चुका है, शास्त्रों के अर्थ का निश्चय कर चुका है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में सदा लगा रहता है।
श्लोक 14 (12.56.14)
त्रय्या संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति । वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात्परम् ॥
trayyā saṃvṛtamantraśca rājā bhavitumarhati | vṛjinaṃ ca narendrāṇāṃ nānyaccārakṣaṇātparam
राजा को चाहिए कि वह वेदत्रयी के अनुसार अपनी मन्त्रणा को भली-भाँति गुप्त रखे; और राजाओं के लिए मन्त्रणा की रक्षा न करने से बढ़कर दूसरा कोई संकट नहीं है।
श्लोक 15 (12.56.15)
चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता । धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥
cāturvarṇyasya dharmāśca rakṣitavyā mahīkṣitā | dharmasaṃkararakṣā ca rājñāṃ dharmaḥ sanātanaḥ
राजा को चारों वर्णों के धर्मों की रक्षा करनी चाहिए; धर्मों में मिश्रण न होने देना राजाओं का सनातन धर्म है।
श्लोक 16 (12.56.16)
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं च विश्वसेत् । षाङ्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं बुद्ध्याऽवलोकयेत् ॥
na viśvasecca nṛpatirna cātyarthaṃ ca viśvaset | ṣāṅguṇyaguṇadoṣāṃśca nityaṃ buddhyā'valokayet
राजा सब पर विश्वास न करे, और विश्वसनीयों पर भी अत्यधिक विश्वास न करे; वह नीति के छः उपायों के गुण-दोषों को सदा बुद्धि से परखता रहे।
श्लोक 17 (12.56.17)
अच्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते । त्रिवर्गे विदितार्थश्च युक्ताचारपथश्च यः ॥
acchidradarśī nṛpatirnityameva praśasyate | trivarge viditārthaśca yuktācārapathaśca yaḥ
जिस राजा की परख में कोई चूक नहीं रहती, उसकी सदा प्रशंसा होती है; वैसे ही उसकी भी, जो धर्म, अर्थ और काम के तत्त्व को जानता है और जिसका आचरण तथा मार्ग उचित है।
श्लोक 18 (12.56.18)
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः । वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षयात्मनः ॥
kośasyopārjanaratiryamavaiśravaṇopamaḥ | vettā ca daśavargasya sthānavṛddhikṣayātmanaḥ
वह कोश बढ़ाने में रुचि रखता है और यम तथा कुबेर के समान है; वह उस दशवर्ग को जानता है जिसका स्वरूप स्थिति, वृद्धि और क्षय है।
श्लोक 19 (12.56.19)
अभृतानां भवेद्भर्ता भृतानामन्ववेक्षकः । नृपतिः सुमुखश्च स्यात्स्मितपूर्वाभिभाषिता ॥
abhṛtānāṃ bhavedbhartā bhṛtānāmanvavekṣakaḥ | nṛpatiḥ sumukhaśca syātsmitapūrvābhibhāṣitā
वह उनका भरण करे जिनका कोई सहारा नहीं और जिनका भरण कर चुका है उनकी देखभाल करे। राजा प्रसन्नमुख हो और मुस्कराकर बात आरम्भ करने वाला हो।
श्लोक 20 (12.56.20)
उपासिता च वृद्धानां जिततन्द्रिरलोलुपः । सतां वृत्ते स्थितमतिः सतां ह्याचारदर्शनः ॥
upāsitā ca vṛddhānāṃ jitatandriralolupaḥ | satāṃ vṛtte sthitamatiḥ satāṃ hyācāradarśanaḥ
वह वृद्धजनों की सेवा करता है, आलस्य को जीत चुका है और लोभ से रहित है; उसकी बुद्धि सज्जनों के आचरण में टिकी रहती है, क्योंकि वह सज्जनों के आचार को ही देखता है।
श्लोक 21 (12.56.21)
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात्कदाचन । असद्भ्यश्च समादाय सद्भ्यस्तु प्रतिपादयेत् ॥
na cādadīta vittāni satāṃ hastātkadācana | asadbhyaśca samādāya sadbhyastu pratipādayet
वह सज्जनों के हाथ से कभी धन न ले; दुष्टों से धन लेकर सज्जनों को दे।
श्लोक 22 (12.56.22)
स्वयं प्रहर्ता दाता च वश्यात्मा वश्यसाधनः । काले दाता च भोक्ता च शुद्धाचारस्तथैव च ॥
svayaṃ prahartā dātā ca vaśyātmā vaśyasādhanaḥ | kāle dātā ca bhoktā ca śuddhācārastathaiva ca
वह स्वयं प्रहार करता है और दान देता है, आत्मसंयमी है और अपने साधनों को वश में रखता है; वह समय पर दान और भोग करता है और उसका आचरण शुद्ध है।
श्लोक 23 (12.56.23)
शूरान्भक्तानसंहार्यान्कुले जातानरोगिणः । शिष्टाञ्शिष्टाभिसंबन्धान्मानिनोऽनवमानिनः ॥
śūrānbhaktānasaṃhāryānkule jātānarogiṇaḥ | śiṣṭāñśiṣṭābhisaṃbandhānmānino'navamāninaḥ
राजा सदा ऐसे लोगों को अपना सहायक बनाए जो शूर हों, निष्ठावान् हों, जिन्हें शत्रु फोड़ न सकें, उच्च कुल में उत्पन्न और नीरोग हों, सुसंस्कृत हों, सुसंस्कृत कुलों से सम्बन्ध रखते हों, आत्मसम्मानी हों और फिर भी दूसरों का अपमान न करते हों,
श्लोक 24 (12.56.24)
विद्याविदो लोकविदः परलोकान्ववेक्षकान् । धर्मे च निरतान्साधूनचलानचलानिव ॥
vidyāvido lokavidaḥ paralokānvavekṣakān | dharme ca niratānsādhūnacalānacalāniva
जो विद्याओं के ज्ञाता हों, लोक को जानने वाले हों, परलोक पर दृष्टि रखने वाले हों, धर्म में लगे हों, सज्जन हों और पर्वतों के समान अचल हों,
श्लोक 25 (12.56.25)
सहायान्सततं कुर्याद्राजा भूतिपरिष्कृतान् । तैश्च तुल्यो भवेद्भोगैश्छत्रमात्राज्ञयाऽधिकः ॥
sahāyānsatataṃ kuryādrājā bhūtipariṣkṛtān | taiśca tulyo bhavedbhogaiśchatramātrājñayā'dhikaḥ
ऐसे ऐश्वर्य से सम्पन्न लोगों को। वह भोगों में उनके समान रहे और केवल छत्र तथा आज्ञा में उनसे बढ़कर रहे।
श्लोक 26 (12.56.26)
प्रत्यक्षा च परोक्षा च वृत्तिश्चास्य भवेत्समा । एवं कुर्वन्नरेन्द्रो हि न खेदमिह विन्दति ॥
pratyakṣā ca parokṣā ca vṛttiścāsya bhavetsamā | evaṃ kurvannarendro hi na khedamiha vindati
प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों में उनके प्रति उसका व्यवहार एक-सा रहे। ऐसा करने वाला राजा इस लोक में कष्ट नहीं पाता।
श्लोक 27 (12.56.27)
सर्वाभिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत् । स क्षिप्रमनृजुर्लुब्धः स्वजनेनैव बाध्यते ॥
sarvābhiśaṅkī nṛpatiryaśca sarvaharo bhavet | sa kṣipramanṛjurlubdhaḥ svajanenaiva bādhyate
जो राजा सब पर शंका करता है और सब कुछ हर लेता है, वह शीघ्र ही कुटिल और लोभी होकर अपने ही लोगों से पीड़ित होता है।
श्लोक 28 (12.56.28)
शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकस्यानुग्रहे रतः । न पतत्यरिभिर्ग्रस्तः पतितश्चाधितिष्ठति ॥
śucistu pṛthivīpālo lokasyānugrahe rataḥ | na patatyaribhirgrastaḥ patitaścādhitiṣṭhati
जो राजा पवित्र है और लोक पर अनुग्रह करने में लगा रहता है, वह शत्रुओं से घिर जाने पर भी नहीं गिरता, और गिर भी जाए तो फिर उठ खड़ा होता है।
श्लोक 29 (12.56.29)
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः । राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ॥
akrodhano hyavyasanī mṛdudaṇḍo jitendriyaḥ | rājā bhavati bhūtānāṃ viśvāsyo himavāniva
जो क्रोध और व्यसन से रहित, मृदु दण्ड देने वाला और जितेन्द्रिय होता है, वह राजा प्राणियों के लिए हिमालय के समान विश्वसनीय होता है।
श्लोक 30 (12.56.30)
प्राज्ञो न्यायगुणोपेतः पररन्ध्रेषु लालसः । सुदर्शः सर्ववर्णानां नयापनयवित्तथा ॥
prājño nyāyaguṇopetaḥ pararandhreṣu lālasaḥ | sudarśaḥ sarvavarṇānāṃ nayāpanayavittathā
वह प्राज्ञ है और न्याय के गुणों से युक्त है, दूसरों की दुर्बलताओं पर सजग दृष्टि रखता है, सब वर्णों के लिए सुलभ है और नीति तथा अनीति को जानता है;
श्लोक 31 (12.56.31)
क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः । अरोगप्रकृतिर्युक्तः क्रियावानविकत्थनः ॥
kṣiprakārī jitakrodhaḥ suprasādo mahāmanāḥ | arogaprakṛtiryuktaḥ kriyāvānavikatthanaḥ
वह शीघ्र कार्य करने वाला है, क्रोध को जीत चुका है, सहज प्रसन्न होने वाला और उदार मन का है, स्वस्थ प्रकृति वाला, उद्यमी और डींग न हाँकने वाला है।
श्लोक 32 (12.56.32)
आरब्धान्येव कार्याणि न पर्यवसितान्यपि । यस्य राज्ञः प्रदृश्यन्ते स राजा राजसत्तमः ॥
ārabdhānyeva kāryāṇi na paryavasitānyapi | yasya rājñaḥ pradṛśyante sa rājā rājasattamaḥ
वह राजा राजाओं में श्रेष्ठ है जिसके राज्य में कार्य सदा आरम्भ हुए ही दिखाई देते हैं, अभी समाप्त हुए नहीं।
श्लोक 33 (12.56.33)
पुत्रा इव पितुर्गेहे विषये यस्य मानवाः । निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ॥
putrā iva piturgehe viṣaye yasya mānavāḥ | nirbhayā vicariṣyanti sa rājā rājasattamaḥ
वह राजा राजाओं में श्रेष्ठ है जिसके राज्य में लोग पिता के घर में पुत्रों की भाँति निर्भय होकर विचरण करेंगे।
श्लोक 34 (12.56.34)
अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः । नयापनयवेत्तारः स राजा राजसत्तमः ॥
agūḍhavibhavā yasya paurā rāṣṭranivāsinaḥ | nayāpanayavettāraḥ sa rājā rājasattamaḥ
वह राजा राजाओं में श्रेष्ठ है जिसके नगरवासी और राष्ट्रवासी अपना वैभव छिपाते नहीं और नीति तथा अनीति को जानते हैं।
श्लोक 35 (12.56.35)
स्वधर्मनिरता यस्य जना विषयवासिनः । असङ्घातरता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ॥
svadharmaniratā yasya janā viṣayavāsinaḥ | asaṅghātaratā dāntāḥ pālyamānā yathāvidhi
वही राजा है जिसके राज्य में रहने वाले लोग अपने धर्म में लगे हों, शरीर के मोह में न पड़े हों, संयमी हों और विधि के अनुसार पाले जाते हों,
श्लोक 36 (12.56.36)
वश्या यत्ता विनीताश्च न च सङ्घर्षशीलिनः । विषये दानरुचयो नरा यस्य स पार्थिवः ॥
vaśyā yattā vinītāśca na ca saṅgharṣaśīlinaḥ | viṣaye dānarucayo narā yasya sa pārthivaḥ
आज्ञाकारी, उद्यमी, विनीत, दूसरों को दबाने का स्वभाव न रखने वाले और दान में रुचि रखने वाले हों।
श्लोक 37 (12.56.37)
न यस्य कूटं कपटं न माया न च मत्सरः । विषये भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ॥
na yasya kūṭaṃ kapaṭaṃ na māyā na ca matsaraḥ | viṣaye bhūmipālasya tasya dharmaḥ sanātanaḥ
जिस शासक के राज्य में न कूट है, न कपट, न माया और न ईर्ष्या, उसी का धर्म सनातन है।
श्लोक 38 (12.56.38)
यः सत्करोति ज्ञानानि श्रेयान्परहिते रतः । सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा स्वर्गमर्हति ॥
yaḥ satkaroti jñānāni śreyānparahite rataḥ | satāṃ vartmānugastyāgī sa rājā svargamarhati
जो राजा विद्वानों का सत्कार करता है, श्रेष्ठ है, दूसरों के हित में लगा रहता है, सज्जनों के मार्ग पर चलता है और त्यागी है, वह स्वर्ग के योग्य है।
श्लोक 39 (12.56.39)
यस्य चाराश्च मन्त्राश्च नित्यं चैव कृताकृताः । न ज्ञायन्ते हि रिपुभिः स राजा राज्यमर्हति ॥
yasya cārāśca mantrāśca nityaṃ caiva kṛtākṛtāḥ | na jñāyante hi ripubhiḥ sa rājā rājyamarhati
वह राजा राज्य के योग्य है जिसके गुप्तचर, मन्त्रणाएँ और किए हुए कार्य भी, न किए हुए की तरह, शत्रुओं को कभी ज्ञात नहीं होते।
श्लोक 40 (12.56.40)
श्लोकद्वयं पुरा गीतं भार्गवेण महात्मना । आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत ॥
ślokadvayaṃ purā gītaṃ bhārgaveṇa mahātmanā | ākhyāte rājacarite nṛpatiṃ prati bhārata
हे भारत, राजाओं के आचरण का वर्णन करते हुए महात्मा भार्गव ने पूर्वकाल में राजा को लक्ष्य करके दो श्लोक गाए थे।
श्लोक 41 (12.56.41)
राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनं ॥
rājānaṃ prathamaṃ vindettato bhāryāṃ tato dhanam | rājanyasati loke'sminkuto bhāryā kuto dhanaṃ
पहले राजा को पाना चाहिए, फिर पत्नी को, फिर धन को; क्योंकि इस लोक में राजा न हो तो पत्नी कहाँ और धन कहाँ?
श्लोक 42 (12.56.42)
तद्राज्ये राज्यकामानां नान्यो धर्मः सनातनः । ऋते रक्षां तु विस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारिणी ॥
tadrājye rājyakāmānāṃ nānyo dharmaḥ sanātanaḥ | ṛte rakṣāṃ tu vispaṣṭāṃ rakṣā lokasya dhāriṇī
राज्य की कामना करने वालों के लिए उस राज्य में स्पष्ट दिखने वाली रक्षा के सिवा कोई दूसरा सनातन धर्म नहीं है; रक्षा ही लोक को धारण करने वाली है।
श्लोक 43 (12.56.43)
प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ । राजधर्मेषु राजेन्द्र ताविहैकमनाः शृणु ॥
prācetasena manunā ślokau cemāvudāhṛtau | rājadharmeṣu rājendra tāvihaikamanāḥ śṛṇu
प्रचेता के पुत्र मनु ने भी राजधर्मों के विषय में ये दो श्लोक कहे थे। हे राजेन्द्र, उन्हें यहाँ एकाग्र मन से सुनो।
श्लोक 44 (12.56.44)
षडेतान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥
ṣaḍetānpuruṣo jahyādbhinnāṃ nāvamivārṇave | apravaktāramācāryamanadhīyānamṛtvijam
मनुष्य इन छः को वैसे ही त्याग दे जैसे समुद्र में टूटी नाव को त्यागा जाता है: उपदेश न देने वाले आचार्य को, अध्ययन न करने वाले ऋत्विज को,
श्लोक 45 (12.56.45)
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥
arakṣitāraṃ rājānaṃ bhāryāṃ cāpriyavādinīm | grāmakāmaṃ ca gopālaṃ vanakāmaṃ ca nāpitam
रक्षा न करने वाले राजा को, कटु बोलने वाली पत्नी को, गाँव की इच्छा रखने वाले ग्वाले को और वन की इच्छा रखने वाले नाई को।