स्त्री पर्व · अध्याय 9
धृतराष्ट्र का रणभूमि की ओर प्रस्थान
जनमेजय पूछते हैं कि व्यास के चले जाने के बाद धृतराष्ट्र ने क्या किया। स्तब्ध राजा विदुर से गान्धारी, कुन्ती और भरतवंश की सब स्त्रियों को बुलवाते हैं और रथ पर चढ़ते हैं। शोक से व्याकुल स्त्रियाँ महलों से निकल पड़ती हैं और विदुर उन्हें नगर से बाहर ले जाते हैं। रोते हुए नगरवासियों से घिरे राजा मृतकों की रणभूमि की ओर चल पड़ते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (11.9.1)
गते व्यासे तु धर्मात्मा धृतराष्ट्रो महीपतिः । किमचेष्टत विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
gate vyāse tu dharmātmā dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | kimaceṣṭata viprarṣe tanme vyākhyātumarhasi
हे विप्रर्षि, व्यास के चले जाने पर धर्मात्मा राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया? कृपा करके मुझे यह बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (11.9.2)
एतच्छ्रुत्वा नरश्रेष्ठश्चिरं ध्यात्वा त्वचेतनः । सञ्जयं योजयेत्युक्त्वा विदुरं प्रत्यभाषत ॥
etacchrutvā naraśreṣṭhaściraṃ dhyātvā tvacetanaḥ | sañjayaṃ yojayetyuktvā viduraṃ pratyabhāṣata
यह सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र देर तक सोच में डूबे रहे, उनकी चेतना मानो जाती रही थी। फिर संजय से सवारी तैयार करने को कहकर उन्होंने विदुर से कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (11.9.3)
क्षिप्रमानय गान्धारीं सर्वाश्च भरतस्त्रियः । कुन्तीं चैव तथा क्षत्तः समानय ममाऽन्तिकम् ॥
kṣipramānaya gāndhārīṃ sarvāśca bharatastriyaḥ | kuntīṃ caiva tathā kṣattaḥ samānaya mamā'ntikam
हे क्षत्ता, गान्धारी को और भरतवंश की सब स्त्रियों को शीघ्र ले आओ, और कुन्ती को भी मेरे पास ले आओ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (11.9.4)
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा विदुरं धर्मवित्तमम् । शोकविप्रहतज्ञानो यानमेवान्वरोहत ॥
evamuktvā sa dharmātmā viduraṃ dharmavittamam | śokaviprahatajñāno yānamevānvarohata
धर्म को जानने वालों में श्रेष्ठ विदुर से ऐसा कहकर, शोक से ज्ञान खो बैठे वे धर्मात्मा राजा अपनी सवारी पर चढ़ गए।
श्लोक 5 (11.9.5)
गान्धारी पुत्रशोकार्ता भर्तुर्वचननोदिता । सह कुन्त्या यतो राजा सह स्त्रीभिरुपाद्रवत् ॥
gāndhārī putraśokārtā bharturvacananoditā | saha kuntyā yato rājā saha strībhirupādravat
पुत्रों के शोक से पीड़ित गान्धारी, पति के वचन से प्रेरित होकर, कुन्ती तथा अन्य स्त्रियों के साथ वहाँ दौड़ी चली आईं जहाँ राजा थे।
श्लोक 6 (11.9.6)
ताः समासाद्य राजानं भृशं शोकसमन्विताः । आमन्त्र्यान्योन्यमायस्ता भृशमुच्चुक्रुशुस्ततः ॥
tāḥ samāsādya rājānaṃ bhṛśaṃ śokasamanvitāḥ | āmantryānyonyamāyastā bhṛśamuccukruśustataḥ
गहरे शोक में डूबी हुई वे स्त्रियाँ राजा के पास पहुँचकर, एक-दूसरे को पुकारती हुई, थकी-हारी ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगीं।
श्लोक 7 (11.9.7)
ताः समाश्वासयत्क्षत्ता ताभ्यश्चार्ततरः स्वयम् । अश्रुकण्ठीः समारोप्य ततोऽसौ निर्ययौ पुरात् ॥
tāḥ samāśvāsayatkṣattā tābhyaścārtataraḥ svayam | aśrukaṇṭhīḥ samāropya tato'sau niryayau purāt
क्षत्ता विदुर ने स्वयं उनसे भी अधिक दुखी होते हुए उन्हें ढाढ़स बँधाया, और आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाली उन स्त्रियों को सवारियों पर चढ़ाकर वे नगर से बाहर निकले।
श्लोक 8 (11.9.8)
ततः प्रणादः सञ्जज्ञे सर्वेषु कुरुवेश्मसु । आकुमारं पुरं सर्वमभवच्छोककर्शितम् ॥
tataḥ praṇādaḥ sañjajñe sarveṣu kuruveśmasu | ākumāraṃ puraṃ sarvamabhavacchokakarśitam
तब कुरुओं के सब घरों में आर्तनाद उठ खड़ा हुआ, और बच्चों तक सारा नगर शोक से क्षीण हो गया।
श्लोक 9 (11.9.9)
अदृष्टपूर्वा या नार्यः पुरा देवगणैरपि । पृथग्जनेन दृश्यन्ते तास्तदा निहतेश्वराः ॥
adṛṣṭapūrvā yā nāryaḥ purā devagaṇairapi | pṛthagjanena dṛśyante tāstadā nihateśvarāḥ
जिन स्त्रियों को पहले देवताओं के समूह तक ने कभी नहीं देखा था, वे अपने स्वामियों के मारे जाने पर तब साधारण लोगों को भी दिखाई देने लगीं।
श्लोक 10 (11.9.10)
प्रकीर्य केशान्सुशुभान्भूषणान्यवमुच्य च । एकवस्त्रधरा नार्यः परिपेतुरनाथवत् ॥
prakīrya keśānsuśubhānbhūṣaṇānyavamucya ca | ekavastradharā nāryaḥ paripeturanāthavat
अपने सुन्दर केश बिखेरकर और आभूषण उतारकर वे स्त्रियाँ, एक-एक वस्त्र पहने, अनाथों की तरह इधर-उधर भागने लगीं।
श्लोक 11 (11.9.11)
श्वेतपर्वतरूपेभ्यो गृहेभ्यस्ता निराक्रमन् । गुहाभ्य इव शैलानां पृषत्यो हतयूथपाः ॥
śvetaparvatarūpebhyo gṛhebhyastā nirākraman | guhābhya iva śailānāṃ pṛṣatyo hatayūthapāḥ
श्वेत पर्वतों जैसे अपने भवनों से वे इस प्रकार निकलीं, जैसे यूथपति के मारे जाने पर चित्तीदार हरिणियाँ पर्वतों की गुफाओं से निकलती हैं।
श्लोक 12 (11.9.12)
तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेकशः । शोकार्तान्यद्रवन्राजन्किशोरीणामिवाङ्गणे ॥
tānyudīrṇāni nārīṇāṃ tadā vṛndānyanekaśaḥ | śokārtānyadravanrājankiśorīṇāmivāṅgaṇe
हे राजन्, शोक से पीड़ित स्त्रियों के वे अनेक झुंड उमड़कर ऐसे दौड़ पड़े, जैसे आँगन में बछेड़ियाँ दौड़ती हैं।
श्लोक 13 (11.9.13)
प्रगृह्य बाहून्क्रोशन्त्यः पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄनपि । दर्शयन्ति हता हि स्म युगान्ते लोकसङ्क्षयम् ॥
pragṛhya bāhūnkrośantyaḥ putrānbhrātṝnpitṝnapi | darśayanti hatā hi sma yugānte lokasaṅkṣayam
बाँहें उठाकर पुत्रों, भाइयों और पिताओं के लिए चीखती हुई, आघात से टूटी वे स्त्रियाँ मानो युगान्त में संसार के संहार को दिखा रही थीं।
श्लोक 14 (11.9.14)
विलपन्त्यो रुदन्त्यश्च धावमानास्ततस्ततः । शोकेनोपहतज्ञानाः कर्तव्यं न प्रजज्ञिरे ॥
vilapantyo rudantyaśca dhāvamānāstatastataḥ | śokenopahatajñānāḥ kartavyaṃ na prajajñire
विलाप करती, रोती और इधर-उधर दौड़ती हुई वे शोक से चेतना खो बैठीं और यह न जान सकीं कि क्या करना चाहिए।
श्लोक 15 (11.9.15)
व्रीडां जग्मुः पुरा याः स्म सखीनामपि योषितः । ता एकवस्त्रा निर्लज्जाः श्वश्रूणां पुरतोऽभवन् ॥
vrīḍāṃ jagmuḥ purā yāḥ sma sakhīnāmapi yoṣitaḥ | tā ekavastrā nirlajjāḥ śvaśrūṇāṃ purato'bhavan
जो स्त्रियाँ पहले अपनी सखियों के सामने भी लज्जा से सिकुड़ती थीं, वे ही अब एक-एक वस्त्र में, लज्जा छोड़कर, अपनी सासों के सामने खड़ी थीं।
श्लोक 16 (11.9.16)
परस्परं सुसूक्ष्मेषु शोकेष्वाश्वासयन्ति याः । ताः शोकविह्वला राजन्नवैक्षन्त परस्परम् ॥
parasparaṃ susūkṣmeṣu śokeṣvāśvāsayanti yāḥ | tāḥ śokavihvalā rājannavaikṣanta parasparam
जो छोटे-से-छोटे दुःखों में भी एक-दूसरे को ढाढ़स बँधाती थीं, हे राजन्, वे अब शोक से व्याकुल होकर बस एक-दूसरे का मुँह देखती रहीं।
श्लोक 17 (11.9.17)
ताभिः परिवृतो राजा रुदतीभिः सहस्रशः । निर्ययौ नगराद्दीनस्तूर्णमायोधनं प्रति ॥
tābhiḥ parivṛto rājā rudatībhiḥ sahasraśaḥ | niryayau nagarāddīnastūrṇamāyodhanaṃ prati
हज़ारों रोती हुई स्त्रियों से घिरे हुए दुखी राजा नगर से निकलकर शीघ्र ही रणभूमि की ओर चले।
श्लोक 18 (11.9.18)
शिल्पिनो वणिजो वैश्याः सर्वे कर्मोपजीविनः । ते पार्थिवं पुरस्कृत्य निर्ययुर्नगराद्बहिः ॥
śilpino vaṇijo vaiśyāḥ sarve karmopajīvinaḥ | te pārthivaṃ puraskṛtya niryayurnagarādbahiḥ
कारीगर, व्यापारी, वैश्य और अपने-अपने कर्म से जीविका चलाने वाले सब लोग राजा को आगे करके नगर से बाहर निकल पड़े।
श्लोक 19 (11.9.19)
तेषां विक्रोशमानानामार्तानां कुरुसङ्क्षये । प्रादुरासीन्महाञ्शब्दो व्यथयन्भुवनान्युत ॥
teṣāṃ vikrośamānānāmārtānāṃ kurusaṅkṣaye | prādurāsīnmahāñśabdo vyathayanbhuvanānyuta
कुरुओं के विनाश पर विलाप करते हुए उन दुखी लोगों का ऐसा महान् कोलाहल उठा, जो लोकों को व्यथित कर रहा था।
श्लोक 20 (11.9.20)
युगान्तकाले सम्प्राप्ते भूतानां दह्यतामिव । अभावस्योदयः प्राप्त इति भूतानि मेनिरे ॥
yugāntakāle samprāpte bhūtānāṃ dahyatāmiva | abhāvasyodayaḥ prāpta iti bhūtāni menire
प्राणियों को लगा कि युगान्त का समय आ पहुँचा है, वे मानो जल रहे हैं और सब कुछ के लोप का क्षण आ गया है।
श्लोक 21 (11.9.21)
भृशमुद्विग्नमनसस्ते पौराः कुरुसङ्क्षये । प्राक्रोशन्त महाराज स्वनुरक्तास्तदा भृशम् ॥
bhṛśamudvignamanasaste paurāḥ kurusaṅkṣaye | prākrośanta mahārāja svanuraktāstadā bhṛśam
कुरुओं के विनाश से अत्यन्त उद्विग्न मन वाले नगरवासी, जो उनसे गहरा प्रेम रखते थे, हे महाराज, ज़ोर-ज़ोर से रो उठे।