Skip to main content

स्त्री पर्व · अध्याय 10

कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा की धृतराष्ट्र से भेंट

नगर से एक कोस आगे धृतराष्ट्र को बचे हुए तीन योद्धा — कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा — मिलते हैं। वे बताते हैं कि उनके पुत्र वीरों की तरह मरे हैं। कृप गान्धारी को सान्त्वना देते हैं, पाण्डवों के शिविर पर रात में किए गए आक्रमण की बात स्वीकार करते हैं और चेताते हैं कि पाण्डव बदला लेने आएँगे। फिर वे विदा लेकर तीन दिशाओं में चले जाते हैं — कृप हस्तिनापुर, कृतवर्मा अपने राज्य और अश्वत्थामा व्यास के आश्रम की ओर।

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (11.10.1)

क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददृशुस्तान्महारथान् । शारद्वतं कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव च ॥

krośamātraṃ tato gatvā dadṛśustānmahārathān | śāradvataṃ kṛpaṃ drauṇiṃ kṛtavarmāṇameva ca

एक कोस आगे जाकर उन्होंने उन महारथियों को देखा: शरद्वान् के पुत्र कृप, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और कृतवर्मा।

श्लोक 2 (11.10.2)

ते तु दृष्ट्वैव राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । अश्रुकण्ठा विनिःश्वस्य रुदन्तमिदमब्रुवन् ॥

te tu dṛṣṭvaiva rājānaṃ prajñācakṣuṣamīśvaram | aśrukaṇṭhā viniḥśvasya rudantamidamabruvan

प्रज्ञा ही जिनकी आँखें हैं, उन स्वामी राजा को देखते ही वे आँसुओं से रुँधे कण्ठ से आह भरकर, रोते हुए राजा से यह बोले।

कृपादय ऊचुः

श्लोक 3 (11.10.3)

पुत्रस्तव महाराज कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । गतः सानुचरो राजञ्शक्रलोकं महीपते ॥

putrastava mahārāja kṛtvā karma suduṣkaram | gataḥ sānucaro rājañśakralokaṃ mahīpate

हे महाराज, आपका पुत्र अत्यन्त कठिन कर्म करके अपने अनुचरों सहित इन्द्रलोक चला गया है, हे पृथ्वीपते।

श्लोक 4 (11.10.4)

दुर्योधनबलान्मुक्ता वयमेव त्रयो रथाः । सर्वमन्यत्परिक्षीणं सैन्यं ते भरतर्षभ ॥

duryodhanabalānmuktā vayameva trayo rathāḥ | sarvamanyatparikṣīṇaṃ sainyaṃ te bharatarṣabha

दुर्योधन की सेना में से केवल हम तीन रथी ही बच निकले हैं; हे भरतश्रेष्ठ, आपकी बाकी सारी सेना नष्ट हो चुकी है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (11.10.5)

इत्येवमुक्त्वा राजानं कृपः शारद्वतस्ततः । गान्धारीं पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत् ॥

ityevamuktvā rājānaṃ kṛpaḥ śāradvatastataḥ | gāndhārīṃ putraśokārtāmidaṃ vacanamabravīt

राजा से ऐसा कहकर शरद्वान् के पुत्र कृप ने फिर पुत्रशोक से पीड़ित गान्धारी से यह वचन कहा।

कृप उवाच

श्लोक 6 (11.10.6)

अभीता युध्यमानास्ते घ्नन्तः शत्रुगणान्बहून् । वीरकर्माणि कुर्वाणाः पुत्रास्ते निधनं गताः ॥

abhītā yudhyamānāste ghnantaḥ śatrugaṇānbahūn | vīrakarmāṇi kurvāṇāḥ putrāste nidhanaṃ gatāḥ

निर्भय होकर लड़ते हुए, शत्रुओं के बहुत-से दलों को मारते हुए और वीरों के कर्म करते हुए आपके पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 7 (11.10.7)

ध्रुवं सम्प्राप्य लोकांस्ते निर्मलाञ्शस्त्रनिर्जितान् । भास्वरं देहमास्थाय विहरन्त्यमरा इव ॥

dhruvaṃ samprāpya lokāṃste nirmalāñśastranirjitān | bhāsvaraṃ dehamāsthāya viharantyamarā iva

निश्चय ही वे शस्त्र से जीते हुए निर्मल लोकों को पाकर, तेजस्वी शरीर धारण करके देवताओं की तरह विचर रहे हैं।

श्लोक 8 (11.10.8)

सर्वे ह्यभिमुखा राज्ञि युध्यमाना हता युधि । न हि कश्चिद्धि शूराणां युध्यमानः पराङ्मुखः । शस्त्रेण निधनं प्राप्तो न च कश्चित्कृताञ्जलिः ॥

sarve hyabhimukhā rājñi yudhyamānā hatā yudhi | na hi kaściddhi śūrāṇāṃ yudhyamānaḥ parāṅmukhaḥ | śastreṇa nidhanaṃ prāpto na ca kaścitkṛtāñjaliḥ

हे रानी, वे सब युद्ध में शत्रु की ओर मुख किए लड़ते हुए मारे गए; क्योंकि लड़ते हुए उन शूरों में से कोई कभी पीठ दिखाने वाला नहीं हुआ, और न कोई हाथ जोड़े हुए शस्त्र से मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 9 (11.10.9)

एतां तां क्षत्रियस्याहुः पुराणाः परमां गतिम् । शस्त्रेण निधनं सङ्ख्ये तान्न शोचितुमर्हसि ॥

etāṃ tāṃ kṣatriyasyāhuḥ purāṇāḥ paramāṃ gatim | śastreṇa nidhanaṃ saṅkhye tānna śocitumarhasi

प्राचीन लोग क्षत्रिय की यही परम गति बताते हैं कि वह युद्ध में शस्त्र से मरे। इसलिए आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 10 (11.10.10)

न चापि शत्रवस्तेषां मुच्यन्ते राज्ञि पाण्डवाः । शृणु यत्कृतमस्माभिरश्वत्थामपुरोगमैः ॥

na cāpi śatravasteṣāṃ mucyante rājñi pāṇḍavāḥ | śṛṇu yatkṛtamasmābhiraśvatthāmapurogamaiḥ

हे रानी, उनके शत्रु पाण्डव भी छूटे हुए नहीं हैं। सुनिए, अश्वत्थामा को आगे रखकर हमने क्या किया है।

श्लोक 11 (11.10.11)

अधर्मेण हतं श्रुत्वा भीमसेनेन ते सुतम् । सुप्तं शिबिरमासाद्य पाण्डूनां कदनं कृतम् ॥

adharmeṇa hataṃ śrutvā bhīmasenena te sutam | suptaṃ śibiramāsādya pāṇḍūnāṃ kadanaṃ kṛtam

आपके पुत्र को भीमसेन द्वारा अधर्म से मारा गया सुनकर हमने सोए हुए पाण्डवों के शिविर में घुसकर उनका संहार किया।

श्लोक 12 (11.10.12)

पाञ्चाला निहताः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रौपदेयाश्च पातिताः ॥

pāñcālā nihatāḥ sarve dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | drupadasyātmajāścaiva draupadeyāśca pātitāḥ

धृष्टद्युम्न सहित सब पाञ्चाल मारे गए, और द्रुपद के पुत्र तथा द्रौपदी के पुत्र भी गिरा दिए गए।

श्लोक 13 (11.10.13)

तथा विशसनं कृत्वा पुत्रशत्रुगणस्य ते । प्राद्रवाम रणे स्थातुं न हि शक्ष्यामहे त्रयः ॥

tathā viśasanaṃ kṛtvā putraśatrugaṇasya te | prādravāma raṇe sthātuṃ na hi śakṣyāmahe trayaḥ

इस प्रकार आपके पुत्र के शत्रुओं का संहार करके हम भाग निकले, क्योंकि हम तीनों युद्ध में टिक नहीं सकेंगे।

श्लोक 14 (11.10.14)

ते हि शूरा महेष्वासाः क्षिप्रमेष्यन्ति पाण्डवाः । अमर्षवशमापन्ना वैरं प्रतिजिहीर्षवः ॥

te hi śūrā maheṣvāsāḥ kṣiprameṣyanti pāṇḍavāḥ | amarṣavaśamāpannā vairaṃ pratijihīrṣavaḥ

वे शूर और महाधनुर्धर पाण्डव क्रोध के वश में होकर वैर का बदला लेने की इच्छा से शीघ्र ही आएँगे।

श्लोक 15 (11.10.15)

ते हतानात्मजाञ्श्रुत्वा प्रमत्ताः पुरुषर्षभाः । अन्विष्यन्तः पदं शूराः क्षिप्रमेष्यन्ति पाण्डवाः ॥

te hatānātmajāñśrutvā pramattāḥ puruṣarṣabhāḥ | anviṣyantaḥ padaṃ śūrāḥ kṣiprameṣyanti pāṇḍavāḥ

अपने पुत्रों को मारा गया सुनकर वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव आपे में न रहते हुए हमारा पता खोजते हुए शीघ्र ही आ पहुँचेंगे।

श्लोक 16 (11.10.16)

तेषां तु किल्बिषं कृत्वा संस्थातुं नोत्सहामहे । अनुजानीहि नो राज्ञि मा च शोके मनः कृथाः ॥

teṣāṃ tu kilbiṣaṃ kṛtvā saṃsthātuṃ notsahāmahe | anujānīhi no rājñi mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ

उनका अपराध करके हम यहाँ ठहरने का साहस नहीं करते। हे रानी, हमें जाने की आज्ञा दीजिए और अपने मन को शोक में न डालिए।

श्लोक 17 (11.10.17)

राजंस्त्वमनुजानीहि धैर्यमातिष्ठ चोत्तमम् । दिष्टान्तं पश्य चापि त्वं क्षात्रं धर्मं च केवलम् ॥

rājaṃstvamanujānīhi dhairyamātiṣṭha cottamam | diṣṭāntaṃ paśya cāpi tvaṃ kṣātraṃ dharmaṃ ca kevalam

हे राजन्, आप भी हमें आज्ञा दीजिए और परम धैर्य धारण कीजिए। दैव द्वारा नियत अन्त को देखिए और केवल क्षत्रिय-धर्म को देखिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (11.10.18)

इत्येवमुक्त्वा राजानं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च भारत ॥

ityevamuktvā rājānaṃ kṛtvā cābhipradakṣiṇam | kṛpaśca kṛtavarmā ca droṇaputraśca bhārata

राजा से ऐसा कहकर और उनकी प्रदक्षिणा करके, हे भारत, कृप, कृतवर्मा और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने

श्लोक 19 (11.10.19)

अवेक्षमाणा राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् । गङ्गामनु महाराज तूर्णमश्वानचोदयन् ॥

avekṣamāṇā rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ manīṣiṇam | gaṅgāmanu mahārāja tūrṇamaśvānacodayan

बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र की ओर देखते हुए, हे महाराज, गंगा के किनारे-किनारे तेज़ी से अपने घोड़े हाँक दिए।

श्लोक 20 (11.10.20)

अपक्रम्य तु ते राजन्सर्व एव महारथाः । आमन्त्र्यान्योन्यमुद्विग्नास्त्रिधा ते प्रययुस्तदा ॥

apakramya tu te rājansarva eva mahārathāḥ | āmantryānyonyamudvignāstridhā te prayayustadā

हे राजन्, वे सब महारथी वहाँ से हटकर, उद्विग्न होकर एक-दूसरे से विदा लेकर तीन दिशाओं में चल पड़े।

श्लोक 21 (11.10.21)

जगाम हास्तिनपुरं कृपः शारद्वतस्तदा । स्वमेव राष्ट्रं हार्दिक्यो द्रौणिर्व्यासाश्रमं ययौ ॥

jagāma hāstinapuraṃ kṛpaḥ śāradvatastadā | svameva rāṣṭraṃ hārdikyo drauṇirvyāsāśramaṃ yayau

शरद्वान् के पुत्र कृप हस्तिनापुर गए, हृदीक के पुत्र कृतवर्मा अपने ही राज्य को गए, और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा व्यास के आश्रम को गए।

श्लोक 22 (11.10.22)

एवं ते प्रययुर्वीरा वीक्षमाणाः परस्परम् । भयार्ताः पाण्डुपुत्राणामागस्कृत्वा महात्मनाम् ॥

evaṃ te prayayurvīrā vīkṣamāṇāḥ parasparam | bhayārtāḥ pāṇḍuputrāṇāmāgaskṛtvā mahātmanām

इस प्रकार वे वीर एक-दूसरे को देखते हुए चले, महात्मा पाण्डवों का अपराध करने के कारण भय से पीड़ित होकर।

श्लोक 23 (11.10.23)

समेत्य वीरा राजानं तदा त्वनुदिते रवौ । विप्रजग्मुर्महात्मानो यथेष्टकमरिन्दमाः ॥

sametya vīrā rājānaṃ tadā tvanudite ravau | viprajagmurmahātmāno yatheṣṭakamarindamāḥ

राजा से मिलकर वे महात्मा, शत्रुओं का दमन करने वाले वीर, सूर्योदय से पहले ही अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग चल दिए।

श्लोक 24 (11.10.24)

समासाद्याथ वै द्रौणिं पाण्डुपुत्रा महारथाः । व्यजयंस्ते रणे राजन्विक्रम्य तदनन्तरम् ॥

samāsādyātha vai drauṇiṃ pāṇḍuputrā mahārathāḥ | vyajayaṃste raṇe rājanvikramya tadanantaram

उसके बाद पाण्डु के पुत्र महारथियों ने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को आ घेरा और, हे राजन्, पराक्रम दिखाकर उसे युद्ध में परास्त किया।

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11