शान्ति पर्व · अध्याय 59
भीष्म द्वारा चारों वर्णों के धर्म का उपदेश
युधिष्ठिर भीष्म से सब वर्णों और आश्रमों के धर्म, राज्य और राजा की उन्नति के उपाय तथा राजा किस पर विश्वास करे और किसे त्यागे, इसके विषय में पूछते हैं। भीष्म धर्म और कृष्ण को नमस्कार करके पहले सब वर्णों के सामान्य धर्म बताते हैं, फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलग-अलग धर्म। आगे वे शूद्र के सरल यज्ञों में अधिकार और यज्ञ में श्रद्धा की सर्वोपरि शक्ति का वर्णन करते हैं, और अन्त में प्राचीन गाथाओं का उल्लेख करते हैं कि यज्ञ करना चाहने वाला पापी भी साधु कहा जाता है तथा तीनों लोकों में यज्ञ के समान कुछ नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.59.1)
ततः पुनः स गाङ्गेयमभिवाद्य पितामहम् । प्राञ्जलिर्नियतो भूत्वा पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥
tataḥ punaḥ sa gāṅgeyamabhivādya pitāmaham | prāñjalirniyato bhūtvā paryapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ
तब युधिष्ठिर ने फिर गंगापुत्र पितामह को प्रणाम किया और संयम के साथ हाथ जोड़कर उनसे पूछा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (12.59.2)
के धर्माः सर्ववर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् । चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राजधर्माश्च के मताः ॥
ke dharmāḥ sarvavarṇānāṃ cāturvarṇyasya ke pṛthak | cāturvarṇyāśramāṇāṃ ca rājadharmāśca ke matāḥ
सब वर्णों के धर्म क्या हैं, और चारों वर्णों के अलग-अलग धर्म कौन-से हैं? चारों वर्णों के आश्रमों के धर्म और राजाओं के धर्म क्या माने गए हैं?
श्लोक 3 (12.59.3)
केन वै वर्धते राष्ट्रं राजा केन विवर्धते । केन पौराश्च भृत्याश्च वर्धन्ते भरतर्षभ ॥
kena vai vardhate rāṣṭraṃ rājā kena vivardhate | kena paurāśca bhṛtyāśca vardhante bharatarṣabha
राष्ट्र किससे बढ़ता है और राजा किससे उन्नति पाता है? हे भरतश्रेष्ठ, नगरवासी और सेवक किससे बढ़ते हैं?
श्लोक 4 (12.59.4)
कोशं दण्डं च दुर्गं च सहायान्मन्त्रिणस्तथा । ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्कीदृशान्वर्जयेन्नृपः ॥
kośaṃ daṇḍaṃ ca durgaṃ ca sahāyānmantriṇastathā | ṛtvikpurohitācāryānkīdṛśānvarjayennṛpaḥ
कोश, सेना, दुर्ग, सहायक और मन्त्री तथा ऋत्विज, पुरोहित और आचार्य — इनमें किस प्रकार के लोगों को राजा त्याग दे?
श्लोक 5 (12.59.5)
केषु विश्वसितव्यं स्याद्राज्ञा कस्यांचिदापदि । कुतो वाऽऽत्मा दृढं रक्ष्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
keṣu viśvasitavyaṃ syādrājñā kasyāṃcidāpadi | kuto vā''tmā dṛḍhaṃ rakṣyastanme brūhi pitāmaha
किसी संकट के समय राजा किन पर विश्वास करे, और अपनी रक्षा किससे दृढ़ता से करे? हे पितामह, मुझे यह बताइए।
श्लोक 6 (12.59.6)
द्वैधीभावे च भृत्यानां शपथः कीदृशो भवेत् । अधर्मस्य फलं यच्च शपथस्य विलङ्घने ॥
dvaidhībhāve ca bhṛtyānāṃ śapathaḥ kīdṛśo bhavet | adharmasya phalaṃ yacca śapathasya vilaṅghane
सेवकों की निष्ठा में फूट होने पर कैसी शपथ ली जाए? और शपथ तोड़ने पर अधर्म का क्या फल होता है?
श्लोक 7 (12.59.7)
सर्वमेतद्यथातत्वं व्यवहारं च तादृशम् । समासव्यासयोगेन कथयस्व पितामह ॥
sarvametadyathātatvaṃ vyavahāraṃ ca tādṛśam | samāsavyāsayogena kathayasva pitāmaha
हे पितामह, यह सब और इसके अनुरूप व्यवहार भी, जैसा यथार्थ है, संक्षेप और विस्तार दोनों रूपों में मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (12.59.8)
नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे । ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥
namo dharmāya mahate namaḥ kṛṣṇāya vedhase | brāhmaṇebhyo namaskṛtya dharmānvakṣyāmi śāśvatān
महान धर्म को नमस्कार, सृष्टिकर्ता कृष्ण को नमस्कार। ब्राह्मणों को प्रणाम करके मैं सनातन धर्मों को कहूँगा।
श्लोक 9 (12.59.9)
अक्रोधः सत्यवचनं संविभागश्च सर्वशः । प्रजनं स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च ॥
akrodhaḥ satyavacanaṃ saṃvibhāgaśca sarvaśaḥ | prajanaṃ sveṣu dāreṣu śaucamadroha eva ca
क्रोध न करना, सत्य बोलना, सब बातों में दूसरों के साथ बाँटकर भोगना, अपनी ही पत्नियों में सन्तान उत्पन्न करना, पवित्रता और द्रोह का अभाव —
श्लोक 10 (12.59.10)
आर्जवं भृत्यभरणं त एते सार्ववर्णिकाः । ब्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम् ॥
ārjavaṃ bhṛtyabharaṇaṃ ta ete sārvavarṇikāḥ | brāhmaṇasya tu yo dharmastaṃ te vakṣyāmi kevalam
सरलता और आश्रितों का भरण-पोषण — ये सभी वर्णों के सामान्य धर्म हैं। अब ब्राह्मण का जो अपना धर्म है, केवल वही तुम्हें बताऊँगा।
श्लोक 11 (12.59.11)
दममेव महाराज धर्ममाहुः पुरातनम् । स्वाध्यायोऽध्यापनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ॥
damameva mahārāja dharmamāhuḥ purātanam | svādhyāyo'dhyāpanaṃ caiva tatra karma samāpyate
हे महाराज, इन्द्रिय-दमन को ही प्राचीन धर्म कहा गया है। स्वाध्याय और अध्यापन — इन्हीं में उसका कर्म पूर्ण हो जाता है।
श्लोक 12 (12.59.12)
तं चेद्द्विजमुपागच्छेद्वर्तमानं स्वकर्मणि । अकुर्वाणं विकर्माणि शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ॥
taṃ ceddvijamupāgacchedvartamānaṃ svakarmaṇi | akurvāṇaṃ vikarmāṇi śāntaṃ prajñānatarpitam
यदि अपने कर्म में लगे हुए, निषिद्ध कर्म न करने वाले, शान्त और ज्ञान से तृप्त उस द्विज के पास धन आ जाए,
श्लोक 13 (12.59.13)
कुर्वीतापत्यसंतानमथो दद्याद्यजेत च । संविभज्य च भोक्तव्यं धनं सद्भिरीतीष्यते ॥
kurvītāpatyasaṃtānamatho dadyādyajeta ca | saṃvibhajya ca bhoktavyaṃ dhanaṃ sadbhirītīṣyate
तो वह सन्तान उत्पन्न करे, दान दे और यज्ञ करे; क्योंकि सज्जन मानते हैं कि धन बाँटकर ही भोगना चाहिए।
श्लोक 14 (12.59.14)
परिनिष्ठितकार्यस्तु स्वाध्यायेनैव वै द्विजः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥
pariniṣṭhitakāryastu svādhyāyenaiva vai dvijaḥ | kuryādanyanna vā kuryānmaitro brāhmaṇa ucyate
जिसके सब कार्य पूरे हो चुके हों, ऐसा द्विज केवल स्वाध्याय में ही लगा रहे; वह दूसरा कर्म करे या न करे — ऐसा ब्राह्मण 'मैत्र' कहलाता है।
श्लोक 15 (12.59.15)
क्षत्रियस्यापि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत । दद्याद्राजा न याचेत यजेत न च याजयेत् ॥
kṣatriyasyāpi yo dharmastaṃ te vakṣyāmi bhārata | dadyādrājā na yāceta yajeta na ca yājayet
हे भरतवंशी, अब क्षत्रिय का जो धर्म है, वह भी तुम्हें बताऊँगा। राजा दान दे, याचना न करे; यज्ञ करे, किन्तु दूसरों से यज्ञ न कराए।
श्लोक 16 (12.59.16)
नाध्यापयेदधीयीत प्रजाश्च परिपालयेत् । नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात्पराक्रमम् ॥
nādhyāpayedadhīyīta prajāśca paripālayet | nityodyukto dasyuvadhe raṇe kuryātparākramam
वह पढ़ाए नहीं, पढ़े; प्रजा का पालन करे और सदा तत्पर रहकर दस्युओं के वध के लिए युद्ध में पराक्रम दिखाए।
श्लोक 17 (12.59.17)
ये तु क्रतुभिरीजानाः श्रुतवन्तश्च भूमिपाः । य एवाहवजेतारस्त एषां लोकजित्तमाः ॥
ye tu kratubhirījānāḥ śrutavantaśca bhūmipāḥ | ya evāhavajetārasta eṣāṃ lokajittamāḥ
यज्ञों से यजन करने वाले और शास्त्रज्ञ राजाओं में भी जो युद्ध में विजय पाने वाले हैं, वे ही लोकों को जीतने वालों में श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 18 (12.59.18)
अविक्षतेन देहेन समराद्यो निवर्तते । क्षत्रियो नास्य तत्कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥
avikṣatena dehena samarādyo nivartate | kṣatriyo nāsya tatkarma praśaṃsanti purāvidaḥ
जो क्षत्रिय बिना घाव खाए शरीर के साथ युद्ध से लौट आता है, उसके उस कर्म की प्राचीन बातों के जानकार प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 19 (12.59.19)
एवं हि क्षत्रबन्धूनां धर्ममाहुः प्रधानतः । नास्य कृत्यतमं किंचिदन्यद्दस्युनिबर्हणात् ॥
evaṃ hi kṣatrabandhūnāṃ dharmamāhuḥ pradhānataḥ | nāsya kṛtyatamaṃ kiṃcidanyaddasyunibarhaṇāt
क्षत्रिय-कुल में जन्मे लोगों का प्रधान धर्म इसी प्रकार कहा गया है; उसके लिए दस्युओं के संहार से बढ़कर करने योग्य कोई और कार्य नहीं।
श्लोक 20 (12.59.20)
दानमध्ययनं यज्ञो राज्ञां क्षेमो विधीयते । तस्माद्राज्ञा विशेषेण योद्धव्यं धर्ममीप्सता ॥
dānamadhyayanaṃ yajño rājñāṃ kṣemo vidhīyate | tasmādrājñā viśeṣeṇa yoddhavyaṃ dharmamīpsatā
दान, अध्ययन और यज्ञ राजाओं के कल्याण के लिए विहित हैं। इसलिए धर्म चाहने वाले राजा को विशेष रूप से युद्ध करना चाहिए।
श्लोक 21 (12.59.21)
स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्यः प्रजाः सर्वा महीपतिः । धर्मेण सर्वकृत्यानि शमनिष्ठानि कारयेत् ॥
sveṣu dharmeṣvavasthāpyaḥ prajāḥ sarvā mahīpatiḥ | dharmeṇa sarvakṛtyāni śamaniṣṭhāni kārayet
राजा सारी प्रजा को उसके अपने धर्मों में स्थिर करे और धर्म के द्वारा सब कार्यों को शान्तिपूर्ण परिणाम तक पहुँचाए।
श्लोक 22 (12.59.22)
परिनिष्ठितकार्यस्तु नृपतिः परिपालनात् । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादैन्द्रो राजन्य उच्यते ॥
pariniṣṭhitakāryastu nṛpatiḥ paripālanāt | kuryādanyanna vā kuryādaindro rājanya ucyate
प्रजा-पालन से जिसके कार्य पूरे हो चुके हों, वह राजा दूसरा कर्म करे या न करे — ऐसा क्षत्रिय इन्द्र के समान 'ऐन्द्र' कहलाता है।
श्लोक 23 (12.59.23)
वैश्यस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि शाश्वतम् । दानमध्ययनं यज्ञः शौचेन धनसंचयः ॥
vaiśyasyāpi hi yo dharmastaṃ te vakṣyāmi śāśvatam | dānamadhyayanaṃ yajñaḥ śaucena dhanasaṃcayaḥ
हे भरतवंशी, अब वैश्य का जो सनातन धर्म है, वह भी तुम्हें बताऊँगा — दान, अध्ययन, यज्ञ और पवित्र साधनों से धन का संचय।
श्लोक 24 (12.59.24)
पितृवत्पालयेद्वैश्यो युक्तः सर्वान्पशूनिह । विकर्म तद्भवेदन्यत्कर्म यत्स समाचरेत् ॥
pitṛvatpālayedvaiśyo yuktaḥ sarvānpaśūniha | vikarma tadbhavedanyatkarma yatsa samācaret
वैश्य निष्ठापूर्वक यहाँ सब पशुओं का पिता की तरह पालन करे। इसके सिवा वह जो और कर्म करेगा, वह उसके लिए विकर्म (निषिद्ध कर्म) होगा।
श्लोक 25 (12.59.25)
रक्षया स हि तेषां वै महत्सुखमवाप्नुयात् । प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददौ पशून् ॥
rakṣayā sa hi teṣāṃ vai mahatsukhamavāpnuyāt | prajāpatirhi vaiśyāya sṛṣṭvā paridadau paśūn
उनकी रक्षा करने से वह बड़ा सुख पाएगा। प्रजापति ने वैश्य को रचकर पशु उसे सौंप दिए,
श्लोक 26 (12.59.26)
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥
brāhmaṇāya ca rājñe ca sarvāḥ paridade prajāḥ | tasya vṛttiṃ pravakṣyāmi yacca tasyopajīvanam
और सारी प्रजाएँ ब्राह्मण तथा राजा को सौंप दीं। अब मैं उसकी वृत्ति और उसके जीवन-निर्वाह का साधन बताऊँगा —
श्लोक 27 (12.59.27)
षण्णामेकां पिबेद्धेनुं शताच्च मिथुनं हरेत् । लये च सप्तमो भागस्तथा शृङ्गे कला खुरे ॥
ṣaṇṇāmekāṃ pibeddhenuṃ śatācca mithunaṃ haret | laye ca saptamo bhāgastathā śṛṅge kalā khure
छह गायों में से एक का दूध वह ले, सौ में से एक जोड़ा (बैल और गाय) ले; व्यापार के लाभ का सातवाँ भाग तथा सींग और खुर पर सोलहवाँ अंश भी उसका है।
श्लोक 28 (12.59.28)
सस्यानां सर्वबीजानामेषा सांवत्सरी भृतिः ॥
sasyānāṃ sarvabījānāmeṣā sāṃvatsarī bhṛtiḥ
सब प्रकार की फसलों और बीजों में से भी — यही उसका वार्षिक पारिश्रमिक है।
श्लोक 29 (12.59.29)
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति । वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन ॥
na ca vaiśyasya kāmaḥ syānna rakṣeyaṃ paśūniti | vaiśye cecchati nānyena rakṣitavyāḥ kathaṃcana
वैश्य की यह इच्छा कभी न हो कि 'मैं पशुओं की रक्षा नहीं करूँगा'; और यदि वैश्य उनका पालन करना चाहता हो, तो उनकी रक्षा किसी और से किसी भी प्रकार नहीं करानी चाहिए।
श्लोक 30 (12.59.30)
शूद्रस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत । प्रजापतिर्हि वर्णानां दासं शूद्रमकल्पयत् ॥
śūdrasyāpi hi yo dharmastaṃ te vakṣyāmi bhārata | prajāpatirhi varṇānāṃ dāsaṃ śūdramakalpayat
हे भारत, अब शूद्र का जो धर्म है, वह भी तुम्हें बताऊँगा। प्रजापति ने शूद्र को सब वर्णों का सेवक बनाया।
श्लोक 31 (12.59.31)
तस्माच्छूद्रस्य वर्णानां परिचर्या विधीयते । तेषां शुश्रूषणाच्चैव महत्सुखमवाप्नुयात् ॥
tasmācchūdrasya varṇānāṃ paricaryā vidhīyate | teṣāṃ śuśrūṣaṇāccaiva mahatsukhamavāpnuyāt
इसलिए शूद्र के लिए अन्य वर्णों की सेवा का विधान है; और उनकी सेवा से ही वह बड़ा सुख पाएगा।
श्लोक 32 (12.59.32)
शूद्र एतान्परिचरेत्रीन्वर्णाननसूयकः । संचयांश्च न कुर्वीत जातु शूद्रः कथंचन ॥
śūdra etānparicaretrīnvarṇānanasūyakaḥ | saṃcayāṃśca na kurvīta jātu śūdraḥ kathaṃcana
शूद्र ईर्ष्या के बिना इन तीनों वर्णों की सेवा करे; और शूद्र किसी भी प्रकार कभी धन का संचय न करे।
श्लोक 33 (12.59.33)
पापीयान्हि धनं लब्ध्वा वशे कुर्याद्गरीयसः । राज्ञा वा समनुज्ञातः कामं कुर्वीत धार्मिकः ॥
pāpīyānhi dhanaṃ labdhvā vaśe kuryādgarīyasaḥ | rājñā vā samanujñātaḥ kāmaṃ kurvīta dhārmikaḥ
क्योंकि नीच मनुष्य धन पाकर अपने से बड़ों को वश में कर लेता है। हाँ, राजा की अनुमति मिलने पर धर्मात्मा शूद्र अपनी इच्छा के अनुसार कर सकता है।
श्लोक 34 (12.59.34)
तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् । अवश्यं भरणीयो हि वर्णानां शूद्र उच्यते ॥
tasya vṛttiṃ pravakṣyāmi yacca tasyopajīvanam | avaśyaṃ bharaṇīyo hi varṇānāṃ śūdra ucyate
अब मैं उसकी वृत्ति और जीविका बताऊँगा। कहा जाता है कि शूद्र का वर्णों द्वारा अवश्य भरण-पोषण होना चाहिए।
श्लोक 35 (12.59.35)
छत्रं वेष्टनमौशीरमुपानद्व्यजनानि च । यातयामानि देयानि शूद्राय परिचारिणे ॥
chatraṃ veṣṭanamauśīramupānadvyajanāni ca | yātayāmāni deyāni śūdrāya paricāriṇe
छत्र, पगड़ी, उशीर की चटाई, जूते और पंखे — ये पहले के बरते हुए सेवा करने वाले शूद्र को देने चाहिए।
श्लोक 36 (12.59.36)
अधार्याणि विशीर्णानि वसनानि द्विजातिभिः । शूद्रायैव प्रदेयानि तस्य धर्मधनं हि तत् ॥
adhāryāṇi viśīrṇāni vasanāni dvijātibhiḥ | śūdrāyaiva pradeyāni tasya dharmadhanaṃ hi tat
द्विजों के जो वस्त्र पहनने योग्य न रहें और फट गए हों, वे शूद्र को ही देने चाहिए; क्योंकि वही उसका धर्मरूप धन है।
श्लोक 37 (12.59.37)
यंच कश्चिद्द्विजातीनां शूद्रः शुश्रूषुराव्रजेत् । कल्प्यां तेन तु तस्याहुर्वृत्तिं धर्मविदो जनाः ॥
yaṃca kaściddvijātīnāṃ śūdraḥ śuśrūṣurāvrajet | kalpyāṃ tena tu tasyāhurvṛttiṃ dharmavido janāḥ
यदि द्विजों में से किसी के पास कोई शूद्र सेवा की इच्छा से आए, तो धर्म जानने वाले कहते हैं कि उसकी जीविका उसी द्विज को निश्चित करनी चाहिए।
श्लोक 38 (12.59.38)
देयः पिण्डोऽनपत्याय भर्तव्यौ वृद्धदुर्बलौ । शूद्रेण तु न हातव्यो भर्ता कस्यांचिदापदि ॥
deyaḥ piṇḍo'napatyāya bhartavyau vṛddhadurbalau | śūdreṇa tu na hātavyo bhartā kasyāṃcidāpadi
सन्तानहीन को भोजन का भाग देना चाहिए; वृद्ध और दुर्बलों का भरण-पोषण करना चाहिए। और शूद्र को किसी भी विपत्ति में अपने स्वामी को नहीं छोड़ना चाहिए।
श्लोक 39 (12.59.39)
अतिरेकेण भर्तव्यो भर्ता द्रव्यपरिक्षये । न हि स्वमस्ति शूद्रस्य भर्तृहार्यधनो हि सः ॥
atirekeṇa bhartavyo bhartā dravyaparikṣaye | na hi svamasti śūdrasya bhartṛhāryadhano hi saḥ
स्वामी का धन नष्ट हो जाने पर शूद्र को अपनी घरेलू आवश्यकता से बचे धन से उसका पोषण करना चाहिए; क्योंकि शूद्र का अपना कुछ नहीं होता, उसका धन स्वामी द्वारा ले लिया जा सकता है।
श्लोक 40 (12.59.40)
उक्तस्त्रयाणां वर्णानां यज्ञस्त्रय्येव भारत । स्वाहाकारवषट्कारौ मन्त्रः शूद्रे न विद्यते ॥
uktastrayāṇāṃ varṇānāṃ yajñastrayyeva bhārata | svāhākāravaṣaṭkārau mantraḥ śūdre na vidyate
हे भारत, तीनों वर्णों का यज्ञ त्रयी (तीनों वेदों) से ही कहा गया है। शूद्र के लिए स्वाहाकार, वषट्कार और वैदिक मन्त्र नहीं हैं।
श्लोक 41 (12.59.41)
तस्माच्छूद्रः पाकयज्ञैर्यजेताव्रतवान्स्वयम् । पूर्णपात्रमयीमाहुः पाकयज्ञस्य दक्षिणाम् ॥
tasmācchūdraḥ pākayajñairyajetāvratavānsvayam | pūrṇapātramayīmāhuḥ pākayajñasya dakṣiṇām
इसलिए शूद्र वैदिक व्रतों के बिना भी स्वयं पाकयज्ञों से यजन कर सकता है। पाकयज्ञ की दक्षिणा, कहते हैं, भरा हुआ पात्र है।
श्लोक 42 (12.59.42)
शूद्रः पैजवनो नाम सहस्राणां शतं ददौ । ऐन्द्राग्नेन विधानेन दक्षिणामिति नः श्रुतम् ॥
śūdraḥ paijavano nāma sahasrāṇāṃ śataṃ dadau | aindrāgnena vidhānena dakṣiṇāmiti naḥ śrutam
पैजवन नाम के शूद्र ने ऐन्द्राग्न विधि से दक्षिणा के रूप में एक लाख (सौ हज़ार) दिए थे — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 43 (12.59.43)
यतो हि सर्ववर्णानां यज्ञस्तस्यैव भारत ॥
yato hi sarvavarṇānāṃ yajñastasyaiva bhārata
क्योंकि हे भारत, सब वर्णों का यज्ञ उसी का है।
श्लोक 44 (12.59.44)
अग्रे सर्वेषु यज्ञेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते । दैवतं हि महच्छ्रद्धा पवित्रं यजतां च यत् । दैवतं हि परं विप्राः स्वेनस्वेन परस्परम् ॥
agre sarveṣu yajñeṣu śraddhāyajño vidhīyate | daivataṃ hi mahacchraddhā pavitraṃ yajatāṃ ca yat | daivataṃ hi paraṃ viprāḥ svenasvena parasparam
सब यज्ञों में सबसे पहले श्रद्धा-यज्ञ का विधान है। श्रद्धा महान देवता है और यजन करने वालों को पवित्र करने वाली है। हे विप्रो, वह परम देवता है — अपने-अपने द्वारा और एक-दूसरे के द्वारा।
श्लोक 45 (12.59.45)
अयजन्निह सत्रैस्ते तैस्तैः कामैः समाहिताः । संसृष्टा ब्राह्मणैरेव त्रिषु वर्णेषु सृष्टयः ॥
ayajanniha satraiste taistaiḥ kāmaiḥ samāhitāḥ | saṃsṛṣṭā brāhmaṇaireva triṣu varṇeṣu sṛṣṭayaḥ
यहाँ उन्होंने अपनी-अपनी कामनाओं में लगे हुए विविध सत्रों से यजन किया; तीनों वर्णों की सन्तानें ब्राह्मणों से ही मिली हुई हैं।
श्लोक 46 (12.59.46)
देवानामपि ये देवा यद्ब्रूयुस्ते परं हितम् । तस्माद्वर्णैः सर्वयज्ञाः संसृज्यन्ते न काम्यया ॥
devānāmapi ye devā yadbrūyuste paraṃ hitam | tasmādvarṇaiḥ sarvayajñāḥ saṃsṛjyante na kāmyayā
देवताओं के भी जो देवता हैं, वे जो कहें वही परम हित है। इसीलिए सब यज्ञ वर्णों के मिलकर होते हैं, केवल कामना से नहीं।
श्लोक 47 (12.59.47)
ऋग्यजुः सामवित्पूज्यो नित्यं स्याद्देववद्द्विजः । अनृग्यजुरसामा च प्राजापत्य उपद्रवः । यज्ञो मनीषया तात सर्ववर्णेषु भारत ॥
ṛgyajuḥ sāmavitpūjyo nityaṃ syāddevavaddvijaḥ | anṛgyajurasāmā ca prājāpatya upadravaḥ | yajño manīṣayā tāta sarvavarṇeṣu bhārata
ऋग्, यजुः और साम को जानने वाला द्विज सदा देवता की तरह पूज्य है। जो ऋक्, यजुः और साम से रहित है, वह साधारण सेवक भी प्रजापति का ही है। हे तात, हे भारत, यज्ञ सब वर्णों में मन के संकल्प से होता है।
श्लोक 48 (12.59.48)
नास्य यज्ञकृतो देवा ईहन्ते नेतरे जनाः । ततः सर्वेषु वर्णेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते ॥
nāsya yajñakṛto devā īhante netare janāḥ | tataḥ sarveṣu varṇeṣu śraddhāyajño vidhīyate
ऐसा यज्ञ करने वाले के मार्ग में न देवता बाधा बनते हैं, न दूसरे लोग। इसीलिए सब वर्णों में श्रद्धा-यज्ञ का विधान है।
श्लोक 49 (12.59.49)
स्वं दैवतं ब्राह्मणः स्वेन नित्यं । परान्वर्णानयजन्नैवमासीत् । अधरो वितानस्त्वथ तत्र सृष्टो । न ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु राजन् ॥
svaṃ daivataṃ brāhmaṇaḥ svena nityaṃ | parānvarṇānayajannaivamāsīt | adharo vitānastvatha tatra sṛṣṭo | na brāhmaṇastriṣu varṇeṣu rājan
ब्राह्मण अपने ही द्वारा सदा दूसरे वर्णों का देवता है; ऐसा नहीं था कि उसने उनके लिए यज्ञ न किया हो। वहाँ एक निम्न विस्तार रचा गया; पर हे राजन्, तीनों वर्णों में ब्राह्मण नहीं है।
श्लोक 50 (12.59.50)
तस्माद्वर्णा ऋजवो ज्ञातिवर्णाः । संसृज्यन्ते तस्य विकार एव । एकं साम यजुरेकमृगेका । विप्रश्चैको निश्चये तेषु सृष्टः ॥
tasmādvarṇā ṛjavo jñātivarṇāḥ | saṃsṛjyante tasya vikāra eva | ekaṃ sāma yajurekamṛgekā | vipraścaiko niścaye teṣu sṛṣṭaḥ
इसलिए सरल और जाति से जुड़े हुए वर्ण परस्पर मिले हुए हैं, और सब उसी (ब्राह्मण) का विकार मात्र हैं। एक साम है, एक यजुः, एक ऋक्, और निश्चय करने पर उनमें एक ही विप्र रचा गया है।
श्लोक 51 (12.59.51)
अत्र गाथा यज्ञगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । वैखानसानां राजेन्द्र मुनीनां यष्टुमिच्छताम् ॥
atra gāthā yajñagītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | vaikhānasānāṃ rājendra munīnāṃ yaṣṭumicchatām
इस विषय में प्राचीन बातों के जानने वाले यज्ञ-सम्बन्धी गाथाएँ गाते हैं, जो यजन की इच्छा रखने वाले वैखानस मुनियों की कही हुई हैं, हे राजेन्द्र।
श्लोक 52 (12.59.52)
उदितेऽनुदिते वाऽपि श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । वह्निं जुहोति धर्मेण श्रद्धा वै कारणं महत् ॥
udite'nudite vā'pi śraddadhāno jitendriyaḥ | vahniṃ juhoti dharmeṇa śraddhā vai kāraṇaṃ mahat
सूर्य उगा हो या न उगा हो, श्रद्धालु और जितेन्द्रिय पुरुष धर्मपूर्वक अग्नि में आहुति देता है; श्रद्धा ही उसका महान कारण है।
श्लोक 53 (12.59.53)
यत्स्कन्नमस्य तत्पूर्वं यदस्कन्नं तदुत्तरम् । बहूनि यज्ञरूपाणि नानाकर्मफलानि च ॥
yatskannamasya tatpūrvaṃ yadaskannaṃ taduttaram | bahūni yajñarūpāṇi nānākarmaphalāni ca
उसकी आहुति का जो छलक गया वह पहला है, जो नहीं छलका वह उसके बाद का। यज्ञ के रूप बहुत हैं और उनके फल अनेक प्रकार के कर्मों के होते हैं।
श्लोक 54 (12.59.54)
तानि यः संप्रजानाति ज्ञाननिश्चयनिश्चितः । द्विजातिः श्रद्धयोपेतः स यष्टुं पुरुषोऽर्हति ॥
tāni yaḥ saṃprajānāti jñānaniścayaniścitaḥ | dvijātiḥ śraddhayopetaḥ sa yaṣṭuṃ puruṣo'rhati
ज्ञान के निश्चय में स्थिर और श्रद्धा से युक्त जो द्विज उन्हें भली-भाँति जानता है, वही पुरुष यज्ञ करने के योग्य है।
श्लोक 55 (12.59.55)
स्तेनो वा यदि वा पापो यदि वा पापकृत्तमः । यष्टुमिच्छति यज्ञं यः साधुमेव वदन्ति तम् ॥
steno vā yadi vā pāpo yadi vā pāpakṛttamaḥ | yaṣṭumicchati yajñaṃ yaḥ sādhumeva vadanti tam
चोर हो, पापी हो या अत्यन्त पापकर्मी ही क्यों न हो, यदि वह यज्ञ करना चाहता है तो उसे साधु ही कहते हैं।
श्लोक 56 (12.59.56)
ऋषयस्तं प्रशंसन्ति साधु चैतदसंशयम् । सर्वथा सर्वदा वर्णैर्यष्टव्यमिति निर्णयः ॥
ṛṣayastaṃ praśaṃsanti sādhu caitadasaṃśayam | sarvathā sarvadā varṇairyaṣṭavyamiti nirṇayaḥ
ऋषि उसकी प्रशंसा करते हैं, और यह निस्सन्देह उचित है। निश्चय यही है कि सभी वर्णों को सदा और सर्वथा यज्ञ करना चाहिए।
श्लोक 57 (12.59.57)
न हि यज्ञसमं किंचित्रिषु लोकेषु विद्यते । तस्माद्यष्टव्यमित्याहुः पुरुषेणानसूयता । श्रद्धापवित्रमाश्रित्य यथाशक्ति यथेच्छया ॥
na hi yajñasamaṃ kiṃcitriṣu lokeṣu vidyate | tasmādyaṣṭavyamityāhuḥ puruṣeṇānasūyatā | śraddhāpavitramāśritya yathāśakti yathecchayā
तीनों लोकों में यज्ञ के समान कुछ भी नहीं है। इसलिए कहा गया है कि पुरुष को बिना ईर्ष्या के, श्रद्धा को पवित्र आधार बनाकर, अपनी शक्ति और इच्छा के अनुसार यज्ञ करना चाहिए।