शान्ति पर्व · अध्याय 58
राजा की उत्पत्ति और ब्रह्मा का नीतिशास्त्र
युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि "राजा" का पद और नाम कैसे उत्पन्न हुआ, जबकि राजा भी अन्य मनुष्यों जैसा ही मनुष्य है। भीष्म बताते हैं कि कृतयुग में प्रजा केवल धर्म से जीती थी, पर मोह, लोभ और काम ने धर्म को नष्ट कर दिया; तब भयभीत देवता ब्रह्मा की शरण में गए और ब्रह्मा ने त्रिवर्ग और शासन-विद्या पर एक विशाल ग्रन्थ रचा। शिव, इन्द्र, बृहस्पति और काव्य (शुक्र) ने क्रम से उसका संक्षेप किया, और विष्णु की रची परम्परा से दुष्ट वेन उत्पन्न हुआ। ऋषियों द्वारा वेन के नाश के बाद उसके पुत्र पृथु का अभिषेक प्रथम राजा के रूप में हुआ; उसने पृथ्वी को समतल किया, सब ओर से धन पाया, और माना गया कि राजा में विष्णु का वास होता है, इसीलिए संसार उसके आगे देवता के समान झुकता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.58.1)
ततः कल्यं समुत्थाय कृतपूर्वाह्णिकक्रियाः । ययुस्ते नगराकारैः रथैः पाण्डवयादवाः ॥
tataḥ kalyaṃ samutthāya kṛtapūrvāhṇikakriyāḥ | yayuste nagarākāraiḥ rathaiḥ pāṇḍavayādavāḥ
वैशम्पायन ने कहा — प्रातःकाल उठकर और प्रातःकाल के नित्यकर्म पूरे करके पाण्डव और यादव नगरों जैसे विशाल रथों में चल पड़े।
श्लोक 2 (12.58.2)
प्रतिपद्य कुरुक्षेत्रं भीष्ममासाद्य चानघम् । सुखां च रजनीं पृष्ट्वा गाङ्गेयं रथिनां वरम् ॥
pratipadya kurukṣetraṃ bhīṣmamāsādya cānagham | sukhāṃ ca rajanīṃ pṛṣṭvā gāṅgeyaṃ rathināṃ varam
कुरुक्षेत्र पहुँचकर वे निष्कलंक भीष्म के पास गए, जो गंगापुत्र और रथियों में श्रेष्ठ थे, और उनसे पूछा कि उनकी रात सुख से बीती या नहीं।
श्लोक 3 (12.58.3)
व्यासादीनभिवाद्यर्षीन्सर्वैस्तैश्चाभिनन्दिताः । निषेदुरभितो भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥
vyāsādīnabhivādyarṣīnsarvaistaiścābhinanditāḥ | niṣedurabhito bhīṣmaṃ parivārya samantataḥ
व्यास आदि ऋषियों को प्रणाम करके और उन सबसे अभिनन्दित होकर वे भीष्म को चारों ओर से घेरकर बैठ गए।
श्लोक 4 (12.58.4)
ततो राजा महातेजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्भीष्मं प्रतिपूज्य यथाविधि ॥
tato rājā mahātejā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | abravītprāñjalirbhīṣmaṃ pratipūjya yathāvidhi
तब महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक भीष्म का सत्कार करके हाथ जोड़कर उनसे कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (12.58.5)
य एष राजन्राजेति शब्दश्चरति भारत । कथमेष समुत्पन्नस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
ya eṣa rājanrājeti śabdaścarati bhārata | kathameṣa samutpannastanme brūhi pitāmaha
युधिष्ठिर ने कहा — हे राजन्, हे भारत! संसार में जो यह 'राजा' शब्द चलता है, वह कैसे उत्पन्न हुआ? पितामह, यह मुझे बताइए।
श्लोक 6 (12.58.6)
तुल्यपाणिभुजग्रीवस्तुल्यबुद्धीन्द्रियात्मकः । तुल्यदुःखसुखात्मा च तुल्यपृष्ठमुखोदरः ॥
tulyapāṇibhujagrīvastulyabuddhīndriyātmakaḥ | tulyaduḥkhasukhātmā ca tulyapṛṣṭhamukhodaraḥ
वह हाथ, भुजा और गर्दन में दूसरों के समान है, बुद्धि और इन्द्रियों में समान है, दुःख-सुख के स्वभाव में समान है, और पीठ, मुख और पेट में भी समान है;
श्लोक 7 (12.58.7)
तुल्यशुक्रास्थिमज्जा च तुल्यमांसासृगेव च । निःश्वासोच्छ्वासतुल्यश्च तुल्यप्राणशरीरवान् ॥
tulyaśukrāsthimajjā ca tulyamāṃsāsṛgeva ca | niḥśvāsocchvāsatulyaśca tulyaprāṇaśarīravān
वीर्य, हड्डी और मज्जा में समान, मांस और रक्त में समान, श्वास लेने और छोड़ने में समान, तथा प्राण और शरीर में भी समान है;
श्लोक 8 (12.58.8)
समानजन्ममरणः समः सर्वैर्गुणैर्नृणाम् । विशिष्टबुद्धीञ्शूरांश्च कथमेकोऽधितिष्ठति ॥
samānajanmamaraṇaḥ samaḥ sarvairguṇairnṛṇām | viśiṣṭabuddhīñśūrāṃśca kathameko'dhitiṣṭhati
उसका जन्म और मरण दूसरों जैसा ही है, और मनुष्यों के सब गुणों में वह उनके समान है। फिर वह अकेला श्रेष्ठ बुद्धिवाले और शूरवीर मनुष्यों पर शासन कैसे करता है?
श्लोक 9 (12.58.9)
कथमेको महीं कृत्स्नां शूरवीरार्यसंकुलम् । रक्षत्यपि च लोकस्य प्रसादमभिवाञ्छति ॥
kathameko mahīṃ kṛtsnāṃ śūravīrāryasaṃkulam | rakṣatyapi ca lokasya prasādamabhivāñchati
वह अकेला शूरवीरों और श्रेष्ठजनों से भरी हुई समूची पृथ्वी की रक्षा कैसे करता है, और रक्षा करते हुए भी लोक की प्रसन्नता कैसे चाहता है?
श्लोक 10 (12.58.10)
एकस्य तु प्रसादेन कृत्स्नो लोकः प्रसीदति । व्याकुले चाकुलः सर्वो भवतीति विनिश्चयः ॥
ekasya tu prasādena kṛtsno lokaḥ prasīdati | vyākule cākulaḥ sarvo bhavatīti viniścayaḥ
एक की प्रसन्नता से सारा संसार प्रसन्न होता है, और उसके व्याकुल होने पर सब व्याकुल हो जाते हैं — यह निश्चय है।
श्लोक 11 (12.58.11)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तो हि भरतर्षभ । कृत्स्नं तन्मे यथातत्त्वं प्रब्रूहि वदतां वर ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tvatto hi bharatarṣabha | kṛtsnaṃ tanme yathātattvaṃ prabrūhi vadatāṃ vara
हे भरतश्रेष्ठ, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! मैं यह आपसे सुनना चाहता हूँ; यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताइए।
श्लोक 12 (12.58.12)
नैतत्कारणमत्यल्पं भविष्यति विशांपते । यदेकस्मिञ्जगत्सर्वं देववद्याति सन्नतिम् ॥
naitatkāraṇamatyalpaṃ bhaviṣyati viśāṃpate | yadekasmiñjagatsarvaṃ devavadyāti sannatim
हे प्रजापालक! यह कारण छोटा नहीं हो सकता कि सारा जगत् एक ही पुरुष के आगे देवता के समान झुकता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.58.13)
नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वमशेषतः । यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत् ॥
niyatastvaṃ naravyāghra śṛṇu sarvamaśeṣataḥ | yathā rājyaṃ samutpannamādau kṛtayuge'bhavat
भीष्म ने कहा — हे नरव्याघ्र! एकाग्र होकर सब कुछ पूरा सुनो कि आदि कृतयुग में राज्य कैसे उत्पन्न हुआ।
श्लोक 14 (12.58.14)
नैव राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥
naiva rājyaṃ na rājā''sīnna ca daṇḍo na dāṇḍikaḥ | dharmeṇaiva prajāḥ sarvā rakṣanti sma parasparam
तब न राज्य था, न राजा था, न दण्ड था और न दण्ड देनेवाला; सारी प्रजा केवल धर्म से ही एक-दूसरे की रक्षा करती थी।
श्लोक 15 (12.58.15)
पाल्यमानास्तथाऽन्योन्यं नरा धर्मेण भारत । दैन्यं परमुपाजग्मुस्ततस्तान्मोह आविशत् ॥
pālyamānāstathā'nyonyaṃ narā dharmeṇa bhārata | dainyaṃ paramupājagmustatastānmoha āviśat
हे भारत! इस प्रकार धर्म से एक-दूसरे का पालन करते हुए मनुष्य अत्यन्त खिन्नता को पहुँच गए, और तब उन पर मोह छा गया।
श्लोक 16 (12.58.16)
ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ । प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत् ॥
te mohavaśamāpannā manujā manujarṣabha | pratipattivimohācca dharmasteṣāmanīnaśat
हे नरश्रेष्ठ! मोह के वश में आए उन मनुष्यों का विवेक भ्रमित हो गया, और इससे उनका धर्म नष्ट हो गया।
श्लोक 17 (12.58.17)
नष्टायां प्रतिपत्तौ च मोहवश्या नरास्तदा । लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥
naṣṭāyāṃ pratipattau ca mohavaśyā narāstadā | lobhasya vaśamāpannāḥ sarve bharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ! विवेक के नष्ट हो जाने पर मोह के वश में पड़े वे सब मनुष्य लोभ के वश में आ गए।
श्लोक 18 (12.58.18)
अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः । कामो नामापरस्तत्र प्रत्यपद्यत वै प्रभो ॥
aprāptasyābhimarśaṃ tu kurvanto manujāstataḥ | kāmo nāmāparastatra pratyapadyata vai prabho
हे प्रभो! तब अप्राप्त वस्तु को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाते हुए उन मनुष्यों में 'काम' नाम का एक और दोष उत्पन्न हो गया।
श्लोक 19 (12.58.19)
तांस्तु कामवशं प्राप्तान्रागो नामाभिसंस्पृशत् । रक्ताश्च नाभ्यजानन्त कार्याकार्ये युधिष्ठिर ॥
tāṃstu kāmavaśaṃ prāptānrāgo nāmābhisaṃspṛśat | raktāśca nābhyajānanta kāryākārye yudhiṣṭhira
काम के वश में आए उन लोगों को 'राग' ने जकड़ लिया। हे युधिष्ठिर! राग में रँगे वे कर्तव्य और अकर्तव्य को नहीं पहचानते थे।
श्लोक 20 (12.58.20)
अगम्यागमनं चैव वाच्यावाच्यं तथैव च । भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ॥
agamyāgamanaṃ caiva vācyāvācyaṃ tathaiva ca | bhakṣyābhakṣyaṃ ca rājendra doṣādoṣaṃ ca nātyajan
हे राजेन्द्र! वे अगम्य के पास जाने लगे, न कहने योग्य बात कहने लगे, अभक्ष्य खाने लगे, और दोषयुक्त तथा निर्दोष दोनों को समान रूप से अपनाने लगे।
श्लोक 21 (12.58.21)
विप्लुते नरलोकेऽस्मिंस्ततो ब्रह्म ननाश ह । नाशाच्च ब्रह्मणो राजन्धर्मो नाशमथागमत् ॥
viplute naraloke'smiṃstato brahma nanāśa ha | nāśācca brahmaṇo rājandharmo nāśamathāgamat
जब यह मनुष्य-लोक इस प्रकार अस्त-व्यस्त हो गया, तब वेद नष्ट हो गया; और हे राजन्! वेद के नाश से धर्म भी नाश को प्राप्त हुआ।
श्लोक 22 (12.58.22)
नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवास्त्रासमथागमन् । ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
naṣṭe brahmaṇi dharme ca devāstrāsamathāgaman | te trastā naraśārdūla brahmāṇaṃ śaraṇaṃ yayuḥ
वेद और धर्म के नष्ट हो जाने पर देवता भयभीत हो गए। हे नरशार्दूल! भयभीत होकर वे ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 23 (12.58.23)
प्रपद्य भगवन्तं ते देवं लोकपितामहम् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःखवेगसमाहताः ॥
prapadya bhagavantaṃ te devaṃ lokapitāmaham | ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve duḥkhavegasamāhatāḥ
लोकों के पितामह भगवान् ब्रह्मा की शरण में जाकर वे सब दुःख के वेग से आहत होकर हाथ जोड़कर बोले।
देवा ऊचुः
श्लोक 24 (12.58.24)
भगवन्नरलोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् । लोभमोहादिभिर्भावैस्ततो नो भयमाविशत् ॥
bhagavannaralokasthaṃ grastaṃ brahma sanātanam | lobhamohādibhirbhāvaistato no bhayamāviśat
देवता बोले — हे भगवन्! मनुष्य-लोक में स्थित सनातन वेद को लोभ, मोह आदि भावों ने ग्रस लिया है, इसलिए हमारे मन में भय समा गया है।
श्लोक 25 (12.58.25)
ब्रह्मणश्च प्रणाशेन धर्मो व्यनशदीश्चर । ततस्तु समतां याता मर्त्यैस्त्रिभुवनेश्वराः ॥
brahmaṇaśca praṇāśena dharmo vyanaśadīścara | tatastu samatāṃ yātā martyaistribhuvaneśvarāḥ
हे ईश्वर! वेद के नष्ट हो जाने से धर्म भी नष्ट हो गया; और हे तीनों लोकों के स्वामी! तब हम मरणशील मनुष्यों के बराबर हो गए हैं।
श्लोक 26 (12.58.26)
अधोऽभिवर्षास्तु वयं भौमास्तूर्ध्वप्रवर्षिणः । क्रियाव्युपरमात्तेषां ततोऽगच्छाम संशयम् ॥
adho'bhivarṣāstu vayaṃ bhaumāstūrdhvapravarṣiṇaḥ | kriyāvyuparamātteṣāṃ tato'gacchāma saṃśayam
हम नीचे की ओर वर्षा करनेवाले हैं और पृथ्वी के लोग ऊपर की ओर वर्षा करनेवाले हैं; उनकी क्रियाओं के बन्द हो जाने से हम संशय में पड़ गए हैं।
श्लोक 27 (12.58.27)
अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद्ध्यायस्व पितामह । त्वत्प्रसादात्समुत्थोऽसौ प्रभावो नो भवत्वयम् ॥
atra niḥśreyasaṃ yannastaddhyāyasva pitāmaha | tvatprasādātsamuttho'sau prabhāvo no bhavatvayam
हे पितामह! इस विषय में हमारा जो कल्याण है, उस पर विचार कीजिए। आपकी कृपा से उत्पन्न हुआ यह हमारा प्रभाव बना रहे।
भीष्म उवाच
श्लोक 28 (12.58.28)
तानुवाच सुरान्सर्वान्स्वयंभूर्भगवांस्ततः । श्रेयोऽहं चिन्तयिष्यामि व्येतु वो भीः सुरोत्तमाः ॥
tānuvāca surānsarvānsvayaṃbhūrbhagavāṃstataḥ | śreyo'haṃ cintayiṣyāmi vyetu vo bhīḥ surottamāḥ
तब भगवान् स्वयंभू ने उन सब देवताओं से कहा — "मैं कल्याण का उपाय सोचूँगा; हे देवश्रेष्ठो! तुम्हारा भय दूर हो।"
श्लोक 29 (12.58.29)
ततोऽध्यायसहस्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम् । यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवानुवर्णितः ॥
tato'dhyāyasahasrāṇāṃ śataṃ cakre svabuddhijam | yatra dharmastathaivārthaḥ kāmaścaivānuvarṇitaḥ
तब उन्होंने अपनी बुद्धि से एक लाख अध्यायों का एक ग्रन्थ रचा, जिसमें धर्म, अर्थ और काम का वर्णन किया गया।
श्लोक 30 (12.58.30)
त्रिवर्ग इति विख्यातो गण एव स्वयंभुवा । चतुर्थो मोक्ष इत्येव पृथगर्थः पृथग्गुणः ॥
trivarga iti vikhyāto gaṇa eva svayaṃbhuvā | caturtho mokṣa ityeva pṛthagarthaḥ pṛthagguṇaḥ
स्वयंभू के रचे इस समूह को 'त्रिवर्ग' कहा जाता है; चौथा मोक्ष है, जिसका प्रयोजन और स्वरूप अलग है।
श्लोक 31 (12.58.31)
मोक्षस्यास्ति त्रिवर्गोऽन्यः प्रोक्तः सत्वं रजस्तमः । स्थानं वृद्धिः क्षयश्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डजः ॥
mokṣasyāsti trivargo'nyaḥ proktaḥ satvaṃ rajastamaḥ | sthānaṃ vṛddhiḥ kṣayaścaiva trivargaścaiva daṇḍajaḥ
मोक्ष का भी एक और त्रिवर्ग कहा गया है — सत्त्व, रजस् और तमस्; और दण्ड से उत्पन्न त्रिवर्ग है — स्थिति, वृद्धि और क्षय।
श्लोक 32 (12.58.32)
आत्मादेशश्च कालश्चाप्युपायाः कृत्यमेव च । सहायाः कारणं चैव षड्वर्गो नीतिजः स्मृतः ॥
ātmādeśaśca kālaścāpyupāyāḥ kṛtyameva ca | sahāyāḥ kāraṇaṃ caiva ṣaḍvargo nītijaḥ smṛtaḥ
आत्मा, देश, काल, उपाय, कृत्य, सहाय और कारण — यह नीति से उत्पन्न 'षड्वर्ग' कहा गया है।
श्लोक 33 (12.58.33)
त्रयी चान्वीक्षिकी चैव वार्ता च भरतर्षभ । दण्डनीतिश्च विपुला विद्यास्तत्र निदर्शिताः ॥
trayī cānvīkṣikī caiva vārtā ca bharatarṣabha | daṇḍanītiśca vipulā vidyāstatra nidarśitāḥ
हे भरतश्रेष्ठ! त्रयी, आन्वीक्षिकी, वार्ता और विस्तृत दण्डनीति — ये विद्याएँ उसमें बताई गई हैं।
श्लोक 34 (12.58.34)
अमात्यलिप्सा प्रणिधी राजपुत्रस्य लक्षणम् । चारश्च विविधोपायः प्रणिधिश्च पृथग्विधः ॥
amātyalipsā praṇidhī rājaputrasya lakṣaṇam | cāraśca vividhopāyaḥ praṇidhiśca pṛthagvidhaḥ
अमात्यों की प्राप्ति, दो प्रकार के प्रणिधि, राजपुत्र के लक्षण, अनेक उपायोंवाले गुप्तचर और भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रणिधि भी उसमें हैं।
श्लोक 35 (12.58.35)
सामभेदः प्रदानं च ततो दण्डश्च पार्थिव । उपेक्षा पञ्चमी चात्र कार्त्स्न्येन समुदाहृता ॥
sāmabhedaḥ pradānaṃ ca tato daṇḍaśca pārthiva | upekṣā pañcamī cātra kārtsnyena samudāhṛtā
हे राजन्! साम, भेद, दान और फिर दण्ड, तथा पाँचवीं उपेक्षा — ये सब पूरी तरह उसमें कहे गए हैं।
श्लोक 36 (12.58.36)
मन्त्रश्च वर्णितः कृत्स्नो मन्त्रभेदार्थ एव च । विभ्रमश्चैव मन्त्रस्य सिद्ध्यसिद्ध्योश्च यत्फलम् ॥
mantraśca varṇitaḥ kṛtsno mantrabhedārtha eva ca | vibhramaścaiva mantrasya siddhyasiddhyośca yatphalam
मन्त्र का पूरा वर्णन है, साथ ही मन्त्र के भेद (प्रकट हो जाने) का प्रयोजन, मन्त्र का विभ्रम, और उसकी सिद्धि-असिद्धि का फल भी।
श्लोक 37 (12.58.37)
संधिश्च त्रिविधाभिख्यो हीनो मध्यस्तथोत्तमः । भयसत्कारवित्ताख्यं कार्त्स्न्येन परिवर्णितम् ॥
saṃdhiśca trividhābhikhyo hīno madhyastathottamaḥ | bhayasatkāravittākhyaṃ kārtsnyena parivarṇitam
सन्धि तीन प्रकार की बताई गई है — हीन, मध्यम और उत्तम — जो भय, सत्कार और धन के नाम से जानी जाती हैं; इसका पूरा वर्णन है।
श्लोक 38 (12.58.38)
यात्राकालाश्च चत्वारस्त्रिवर्गस्य च विस्तरः । विजयो धर्मयुक्तश्च तथार्थविजयश्च ह ॥
yātrākālāśca catvārastrivargasya ca vistaraḥ | vijayo dharmayuktaśca tathārthavijayaśca ha
यात्रा के चार काल, त्रिवर्ग का विस्तार, धर्मयुक्त विजय और अर्थ के लिए विजय,
श्लोक 39 (12.58.39)
आसुरश्चैव विजयः कार्त्स्न्येन परिवर्णितः । लक्षणं पञ्चवर्गस्य त्रिविधं चात्र वर्णितम् ॥
āsuraścaiva vijayaḥ kārtsnyena parivarṇitaḥ | lakṣaṇaṃ pañcavargasya trividhaṃ cātra varṇitam
और आसुरी विजय — इन सबका पूरा वर्णन है। पञ्चवर्ग का लक्षण भी यहाँ तीन प्रकार का बताया गया है।
श्लोक 40 (12.58.40)
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च दण्डोऽथ परिशब्दितः । प्रकाशोऽष्टविधस्तत्र गुह्यश्च बहुविस्तरः ॥
prakāśaścāprakāśaśca daṇḍo'tha pariśabditaḥ | prakāśo'ṣṭavidhastatra guhyaśca bahuvistaraḥ
दण्ड (बल) प्रकाश और अप्रकाश दो प्रकार का कहा गया है; प्रकाश आठ प्रकार का है, और गुप्त के बहुत विस्तार हैं।
श्लोक 41 (12.58.41)
रथा नागा हयाश्चैव पादाताश्चैव पाण्डव । विष्टिर्नावश्चराश्चैव देशिका इति चाष्टमः । अङ्गान्येतानि कौरव्य प्रकाशानि बलस्य तु ॥
rathā nāgā hayāścaiva pādātāścaiva pāṇḍava | viṣṭirnāvaścarāścaiva deśikā iti cāṣṭamaḥ | aṅgānyetāni kauravya prakāśāni balasya tu
हे पाण्डव! रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक; बोझ ढोनेवाले, नावें, चर (गुप्तचर) और आठवें मार्गदर्शक — हे कौरव्य! ये सेना के प्रकट अंग हैं।
श्लोक 42 (12.58.42)
जङ्गमाजङ्गमाश्चोक्ताश्चूर्णयोगा विषादयः । स्पर्शे चाभ्यवहार्ये चाप्युपांशुर्विविधः स्मृतः ॥
jaṅgamājaṅgamāścoktāścūrṇayogā viṣādayaḥ | sparśe cābhyavahārye cāpyupāṃśurvividhaḥ smṛtaḥ
जंगम और अजंगम विष, चूर्ण-योग और विष आदि कहे गए हैं; स्पर्श से और खाने-पीने की वस्तुओं के द्वारा होनेवाला गुप्त प्रयोग अनेक प्रकार का माना गया है।
श्लोक 43 (12.58.43)
क्रीडापूर्वे रणे द्यूते विस्रम्भणसमन्वितम् । उक्तं कैतव्यमित्येतदुपायो नवमो बुधैः ॥
krīḍāpūrve raṇe dyūte visrambhaṇasamanvitam | uktaṃ kaitavyamityetadupāyo navamo budhaiḥ
खेल में, रण में और द्यूत में विश्वास जमाकर किया जानेवाला छल 'कैतव्य' कहा गया है; ज्ञानियों ने इसे नौवाँ उपाय माना है।
श्लोक 44 (12.58.44)
उपेक्षा सर्वकार्येषु कर्मणां करणेषु च । अनिष्टानां समुत्थाने त्रिवर्गो नश्यते यया ॥
upekṣā sarvakāryeṣu karmaṇāṃ karaṇeṣu ca | aniṣṭānāṃ samutthāne trivargo naśyate yayā
सब कार्यों में और कर्म के साधनों में उपेक्षा, तथा अनिष्टों के उठ खड़े होने पर उपेक्षा — जिससे त्रिवर्ग नष्ट हो जाता है।
श्लोक 45 (12.58.45)
इन्द्रजालादिका माया वाग्जीवनकुशीलवैः । सुनिमित्तैर्दुर्निमित्तैरुत्पातैश्च समन्वितम् ॥
indrajālādikā māyā vāgjīvanakuśīlavaiḥ | sunimittairdurnimittairutpātaiśca samanvitam
इन्द्रजाल आदि माया, जो वाणी से जीविका चलानेवाले नटों द्वारा की जाती है, तथा शुभ और अशुभ शकुन और उत्पात भी।
श्लोक 46 (12.58.46)
डम्भो लिङ्गं समाश्रित्य शत्रुवर्गे प्रयुज्यते । शाठ्यं निश्चेष्टता प्रोक्ता चित्तदोषप्रदूषिका ॥
ḍambho liṅgaṃ samāśritya śatruvarge prayujyate | śāṭhyaṃ niśceṣṭatā proktā cittadoṣapradūṣikā
दम्भ, जो धर्म का चिह्न धारण करके शत्रुपक्ष पर प्रयुक्त किया जाता है; और शाठ्य, जिसे निश्चेष्टता कहा गया है और जो चित्त के दोषों से दूषित करती है।
श्लोक 47 (12.58.47)
अरिर्मित्र उदासीन इत्येतेऽप्यनुवर्णिताः । कृत्स्ना मार्गगुणाश्चैव तथा भूमिगुणाश्च ह । आत्मरक्षणमाश्वासः स्पर्शानां चान्ववेक्षणम् ॥
arirmitra udāsīna ityete'pyanuvarṇitāḥ | kṛtsnā mārgaguṇāścaiva tathā bhūmiguṇāśca ha | ātmarakṣaṇamāśvāsaḥ sparśānāṃ cānvavekṣaṇam
शत्रु, मित्र और उदासीन का भी वर्णन है; मार्गों के सब गुण और भूमि के गुण; आत्मरक्षा, आश्वासन, और स्पर्शों पर निगरानी।
श्लोक 48 (12.58.48)
कल्पना विविधाश्चापि नृनागरथवाजिनाम् । व्यूहाश्च विविधाभिख्या विचित्रं युद्धकौशलम् ॥
kalpanā vividhāścāpi nṛnāgarathavājinām | vyūhāśca vividhābhikhyā vicitraṃ yuddhakauśalam
मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ों की अनेक प्रकार की रचनाएँ; अनेक नामोंवाले व्यूह; और युद्ध का विचित्र कौशल।
श्लोक 49 (12.58.49)
उत्पाताश्च निपाताश्च सुयुद्धं सुपलायितम् । शस्त्राणां पालनं ज्ञानं तथैव भरतर्षभ ॥
utpātāśca nipātāśca suyuddhaṃ supalāyitam | śastrāṇāṃ pālanaṃ jñānaṃ tathaiva bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! उत्पात और निपात, भली-भाँति लड़ना और भली-भाँति पीछे हटना, तथा शस्त्रों की देखभाल और उनका ज्ञान।
श्लोक 50 (12.58.50)
बलव्यसनयुक्तं च तथैव बलहर्षणम् । पीडा चापदकालश्च भयकालश्च पाण्डव ॥
balavyasanayuktaṃ ca tathaiva balaharṣaṇam | pīḍā cāpadakālaśca bhayakālaśca pāṇḍava
हे पाण्डव! सेना की विपत्ति से युक्त स्थिति और सेना को हर्षित करना; पीड़ा, आपत्ति का समय और भय का समय।
श्लोक 51 (12.58.51)
तथाख्यातविधानं च योगः संचार एव च । चोरैराटविकैश्चोग्रैः परराष्ट्रस्य पीडनम् ॥
tathākhyātavidhānaṃ ca yogaḥ saṃcāra eva ca | corairāṭavikaiścograiḥ pararāṣṭrasya pīḍanam
कहे गए विधान, योग और संचार; तथा चोरों, जंगली जातियों और उग्र पुरुषों द्वारा शत्रु के राष्ट्र को पीड़ित करना,
श्लोक 52 (12.58.52)
अग्निदैर्गरदैश्चैव प्रतिरूपककारकैः । श्रेणिमुख्योपजापेन वीरुधश्छेदनेन च ॥
agnidairgaradaiścaiva pratirūpakakārakaiḥ | śreṇimukhyopajāpena vīrudhaśchedanena ca
आग लगानेवालों और विष देनेवालों द्वारा, नकली प्रतिमा बनानेवालों द्वारा, श्रेणियों के मुखियों में फूट डालकर और लताओं-वनस्पतियों को कटवाकर,
श्लोक 53 (12.58.53)
दूषणेन च नागानामातङ्कजननेन च । आराधनेन भक्तस्य पत्युश्चोपग्रहेण च ॥
dūṣaṇena ca nāgānāmātaṅkajananena ca | ārādhanena bhaktasya patyuścopagraheṇa ca
हाथियों को दूषित करके और आतंक फैलाकर, भक्त की आराधना करके और स्वामी को अपने पक्ष में करके।
श्लोक 54 (12.58.54)
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमीक्षणम् । दूतसामर्थ्ययोगश्च राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ॥
saptāṅgasya ca rājyasya hrāsavṛddhisamīkṣaṇam | dūtasāmarthyayogaśca rāṣṭrasya ca vivardhanam
सात अंगोंवाले राज्य की ह्रास-वृद्धि का निरीक्षण, दूत की सामर्थ्य का उपयोग और राष्ट्र की वृद्धि।
श्लोक 55 (12.58.55)
अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक्चोक्तं प्रपञ्चनम् । अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम् ॥
arimadhyasthamitrāṇāṃ samyakcoktaṃ prapañcanam | avamardaḥ pratīghātastathaiva ca balīyasām
शत्रु, मध्यस्थ और मित्र का भली-भाँति कहा गया विस्तार; और अधिक बलवानों को कुचलना तथा रोकना।
श्लोक 56 (12.58.56)
व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् । श्रमो व्यायामयोगश्च योगद्रव्यस्य सञ्चयः ॥
vyavahāraḥ susūkṣmaśca tathā kaṇṭakaśodhanam | śramo vyāyāmayogaśca yogadravyasya sañcayaḥ
व्यवहार, जो अत्यन्त सूक्ष्म है; कण्टक-शोधन; श्रम और व्यायाम का अभ्यास; और काम आनेवाली सामग्री का संचय।
श्लोक 57 (12.58.57)
अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् । अन्तकाले प्रदानं च व्यसने चाप्रसङ्गिता ॥
abhṛtānāṃ ca bharaṇaṃ bhṛtānāṃ cānvavekṣaṇam | antakāle pradānaṃ ca vyasane cāprasaṅgitā
जिनका भरण नहीं हुआ उनका भरण, जिनका भरण हो चुका उनकी देखरेख, अन्त के समय दान, और व्यसनों में आसक्त न होना।
श्लोक 58 (12.58.58)
तथा राजगुणाश्चैव सेनापतिगुणाश्च ह । करणस्य च कर्तुश्च गुणदोषास्तथैव च ॥
tathā rājaguṇāścaiva senāpatiguṇāśca ha | karaṇasya ca kartuśca guṇadoṣāstathaiva ca
राजा के गुण और सेनापति के गुण, तथा कार्य के साधन और कर्ता के गुण-दोष भी।
श्लोक 59 (12.58.59)
दुष्टेङ्गितं च विविधं वृत्तिश्चैवानुवर्तिनाम् । शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ॥
duṣṭeṅgitaṃ ca vividhaṃ vṛttiścaivānuvartinām | śaṅkitatvaṃ ca sarvasya pramādasya ca varjanam
अनेक प्रकार की दुष्ट चेष्टाएँ, आश्रितों का व्यवहार, सब पर शंका रखना और प्रमाद का त्याग।
श्लोक 60 (12.58.60)
अलब्धलिप्सा लब्धस्य तथैव च विवर्धनम् । प्रदानं च विवृद्धस्य पात्रेभ्यो विधिवत्तथा ॥
alabdhalipsā labdhasya tathaiva ca vivardhanam | pradānaṃ ca vivṛddhasya pātrebhyo vidhivattathā
जो नहीं मिला उसे पाने की इच्छा, जो मिला उसकी वृद्धि, और बढ़े हुए धन का पात्रों को विधिपूर्वक दान।
श्लोक 61 (12.58.61)
विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थमर्थार्थं कामहेतुकम् । चतुर्थं व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितम् ॥
visargo'rthasya dharmārthamarthārthaṃ kāmahetukam | caturthaṃ vyasanāghāte tathaivātrānuvarṇitam
धर्म के लिए, अर्थ के लिए और काम के लिए धन का व्यय, और चौथा विपत्ति आ पड़ने पर — ऐसा यहाँ वर्णित है।
श्लोक 62 (12.58.62)
क्रोधजानि ततोग्राणि कामजानि तथैव च । दशोक्तानि कुरुश्रेष्ठ व्यसनान्यत्र चैव ह ॥
krodhajāni tatogrāṇi kāmajāni tathaiva ca | daśoktāni kuruśreṣṭha vyasanānyatra caiva ha
हे कुरुश्रेष्ठ! यहाँ क्रोध से उत्पन्न और काम से उत्पन्न दस उग्र व्यसन भी बताए गए हैं।
श्लोक 63 (12.58.63)
मृगयाक्षास्तथा पानं स्त्रियश्च भरतर्षभ । कामजान्याहुराचार्याः प्रोक्तानीह स्वयंभुवा ॥
mṛgayākṣāstathā pānaṃ striyaśca bharatarṣabha | kāmajānyāhurācāryāḥ proktānīha svayaṃbhuvā
हे भरतश्रेष्ठ! शिकार, जुआ, मद्यपान और स्त्रियाँ — इन्हें आचार्य कामज (व्यसन) कहते हैं; इन्हें स्वयंभू ने यहाँ कहा है।
श्लोक 64 (12.58.64)
वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च । आत्मनो निग्रहस्त्यागो ह्यर्थदूषणमेव च ॥
vākpāruṣyaṃ tathogratvaṃ daṇḍapāruṣyameva ca | ātmano nigrahastyāgo hyarthadūṣaṇameva ca
कटु वचन, उग्रता, कठोर दण्ड, आत्म-निग्रह, त्याग और धन की हानि।
श्लोक 65 (12.58.65)
यन्त्राणि विविधान्येव क्रियास्तेषां च वर्णिताः । अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ॥
yantrāṇi vividhānyeva kriyāsteṣāṃ ca varṇitāḥ | avamardaḥ pratīghātaḥ ketanānāṃ ca bhañjanam
अनेक प्रकार के यन्त्र और उनके प्रयोग बताए गए हैं; कुचलना, रोकना और ध्वजाओं को तोड़ना भी।
श्लोक 66 (12.58.66)
चैत्यद्रुमावमर्दश्च रोधः कर्मान्तनाशनम् । अपस्करोऽथ वमनं तथोपास्या च वर्णिता ॥
caityadrumāvamardaśca rodhaḥ karmāntanāśanam | apaskaro'tha vamanaṃ tathopāsyā ca varṇitā
पूज्य वृक्षों को कुचलना, घेराबन्दी, शत्रु के कार्यस्थलों का नाश, हटाना, निकाल देना और उपासना का भी वर्णन है।
श्लोक 67 (12.58.67)
पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधिष्ठिर । उपार्जनं च द्रव्याणां परमर्म च तानि षट् ॥
paṇavānakaśaṅkhānāṃ bherīṇāṃ ca yudhiṣṭhira | upārjanaṃ ca dravyāṇāṃ paramarma ca tāni ṣaṭ
हे युधिष्ठिर! पणव, आनक, शंख और भेरियाँ; द्रव्यों का संग्रह और शत्रु के मर्म-स्थल — ये छः हैं।
श्लोक 68 (12.58.68)
लब्धस्य च प्रशमनं सतां चैवाभिपूजनम् । विद्वद्भिरेकीभावश्च जपहोमविधिज्ञता ॥
labdhasya ca praśamanaṃ satāṃ caivābhipūjanam | vidvadbhirekībhāvaśca japahomavidhijñatā
प्राप्त वस्तु का शमन, सज्जनों का आदर, विद्वानों से मेल, और जप तथा होम की विधि का ज्ञान।
श्लोक 69 (12.58.69)
मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया । आहारयोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ॥
maṅgalālambhanaṃ caiva śarīrasya pratikriyā | āhārayojanaṃ caiva nityamāstikyameva ca
माङ्गलिक वस्तुओं का स्पर्श, शरीर की देखभाल, आहार की योजना और नित्य आस्तिकता।
श्लोक 70 (12.58.70)
एकेन च यथोत्थेयं सत्यत्वं मधुरा गिरः । उत्तमानां समाजानां क्रियाः केतनजास्तथा ॥
ekena ca yathottheyaṃ satyatvaṃ madhurā giraḥ | uttamānāṃ samājānāṃ kriyāḥ ketanajāstathā
अकेले मनुष्य को भी कैसे उठकर कर्म में लगना चाहिए, सत्य, मधुर वाणी, श्रेष्ठ सभाओं की क्रियाएँ और गृह-सम्बन्धी क्रियाएँ।
श्लोक 71 (12.58.71)
प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च सर्वाधिकरणेष्वथ । वृत्तेर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्ववेक्षणम् ॥
pratyakṣāśca parokṣāśca sarvādhikaraṇeṣvatha | vṛtterbharataśārdūla nityaṃ caivānvavekṣaṇam
सब सभा-स्थानों में प्रत्यक्ष और परोक्ष निरीक्षण, और हे भरतशार्दूल! आचरण पर सदा निगरानी।
श्लोक 72 (12.58.72)
अदण्ड्यत्वं च विप्राणां युक्त्या दण्डनिपातनम् । अनुजीवि स्वजातिभ्यो गुणेभ्यश्च समुद्भवः ॥
adaṇḍyatvaṃ ca viprāṇāṃ yuktyā daṇḍanipātanam | anujīvi svajātibhyo guṇebhyaśca samudbhavaḥ
ब्राह्मणों का अदण्ड्य होना, युक्ति से दण्ड देना, और आश्रित का अपनी जाति और गुणों के अनुसार मान।
श्लोक 73 (12.58.73)
रक्षणं चैव पौराणां राष्ट्रस्य च विवर्धनम् । मण्डलस्था च या चिन्ता राजन्द्वादशराजिका ॥
rakṣaṇaṃ caiva paurāṇāṃ rāṣṭrasya ca vivardhanam | maṇḍalasthā ca yā cintā rājandvādaśarājikā
नगरवासियों की रक्षा और राष्ट्र की वृद्धि; और हे राजन्! मण्डल में स्थित बारह राजाओं का जो विचार है, वह भी।
श्लोक 74 (12.58.74)
द्विसप्ततिमतिश्चैव प्रोक्ता या च स्वयंभुवा । देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ॥
dvisaptatimatiścaiva proktā yā ca svayaṃbhuvā | deśajātikulānāṃ ca dharmāḥ samanuvarṇitāḥ
स्वयंभू द्वारा कही गई बहत्तर प्रकार की मति भी दी गई है, और देशों, जातियों और कुलों के धर्म भी भली-भाँति बताए गए हैं।
श्लोक 75 (12.58.75)
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णिताः । उपायाश्चार्थलिप्सा च विविधा भूरिदक्षिणः ॥
dharmaścārthaśca kāmaśca mokṣaścātrānuvarṇitāḥ | upāyāścārthalipsā ca vividhā bhūridakṣiṇaḥ
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वहाँ वर्णन है; और हे भूरिदक्षिण! उपाय तथा अनेक प्रकार की अर्थ-लिप्सा भी।
श्लोक 76 (12.58.76)
मूलकर्मक्रिया चात्र मायायोगश्च वर्णितः । दूषणं स्रोतसां चैव वर्णितं च स्थिराम्भसाम् ॥
mūlakarmakriyā cātra māyāyogaśca varṇitaḥ | dūṣaṇaṃ srotasāṃ caiva varṇitaṃ ca sthirāmbhasām
कोश बढ़ानेवाले मूलकर्मों, जैसे कृषि आदि, की विधि और माया-योग का वर्णन है; नदियों और ठहरे हुए जलों को दूषित करने का भी वर्णन है।
श्लोक 77 (12.58.77)
यैर्यैरुपायैर्लोकस्तु न चलेदार्यवर्त्मनः । तत्सर्वं राजशार्दूल नीतिशास्त्रेऽभिवर्णितम् ॥
yairyairupāyairlokastu na caledāryavartmanaḥ | tatsarvaṃ rājaśārdūla nītiśāstre'bhivarṇitam
जिन-जिन उपायों से लोक आर्यों के मार्ग से विचलित न हो, हे राजशार्दूल! वह सब नीतिशास्त्र में वर्णित है।
श्लोक 78 (12.58.78)
एतत्कृत्वा शुभं शास्त्रं ततः स भगवान्प्रभुः । देवानुवाच संहृष्टः सर्वाञ्छक्रपुरोगमान् ॥
etatkṛtvā śubhaṃ śāstraṃ tataḥ sa bhagavānprabhuḥ | devānuvāca saṃhṛṣṭaḥ sarvāñchakrapurogamān
इस मंगलकारी शास्त्र की रचना पूरी करके भगवान् प्रभु ने अत्यन्त प्रसन्न होकर इन्द्र आदि सब देवताओं से कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 79 (12.58.79)
उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च । नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरेषा प्रभाषिता ॥
upakārāya lokasya trivargasthāpanāya ca | navanītaṃ sarasvatyā buddhireṣā prabhāṣitā
"लोक के उपकार और धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन वर्गों की स्थापना के लिए यह बुद्धि कही गई है, जो सरस्वती से मथकर निकाले गए नवनीत के समान है।
श्लोक 80 (12.58.80)
दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका । निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥
daṇḍena sahitā hyeṣā lokarakṣaṇakārikā | nigrahānugraharatā lokānanucariṣyati
दण्ड से युक्त होकर यह नीति लोक की रक्षा करनेवाली है; निग्रह और अनुग्रह में तत्पर रहकर यह लोकों के साथ-साथ चलती रहेगी।
श्लोक 81 (12.58.81)
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः । दण्डनीतिरितिख्याता त्रीँल्लोकानवपत्स्यते ॥
daṇḍena nīyate cedaṃ daṇḍaṃ nayati vā punaḥ | daṇḍanītiritikhyātā trīm̐llokānavapatsyate
दण्ड के द्वारा यह जगत् चलाया जाता है और यह नीति दण्ड को भी चलाती है; इसीलिए यह दण्डनीति कहलाती है और तीनों लोकों में व्याप्त रहेगी।
श्लोक 82 (12.58.82)
षाङ्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु । धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शब्दिताः ॥
ṣāṅguṇyaguṇasāraiṣā sthāsyatyagre mahātmasu | dharmārthakāmamokṣāśca sakalā hyatra śabditāḥ
छह गुणों (उपायों) का सार लिये हुए यह नीति महात्माओं के बीच सबसे आगे स्थित रहेगी; और इसमें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सब कहे गए हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 83 (12.58.83)
ततस्तां भगवान्नीतिं पूर्वं जग्राह शंकरः । बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥
tatastāṃ bhagavānnītiṃ pūrvaṃ jagrāha śaṃkaraḥ | bahurūpo viśālākṣaḥ śivaḥ sthāṇurumāpatiḥ
तब भगवान् शंकर ने सबसे पहले उस नीति को ग्रहण किया; वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु और उमापति हैं।
श्लोक 84 (12.58.84)
अनादिनिधनो देवश्चैतन्यादिसमन्वितः । ज्ञानानि च वशे यस्य तारकादीन्यशेषतः ॥
anādinidhano devaścaitanyādisamanvitaḥ | jñānāni ca vaśe yasya tārakādīnyaśeṣataḥ
वे अनादि और अनन्त देव हैं, चैतन्य आदि से युक्त हैं, और तारक आदि सारे ज्ञान पूरी तरह उनके वश में हैं;
श्लोक 85 (12.58.85)
अणिमादिगुणोपेतमैश्वर्यं न च कृत्रिमम् । तुष्ट्यर्थं ब्रह्मणः पुत्रो ललाटादुत्थितः प्रभुः ॥
aṇimādiguṇopetamaiśvaryaṃ na ca kṛtrimam | tuṣṭyarthaṃ brahmaṇaḥ putro lalāṭādutthitaḥ prabhuḥ
वे अणिमा आदि गुणों से सम्पन्न हैं और उनका ऐश्वर्य कृत्रिम नहीं है। ब्रह्मा को सन्तुष्ट करने के लिए वे प्रभु उनके पुत्र रूप में उनके ललाट से प्रकट हुए।
श्लोक 86 (12.58.86)
अरुदत्सस्वनं घोरं जगतः प्रभुरव्ययः । जायमानः पिता पुत्रे पुत्रः पितरि चैव हि ॥
arudatsasvanaṃ ghoraṃ jagataḥ prabhuravyayaḥ | jāyamānaḥ pitā putre putraḥ pitari caiva hi
जन्म लेते समय उन अविनाशी जगत्प्रभु ने भयंकर स्वर में रुदन किया; उस समय पिता पुत्र में था और पुत्र पिता में।
श्लोक 87 (12.58.87)
बुद्धिं विश्वसृजे दत्त्वा ब्रह्माण्डं येन निर्मितम् । यस्मिन्हिरण्मयो हंसः शकुनिः समपद्यत ॥
buddhiṃ viśvasṛje dattvā brahmāṇḍaṃ yena nirmitam | yasminhiraṇmayo haṃsaḥ śakuniḥ samapadyata
उन्होंने विश्व के रचयिता को वह बुद्धि दी जिससे ब्रह्माण्ड बना; उसी ब्रह्माण्ड में स्वर्णमय हंस रूपी पक्षी उत्पन्न हुआ।
श्लोक 88 (12.58.88)
कर्ता सर्वस्य लोकस्य ब्रह्मा लोकपितामहः । स देवः सर्वभूतानां महादेवः सनातनः । असंख्यातसहस्राणां रुद्राणां स्थानमव्ययम् ॥
kartā sarvasya lokasya brahmā lokapitāmahaḥ | sa devaḥ sarvabhūtānāṃ mahādevaḥ sanātanaḥ | asaṃkhyātasahasrāṇāṃ rudrāṇāṃ sthānamavyayam
सारे लोक के कर्ता ब्रह्मा हैं, जो लोकों के पितामह हैं; और वे देव, सब प्राणियों के सनातन महादेव, असंख्य हज़ारों रुद्रों के अविनाशी आश्रय हैं।
श्लोक 89 (12.58.89)
युगानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवाञ्शिवः । संचिक्षेप ततः शास्त्रं महार्थं ब्रह्मणा कृतम् ॥
yugānāmāyuṣo hrāsaṃ vijñāya bhagavāñśivaḥ | saṃcikṣepa tataḥ śāstraṃ mahārthaṃ brahmaṇā kṛtam
युगों की आयु के क्षीण होने को जानकर भगवान् शिव ने ब्रह्मा के रचे हुए उस महान् अर्थवाले शास्त्र को संक्षिप्त कर दिया।
श्लोक 90 (12.58.90)
वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत । दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥
vaiśālākṣamiti proktaṃ tadindraḥ pratyapadyata | daśādhyāyasahasrāṇi subrahmaṇyo mahātapāḥ
वह संक्षेप, जो वैशालाक्ष कहलाता है और दस हज़ार अध्यायों का है, महातपस्वी सुब्रह्मण्य इन्द्र ने प्राप्त किया।
श्लोक 91 (12.58.91)
मघवानपि तच्छास्त्रं देवात्प्राप्य महेश्वरात् । प्रजानां हितमन्विच्छन्संचिक्षेप पुरंदरः ॥
maghavānapi tacchāstraṃ devātprāpya maheśvarāt | prajānāṃ hitamanvicchansaṃcikṣepa puraṃdaraḥ
मघवा पुरन्दर ने भी देव महेश्वर से वह शास्त्र पाकर प्रजा का हित चाहते हुए उसे और संक्षिप्त किया।
श्लोक 92 (12.58.92)
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् । अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः । संचिक्षेपेश्वरो बुद्ध्या बार्हस्पत्यं यदुच्यते ॥
sahasraiḥ pañcabhistāta yaduktaṃ bāhudantakam | adhyāyānāṃ sahasraistu tribhireva bṛhaspatiḥ | saṃcikṣepeśvaro buddhyā bārhaspatyaṃ yaducyate
हे तात, पाँच हज़ार अध्यायों का वह संक्षेप बाहुदन्तक कहा जाता है; और ईश्वर बृहस्पति ने अपनी बुद्धि से उसे केवल तीन हज़ार अध्यायों में संक्षिप्त किया, जो बार्हस्पत्य कहलाता है।
श्लोक 93 (12.58.93)
अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् । तच्छास्त्रममितप्रज्ञो योगाचार्यो महायशाः ॥
adhyāyānāṃ sahasreṇa kāvyaḥ saṃkṣepamabravīt | tacchāstramamitaprajño yogācāryo mahāyaśāḥ
अपार प्रज्ञावाले, महायशस्वी योगाचार्य काव्य (शुक्र) ने उस शास्त्र का संक्षेप एक हज़ार अध्यायों में कहा।
श्लोक 94 (12.58.94)
एवं लोकानुरोधेन शास्त्रमेतन्महर्षिभिः । संक्षिप्तमायुर्विज्ञाय लोकानां ह्रासि पाण्डव ॥
evaṃ lokānurodhena śāstrametanmaharṣibhiḥ | saṃkṣiptamāyurvijñāya lokānāṃ hrāsi pāṇḍava
इस प्रकार, हे पाण्डव, लोगों की आयु घटती जानकर महर्षियों ने लोक के अनुरोध से इस शास्त्र को संक्षिप्त कर दिया।
श्लोक 95 (12.58.95)
अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् । एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥
atha devāḥ samāgamya viṣṇumūcuḥ prajāpatim | eko yo'rhati martyebhyaḥ śraiṣṭhyaṃ vai taṃ samādiśa
तब देवताओं ने एकत्र होकर प्रजापति विष्णु से कहा, "मनुष्यों में जो एक पुरुष श्रेष्ठता के योग्य हो, उसे आप नियुक्त कीजिए।"
श्लोक 96 (12.58.96)
ततः संचिन्त्य भगवान्देवो नारायणः प्रभुः । तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम् ॥
tataḥ saṃcintya bhagavāndevo nārāyaṇaḥ prabhuḥ | taijasaṃ vai virajasaṃ so'sṛjanmānasaṃ sutam
तब भगवान् देव नारायण प्रभु ने विचार करके अपने मन से एक तेजस्वी और रजोगुण से रहित पुत्र की सृष्टि की।
श्लोक 97 (12.58.97)
विरजास्तु महाभागः प्रभुत्वं भुवि नैच्छत । न्यासायैवाभवद्बुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ॥
virajāstu mahābhāgaḥ prabhutvaṃ bhuvi naicchata | nyāsāyaivābhavadbuddhiḥ praṇītā tasya pāṇḍava
परन्तु महाभाग विरज ने पृथ्वी पर प्रभुत्व नहीं चाहा; हे पाण्डव, उसकी बुद्धि संन्यास की ओर ही लगी थी।
श्लोक 98 (12.58.98)
कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत्सोऽपि मर्त्याधिकोऽभवत् । कर्दमस्तस्य तु सुतः सोऽप्यतप्यन्महत्तपः ॥
kīrtimāṃstasya putro'bhūtso'pi martyādhiko'bhavat | kardamastasya tu sutaḥ so'pyatapyanmahattapaḥ
उसका पुत्र कीर्तिमान् हुआ, जो भी मनुष्यों से बढ़कर था; और उसका पुत्र कर्दम हुआ, जिसने भी महान् तप किया।
श्लोक 99 (12.58.99)
प्रजापतेः कर्दमस्य त्वनङ्गो नाम वीर्यवान् । प्रजा रक्षयिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ॥
prajāpateḥ kardamasya tvanaṅgo nāma vīryavān | prajā rakṣayitā sādhurdaṇḍanītiviśāradaḥ
प्रजापति कर्दम का पुत्र अनङ्ग नामक पराक्रमी पुरुष हुआ, जो प्रजा का रक्षक, सज्जन और दण्डनीति में निपुण था।
श्लोक 100 (12.58.100)
अनङ्गपुत्रोऽतिबलो नीतिमानभिगम्य वै । प्रतिपेदे महाराज्यमथेन्द्रियवशोऽभवत् ॥
anaṅgaputro'tibalo nītimānabhigamya vai | pratipede mahārājyamathendriyavaśo'bhavat
अनङ्ग का पुत्र अतिबल, जो बड़ा बलवान् और नीतिमान् था, महान् राज्य पाकर इन्द्रियों के वश में हो गया।
श्लोक 101 (12.58.101)
प्राप्य नारीं महाभागां रूपिणीं काममोहितः । सौभाग्येन च संपन्नां गुणैश्चानुत्तमां सतीम् ॥
prāpya nārīṃ mahābhāgāṃ rūpiṇīṃ kāmamohitaḥ | saubhāgyena ca saṃpannāṃ guṇaiścānuttamāṃ satīm
कामना से मोहित होकर उसने एक महाभागा, रूपवती, सौभाग्यशालिनी और गुणों में अनुपम सती स्त्री को पत्नी रूप में प्राप्त किया।
श्लोक 102 (12.58.102)
मृत्योस्तु दुहिता राजन्सुनीथा नाम नामतः । प्रख्याता त्रिषु लोकेषु या सा वेनमजीजनत् ॥
mṛtyostu duhitā rājansunīthā nāma nāmataḥ | prakhyātā triṣu lokeṣu yā sā venamajījanat
हे राजन्, मृत्यु की पुत्री सुनीथा नाम की स्त्री तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी; उसी ने वेन को जन्म दिया।
श्लोक 103 (12.58.103)
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् । मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुर्ऋषयो ब्रह्मवादिनः ॥
taṃ prajāsu vidharmāṇaṃ rāgadveṣavaśānugam | mantrapūtaiḥ kuśairjaghnurṛṣayo brahmavādinaḥ
वह प्रजा के प्रति अधर्म करता था और राग-द्वेष के वश में चलता था; इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने मन्त्रों से पवित्र किए हुए कुशों से उसे मार डाला।
श्लोक 104 (12.58.104)
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषयस्तस्य भारत । ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वकः पुरुषोऽशुचिः ॥
mamanthurdakṣiṇaṃ corumṛṣayastasya bhārata | tato'sya vikṛto jajñe hrasvakaḥ puruṣo'śuciḥ
हे भारत, तब ऋषियों ने उसकी दाहिनी जाँघ का मन्थन किया, और उससे एक विकृत, नाटा और अपवित्र पुरुष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 105 (12.58.105)
दग्धस्थूणाप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः । निषीदेत्येवमूचुस्तमृषयो ब्रह्मवादिनः ॥
dagdhasthūṇāpratīkāśo raktākṣaḥ kṛṣṇamūrdhajaḥ | niṣīdetyevamūcustamṛṣayo brahmavādinaḥ
वह जले हुए ठूँठ के समान था, उसकी आँखें लाल और केश काले थे; ब्रह्मवादी ऋषियों ने उससे कहा, "बैठ जा।"
श्लोक 106 (12.58.106)
तस्मान्निषादाः संभूताः क्रूराः शैलवनाश्रयाः । ये चान्ये विन्ध्यनिलया म्लेच्छाः शतसहस्रशः ॥
tasmānniṣādāḥ saṃbhūtāḥ krūrāḥ śailavanāśrayāḥ | ye cānye vindhyanilayā mlecchāḥ śatasahasraśaḥ
उसी से निषाद उत्पन्न हुए, जो क्रूर होते हैं और पर्वतों तथा वनों में रहते हैं; और विन्ध्य में बसनेवाले दूसरे लाखों म्लेच्छ भी उसी से हुए।
श्लोक 107 (12.58.107)
भूयोऽस्य दक्षिणं पाणिं ममन्थुस्ते महर्षयः । ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ॥
bhūyo'sya dakṣiṇaṃ pāṇiṃ mamanthuste maharṣayaḥ | tataḥ puruṣa utpanno rūpeṇendra ivāparaḥ
फिर उन महर्षियों ने उसके दाहिने हाथ का मन्थन किया, और उससे रूप में दूसरे इन्द्र के समान एक पुरुष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 108 (12.58.108)
कवची बद्धनिस्त्रिंशः सशरः सशरासनः । वेदवेदाङ्गविच्चैव धनुर्वेदे च पारगः ॥
kavacī baddhanistriṃśaḥ saśaraḥ saśarāsanaḥ | vedavedāṅgaviccaiva dhanurvede ca pāragaḥ
वह कवच पहने, तलवार बाँधे, बाण और धनुष लिये हुए था; वेद और वेदाङ्गों का ज्ञाता था और धनुर्वेद में पारंगत था।
श्लोक 109 (12.58.109)
तं दण्डनीतिः सकला श्रिता राजन्नरोत्तमम् । ततस्तु प्राञ्जलिर्वैन्यो महर्षीस्तानुवाच ह ॥
taṃ daṇḍanītiḥ sakalā śritā rājannarottamam | tatastu prāñjalirvainyo maharṣīstānuvāca ha
हे राजन्, सम्पूर्ण दण्डनीति उस नरश्रेष्ठ के आश्रित हो गई। तब वैन्य ने हाथ जोड़कर उन महर्षियों से कहा।
वैन्य उवाच
श्लोक 110 (12.58.110)
सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना बुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी । अनया किं मया कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत ॥
susūkṣmā me samutpannā buddhirdharmārthadarśinī | anayā kiṃ mayā kāryaṃ tanme tattvena śaṃsata
"मुझमें धर्म और अर्थ को देखनेवाली एक अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि उत्पन्न हुई है। इससे मुझे क्या करना चाहिए? यह मुझे ठीक-ठीक बताइए।
श्लोक 111 (12.58.111)
यन्मां भवन्तो वक्ष्यन्ति कार्यमर्थसमन्वितम् । तदहं वः करिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥
yanmāṃ bhavanto vakṣyanti kāryamarthasamanvitam | tadahaṃ vaḥ kariṣyāmi nātra kāryā vicāraṇā
आप पूज्यजन मुझसे जो भी हितकारी कार्य कहेंगे, उसे मैं करूँगा; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 112 (12.58.112)
तमूचुस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः । नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर ॥
tamūcustatra devāste te caiva paramarṣayaḥ | niyato yatra dharmo vai tamaśaṅkaḥ samācara
तब वहाँ उपस्थित देवताओं और परमर्षियों ने उससे कहा, "जिसमें धर्म दृढ़ता से स्थित है, उसी का तुम निर्भय होकर आचरण करो।
देवा ऋषयश्चोचुः
श्लोक 113 (12.58.113)
प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु । कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥
priyāpriye parityajya samaḥ sarveṣu jantuṣu | kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca mānaṃ cotsṛjya dūrataḥ
प्रिय और अप्रिय को छोड़कर सब प्राणियों के प्रति समभाव रखो, और काम, क्रोध, लोभ तथा मान को दूर फेंक दो।
श्लोक 114 (12.58.114)
यश्च धर्मात्प्रविचलेल्लोके कश्चन मानवः । निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद्धर्ममवेक्षता ॥
yaśca dharmātpravicalelloke kaścana mānavaḥ | nigrāhyaste svabāhubhyāṃ śaśvaddharmamavekṣatā
संसार में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो, उसे तुम सदा धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपनी भुजाओं से दण्ड देकर रोको।
श्लोक 115 (12.58.115)
प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा । पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत् ॥
pratijñāṃ cādhirohasva manasā karmaṇā girā | pālayiṣyāmyahaṃ bhaumaṃ brahma ityeva cāsakṛt
और मन, कर्म तथा वाणी से यह प्रतिज्ञा करो और बार-बार दोहराओ कि ‘मैं पृथ्वी पर स्थित ब्रह्म की रक्षा करूँगा।’
श्लोक 116 (12.58.116)
यश्चात्र धर्म इत्युक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः । तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ॥
yaścātra dharma ityukto daṇḍanītivyapāśrayaḥ | tamaśaṅkaḥ kariṣyāmi svavaśo na kadācana
‘दण्डनीति पर आश्रित जो भी धर्म कहा गया है, उसका मैं निःशङ्क होकर पालन करूँगा और कभी स्वेच्छाचारी नहीं बनूँगा।’
श्लोक 117 (12.58.117)
अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीष्व चाभिभो । लोकं च संकरात्कृत्स्नं त्राताऽस्मीति परंतप ॥
adaṇḍyā me dvijāśceti pratijānīṣva cābhibho | lokaṃ ca saṃkarātkṛtsnaṃ trātā'smīti paraṃtapa
और हे प्रभावशाली, यह भी प्रतिज्ञा करो कि ‘द्विज मेरे लिए दण्ड के योग्य नहीं हैं, और हे शत्रुओं को तपानेवाले, मैं सारे संसार को वर्णसंकर से बचाऊँगा।’"
भीष्म उवाच
श्लोक 118 (12.58.118)
वैन्यस्ततस्तानुवाच देवानृषिपुरोगमान् । ब्राह्मणा मे सहायाश्चेदेवमस्तु सुरर्षभाः ॥
vainyastatastānuvāca devānṛṣipurogamān | brāhmaṇā me sahāyāścedevamastu surarṣabhāḥ
तब वैन्य ने ऋषियों के साथ आए देवताओं से कहा, "हे देवश्रेष्ठो, यदि ब्राह्मण मेरे सहायक रहें तो ऐसा ही हो।"
श्लोक 119 (12.58.119)
एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो ब्रह्मवादिभिः । पुरोधाश्चाभवत्तस्य शुक्रो ब्रह्ममयो निधिः ॥
evamastviti vainyastu tairukto brahmavādibhiḥ | purodhāścābhavattasya śukro brahmamayo nidhiḥ
ब्रह्मवादियों के "ऐसा ही हो" कहने पर वैन्य के पुरोहित वेदविद्या के भण्डार शुक्र हुए।
श्लोक 120 (12.58.120)
मन्त्रिणो वालखिल्याश्च सारस्वत्यो गणस्तथा । महर्षिर्भगवान्गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ॥
mantriṇo vālakhilyāśca sārasvatyo gaṇastathā | maharṣirbhagavāngargastasya sāṃvatsaro'bhavat
वालखिल्य और सारस्वत गण उसके मन्त्री हुए, और महर्षि भगवान् गर्ग उसके ज्योतिषी हुए।
श्लोक 121 (12.58.121)
आत्मनाऽष्टम इत्येव श्रुतिरेषां परा नृषु । उत्पन्नौ बन्दिनौ चास्य तत्पूर्वौ सूतमागधौ ॥
ātmanā'ṣṭama ityeva śrutireṣāṃ parā nṛṣu | utpannau bandinau cāsya tatpūrvau sūtamāgadhau
स्वयं को गिनकर वह आठवाँ था, मनुष्यों में इनके विषय में यही श्रेष्ठ परम्परा है। और उसके लिए दो बन्दी उत्पन्न हुए, सूत और मागध, जो अपने वर्ग के पहले थे।
श्लोक 122 (12.58.122)
तयोः प्रीतो ददौ राजा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । अनूपदेशं सूताय मगधं मागधाय च ॥
tayoḥ prīto dadau rājā pṛthurvainyaḥ pratāpavān | anūpadeśaṃ sūtāya magadhaṃ māgadhāya ca
उन दोनों से प्रसन्न होकर प्रतापी राजा पृथु वैन्य ने सूत को अनूप देश और मागध को मगध देश दिया।
श्लोक 123 (12.58.123)
समतां वसुधायाश्च स सम्यगुदपादयत् । वैषम्यं हि परं भूमेरिति नः परमा श्रुतिः ॥
samatāṃ vasudhāyāśca sa samyagudapādayat | vaiṣamyaṃ hi paraṃ bhūmeriti naḥ paramā śrutiḥ
उसने पृथ्वी को भली-भाँति समतल किया; क्योंकि हमारी श्रेष्ठ परम्परा के अनुसार पृथ्वी में बड़ी विषमता थी।
श्लोक 124 (12.58.124)
मन्वन्तरेषु सर्वेषु विषमा जायते मही । उज्जहार ततो वैन्यः शिलाजालान्समन्ततः ॥
manvantareṣu sarveṣu viṣamā jāyate mahī | ujjahāra tato vainyaḥ śilājālānsamantataḥ
सभी मन्वन्तरों में पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है; तब वैन्य ने चारों ओर से शिलाओं के समूहों को उखाड़ फेंका।
श्लोक 125 (12.58.125)
धनुष्कोट्या महाराज तेन शैला विमर्दिताः । स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह । ऋषिभिश्च प्रजापाल्ये ब्रह्मणा चाभिषेचितः ॥
dhanuṣkoṭyā mahārāja tena śailā vimarditāḥ | sa viṣṇunā ca devena śakreṇa vibudhaiḥ saha | ṛṣibhiśca prajāpālye brahmaṇā cābhiṣecitaḥ
हे महाराज, उसने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को चूर-चूर कर दिया। प्रजा के पालन के लिए देव विष्णु, देवताओं सहित इन्द्र, ऋषियों और ब्रह्मा ने उसका अभिषेक किया।
श्लोक 126 (12.58.126)
तं साक्षात्पृथिवी भेजे रत्नान्यादाय पाण्डव । सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः ॥
taṃ sākṣātpṛthivī bheje ratnānyādāya pāṇḍava | sāgaraḥ saritāṃ bhartā himavāṃścācalottamaḥ
हे पाण्डव, साक्षात् पृथ्वी रत्न लेकर उसके पास आई; नदियों के स्वामी समुद्र और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय भी आए।
श्लोक 127 (12.58.127)
शक्रश्च धनमक्षय्यं प्रादात्तस्मै युधिष्ठिर । रुक्मं चापि महामेरुः स्वयं कनकपर्वतः ॥
śakraśca dhanamakṣayyaṃ prādāttasmai yudhiṣṭhira | rukmaṃ cāpi mahāmeruḥ svayaṃ kanakaparvataḥ
हे युधिष्ठिर, इन्द्र ने उसे अक्षय धन दिया, और स्वर्णमय पर्वत महामेरु ने स्वयं उसे सोना दिया।
श्लोक 128 (12.58.128)
यक्षराक्षसभर्ता च भगवान्नरवाहनः । धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् ॥
yakṣarākṣasabhartā ca bhagavānnaravāhanaḥ | dharme cārthe ca kāme ca samarthaṃ pradadau dhanam
यक्षों और राक्षसों के स्वामी भगवान् नरवाहन (कुबेर) ने उसे धर्म, अर्थ और काम के लिए पर्याप्त धन दिया।
श्लोक 129 (12.58.129)
हया रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा । प्रादुर्बभूवुर्वैन्यस्य चिन्तयानस्य पाण्डव ॥
hayā rathāśca nāgāśca koṭiśaḥ puruṣāstathā | prādurbabhūvurvainyasya cintayānasya pāṇḍava
हे पाण्डव, वैन्य के सोचते ही करोड़ों घोड़े, रथ, हाथी और मनुष्य प्रकट हो जाते थे।
श्लोक 130 (12.58.130)
न जरा न च दुर्भिक्षं नाधयो व्याधयः कुतः । सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्येभ्यः कदाचन । भयमासीत्ततस्तस्य पृथिवी सस्यमालिनी ॥
na jarā na ca durbhikṣaṃ nādhayo vyādhayaḥ kutaḥ | sarīsṛpebhyaḥ stenebhyo na cānyebhyaḥ kadācana | bhayamāsīttatastasya pṛthivī sasyamālinī
न बुढ़ापा था, न अकाल; मानसिक और शारीरिक रोग कहाँ से होते? साँप-बिच्छू, चोर या किसी और से उसके राज्य में कभी भय नहीं हुआ; और पृथ्वी अन्न की मालाओं से भरी रहती थी।
श्लोक 131 (12.58.131)
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥
āpastastambhire cāsya samudramabhiyāsyataḥ | parvatāśca dadurmārgaṃ dhvajabhaṅgaśca nābhavat
जब वह समुद्र की ओर जाता, तब जल थम जाता था, पर्वत उसे मार्ग दे देते थे और उसकी ध्वजा कभी नहीं टूटी।
श्लोक 132 (12.58.132)
तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च । यक्षराक्षसनागानामीप्सितं यस्य यस्य यत् ॥
teneyaṃ pṛthivī dugdhā sasyāni daśa sapta ca | yakṣarākṣasanāgānāmīpsitaṃ yasya yasya yat
उसने इस पृथ्वी को दुहकर सत्रह प्रकार के अन्न प्राप्त किए, और यक्षों, राक्षसों तथा नागों में से जिसे जो चाहिए था, वह भी दुहा।
श्लोक 133 (12.58.133)
तेन धर्मोत्तरश्चायं कृतो लोको महात्मना । रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥
tena dharmottaraścāyaṃ kṛto loko mahātmanā | rañjitāśca prajāḥ sarvāstena rājeti śabdyate
उस महात्मा ने इस लोक को धर्म में अग्रगण्य बनाया और सारी प्रजा को प्रसन्न किया; इसीलिए वह राजा कहा जाता है।
श्लोक 134 (12.58.134)
ब्राह्मणानां क्षतत्राणात्ततः क्षत्रिय उच्यते । प्रथिता धर्मतश्चेयं पृथिवी साधुभिः स्मृता ॥
brāhmaṇānāṃ kṣatatrāṇāttataḥ kṣatriya ucyate | prathitā dharmataśceyaṃ pṛthivī sādhubhiḥ smṛtā
उसने ब्राह्मणों को क्षति से बचाया, इसीलिए वह क्षत्रिय कहलाता है; और धर्म के कारण प्रसिद्ध हुई यह भूमि साधुजनों द्वारा पृथ्वी कही जाती है।
श्लोक 135 (12.58.135)
स्थापनं चाकरोद्विष्णुः स्वयमेव सनातनः । नातिवर्तिष्यते कश्चिद्राजंस्त्वामिति भारत ॥
sthāpanaṃ cākarodviṣṇuḥ svayameva sanātanaḥ | nātivartiṣyate kaścidrājaṃstvāmiti bhārata
हे भारत, सनातन विष्णु ने स्वयं यह मर्यादा स्थापित की कि "हे राजन्, कोई तुम्हारा उल्लंघन नहीं करेगा।"
श्लोक 136 (12.58.136)
ततः स भगवान्विष्णुराविवेश च पार्थिवम् । देववन्नरदेवानां नमतीदं जगत्ततः ॥
tataḥ sa bhagavānviṣṇurāviveśa ca pārthivam | devavannaradevānāṃ namatīdaṃ jagattataḥ
तब भगवान् विष्णु ने उस पृथ्वीपति में प्रवेश किया; इसीलिए यह जगत् राजाओं को देवताओं के समान प्रणाम करता है।
श्लोक 137 (12.58.137)
दण्डनीत्या च सततं रक्षितारं नरेश्वरम् । नाधर्षयेत्तथा कश्चिच्चारनिष्पन्ददर्शनात् ॥
daṇḍanītyā ca satataṃ rakṣitāraṃ nareśvaram | nādharṣayettathā kaściccāraniṣpandadarśanāt
जो नरेश्वर सदा दण्डनीति से रक्षा करता है और गुप्तचरों के संचार से सब कुछ देखता है, उस पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता।
श्लोक 138 (12.58.138)
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते । आत्मना करणैश्चैव समस्येह महीक्षितः ॥
śubhaṃ hi karma rājendra śubhatvāyopakalpate | ātmanā karaṇaiścaiva samasyeha mahīkṣitaḥ
हे राजेन्द्र, शुभ कर्म शुभ फल के लिए होता है; और पृथ्वी का स्वामी अपने शरीर और इन्द्रियों में यहाँ दूसरों के समान ही है।
श्लोक 139 (12.58.139)
को हेतुर्यद्वशे तिष्ठेल्लोको दैवादृते गुणात् ॥
ko heturyadvaśe tiṣṭhelloko daivādṛte guṇāt
फिर क्या कारण है कि संसार उसके वश में रहता है, यदि दैव से प्राप्त गुण के सिवा और कुछ नहीं?
श्लोक 140 (12.58.140)
विष्णोर्ललाटात्कमलं सौवर्णमभवत्तदा । श्रीः संभूता ततस्तस्मिन्देवी धर्मस्य पाण्डव ॥
viṣṇorlalāṭātkamalaṃ sauvarṇamabhavattadā | śrīḥ saṃbhūtā tatastasmindevī dharmasya pāṇḍava
तब विष्णु के ललाट से एक स्वर्णमय कमल प्रकट हुआ, और हे पाण्डव, उसमें धर्म की देवी श्री उत्पन्न हुईं।
श्लोक 141 (12.58.141)
श्रियः सकाशादर्थश्च जातो धर्मस्य पाण्डव । अथ धर्मस्तथैवार्थः श्रीश्च राज्ये प्रतिष्ठिता ॥
śriyaḥ sakāśādarthaśca jāto dharmasya pāṇḍava | atha dharmastathaivārthaḥ śrīśca rājye pratiṣṭhitā
हे पाण्डव, श्री से धर्म के सहचर अर्थ (धन) की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार धर्म, अर्थ और श्री राज्य में प्रतिष्ठित हुए।
श्लोक 142 (12.58.142)
सुकृतस्य क्षयाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् । पार्थिवो जायते तात दण्डनीतिविशारदः ॥
sukṛtasya kṣayāccaiva svarlokādetya medinīm | pārthivo jāyate tāta daṇḍanītiviśāradaḥ
पुण्य के क्षीण होने पर मनुष्य स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आकर राजा के रूप में जन्म लेता है; हे तात, वह दण्डनीति में निपुण होता है।
श्लोक 143 (12.58.143)
माहात्म्येन च संयुक्तो वैष्णवेन नरो भुवि । बुद्ध्या भवति संयुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ॥
māhātmyena ca saṃyukto vaiṣṇavena naro bhuvi | buddhyā bhavati saṃyukto māhātmyaṃ cādhigacchati
ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर विष्णु की महिमा से युक्त होता है; वह बुद्धि से सम्पन्न होता है और बड़प्पन को प्राप्त करता है।
श्लोक 144 (12.58.144)
स्थापितं च ततो देवैर्न कश्चिदतिवर्तते । तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चैवानुविधीयते ॥
sthāpitaṃ ca tato devairna kaścidativartate | tiṣṭhatyekasya ca vaśe taṃ caivānuvidhīyate
देवताओं की स्थापित की हुई मर्यादा का कोई उल्लंघन नहीं करता; जगत् एक के वश में रहता है और उसी के अनुसार चलता है।
श्लोक 145 (12.58.145)
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते । तुल्यस्यैकस्य येनायं लोको वचसि तिष्ठति ॥
śubhaṃ hi karma rājendra śubhatvāyopakalpate | tulyasyaikasya yenāyaṃ loko vacasi tiṣṭhati
हे राजेन्द्र, शुभ कर्म शुभ फल के लिए होता है; दूसरों के समान होते हुए भी जिस एक के कारण यह जगत् उसके वचन में स्थित रहता है।
श्लोक 146 (12.58.146)
योऽस्य वै मुखमद्राक्षीत्सोऽस्य सर्वो वशानुगः । सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ॥
yo'sya vai mukhamadrākṣītso'sya sarvo vaśānugaḥ | subhagaṃ cārthavantaṃ ca rūpavantaṃ ca paśyati
जिसने उसका मुख देख लिया, वह पूरी तरह उसके वश में हो जाता है और उसे सौभाग्यशाली, धनवान् और रूपवान् देखता है।
श्लोक 147 (12.58.147)
महत्त्वात्तस्य दण्डस्य नीतिर्विस्पष्टलक्षणा । नयश्चारश्च विपुलो येन सर्वमिदं ततम् ॥
mahattvāttasya daṇḍasya nītirvispaṣṭalakṣaṇā | nayaścāraśca vipulo yena sarvamidaṃ tatam
उस दण्ड की महत्ता के कारण नीति के लक्षण स्पष्ट हैं; और नीति तथा गुप्तचरों का आचरण विशाल है, जिससे यह सब व्याप्त है;
श्लोक 148 (12.58.148)
आगमश्च पुराणानां महर्षीणां च संभवः । तीर्थवंशश्च वंशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ॥
āgamaśca purāṇānāṃ maharṣīṇāṃ ca saṃbhavaḥ | tīrthavaṃśaśca vaṃśaśca kṣatriyāṇāṃ yudhiṣṭhira
पुराणों का आगम, महर्षियों की उत्पत्ति, तीर्थों की परम्परा और क्षत्रियों के वंश, हे युधिष्ठिर;
श्लोक 149 (12.58.149)
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च । चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्विद्यं च कीर्तितम् ॥
sakalaṃ cāturāśramyaṃ cāturhotraṃ tathaiva ca | cāturvarṇyaṃ tathaivātra cāturvidyaṃ ca kīrtitam
चारों आश्रमों का पूरा विधान, चारों होत्र, चारों वर्ण और चारों विद्याएँ, ये सब यहाँ वर्णित हैं;
श्लोक 150 (12.58.150)
इतिहासोपवेदाश्च न्यायः कृत्स्नश्च वर्णितः । तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यं दानममत्सरः ॥
itihāsopavedāśca nyāyaḥ kṛtsnaśca varṇitaḥ | tapo jñānamahiṃsā ca satyaṃ dānamamatsaraḥ
इतिहास, उपवेद और सम्पूर्ण न्यायशास्त्र का वर्णन है; तप, ज्ञान, अहिंसा, सत्य, दान, मत्सर का अभाव,
श्लोक 151 (12.58.151)
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च । सर्वभूतानुकम्पा च सर्वमत्रोपवर्णितम् ॥
vṛddhopasevā dānaṃ ca śaucamutthānameva ca | sarvabhūtānukampā ca sarvamatropavarṇitam
वृद्धों की सेवा, दान, शुचिता, उद्योग और सब प्राणियों पर दया, यह सब यहाँ वर्णित है।
श्लोक 152 (12.58.152)
भुवि वाचोगतं यच्च तच्च सर्वं समर्पितम् । तस्मिन्पैतामहे शास्त्रे पाण्डवेय न संशयः ॥
bhuvi vācogataṃ yacca tacca sarvaṃ samarpitam | tasminpaitāmahe śāstre pāṇḍaveya na saṃśayaḥ
पृथ्वी पर वाणी की पहुँच में जो कुछ भी है, वह सब पितामह के उस शास्त्र में समर्पित है, हे पाण्डव; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 153 (12.58.153)
ततो जगति राजेन्द्र सततं शब्दितं बुधैः । देवाश्च नरदेवाश्च तुल्या इति विशांपते ॥
tato jagati rājendra satataṃ śabditaṃ budhaiḥ | devāśca naradevāśca tulyā iti viśāṃpate
इसी कारण, हे राजेन्द्र, जगत् में विद्वान् सदा कहते आए हैं कि देवता और राजा समान हैं, हे प्रजापति।
श्लोक 154 (12.58.154)
एतत्ते सर्वमाख्यातं महत्त्वं प्रति राजसु । कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तते ॥
etatte sarvamākhyātaṃ mahattvaṃ prati rājasu | kārtsnyena bharataśreṣṭha kimanyadiha vartate
हे भरतश्रेष्ठ, राजाओं की महत्ता के विषय में यह सब मैंने तुम्हें पूरा-पूरा बता दिया; अब यहाँ और क्या शेष है?