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शान्ति पर्व · अध्याय 63

इन्द्र द्वारा मान्धाता को क्षात्रधर्म की श्रेष्ठता का उपदेश

भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि सभी आश्रमों के धर्म क्षात्रधर्म में समाए हुए हैं, और राजा मान्धाता का वृत्तान्त सुनाते हैं, जिन्होंने नारायण के दर्शन की इच्छा से यज्ञ किया तो विष्णु इन्द्र का रूप धारण करके उनके पास आए। मान्धाता कहते हैं कि वे कामनाएँ त्यागकर वन जाना चाहते हैं; इन्द्र उत्तर देते हैं कि क्षात्रधर्म आदिदेव से सबसे पहले प्रकट हुआ, देवता भी उसी से बचाए गए, और उसके बिना अन्य धर्म, ब्राह्मण तथा लोक की व्यवस्था नष्ट हो जाती।

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.63.1)

चातुराश्रम्यधर्माश्च यतिधर्माश्च पाण्डव । लोकवेदोत्तराश्चैव क्षात्रधर्मे समाहिताः ॥

cāturāśramyadharmāśca yatidharmāśca pāṇḍava | lokavedottarāścaiva kṣātradharme samāhitāḥ

हे पाण्डव, चारों आश्रमों के धर्म, संन्यासियों के धर्म, तथा जो लोक और वेद से भी परे हैं, वे सब क्षात्रधर्म में समाए हुए हैं।

श्लोक 2 (12.63.2)

सर्वाण्येतानि कर्माणि क्षात्रे भरतसत्तम । निराशिषो जीवलोकाः क्षत्रधर्मे व्यवस्थिते ॥

sarvāṇyetāni karmāṇi kṣātre bharatasattama | nirāśiṣo jīvalokāḥ kṣatradharme vyavasthite

हे भरतश्रेष्ठ, ये सब कर्म क्षत्रिय के कार्यक्षेत्र में ही आते हैं; क्षात्रधर्म के भली-भाँति स्थापित रहने पर जीव-जगत् चिन्ताभरी आशाओं से मुक्त रहता है।

श्लोक 3 (12.63.3)

अप्रत्यक्षं बहुफलं धर्ममाश्रमवासिनाम् । प्ररूपयन्ति तद्भावमागमैरेव शाश्वतम् ॥

apratyakṣaṃ bahuphalaṃ dharmamāśramavāsinām | prarūpayanti tadbhāvamāgamaireva śāśvatam

आश्रमों में रहनेवालों का धर्म बहुत फल देनेवाला तो है, पर प्रत्यक्ष नहीं दीखता; उसके शाश्वत स्वरूप का वे केवल शास्त्रों के द्वारा ही निरूपण करते हैं।

श्लोक 4 (12.63.4)

अपरे वचनैः पुण्यैर्वादिनो लोकनिश्चये । अनिश्चयज्ञा धर्माणामदृष्टान्ते परे रताः ॥

apare vacanaiḥ puṇyairvādino lokaniścaye | aniścayajñā dharmāṇāmadṛṣṭānte pare ratāḥ

दूसरे लोग, जो पुण्य वचनों से लोक का निर्णय करने की बातें करते हैं, धर्मों के निश्चित स्वरूप को नहीं जानते और ऐसी बातों में रमे रहते हैं जिनका अन्त कभी दीखता नहीं।

श्लोक 5 (12.63.5)

प्रत्यक्षं फलभूयिष्ठमात्मसाक्षिकमच्छलम् । सर्वलोकहितं धर्मं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥

pratyakṣaṃ phalabhūyiṣṭhamātmasākṣikamacchalam | sarvalokahitaṃ dharmaṃ kṣatriyeṣu pratiṣṭhitam

परन्तु क्षत्रियों में जो धर्म प्रतिष्ठित है, वह प्रत्यक्ष है, बहुत फल देनेवाला है, अपने ही अन्तःकरण से साक्षी, छल से रहित और सारे संसार का हित करनेवाला है।

श्लोक 6 (12.63.6)

धर्माश्रमेऽध्यवसिनां ब्राह्मणानां युधिष्ठिर । यथा त्रयाणां वर्णानां संख्यातोपश्रुतिः पुरा । राजधर्मेष्वनुमता लोकाः सुचरितैः सह ॥

dharmāśrame'dhyavasināṃ brāhmaṇānāṃ yudhiṣṭhira | yathā trayāṇāṃ varṇānāṃ saṃkhyātopaśrutiḥ purā | rājadharmeṣvanumatā lokāḥ sucaritaiḥ saha

हे युधिष्ठिर, जैसे पूर्वकाल में अपने आश्रमधर्म में स्थित ब्राह्मणों और तीनों वर्णों की गणना और उनका समावेश बताया गया था, वैसे ही सत्कर्मों सहित सब लोक राजधर्मों के अन्तर्गत माने गए हैं।

श्लोक 7 (12.63.7)

उदाहृतं ते राजेन्द्र यथा विष्णुं महौजसम् । सर्वभूतेश्वरं देवं ब्राह्मं नारायणं पुरा । जग्मुः सुबहुशः शूरा राजानो दण्डनीतये ॥

udāhṛtaṃ te rājendra yathā viṣṇuṃ mahaujasam | sarvabhūteśvaraṃ devaṃ brāhmaṃ nārāyaṇaṃ purā | jagmuḥ subahuśaḥ śūrā rājāno daṇḍanītaye

हे राजेन्द्र, मैंने तुम्हें बताया कि पूर्वकाल में दण्डनीति के लिए बहुत-से शूर राजा समस्त प्राणियों के ईश्वर, महातेजस्वी, ब्राह्म देव भगवान् नारायण विष्णु के पास गए थे।

श्लोक 8 (12.63.8)

एकैकमात्मनः कर्म तुलयित्वाश्रमं पुरा । राजानः पर्युपासन्त दृष्टान्तवचने स्थिताः ॥

ekaikamātmanaḥ karma tulayitvāśramaṃ purā | rājānaḥ paryupāsanta dṛṣṭāntavacane sthitāḥ

उन राजाओं ने पूर्वकाल में अपने-अपने कर्म को आश्रम के धर्म से तौलकर, दृष्टान्त-वचन में स्थित रहते हुए उनकी उपासना की।

श्लोक 9 (12.63.9)

साध्या देवा वसवश्चाश्विनौ च । रुद्राश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । सृष्टाः पुरा ह्यादिदेवेन देवाः । क्षात्रे धर्मे वर्तयन्ते च सिद्धाः ॥

sādhyā devā vasavaścāśvinau ca | rudrāśca viśve marutāṃ gaṇāśca | sṛṣṭāḥ purā hyādidevena devāḥ | kṣātre dharme vartayante ca siddhāḥ

साध्य, देवता, वसु और दोनों अश्विनीकुमार, रुद्र, विश्वेदेव और मरुतों के गण, जिन्हें पूर्वकाल में आदिदेव ने रचा था, तथा सिद्ध भी, ये सब क्षात्रधर्म के अनुसार ही चलते हैं।

श्लोक 10 (12.63.10)

अत्र ते वर्तयिष्यामि धर्ममर्थविनिश्चये । निर्मर्यादे वर्तमाने दानवैकार्णवे पुरा ॥

atra te vartayiṣyāmi dharmamarthaviniścaye | nirmaryāde vartamāne dānavaikārṇave purā

इस विषय में धर्म और अर्थ के निर्णय के लिए मैं तुम्हें पुरानी बात सुनाता हूँ, जब सब मर्यादाएँ टूट चुकी थीं और संसार दानवों का एक ही महासागर-सा हो गया था।

श्लोक 11 (12.63.11)

बभूव राजा राजेन्द्र मान्धाता नाम वीर्यवान् । पुरा वसुमतीपालो यज्ञं चक्रे दिदृक्षया ॥

babhūva rājā rājendra māndhātā nāma vīryavān | purā vasumatīpālo yajñaṃ cakre didṛkṣayā

हे राजेन्द्र, मान्धाता नाम का एक पराक्रमी राजा हुआ, जो पृथ्वी का पालक था; उसने प्राचीन काल में दर्शन की इच्छा से एक यज्ञ किया,

श्लोक 12 (12.63.12)

अनादिमध्यनिधनं देवं नारायणं प्रभुम् । स राजा राजशार्दूल मान्धाता परमेश्वरम् ॥

anādimadhyanidhanaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ prabhum | sa rājā rājaśārdūla māndhātā parameśvaram

आदि, मध्य और अन्त से रहित देव प्रभु नारायण के। राजाओं में सिंह वह राजा मान्धाता परमेश्वर की ओर गया,

श्लोक 13 (12.63.13)

जगाम शिरसा पादौ यज्ञे विष्णोर्महात्मनः । दर्शयामास तं विष्णू रूपमास्थाय वासवम् ॥

jagāma śirasā pādau yajñe viṣṇormahātmanaḥ | darśayāmāsa taṃ viṣṇū rūpamāsthāya vāsavam

और यज्ञ में सिर झुकाकर महात्मा विष्णु के चरणों में पहुँचा। तब विष्णु ने इन्द्र का रूप धारण करके उसे दर्शन दिए।

श्लोक 14 (12.63.14)

स पार्थिवैर्वृतः सद्भिरर्चयामास तं प्रभुम् । तस्य पार्थिवसङ्घस्य तस्य चैव महात्मनः । संवादोऽयं महानासीद्विष्णुं प्रति महाद्युतिम् ॥

sa pārthivairvṛtaḥ sadbhirarcayāmāsa taṃ prabhum | tasya pārthivasaṅghasya tasya caiva mahātmanaḥ | saṃvādo'yaṃ mahānāsīdviṣṇuṃ prati mahādyutim

सज्जन राजाओं से घिरे हुए उसने उन प्रभु की पूजा की। उस राजसमूह और उस महात्मा के बीच महातेजस्वी विष्णु के विषय में यह बड़ा संवाद हुआ।

इन्द्र उवाच

श्लोक 15 (12.63.15)

किमिष्यसे धर्मभूतां वरिष्ठ । यं द्रष्टुकामोऽसि तमप्रमेयम् । अनन्तमायामितमन्त्रवीर्यं । नारायणं ह्यादिदेवं पुराणम् ॥

kimiṣyase dharmabhūtāṃ variṣṭha | yaṃ draṣṭukāmo'si tamaprameyam | anantamāyāmitamantravīryaṃ | nārāyaṇaṃ hyādidevaṃ purāṇam

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, तुम क्या चाहते हो, जो उस अप्रमेय, अनन्त माया और असीम मन्त्रशक्ति तथा पराक्रमवाले, पुराण आदिदेव नारायण को देखना चाहते हो?

श्लोक 16 (12.63.16)

नासौ देवो विश्वरूपो मयाऽपि । शक्यो द्रष्टुं ब्रह्मणा वाऽपि साक्षात् । येऽन्ये कामास्तव राजन्हृदिस्था । दास्ये चैतांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा ॥

nāsau devo viśvarūpo mayā'pi | śakyo draṣṭuṃ brahmaṇā vā'pi sākṣāt | ye'nye kāmāstava rājanhṛdisthā | dāsye caitāṃstvaṃ hi martyeṣu rājā

वे विश्वरूप देव मुझसे भी नहीं देखे जा सकते, और साक्षात् ब्रह्मा भी उन्हें नहीं देख सकते। परन्तु हे राजन्, तुम्हारे हृदय में जो और कामनाएँ हैं, उन्हें मैं पूरा करूँगा; क्योंकि तुम मनुष्यों में राजा हो।

श्लोक 17 (12.63.17)

सत्ये स्थितो धर्मपरो जितेन्द्रियः । शूरो दृढप्रीतिरतः सुराणाम् । बुद्ध्या भक्त्या चोत्तमः श्रद्धया च । ततस्तेऽहं दद्मि वरान्यथेष्टम् ॥

satye sthito dharmaparo jitendriyaḥ | śūro dṛḍhaprītirataḥ surāṇām | buddhyā bhaktyā cottamaḥ śraddhayā ca | tataste'haṃ dadmi varānyatheṣṭam

तुम सत्य में स्थित, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, शूर और देवताओं के प्रति दृढ़ प्रेम रखनेवाले हो; बुद्धि, भक्ति और श्रद्धा में भी उत्तम हो। इसलिए मैं तुम्हें इच्छानुसार वर दूँगा।

मान्धातोवाच

श्लोक 18 (12.63.18)

असंशयं भगवन्नादिदेवं । वक्ष्यामि त्वाऽहं शिरसा संप्रसाद्य । त्यक्त्वा कामान्धर्मकामो ह्यरण्य । मिच्छे गन्तुं सत्पथं साधुजुष्टम् ॥

asaṃśayaṃ bhagavannādidevaṃ | vakṣyāmi tvā'haṃ śirasā saṃprasādya | tyaktvā kāmāndharmakāmo hyaraṇya | micche gantuṃ satpathaṃ sādhujuṣṭam

हे भगवन्, निःसंदेह मैं आप आदिदेव को सिर झुकाकर प्रसन्न करके कहूँगा: कामनाओं को त्यागकर, धर्म की इच्छा से मैं वन में जाना चाहता हूँ, जो सज्जनों का सेवित सन्मार्ग है।

श्लोक 19 (12.63.19)

क्षात्राद्धर्माद्विपुलादप्रमेया । श्लोकाः प्राप्ताः स्थापितं स्वं यशश्च । धर्मो योऽसावादिदेवात्प्रवृत्तो । लोकश्रेष्ठं तं न जानामि कर्तुम् ॥

kṣātrāddharmādvipulādaprameyā | ślokāḥ prāptāḥ sthāpitaṃ svaṃ yaśaśca | dharmo yo'sāvādidevātpravṛtto | lokaśreṣṭhaṃ taṃ na jānāmi kartum

विशाल और अप्रमेय क्षात्रधर्म से मुझे कीर्तियाँ मिली हैं और मेरा अपना यश स्थिर हुआ है। परन्तु जो धर्म आदिदेव से प्रकट हुआ और लोक में सबसे श्रेष्ठ है, उसका आचरण करना मैं नहीं जानता।

इन्द्र उवाच

श्लोक 20 (12.63.20)

असैनिका धर्मपराश्च धर्मे । परां गतिं न नयन्ते ह्ययुक्तम् । क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात्प्रवृत्तः । पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥

asainikā dharmaparāśca dharme | parāṃ gatiṃ na nayante hyayuktam | kṣātro dharmo hyādidevātpravṛttaḥ | paścādanye śeṣabhūtāśca dharmāḥ

जो धर्मपरायण होकर भी सेनारहित हैं, वे धर्म में किसी को परम गति तक ठीक रीति से नहीं पहुँचा पाते। क्योंकि क्षात्रधर्म आदिदेव से सबसे पहले प्रकट हुआ; दूसरे धर्म बाद में उसके अंगरूप होकर आए।

श्लोक 21 (12.63.21)

शेषाः सृष्टा ह्यन्तवन्तो ह्यनन्ताः । सप्रस्थानाः क्षात्रधर्मा विशिष्टाः । अस्मिन्धर्मे सर्वधर्माः प्रविष्टाः । क्षात्रं धर्मं श्रेष्ठतमं वदन्ति ॥

śeṣāḥ sṛṣṭā hyantavanto hyanantāḥ | saprasthānāḥ kṣātradharmā viśiṣṭāḥ | asmindharme sarvadharmāḥ praviṣṭāḥ | kṣātraṃ dharmaṃ śreṣṭhatamaṃ vadanti

शेष धर्म सीमित रचे गए हैं और अनगिनत हैं; पर क्षात्रधर्म अपने सुस्पष्ट मार्ग के कारण सबसे विशिष्ट हैं। इस धर्म में सब धर्म समाए हुए हैं, इसलिए क्षात्रधर्म को सबसे श्रेष्ठ कहते हैं।

श्लोक 22 (12.63.22)

कर्मणा वै पुरा देवा ऋषयश्चामितौजसः । त्राताः सर्वे प्रसह्यारीन्क्षत्रधर्मेण विष्णुना ॥

karmaṇā vai purā devā ṛṣayaścāmitaujasaḥ | trātāḥ sarve prasahyārīnkṣatradharmeṇa viṣṇunā

इसी कर्म से पूर्वकाल में देवता और अपार तेजवाले ऋषि सब बचाए गए, जब विष्णु ने क्षात्रधर्म से बलपूर्वक उनके शत्रुओं को परास्त किया।

श्लोक 23 (12.63.23)

यदि ह्यसौ भगवन्नाहनिष्य । द्रिपू सर्वानसुरानप्रमेयः । न च ब्रह्मा नैव लोकादिकर्ता । सन्तो धर्माश्चादिधर्माश्च न स्युः ॥

yadi hyasau bhagavannāhaniṣya | dripū sarvānasurānaprameyaḥ | na ca brahmā naiva lokādikartā | santo dharmāścādidharmāśca na syuḥ

यदि वे अप्रमेय भगवान् सब शत्रुओं, अर्थात् असुरों को न मारते, तो न ब्रह्मा होते, न लोकों के आदिकर्ता, और न सत् धर्म तथा आदिधर्म ही रहते।

श्लोक 24 (12.63.24)

इमामुर्वी नाजयद्विक्रमेण । देवश्रेष्ठः सासुरामादिदेवः । चातुर्वर्ण्यं चातुराश्रम्यधर्माः । सर्वे न स्युर्ब्राह्मणानां विनाशात् ॥

imāmurvī nājayadvikrameṇa | devaśreṣṭhaḥ sāsurāmādidevaḥ | cāturvarṇyaṃ cāturāśramyadharmāḥ | sarve na syurbrāhmaṇānāṃ vināśāt

यदि देवश्रेष्ठ आदिदेव असुरों के अधिकारवाली इस पृथ्वी को अपने पराक्रम से न जीतते, तो ब्राह्मणों के विनाश से चारों वर्ण और चारों आश्रमों के सब धर्म न रहते।

श्लोक 25 (12.63.25)

नष्टा धर्माः शतधा शाश्वतास्ते । क्षात्रेण धर्मेण पुनः प्रवृद्धाः । युगेयुगे ह्यादिधर्माः प्रवृत्ता । लोकज्येष्ठं क्षात्रधर्मं वदन्ति ॥

naṣṭā dharmāḥ śatadhā śāśvatāste | kṣātreṇa dharmeṇa punaḥ pravṛddhāḥ | yugeyuge hyādidharmāḥ pravṛttā | lokajyeṣṭhaṃ kṣātradharmaṃ vadanti

सैकड़ों प्रकार से नष्ट हुए सनातन धर्म क्षात्रधर्म के द्वारा फिर बढ़ने लगे। युग-युग में आदिधर्म प्रकट होते रहे हैं; क्षात्रधर्म को वे लोक में सबसे ज्येष्ठ कहते हैं।

श्लोक 26 (12.63.26)

आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा । लोकज्ञानं पालनं मोक्षणं च । विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां । क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ॥

ātmatyāgaḥ sarvabhūtānukampā | lokajñānaṃ pālanaṃ mokṣaṇaṃ ca | viṣaṇṇānāṃ mokṣaṇaṃ pīḍitānāṃ | kṣātre dharme vidyate pārthivānām

आत्मत्याग, सब प्राणियों पर दया, लोक का ज्ञान, पालन और उद्धार, दुःखी और पीड़ित जनों की मुक्ति, ये सब राजाओं के क्षात्रधर्म में पाए जाते हैं।

श्लोक 27 (12.63.27)

निर्मर्यादाः काममन्युप्रवृत्ता । भीता राज्ञो नाधिगच्छन्ति पापम् । शिष्टाश्चान्ये सर्वधर्मोपपन्नाः । साध्वाचाराः साधुधर्मं वदन्ति ॥

nirmaryādāḥ kāmamanyupravṛttā | bhītā rājño nādhigacchanti pāpam | śiṣṭāścānye sarvadharmopapannāḥ | sādhvācārāḥ sādhudharmaṃ vadanti

मर्यादाहीन लोग, जो काम और क्रोध में बह जाते हैं, राजा के भय से पाप नहीं करते; और दूसरे शिष्ट, सब धर्मों से युक्त, सदाचारी लोग सज्जनों के धर्म का कथन करते हैं।

श्लोक 28 (12.63.28)

पुत्रवत्पाल्यमानानि धर्मलिङ्गानि पार्थिवैः । लोके भूतानि सर्वाणि चरन्ते नात्र संशयः ॥

putravatpālyamānāni dharmaliṅgāni pārthivaiḥ | loke bhūtāni sarvāṇi carante nātra saṃśayaḥ

धर्म के चिह्न धारण करनेवाले संसार के सब प्राणी राजाओं से पुत्र की भाँति पाले जाते हुए विचरते हैं; इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 29 (12.63.29)

सर्वधर्मपरं क्षात्रं लोकश्रेष्ठं सनातनम् । शश्वदक्षरपर्यन्तमक्षरं सर्वतोमुखम् ॥

sarvadharmaparaṃ kṣātraṃ lokaśreṣṭhaṃ sanātanam | śaśvadakṣaraparyantamakṣaraṃ sarvatomukham

क्षात्रधर्म सब धर्मों में परम, लोक में श्रेष्ठ और सनातन है; वह सदा अक्षर (मोक्ष) की सीमा तक पहुँचता है, स्वयं अक्षर है और सब ओर मुखवाला है।

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