शान्ति पर्व · अध्याय 61
ब्राह्मण के आश्रम और वर्जित कर्म
युधिष्ठिर अपने जैसे लोगों के लिए सुखद, कल्याणकारी और अहिंसक धर्मों का फिर उपदेश माँगते हैं। भीष्म बताते हैं कि ब्राह्मण के लिए चार आश्रम विहित हैं, और जो ब्राह्मण दूसरे वर्णों के कर्म करता है, वह इस लोक में निन्दित होता है और परलोक में नरक जाता है। तप में लगे शुद्ध ब्राह्मण के लिए लोक अविनाशी हैं। हर कर्म का फल उसके अनुरूप होता है, और मनुष्य काल की प्रेरणा से कर्म करता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.61.1)
पुनः शिवान्महोदर्कानहिंस्रांल्लोकसंमतान् । ब्रूहि धर्मान्सुखोपायान्मद्विधानां सुखावहान् ॥
punaḥ śivānmahodarkānahiṃsrāṃllokasaṃmatān | brūhi dharmānsukhopāyānmadvidhānāṃ sukhāvahān
मुझ जैसे लोगों को सुख देने वाले उन कल्याणकारी, शुभ फल देने वाले, अहिंसक और लोक-सम्मत धर्मों को, जो सुख के उपाय हैं, फिर से बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.61.2)
ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो । वर्णास्तान्नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम ॥
brāhmaṇasya tu catvārastvāśramā vihitāḥ prabho | varṇāstānnānuvartante trayo bhāratasattama
हे प्रभो, ब्राह्मण के लिए चार आश्रम विहित हैं; हे भरतश्रेष्ठ, शेष तीन वर्ण उनका अनुसरण नहीं करते।
श्लोक 3 (12.61.3)
उक्तानि कर्माणि बहूनि राज । न्स्वर्ग्याणि राजन्यपरायणानि । शास्त्रस्य सर्वस्य विधौ स्मृतानि । क्षात्रे हि सर्वं विहितं यथावत् ॥
uktāni karmāṇi bahūni rāja | nsvargyāṇi rājanyaparāyaṇāni | śāstrasya sarvasya vidhau smṛtāni | kṣātre hi sarvaṃ vihitaṃ yathāvat
हे राजन्, स्वर्ग देने वाले और क्षत्रिय को आश्रय बनाने वाले बहुत-से कर्म कहे गए हैं, जो सम्पूर्ण शास्त्र के विधान में स्मरण किए गए हैं; क्योंकि क्षत्रिय-धर्म में सब कुछ यथावत् विहित है।
श्लोक 4 (12.61.4)
क्षात्राणि वैश्यानि च सेवमानः । शौद्राणि कर्माणि च ब्राह्मणः सत् । अस्मिँल्लोके निन्दितो मन्दचेताः । परे च लोके निरयं प्रयाति ॥
kṣātrāṇi vaiśyāni ca sevamānaḥ | śaudrāṇi karmāṇi ca brāhmaṇaḥ sat | asmim̐lloke nindito mandacetāḥ | pare ca loke nirayaṃ prayāti
जो ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म करता है, वह मन्दबुद्धि इस लोक में निन्दित होता है और परलोक में नरक को जाता है।
श्लोक 5 (12.61.5)
या संज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ । विकर्मणि स्थिते विप्रे तां संज्ञां कुरु पाण्डव ॥
yā saṃjñā vihitā loke dāse śuni vṛke paśau | vikarmaṇi sthite vipre tāṃ saṃjñāṃ kuru pāṇḍava
संसार में दास, कुत्ते, भेड़िये और पशु के लिए जो नाम निश्चित है, हे पाण्डव, विकर्म में स्थित ब्राह्मण को वही नाम दो।
श्लोक 6 (12.61.6)
षट्कर्मसंप्रवृत्तस्य आश्रमेषु चतुर्ष्वपि । सर्वधर्मोपपन्नस्य तद्भूतस्य कृतात्मनः ॥
ṣaṭkarmasaṃpravṛttasya āśrameṣu caturṣvapi | sarvadharmopapannasya tadbhūtasya kṛtātmanaḥ
चारों आश्रमों में छह कर्मों में लगे हुए, सब धर्मों से युक्त, उसी में रम चुके और संस्कारित आत्मा वाले,
श्लोक 7 (12.61.7)
ब्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च । निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसंज्ञिताः ॥
brāhmaṇasya viśuddhasya tapasyabhiratasya ca | nirāśiṣo vadānyasya lokā hyakṣarasaṃjñitāḥ
शुद्ध, तप में रमे हुए, आशा से रहित और उदार ब्राह्मण के लिए लोक 'अक्षर' (अविनाशी) कहे गए हैं।
श्लोक 8 (12.61.8)
यो यस्मिन्कुरुते कर्म यादृशं येन यत्र च । तादृशं तादृशेनैव सगुणं प्रतिपद्यते ॥
yo yasminkurute karma yādṛśaṃ yena yatra ca | tādṛśaṃ tādṛśenaiva saguṇaṃ pratipadyate
जो मनुष्य जिस अवस्था में, जैसा कर्म, जिस साधन से और जहाँ करता है, वह उसी के अनुरूप, वैसा ही फल पाता है।
श्लोक 9 (12.61.9)
वृद्ध्या कृषिवणिक्त्वेन जीवसंजीवनेन च । वेत्तुमर्हसि राजेन्द्र स्वाध्यात्मगुणितेन च ॥
vṛddhyā kṛṣivaṇiktvena jīvasaṃjīvanena ca | vettumarhasi rājendra svādhyātmaguṇitena ca
हे राजेन्द्र, ब्याज, खेती-व्यापार, प्राणियों के जीवन पर जीने और अपने अन्तर के अध्यात्म से गुणित हुए फल के आधार पर तुम्हें इसे समझना चाहिए।
श्लोक 10 (12.61.10)
कालसंचोदितः काले कालपर्यायनिश्चितः । उत्तमाधममध्यानि कर्माणि कुरुतेऽवशः ॥
kālasaṃcoditaḥ kāle kālaparyāyaniścitaḥ | uttamādhamamadhyāni karmāṇi kurute'vaśaḥ
काल से प्रेरित, काल के चक्र से निश्चित हुआ मनुष्य विवश होकर समय पर उत्तम, अधम और मध्यम कर्म करता है।
श्लोक 11 (12.61.11)
अन्तवन्ति प्रदानानि परं श्रेयस्कराणि च । स्वकर्मविहितो लोको ह्यक्षरः सर्वतोमुखः ॥
antavanti pradānāni paraṃ śreyaskarāṇi ca | svakarmavihito loko hyakṣaraḥ sarvatomukhaḥ
दान नश्वर हैं, फिर भी परम कल्याण करने वाले हैं। अपने कर्म से विहित लोक अक्षय है और सब ओर मुख वाला है।