शान्ति पर्व · अध्याय 60
चार आश्रमों का वर्णन
भीष्म चार आश्रम गिनाते हैं — वानप्रस्थ, भिक्षाचर्या, गृहस्थ और ब्रह्मचर्य। वे बताते हैं कि संस्कार पाकर और वेद पढ़कर द्विज वानप्रस्थ में कैसे प्रवेश करे, भिक्षु बिना अग्नि और बिना घर के कैसे रहता है, तथा गृहस्थ को कैसा होना चाहिए और उसे क्या फल मिलता है — सत्य, अतिथि-सत्कार और परिवार के भरण-पोषण का जीवन। अन्त में वे ब्रह्मचारी के नियम बताते हैं, जो गुरु की सेवा करता है, व्रतों का पालन करता है और अपनी मर्यादा से आगे नहीं बढ़ता।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.60.1)
आश्रमाणां महाबाहो शृणु सत्यपराक्रम । चतुर्णामपि नामानि कर्माणि च युधिष्ठिर ॥
āśramāṇāṃ mahābāho śṛṇu satyaparākrama | caturṇāmapi nāmāni karmāṇi ca yudhiṣṭhira
हे महाबाहु, हे सत्यपराक्रमी युधिष्ठिर, चारों आश्रमों के नाम और कर्म सुनो।
श्लोक 2 (12.60.2)
वानप्रस्थं भैक्षचर्यं गार्हस्थ्यं च महाश्रमम् । ब्रह्मचर्याश्रमं प्राहुश्चतुर्थं ब्रह्मणेरितम् ॥
vānaprasthaṃ bhaikṣacaryaṃ gārhasthyaṃ ca mahāśramam | brahmacaryāśramaṃ prāhuścaturthaṃ brahmaṇeritam
वानप्रस्थ, भिक्षाचर्या, और गृहस्थ — जो बड़ा आश्रम है — तथा ब्रह्मचर्याश्रम; ब्रह्मा के कहे हुए ये चार आश्रम बताए गए हैं।
श्लोक 3 (12.60.3)
चूडाकरणसंस्कारं द्विजातित्वमवाप्य च । आधानादीनि कर्माणि प्राप्य वेदानधीत्य च ॥
cūḍākaraṇasaṃskāraṃ dvijātitvamavāpya ca | ādhānādīni karmāṇi prāpya vedānadhītya ca
चूडाकरण आदि संस्कारों से द्विजत्व पाकर, आधान आदि कर्म करके और वेदों का अध्ययन करके —
श्लोक 4 (12.60.4)
सदारो वाऽप्यदारो वा विनीतः संयतेन्द्रियः । वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत्कृतकृत्यो गृहाश्रमात् ॥
sadāro vā'pyadāro vā vinītaḥ saṃyatendriyaḥ | vānaprasthāśramaṃ gacchetkṛtakṛtyo gṛhāśramāt
पत्नी के साथ या बिना पत्नी के, विनीत और संयतेन्द्रिय पुरुष कर्तव्य पूरे करके गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थ आश्रम में जाए।
श्लोक 5 (12.60.5)
तत्रारण्यकशास्त्राणि समधीत्य स धर्मवित् । ऊर्ध्वरेताः प्रजा हित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥
tatrāraṇyakaśāstrāṇi samadhītya sa dharmavit | ūrdhvaretāḥ prajā hitvā gacchatyakṣarasātmatām
वहाँ आरण्यक ग्रन्थों का अध्ययन करके वह धर्मज्ञ, ऊर्ध्वरेता होकर और सन्तान को छोड़कर, अक्षर ब्रह्म की समानता को प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (12.60.6)
एतान्येव निमित्तानि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । कर्तव्यानीह विप्रेण राजन्नादौ विपश्चिता ॥
etānyeva nimittāni munīnāmūrdhvaretasām | kartavyānīha vipreṇa rājannādau vipaścitā
हे राजन्, ऊर्ध्वरेता मुनियों के ये ही कर्म बुद्धिमान ब्राह्मण को आरम्भ में ही करने चाहिए।
श्लोक 7 (12.60.7)
चरितब्रह्मचर्यस्य ब्राह्मणस्य विशांपते । भैक्षचर्यास्वधीकारः प्रशस्तो देहमोक्षणे ॥
caritabrahmacaryasya brāhmaṇasya viśāṃpate | bhaikṣacaryāsvadhīkāraḥ praśasto dehamokṣaṇe
हे प्रजापालक, जिसने ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया हो, उस ब्राह्मण के लिए शरीर छोड़ने के निमित्त भिक्षाचर्या में प्रवेश श्रेष्ठ कहा गया है।
श्लोक 8 (12.60.8)
यत्रास्तमितशायी स्यान्निरग्निरनिकेतनः । यथोपलब्धजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रियः ॥
yatrāstamitaśāyī syānniragniraniketanaḥ | yathopalabdhajīvī syānmunirdānto jitendriyaḥ
जहाँ सूर्यास्त हो वहीं सो जाए, बिना अग्नि और बिना घर के रहे, जो मिल जाए उसी से निर्वाह करे — ऐसा मुनि संयमी और जितेन्द्रिय हो।
श्लोक 9 (12.60.9)
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्भोगो निर्विकारवान् । विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ॥
nirāśīrnirnamaskāro nirbhogo nirvikāravān | vipraḥ kṣemāśramaṃ prāpto gacchatyakṣarasātmatām
आशा, नमस्कार और भोग से रहित, विकारहीन ब्राह्मण क्षेम-आश्रम को पाकर अक्षर ब्रह्म की समानता को प्राप्त होता है।
श्लोक 10 (12.60.10)
अधीत्य वेदान्कृतसर्वकृत्यः । संतानमुत्पाद्य सुखानि भुक्त्वा । समाहितः प्रचरेद्दुश्चरं तं । गार्हस्थ्यधर्मं मुनिधर्मजुष्टम् ॥
adhītya vedānkṛtasarvakṛtyaḥ | saṃtānamutpādya sukhāni bhuktvā | samāhitaḥ pracaredduścaraṃ taṃ | gārhasthyadharmaṃ munidharmajuṣṭam
वेदों को पढ़कर, सब कर्तव्य पूरे करके, सन्तान उत्पन्न करके और सुखों को भोगकर, एकाग्र चित्त से वह उस कठिन गृहस्थ-धर्म का पालन करे, जिसे मुनियों का धर्म भी अपनाता है।
श्लोक 11 (12.60.11)
स्वदारतुष्टस्त्वृतुकालगामी । नियोगसेवी न शठो न जिह्नः । मिताशनो देवरतः कृतज्ञः । सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ॥
svadāratuṣṭastvṛtukālagāmī | niyogasevī na śaṭho na jihnaḥ | mitāśano devarataḥ kṛtajñaḥ | satyo mṛduścānṛśaṃsaḥ kṣamāvān
वह अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट रहे और ऋतुकाल में ही उसके पास जाए; कर्तव्य-पालन में लगा रहे, न शठ हो न कुटिल; परिमित भोजन करे, देवताओं में अनुरक्त, कृतज्ञ, सत्यवादी, कोमल, दयालु और क्षमाशील हो —
श्लोक 12 (12.60.12)
दान्तो विधेयो हव्यकव्याप्रमत्तो । ह्यन्नस्य दाता सततं द्विजेभ्यः । अमत्सरी सर्वलिङ्गप्रदाता । वैताननित्यश्च गृहाश्रमी स्यात् ॥
dānto vidheyo havyakavyāpramatto | hyannasya dātā satataṃ dvijebhyaḥ | amatsarī sarvaliṅgapradātā | vaitānanityaśca gṛhāśramī syāt
संयमी, आज्ञाकारी, हव्य-कव्य में सावधान, द्विजों को निरन्तर अन्न देने वाला, ईर्ष्या से रहित, सब आश्रम-चिह्न धारण करने वालों को दान देने वाला और वैदिक अग्निकर्मों में नित्य लगा रहने वाला — ऐसा गृहस्थ होना चाहिए।
श्लोक 13 (12.60.13)
अथात्र नारायणगीतमाहु । र्महर्षयस्तात महानुभावाः । महार्थमत्यन्ततपः प्रयुक्तं । तदुच्यमानं हि मया निबोध ॥
athātra nārāyaṇagītamāhu | rmaharṣayastāta mahānubhāvāḥ | mahārthamatyantatapaḥ prayuktaṃ | taducyamānaṃ hi mayā nibodha
हे तात, अब महान प्रभाव वाले महर्षि यहाँ नारायण-गीत कहते हैं, जो बड़े अर्थ वाला और घोर तप से युक्त है; मैं उसे कहता हूँ, सुनो।
श्लोक 14 (12.60.14)
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च । धर्मस्तथार्थश्च रतिः स्वदारैः । निषेवितव्यानि सुखानि लोके । ह्यस्मिन्परे चैव मतं ममैतत् ॥
satyārjavaṃ cātithipūjanaṃ ca | dharmastathārthaśca ratiḥ svadāraiḥ | niṣevitavyāni sukhāni loke | hyasminpare caiva mataṃ mamaitat
सत्य और सरलता, अतिथि-पूजन, धर्म, अर्थ और अपनी पत्नियों के साथ रति — ये सुख इस लोक और परलोक दोनों में सेवन करने योग्य हैं, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 15 (12.60.15)
भरणं पुत्रदाराणां वेदानां चानुपालनम् । सेवतामाश्रमं श्रेष्ठं वदन्ति परमर्षयः ॥
bharaṇaṃ putradārāṇāṃ vedānāṃ cānupālanam | sevatāmāśramaṃ śreṣṭhaṃ vadanti paramarṣayaḥ
पुत्र और पत्नियों का भरण-पोषण और वेदों की रक्षा — इसका पालन करने वालों के लिए परमर्षि इसे श्रेष्ठ आश्रम कहते हैं।
श्लोक 16 (12.60.16)
एवं हि यो ब्राह्मणो यज्ञशीलो । गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत् । गृहस्थवृत्तिं प्रतिगाह्य सम्य । क्स्वर्गे विशुद्धं फलमश्नुते सः ॥
evaṃ hi yo brāhmaṇo yajñaśīlo | gārhasthyamadhyāvasate yathāvat | gṛhasthavṛttiṃ pratigāhya samya | ksvarge viśuddhaṃ phalamaśnute saḥ
इस प्रकार जो ब्राह्मण यज्ञशील रहकर यथाविधि गृहस्थाश्रम में रहता है और गृहस्थ-वृत्ति को भली-भाँति अपनाता है, वह स्वर्ग में शुद्ध फल पाता है।
श्लोक 17 (12.60.17)
तस्य देहं परित्यज्य इष्टकामाक्षया मताः । आनन्त्यायोपकल्पन्ते सर्वतोक्षिशिरोमुखाः ॥
tasya dehaṃ parityajya iṣṭakāmākṣayā matāḥ | ānantyāyopakalpante sarvatokṣiśiromukhāḥ
देह छोड़ने पर उसकी इच्छित कामनाएँ अक्षय मानी गई हैं; वे सब ओर आँखों, सिरों और मुखों वाली होकर अनन्त काल के लिए उसके सामने उपस्थित होती हैं।
श्लोक 18 (12.60.18)
वसन्नेको जपन्नेकः सर्वान्वेदान्युधिष्ठिर । एकस्मिन्नेव चाचार्ये शुश्रूषुर्मलपङ्कवान् ॥
vasanneko japannekaḥ sarvānvedānyudhiṣṭhira | ekasminneva cācārye śuśrūṣurmalapaṅkavān
हे युधिष्ठिर, अकेला रहता हुआ, अकेला सब वेदों का जप करता हुआ, एक ही आचार्य की सेवा चाहने वाला और मैल-कीचड़ धारण करने वाला —
श्लोक 19 (12.60.19)
ब्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी । गुरुच्छायानुगो नित्यमधीयानः सुयन्त्रितः । अविचाल्यव्रतोपेतं कृत्यं कुर्वन्वसेत्सदा ॥
brahmacārī vratī nityaṃ nityaṃ dīkṣāparo vaśī | gurucchāyānugo nityamadhīyānaḥ suyantritaḥ | avicālyavratopetaṃ kṛtyaṃ kurvanvasetsadā
ब्रह्मचारी, व्रती, नित्य दीक्षा में तत्पर और संयमी; गुरु की छाया के पीछे चलने वाला, सदा पढ़ने वाला और भली-भाँति नियमित रहता हुआ, अटल व्रतों से युक्त होकर सदा करने योग्य कर्म करता हुआ रहे।
श्लोक 20 (12.60.20)
शुश्रूषां सततं कुर्वन्गुरोः संप्रणमेत च । षट्कर्मस्वनिवृत्तश्च न प्रवृत्तश्च सर्वशः ॥
śuśrūṣāṃ satataṃ kurvanguroḥ saṃpraṇameta ca | ṣaṭkarmasvanivṛttaśca na pravṛttaśca sarvaśaḥ
वह गुरु की निरन्तर सेवा करे और उन्हें प्रणाम करे; छह कर्मों से न पूरी तरह निवृत्त हो, न सर्वथा उनमें प्रवृत्त।
श्लोक 21 (12.60.21)
नाचरत्यधिकारेण सेवेत द्विषतो न च । एषोऽऽश्रमपदस्तात ब्रह्मचारिण इष्यते ॥
nācaratyadhikāreṇa seveta dviṣato na ca | eṣo''śramapadastāta brahmacāriṇa iṣyate
वह अधिकार जताकर आचरण नहीं करता और शत्रुता रखने वालों की सेवा नहीं करता। हे तात, ब्रह्मचारी का आश्रमपद यही कहा जाता है।