शान्ति पर्व · अध्याय 57
राजधर्म का सार; पहले दिन का समापन
भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म का सार बताते हैं: सबसे बढ़कर रक्षा, जो गुप्तचरों, उचित देने-लेने, सज्जनों के संग्रह, नगर और कोश की रक्षा तथा अविराम उद्योग से सधती है, क्योंकि उद्योगहीन राजा विषहीन साँप के समान है। छोटे शत्रु की भी अवहेलना नहीं करनी चाहिए, और राज्य कोमलता तथा कठोरता के मिश्रण से ही टिकता है। व्यास, कृष्ण और अन्य लोग भीष्म की स्तुति करते हैं; युधिष्ठिर अपना शेष प्रश्न कल के लिए रखते हैं, और सब भीष्म को प्रणाम करके दृषद्वती में स्नान करते, सन्ध्या करते और हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.57.1)
एतत्ते राजधर्माणां नवनीतं युधिष्ठिर । बृहस्पतिर्हि भगवान्नान्यं धर्मं प्रशंसति ॥
etatte rājadharmāṇāṃ navanītaṃ yudhiṣṭhira | bṛhaspatirhi bhagavānnānyaṃ dharmaṃ praśaṃsati
हे युधिष्ठिर, यह राजाओं के धर्मों का नवनीत (सार) है; भगवान् बृहस्पति इसके सिवा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 2 (12.57.2)
विशालाक्षश्च भगवान्काव्यश्चैव महातपाः । सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः ॥
viśālākṣaśca bhagavānkāvyaścaiva mahātapāḥ | sahasrākṣo mahendraśca tathā prācetaso manuḥ
विशालाक्ष, महातपस्वी भगवान् काव्य (उशना), सहस्राक्ष महेन्द्र और प्रचेता के पुत्र मनु,
श्लोक 3 (12.57.3)
भरद्वाजश्च भगवांस्तथा गौरशिरा मुनिः । राजशास्त्रप्रणेतारो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ॥
bharadvājaśca bhagavāṃstathā gauraśirā muniḥ | rājaśāstrapraṇetāro brāhmaṇā brahmavādinaḥ
भगवान् भरद्वाज और गौरशिरा मुनि: ये ब्रह्मवादी ब्राह्मण राजशास्त्र के रचयिता हैं।
श्लोक 4 (12.57.4)
रक्षामेव प्रशंसन्ति धर्मं धर्मभृतां वर । राज्ञां राजीवताम्राक्ष साधनं चात्र मे शृणु ॥
rakṣāmeva praśaṃsanti dharmaṃ dharmabhṛtāṃ vara | rājñāṃ rājīvatāmrākṣa sādhanaṃ cātra me śṛṇu
हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, ये सब राजाओं के धर्म के रूप में रक्षा की ही प्रशंसा करते हैं। हे कमल के समान लाल नेत्रों वाले, अब रक्षा के साधन मुझसे सुनो।
श्लोक 5 (12.57.5)
चारश्च प्रणिधिश्चैव काले दानममत्सरः । युक्त्या दानं न चादानमयोगेन युधिष्ठिर ॥
cāraśca praṇidhiścaiva kāle dānamamatsaraḥ | yuktyā dānaṃ na cādānamayogena yudhiṣṭhira
गुप्तचर और प्रकट चर; समय पर बिना डाह के देना; हे युधिष्ठिर, उचित उपाय से लेना, अनुचित उपाय से कभी नहीं।
श्लोक 6 (12.57.6)
सतां संग्रहणं शौर्यं दाक्ष्यं सत्यं प्रजाहितम् । अनार्जवैरार्जवैश्च शत्रुपक्षाविवर्धनम् ॥
satāṃ saṃgrahaṇaṃ śauryaṃ dākṣyaṃ satyaṃ prajāhitam | anārjavairārjavaiśca śatrupakṣāvivardhanam
सज्जनों का संग्रह, शूरता, दक्षता, सत्य, प्रजा का हित, और कुटिल तथा सरल, दोनों उपायों से शत्रुपक्ष को बढ़ने न देना।
श्लोक 7 (12.57.7)
केतनानां च जीर्णानामवेक्षा चैव सीदताम् । द्विविधस्य च दण्डस्य प्रयोगः कालचोदितः ॥
ketanānāṃ ca jīrṇānāmavekṣā caiva sīdatām | dvividhasya ca daṇḍasya prayogaḥ kālacoditaḥ
जीर्ण-शीर्ण और गिरते हुए भवनों की देखभाल, और समय की माँग के अनुसार दो प्रकार के दण्ड (शारीरिक और आर्थिक) का प्रयोग।
श्लोक 8 (12.57.8)
साधूनामपरित्यागः कुलीनानां च धारणम् । निचयश्च निचेयानां सेवा बुद्धिमतामपि ॥
sādhūnāmaparityāgaḥ kulīnānāṃ ca dhāraṇam | nicayaśca niceyānāṃ sevā buddhimatāmapi
सज्जनों का त्याग न करना, कुलीनों को सहारा देना, संग्रह के योग्य वस्तुओं का संग्रह करना और बुद्धिमानों की सेवा करना।
श्लोक 9 (12.57.9)
बलानां हर्षणं नित्यं प्रजानामन्ववेक्षणम् । कार्येष्वखेदः कोशस्य तथैव च विवर्धनम् ॥
balānāṃ harṣaṇaṃ nityaṃ prajānāmanvavekṣaṇam | kāryeṣvakhedaḥ kośasya tathaiva ca vivardhanam
सेना को सदा हर्षित रखना, प्रजा की देखभाल करना, कार्यों में न थकना और उसी प्रकार कोश को बढ़ाना।
श्लोक 10 (12.57.10)
पुरगुप्तिरविश्वासः पौरसंघातभेदनम् । अरिमध्यस्थमित्राणां यथावच्चान्ववेक्षणम् ॥
puraguptiraviśvāsaḥ paurasaṃghātabhedanam | arimadhyasthamitrāṇāṃ yathāvaccānvavekṣaṇam
नगर की रक्षा, (पहरेदारों आदि पर भी) अविश्वास, नगरवासियों के संघों को तोड़ना, और शत्रुओं, मध्यस्थों तथा मित्रों पर यथोचित दृष्टि रखना।
श्लोक 11 (12.57.11)
उपजापश्च भृत्यानामात्मनः पुरदर्शनम् । अविश्वासः स्वयं चैव परस्याश्वासनं तथा ॥
upajāpaśca bhṛtyānāmātmanaḥ puradarśanam | aviśvāsaḥ svayaṃ caiva parasyāśvāsanaṃ tathā
सेवकों में फूट डालना, स्वयं अपने नगर का निरीक्षण, अपने सेवकों पर अविश्वास और उसी प्रकार दूसरे को आश्वासन देना।
श्लोक 12 (12.57.12)
नीतिवर्त्मानुसारेण नित्यमुत्थानमेव च । रिपूणामनवज्ञानं नित्यं चानार्यवर्जनम् ॥
nītivartmānusāreṇa nityamutthānameva ca | ripūṇāmanavajñānaṃ nityaṃ cānāryavarjanam
नीति के मार्ग पर चलते हुए सदा उद्योग करना, शत्रुओं की अवहेलना न करना और नीच कर्मों से सदा दूर रहना।
श्लोक 13 (12.57.13)
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत । राजधर्मस्य यन्मूलं श्लोकांश्चात्र निबोध मे ॥
utthānaṃ hi narendrāṇāṃ bṛhaspatirabhāṣata | rājadharmasya yanmūlaṃ ślokāṃścātra nibodha me
बृहस्पति ने राजाओं के उद्योग को ही राजधर्म की जड़ बताया है। इस विषय के श्लोक मुझसे सुनो।
श्लोक 14 (12.57.14)
उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः । उत्थानेन महेन्द्रेण श्रैष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ॥
utthānenāmṛtaṃ labdhamutthānenāsurā hatāḥ | utthānena mahendreṇa śraiṣṭhyaṃ prāptaṃ divīha ca
उद्योग से अमृत प्राप्त हुआ, उद्योग से असुर मारे गए, उद्योग से महेन्द्र ने स्वर्ग में और यहाँ भी श्रेष्ठता पाई।
श्लोक 15 (12.57.15)
उत्थानधीरः पुरुषो वाग्धीरानधितिष्ठति । उत्थानवीरान्वाग्वीरा रमयन्त उपासते ॥
utthānadhīraḥ puruṣo vāgdhīrānadhitiṣṭhati | utthānavīrānvāgvīrā ramayanta upāsate
उद्योग में दृढ़ पुरुष केवल वाणी में दृढ़ लोगों पर शासन करता है; वाणी के वीर उद्योग के वीरों की सेवा में रहकर उन्हें प्रसन्न करते हैं।
श्लोक 16 (12.57.16)
उत्थानहीनो राजा हि बुद्धिमानपि नित्यशः । प्रधर्षणीयः शत्रूणां भुजङ्ग इव निर्विषः ॥
utthānahīno rājā hi buddhimānapi nityaśaḥ | pradharṣaṇīyaḥ śatrūṇāṃ bhujaṅga iva nirviṣaḥ
उद्योगहीन राजा बुद्धिमान होने पर भी शत्रुओं के लिए सदा विषहीन साँप की तरह सरलता से दबाया जाने योग्य होता है।
श्लोक 17 (12.57.17)
न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा । अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च ॥
na ca śatruravajñeyo durbalo'pi balīyasā | alpo'pi hi dahatyagnirviṣamalpaṃ hinasti ca
शत्रु निर्बल हो तो भी बलवान् को उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए; थोड़ी-सी आग भी जला देती है और थोड़ा-सा विष भी मार देता है।
श्लोक 18 (12.57.18)
एकाङ्गेनापि संभूतः शत्रुर्दुर्गमुपाश्रितः । सर्वं तापयते देशमपि राज्ञः समृद्धिनः ॥
ekāṅgenāpi saṃbhūtaḥ śatrurdurgamupāśritaḥ | sarvaṃ tāpayate deśamapi rājñaḥ samṛddhinaḥ
केवल एक अंग (सेना के चार अंगों में से एक) के साथ भी उठा हुआ और दुर्ग का आश्रय लिए हुआ शत्रु समृद्ध राजा के सारे देश को सन्तप्त कर देता है।
श्लोक 19 (12.57.19)
राज्ञो रहस्यं यद्वाक्यं जयार्थे लोकसंग्रहः । हृदि यच्चास्य जिह्नं स्यात्कारणार्थं च यद्भवेत् ॥
rājño rahasyaṃ yadvākyaṃ jayārthe lokasaṃgrahaḥ | hṛdi yaccāsya jihnaṃ syātkāraṇārthaṃ ca yadbhavet
राजा की गुप्त बातें, विजय के लिए लोगों को साथ मिलाने का जो उपाय है, जो कुछ उसके हृदय में कुटिल हो और जो किसी प्रयोजन के लिए हो,
श्लोक 20 (12.57.20)
यच्चास्य कार्यं वृजिनं मार्दवेनैव धार्यते । रञ्जनार्थं च लोकस्य धर्मिष्ठामाचरेत्क्रियाम् ॥
yaccāsya kāryaṃ vṛjinaṃ mārdavenaiva dhāryate | rañjanārthaṃ ca lokasya dharmiṣṭhāmācaretkriyām
और उसका जो कठोर कर्म हो, वह कोमलता के आवरण में ही सम्पन्न किया जाता है; और लोगों को प्रसन्न करने के लिए वह अत्यन्त धर्मयुक्त कर्म करे।
श्लोक 21 (12.57.21)
राज्यं हि सुमहत्तत्र दुर्धार्यमकृतात्मभिः । न शक्यं मृदुना वोदुमाघातस्थानमुल्वणम् ॥
rājyaṃ hi sumahattatra durdhāryamakṛtātmabhiḥ | na śakyaṃ mṛdunā vodumāghātasthānamulvaṇam
राज्य बहुत भारी दायित्व है, जिन्होंने आत्मा को वश में नहीं किया उनके लिए उसे वहन करना कठिन है; और कोमल व्यक्ति उसे नहीं सँभाल सकता, क्योंकि वह भयंकर प्रहारों का स्थान है।
श्लोक 22 (12.57.22)
राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनैव धार्यते । तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ॥
rājyaṃ sarvāmiṣaṃ nityamārjavenaiva dhāryate | tasmānmiśreṇa satataṃ vartitavyaṃ yudhiṣṭhira
राज्य सबके लिए लालच की वस्तु है; वह केवल सरलता से नहीं टिकता। इसलिए हे युधिष्ठिर, सदा (कोमलता और कठोरता के) मिश्रण से व्यवहार करना चाहिए।
श्लोक 23 (12.57.23)
यद्यप्यस्य विपत्तिः स्याद्रक्षमाणस्य वै प्रजाः । सोप्यस्य विपुलो धर्म एवं वृत्ता हि भूमिपाः ॥
yadyapyasya vipattiḥ syādrakṣamāṇasya vai prajāḥ | sopyasya vipulo dharma evaṃ vṛttā hi bhūmipāḥ
प्रजा की रक्षा करते हुए यदि उस पर कोई विपत्ति आ भी जाए, तो वह भी उसके लिए बड़ा धर्म है; पृथ्वी के राजा इसी प्रकार आचरण करते आए हैं।
श्लोक 24 (12.57.24)
एष ते राजधर्माणां लेशः समनुवर्णितः । भूयस्ते यत्र संदेहस्तद्ब्रूहि कुरुसत्तम ॥
eṣa te rājadharmāṇāṃ leśaḥ samanuvarṇitaḥ | bhūyaste yatra saṃdehastadbrūhi kurusattama
मैंने तुम्हें राजधर्मों का केवल एक अंश बताया है। हे कुरुश्रेष्ठ, जिसमें और सन्देह हो वह पूछो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (12.57.25)
ततो व्यासश्च भगवान्देवस्थानोऽश्म एव च । वासुदेवः कृपश्चैव सात्यकिः सञ्जयस्तथा ॥
tato vyāsaśca bhagavāndevasthāno'śma eva ca | vāsudevaḥ kṛpaścaiva sātyakiḥ sañjayastathā
तब भगवान् व्यास, देवस्थान और अश्मा, वासुदेव, कृप, सात्यकि और सञ्जय,
श्लोक 26 (12.57.26)
साधुसाध्विति संहृष्टा घुष्यमाणैरिवाननैः । अस्तुवंश्च नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम् ॥
sādhusādhviti saṃhṛṣṭā ghuṣyamāṇairivānanaiḥ | astuvaṃśca naravyāghraṃ bhīṣmaṃ dharmabhṛtāṃ varam
हर्ष से भरकर 'साधु, साधु!' कहते हुए, मानो मुखों से जयघोष करते हुए, धर्मधारियों में श्रेष्ठ नरव्याघ्र भीष्म की स्तुति करने लगे।
श्लोक 27 (12.57.27)
ततो दीनमना भीष्ममुवाच कुरुनन्दनः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैः स्पृशन् ॥
tato dīnamanā bhīṣmamuvāca kurunandanaḥ | netrābhyāmaśrupūrṇābhyāṃ pādau tasya śanaiḥ spṛśan
तब कुरुनन्दन युधिष्ठिर ने खिन्न मन से, आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ धीरे-धीरे भीष्म के चरण छूते हुए उनसे कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (12.57.28)
श्व इदानीं स्वसंदेहं प्रवक्ष्यामि पितामह । उपैति सविता ह्यस्तं रसमापीय पार्थिवम् ॥
śva idānīṃ svasaṃdehaṃ pravakṣyāmi pitāmaha | upaiti savitā hyastaṃ rasamāpīya pārthivam
पितामह, अपना शेष सन्देह मैं कल कहूँगा। सूर्य पृथ्वी का रस पीकर अस्त हो रहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (12.57.29)
ततो द्विजातीनभिवाद्य केशवः । कृपश्च ते चैव युधिष्ठिरादयः । प्रदक्षिणीकृत्य महानदीसुतं । ततो रथानारुरुहुर्मुदान्विताः ॥
tato dvijātīnabhivādya keśavaḥ | kṛpaśca te caiva yudhiṣṭhirādayaḥ | pradakṣiṇīkṛtya mahānadīsutaṃ | tato rathānāruruhurmudānvitāḥ
तब केशव, कृप, वे अन्य लोग और युधिष्ठिर आदि द्विजों को प्रणाम करके तथा महानदी गंगा के पुत्र भीष्म की प्रदक्षिणा करके आनन्दपूर्वक अपने रथों पर सवार हुए।
श्लोक 30 (12.57.30)
दृषद्वतीं चाप्यवगाह्य सुव्रताः । कृतोदकार्थाः कृतजप्यमङ्गलाः । उपास्य संध्यां विधिवत्परंतपा । स्ततः पुरं ते विविशुर्गजाह्वयम् ॥
dṛṣadvatīṃ cāpyavagāhya suvratāḥ | kṛtodakārthāḥ kṛtajapyamaṅgalāḥ | upāsya saṃdhyāṃ vidhivatparaṃtapā | stataḥ puraṃ te viviśurgajāhvayam
उन दृढ़व्रतियों ने दृषद्वती में स्नान किया, जलतर्पण किया, जप और मंगलकर्म किए, और विधिपूर्वक सन्ध्योपासना करके वे शत्रुओं को तपाने वाले वीर गजाह्वय नगर, हस्तिनापुर में प्रविष्ट हुए।