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शान्ति पर्व · अध्याय 62

वर्जित कर्म और राजधर्म की श्रेष्ठता

भीष्म ब्राह्मण के लिए वर्जित कर्मों और उन मनुष्यों को गिनाते हैं जो शूद्र के समान माने जाने चाहिए और देवकार्य में त्याज्य हैं, फिर सच्चे ब्राह्मण का लक्षण बताते हैं। वे समझाते हैं कि अन्य वर्ण राजा की अनुमति से आश्रमों में कैसे प्रवेश कर सकते हैं, और कर्तव्य पूरे कर चुका क्षत्रिय या वैश्य क्रम से आश्रमों में कैसे जा सकता है। फिर वे कहते हैं कि सब धर्म राजधर्म में समाए हैं, जैसे सब पदचिह्न हाथी के पैर में समा जाते हैं; त्याग, दीक्षा और विद्या सब उसी में हैं, और उसके बिना संसार के धर्म नष्ट हो जाएँगे।

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.62.1)

ज्याकर्षणं शत्रुनिवर्हणं च । कृषिर्वणिज्या पशुपालनं च । शुश्रूषणं चापि तथाऽर्थहेतो । रकार्यमेतत्परमं द्विजस्य ॥

jyākarṣaṇaṃ śatrunivarhaṇaṃ ca | kṛṣirvaṇijyā paśupālanaṃ ca | śuśrūṣaṇaṃ cāpi tathā'rthaheto | rakāryametatparamaṃ dvijasya

धनुष की डोरी खींचना, शत्रुओं का संहार, खेती, व्यापार, पशुपालन और धन के लिए सेवा करना — द्विज के लिए ये सर्वथा न करने योग्य कर्म हैं।

श्लोक 2 (12.62.2)

सेव्यं तु ब्रह्म षट्‌कर्म गृहस्थेन मनीषिणा । कृतकृत्यस्य चारण्ये वासो विप्रस्य शस्यते ॥

sevyaṃ tu brahma ṣaṭkarma gṛhasthena manīṣiṇā | kṛtakṛtyasya cāraṇye vāso viprasya śasyate

बुद्धिमान गृहस्थ को ब्राह्मण के छह कर्मों का सेवन करना चाहिए; और जिसके कर्तव्य पूरे हो चुके हों, उस विप्र के लिए वन में निवास श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 3 (12.62.3)

राजप्रेष्यं कृषिधनं जीवनं च वणिज्यया । कौटिल्यं कौलटेयं च ब्राह्मणस्य विगर्हितम् ॥

rājapreṣyaṃ kṛṣidhanaṃ jīvanaṃ ca vaṇijyayā | kauṭilyaṃ kaulaṭeyaṃ ca brāhmaṇasya vigarhitam

राजा की नौकरी, खेती से धन, व्यापार से जीविका, कुटिलता और कुलटाओं का आचार — ब्राह्मण के लिए ये निन्दित हैं।

श्लोक 4 (12.62.4)

शूद्रो राजन्भवति ब्रह्मबन्धु । र्दुश्चारित्रो यश्च धर्मादपेतः । वृषलीपतिः पिशुनो नर्तनश्च । ग्रामप्रेष्यो यश्च भवेद्विकर्मा ॥

śūdro rājanbhavati brahmabandhu | rduścāritro yaśca dharmādapetaḥ | vṛṣalīpatiḥ piśuno nartanaśca | grāmapreṣyo yaśca bhavedvikarmā

हे राजन्, जो ब्राह्मण नाममात्र का है, दुराचारी है और धर्म से गिरा हुआ है, वृषली का पति, चुगलखोर, नर्तक, गाँव का सेवक और निषिद्ध कर्म करने वाला है — वह शूद्र हो जाता है।

श्लोक 5 (12.62.5)

जपन्वेदानजपंश्चापि राजन् । समः शूद्रैर्दासवच्चापि भोज्यः । एते सर्वे शूद्रसमा भवन्ति । राजन्नेतान्वर्जयेद्देवकृत्ये ॥

japanvedānajapaṃścāpi rājan | samaḥ śūdrairdāsavaccāpi bhojyaḥ | ete sarve śūdrasamā bhavanti | rājannetānvarjayeddevakṛtye

वेदों का जप करे या न करे, हे राजन्, वह शूद्रों के समान है और दास की तरह भोजन कराने योग्य है। ये सब शूद्र के समान होते हैं; हे राजन्, देवकार्य में इन्हें त्याग दे।

श्लोक 6 (12.62.6)

निर्मर्यादे वाक्छठे क्रूरवृत्तौ । हिंसाकामे त्यक्तवृत्तस्वधर्मो । हव्यं कव्यं यानि चान्यानि राजन् । देयान्यदेयानि भवन्ति तस्मिन् ॥

nirmaryāde vākchaṭhe krūravṛttau | hiṃsākāme tyaktavṛttasvadharmo | havyaṃ kavyaṃ yāni cānyāni rājan | deyānyadeyāni bhavanti tasmin

जो मर्यादाहीन, वाणी का कपटी, क्रूर आचरण वाला, हिंसा चाहने वाला है और जिसने अपनी वृत्ति तथा स्वधर्म छोड़ दिया है — हे राजन्, उसके प्रति हव्य, कव्य और दूसरी देने योग्य वस्तुएँ भी न देने योग्य हो जाती हैं।

श्लोक 7 (12.62.7)

तस्माद्धर्मो विहितो ब्राह्मणस्य । दमः शौचं चार्जवं चापि राजन् । तथा विप्रस्याश्रमाः सर्व एव । पुरा राजन्ब्रह्मणा संनिसृष्टाः ॥

tasmāddharmo vihito brāhmaṇasya | damaḥ śaucaṃ cārjavaṃ cāpi rājan | tathā viprasyāśramāḥ sarva eva | purā rājanbrahmaṇā saṃnisṛṣṭāḥ

इसलिए, हे राजन्, ब्राह्मण के लिए दम, शौच और सरलता धर्म के रूप में विहित हैं; और ब्राह्मण के सभी आश्रम प्राचीन काल में ब्रह्मा ने ही रचे थे।

श्लोक 8 (12.62.8)

यः स्याद्दान्तः सोमपाश्चार्यशीलः । सानुक्रोशः सर्वसहो निराशीः । ऋजुर्मृदुरनृशंसः क्षमावान् । स वै विप्रो नेतरः पापकर्मा ॥

yaḥ syāddāntaḥ somapāścāryaśīlaḥ | sānukrośaḥ sarvasaho nirāśīḥ | ṛjurmṛduranṛśaṃsaḥ kṣamāvān | sa vai vipro netaraḥ pāpakarmā

जो संयमी, सोमपायी, श्रेष्ठ आचरण वाला, दयालु, सब कुछ सहने वाला, निष्काम, सरल, कोमल, क्रूरता से रहित और क्षमावान् है — वही ब्राह्मण है, पापकर्मी दूसरा नहीं।

श्लोक 9 (12.62.9)

विप्रं वैश्यं राजपुत्रं च राजन् । लोकाः सर्वे संश्रिता धर्मकामाः । तस्माद्वर्णाञ्जातिधर्मेषु सक्ता । ञ्जेतुं विष्णुर्नेच्छति पाण्डुपुत्र ॥

vipraṃ vaiśyaṃ rājaputraṃ ca rājan | lokāḥ sarve saṃśritā dharmakāmāḥ | tasmādvarṇāñjātidharmeṣu saktā | ñjetuṃ viṣṇurnecchati pāṇḍuputra

हे राजन्, धर्म और कामना चाहने वाले सभी लोग ब्राह्मण, वैश्य और राजपुत्र के आश्रित हैं। इसलिए हे पाण्डुपुत्र, विष्णु अपने जन्मसिद्ध धर्मों में लगे हुए वर्णों को जीतना (अर्थात् बाधित करना) नहीं चाहते।

श्लोक 10 (12.62.10)

लोकश्चायं सर्वलोकस्य न स्या । च्चातुर्वर्ण्यं वेदवादाश्च न स्युः । सर्वाश्चेज्याः सर्वलोकक्रियाश्च । सद्यः सर्वे चाश्रमाश्चैव न स्युः ॥

lokaścāyaṃ sarvalokasya na syā | ccāturvarṇyaṃ vedavādāśca na syuḥ | sarvāścejyāḥ sarvalokakriyāśca | sadyaḥ sarve cāśramāścaiva na syuḥ

यदि ऐसा न हो तो सब लोकों का यह लोक, चारों वर्ण, वेद-वाणी, सब यज्ञ, लोक की सब क्रियाएँ और सब आश्रम भी तुरन्त न रहें।

श्लोक 11 (12.62.11)

यच्च त्रयाणां वर्णानामिच्छेदाश्रमसेवनम् । कर्तुमाश्रमदृष्टांश्च धर्मास्ताञ्शृणु पाण्डव ॥

yacca trayāṇāṃ varṇānāmicchedāśramasevanam | kartumāśramadṛṣṭāṃśca dharmāstāñśṛṇu pāṇḍava

और तीनों वर्णों में जो आश्रम-सेवन की इच्छा करे, तथा आश्रमों में बताए गए जो धर्म उसे करने हैं, हे पाण्डव, उन्हें सुनो।

श्लोक 12 (12.62.12)

शुश्रूषोः कृतकार्यस्य कृतसंतानकर्मणः । अभ्यनुज्ञाप्य राजानं शूद्रस्य जगतीपते ॥

śuśrūṣoḥ kṛtakāryasya kṛtasaṃtānakarmaṇaḥ | abhyanujñāpya rājānaṃ śūdrasya jagatīpate

जिसका सेवा-कार्य पूरा हो चुका है और जिसने सन्तानोत्पत्ति का कर्म कर लिया है, ऐसे शूद्र के लिए भी, हे पृथ्वीपति, राजा की अनुमति लेकर —

श्लोक 13 (12.62.13)

अल्पान्तरगतस्यापि देशधर्मगतस्य वा । आश्रमा विहिताः सर्वे वर्जयित्वा निराशिषम् ॥

alpāntaragatasyāpi deśadharmagatasya vā | āśramā vihitāḥ sarve varjayitvā nirāśiṣam

थोड़े ही अन्तर पर खड़े हुए, या देश-धर्म के अनुसार चलने वाले के लिए भी सब आश्रम विहित हैं, केवल उस व्यक्ति को छोड़कर जो सब कल्याणकारी गुणों से रहित है।

श्लोक 14 (12.62.14)

भैक्षचर्यां नचैवाहुस्तस्य तद्धर्मवादिनः । तथा वैश्यस्य राजेन्द्र राजपुत्रस्य चैव हि ॥

bhaikṣacaryāṃ nacaivāhustasya taddharmavādinaḥ | tathā vaiśyasya rājendra rājaputrasya caiva hi

फिर भी धर्म की यह बात कहने वाले उसके लिए भिक्षाचर्या नहीं बताते; इसी प्रकार हे राजेन्द्र, वैश्य और राजपुत्र के लिए भी।

श्लोक 15 (12.62.15)

कृतकृत्यो वयोतीतो राज्ञः कृतपरिश्रमः । वैश्यो गच्छेदनुज्ञातो नृपेणाश्रमसंश्रयम् ॥

kṛtakṛtyo vayotīto rājñaḥ kṛtapariśramaḥ | vaiśyo gacchedanujñāto nṛpeṇāśramasaṃśrayam

जिसके कार्य पूरे हो गए हों, जो आयु बिता चुका हो और राजा के लिए परिश्रम कर चुका हो, ऐसा वैश्य राजा की अनुमति पाकर आश्रम-मण्डल में जाए।

श्लोक 16 (12.62.16)

वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्राणि चानघ । संतानादीनि कर्माणि कृत्वा सोमं निषेव्य च ॥

vedānadhītya dharmeṇa rājaśāstrāṇi cānagha | saṃtānādīni karmāṇi kṛtvā somaṃ niṣevya ca

हे निष्पाप, धर्मपूर्वक वेदों और राजशास्त्रों का अध्ययन करके, सन्तान आदि कर्म करके और सोम का सेवन करके,

श्लोक 17 (12.62.17)

पालयित्वा प्रजाः सर्वा धर्मेण वदतांवर । राजसूयाश्वमेधादीन्मखानन्यांस्तथैव च ॥

pālayitvā prajāḥ sarvā dharmeṇa vadatāṃvara | rājasūyāśvamedhādīnmakhānanyāṃstathaiva ca

हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, धर्म से सारी प्रजा का पालन करके, राजसूय, अश्वमेध आदि तथा अन्य यज्ञ करके,

श्लोक 18 (12.62.18)

आनयित्वा यथान्यायं विप्रेभ्यो दत्तदक्षिणः । संग्रामे विजयं प्राप्य तथाऽल्पं यदि वा बहु ॥

ānayitvā yathānyāyaṃ viprebhyo dattadakṣiṇaḥ | saṃgrāme vijayaṃ prāpya tathā'lpaṃ yadi vā bahu

विधि के अनुसार साधन जुटाकर, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर और युद्ध में थोड़ी या बहुत विजय पाकर,

श्लोक 19 (12.62.19)

स्थापयित्वा प्रजापालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव । अन्यगोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभ ॥

sthāpayitvā prajāpālaṃ putraṃ rājye ca pāṇḍava | anyagotraṃ praśastaṃ vā kṣatriyaṃ kṣatriyarṣabha

हे पाण्डव, प्रजा का पालन करने वाले पुत्र को, अथवा हे क्षत्रियश्रेष्ठ, अन्य गोत्र के किसी प्रशंसनीय क्षत्रिय को राज्य पर बैठाकर,

श्लोक 20 (12.62.20)

अर्चयित्वा पितॄञ्श्राद्धैः पितृयज्ञैर्यथाविधि । देवान्यज्ञैर्ऋषीन्वेदैरर्चयित्वा तु यत्नतः ॥

arcayitvā pitṝñśrāddhaiḥ pitṛyajñairyathāvidhi | devānyajñairṛṣīnvedairarcayitvā tu yatnataḥ

पितरों का श्राद्ध और पितृयज्ञों से विधिपूर्वक पूजन करके, देवताओं का यज्ञों से और ऋषियों का वेदाध्ययन से यत्नपूर्वक पूजन करके,

श्लोक 21 (12.62.21)

अन्तकाले च संप्राप्ते य इच्छेदाश्रमान्तरम् । सोऽनुपूर्व्याश्रमान्राजन्गत्वा सिद्धिमवाप्नुयात् ॥

antakāle ca saṃprāpte ya icchedāśramāntaram | so'nupūrvyāśramānrājangatvā siddhimavāpnuyāt

और अन्त समय आने पर जो दूसरा आश्रम चाहे, वह हे राजन्, क्रम से आश्रमों में जाकर सिद्धि पाए।

श्लोक 22 (12.62.22)

राजर्षित्वेन राजेन्द्र भैक्ष्यचर्याद्यसेवया । अपेतगृहधर्मापि चरेज्जीवितकाम्यया ॥

rājarṣitvena rājendra bhaikṣyacaryādyasevayā | apetagṛhadharmāpi carejjīvitakāmyayā

हे राजेन्द्र, राजर्षि होकर भिक्षाचर्या आदि का मार्ग अपनाकर वह गृहस्थ-धर्म छोड़ चुका होने पर भी जीवन की इच्छा से विचर सकता है।

श्लोक 23 (12.62.23)

न चैतन्नैष्ठिकं कर्म त्रयाणां भूरिदक्षिण । चतुर्णां राजशार्दूल प्राहुराश्रमवासिनाम् ॥

na caitannaiṣṭhikaṃ karma trayāṇāṃ bhūridakṣiṇa | caturṇāṃ rājaśārdūla prāhurāśramavāsinām

हे भूरि-दक्षिणा देने वाले, यह तीनों के लिए अन्तिम निष्ठा वाला कर्म नहीं है; हे राजश्रेष्ठ, इसे चारों आश्रमवासियों के लिए कहा गया है।

श्लोक 24 (12.62.24)

बाह्वायत्तं क्षत्रियैर्मानवानां । लोकश्रेष्ठं धर्ममासेवमानैः । सर्वे धर्माः सोपधर्मास्त्रयाणां । राज्ञो धर्मं नीतिशास्त्रे शृणोमि ॥

bāhvāyattaṃ kṣatriyairmānavānāṃ | lokaśreṣṭhaṃ dharmamāsevamānaiḥ | sarve dharmāḥ sopadharmāstrayāṇāṃ | rājño dharmaṃ nītiśāstre śṛṇomi

क्षत्रियों की भुजाओं पर टिके, संसार में श्रेष्ठ धर्म का पालन करने वाले राजा के धर्म के विषय में मैं नीतिशास्त्र में सुनता हूँ कि तीनों के सब धर्म अपने उप-धर्मों सहित उसी में समाए हैं।

श्लोक 25 (12.62.25)

यथा राजन्हस्तिपदे पदानि । संलीयन्ते सर्वसत्वोद्भवानि । एवं धर्मान्राजधर्मेषु सर्वान् । सर्वावस्थान्संप्रलीनान्निबोध ॥

yathā rājanhastipade padāni | saṃlīyante sarvasatvodbhavāni | evaṃ dharmānrājadharmeṣu sarvān | sarvāvasthānsaṃpralīnānnibodha

हे राजन्, जैसे हाथी के पैर में सब प्राणियों के पदचिह्न समा जाते हैं, वैसे ही समझो कि सब अवस्थाओं के सारे धर्म राजधर्म में समाए हुए हैं।

श्लोक 26 (12.62.26)

अल्पाश्रयानल्पफलान्वदन्ति । धर्मानन्यान्धर्मविदो मनुष्याः । महाश्रयं बहुकल्याणरूपं । क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुरार्याः ॥

alpāśrayānalpaphalānvadanti | dharmānanyāndharmavido manuṣyāḥ | mahāśrayaṃ bahukalyāṇarūpaṃ | kṣātraṃ dharmaṃ netaraṃ prāhurāryāḥ

धर्मज्ञ मनुष्य दूसरे धर्मों को थोड़े आश्रय और थोड़े फल वाला कहते हैं; पर श्रेष्ठ जन क्षत्रिय-धर्म को ही महान आश्रय वाला और बहुत कल्याणकारी कहते हैं, दूसरे को नहीं।

श्लोक 27 (12.62.27)

सर्वे धर्मा राजधर्मप्रधानाः । सर्वे वर्णाः पाल्यमाना भवन्ति । सर्वस्त्यागो राजधर्मेषु राजं । स्त्यागं धर्मं चाहुरग्र्यं पुराणम् ॥

sarve dharmā rājadharmapradhānāḥ | sarve varṇāḥ pālyamānā bhavanti | sarvastyāgo rājadharmeṣu rājaṃ | styāgaṃ dharmaṃ cāhuragryaṃ purāṇam

सब धर्म राजधर्म को प्रधान मानते हैं; सब वर्ण उसी से रक्षित होते हैं। राजधर्मों में सबका त्याग है, हे राजन्, और त्याग को ही प्राचीन श्रेष्ठ धर्म कहते हैं।

श्लोक 28 (12.62.28)

मज्जेत्रयी दण्डनीतौ हतायां । सर्वे धर्माः प्रक्षयेयुर्विरुद्धाः । सर्वे धर्माश्चाश्रमाणां हताः स्युः । क्षात्रे नष्टे राजधर्मे पुराणे ॥

majjetrayī daṇḍanītau hatāyāṃ | sarve dharmāḥ prakṣayeyurviruddhāḥ | sarve dharmāścāśramāṇāṃ hatāḥ syuḥ | kṣātre naṣṭe rājadharme purāṇe

दण्डनीति के नष्ट होने पर तीनों वेद डूब जाएँगे, सब धर्म विरुद्ध होकर नष्ट हो जाएँगे; और प्राचीन क्षात्रधर्म, राजधर्म के नष्ट होने पर आश्रमों के सब धर्म भी नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 29 (12.62.29)

सर्वे भोगा राजधर्मेषु दृष्टाः । सर्वा दीक्षा राजधर्मेषु चोक्ताः । सर्वा विद्या राजधर्मेषु युक्ताः । सर्वे लोका राजधर्मे प्रविष्टाः ॥

sarve bhogā rājadharmeṣu dṛṣṭāḥ | sarvā dīkṣā rājadharmeṣu coktāḥ | sarvā vidyā rājadharmeṣu yuktāḥ | sarve lokā rājadharme praviṣṭāḥ

सब भोग राजधर्म में देखे गए हैं, सब दीक्षाएँ राजधर्म में कही गई हैं, सब विद्याएँ राजधर्म में जुड़ी हैं, और सब लोक राजधर्म में प्रविष्ट हैं।

श्लोक 30 (12.62.30)

तस्माद्धर्मो राजधर्माद्विशिष्टो । नान्यो लोके विद्यतेऽजातशत्रो ॥

tasmāddharmo rājadharmādviśiṣṭo | nānyo loke vidyate'jātaśatro

इसलिए, हे अजातशत्रु, संसार में राजधर्म से बढ़कर कोई और धर्म नहीं है।

श्लोक 31 (12.62.31)

सर्वाण्येतानि कर्माणि क्षात्रे भरतसत्तम । भवन्ति जीवलोकाश्च क्षत्रधर्मे प्रतिष्ठिताः ॥

sarvāṇyetāni karmāṇi kṣātre bharatasattama | bhavanti jīvalokāśca kṣatradharme pratiṣṭhitāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, ये सब कर्म क्षात्र-धर्म में टिके हैं, और जीवलोक क्षत्रिय-धर्म में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 32 (12.62.32)

यथा जीवाः प्राकृतैर्वध्यमाना । धर्मश्रुतीनामुपपीडनाय । एवं धर्मा राजधर्मैर्वियुक्ताः । संचिन्वन्तो नाद्रियन्ते स्वधर्मम् ॥

yathā jīvāḥ prākṛtairvadhyamānā | dharmaśrutīnāmupapīḍanāya | evaṃ dharmā rājadharmairviyuktāḥ | saṃcinvanto nādriyante svadharmam

जैसे साधारण लोगों द्वारा धर्म और श्रुति को मानने वालों को पीड़ा देने के लिए प्राणी मारे जाते हैं, वैसे ही राजधर्म से कटे हुए धर्म, लोगों के संचय करते रहने पर, अपने स्वधर्म का आदर नहीं करते।

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