स्त्री पर्व · अध्याय 8
व्यास द्वारा धृतराष्ट्र को सान्त्वना
विदुर की बातें सुनकर धृतराष्ट्र मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं; होश आने पर वे विलाप करते हैं और प्राण त्याग देने की बात कहते हैं। तब व्यास उनके पास आकर बताते हैं कि उन्होंने देवताओं की सभा में स्वयं क्या देखा-सुना था: पृथ्वी ने भार से पीड़ित होकर देवताओं से अपना वचन पूरा करने को कहा, और विष्णु ने उत्तर दिया कि गान्धारी के गर्भ से कलि के अंश रूप में उत्पन्न दुर्योधन राजाओं के विनाश का कारण बनेगा। व्यास स्मरण कराते हैं कि नारद ने यह सब युधिष्ठिर को पहले ही बता दिया था, कि धृतराष्ट्र के पुत्र अपने ही अपराध से नष्ट हुए, और कि दैव को लौटाया नहीं जा सकता; वे उन्हें पाण्डवों के लिए जीवित रहने को कहते हैं। धृतराष्ट्र उपदेश मान लेते हैं और व्यास अन्तर्धान हो जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (11.8.1)
विदुरस्य तु तद्वाक्यं निशम्य कुरुसत्तमः । पुत्रशोकाभिसन्तप्तः पपात भुवि मूर्छितः ॥
vidurasya tu tadvākyaṃ niśamya kurusattamaḥ | putraśokābhisantaptaḥ papāta bhuvi mūrchitaḥ
वैशम्पायन ने कहा — विदुर की वह बात सुनकर कुरुओं में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र पुत्र-शोक से सन्तप्त होकर मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 2 (11.8.2)
तं तथा पतितं भूमौ निःसंज्ञं प्रेक्ष्य बान्धवाः । कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षत्ता च विदुरस्तथा ॥
taṃ tathā patitaṃ bhūmau niḥsaṃjñaṃ prekṣya bāndhavāḥ | kṛṣṇadvaipāyanaścaiva kṣattā ca vidurastathā
उन्हें इस प्रकार भूमि पर अचेत पड़ा देखकर उनके बन्धु — कृष्ण द्वैपायन और मन्त्री विदुर —
श्लोक 3 (11.8.3)
सञ्जयः सुहृदश्चान्ये द्वास्था ये चास्य सम्मताः । जलेन सुखशीतेन तालवृन्तैश्च भारत ॥
sañjayaḥ suhṛdaścānye dvāsthā ye cāsya sammatāḥ | jalena sukhaśītena tālavṛntaiśca bhārata
और सञ्जय, अन्य मित्र तथा उनके विश्वासपात्र द्वारपाल, हे भारत! सुखद शीतल जल और ताड़ के पंखों से
श्लोक 4 (11.8.4)
पस्पर्शुश्च करैर्गात्रं वीजमानाश्च यत्नतः । अन्वासत चिरं कालं धृतराष्ट्रं तथाविधम् ॥
pasparśuśca karairgātraṃ vījamānāśca yatnataḥ | anvāsata ciraṃ kālaṃ dhṛtarāṣṭraṃ tathāvidham
हाथों से उनके शरीर को सहलाते और यत्न से पंखा झलते हुए बहुत देर तक उस अवस्था में पड़े धृतराष्ट्र के पास बैठे रहे।
श्लोक 5 (11.8.5)
अथ दीर्घस्य कालस्य लब्धसञ्ज्ञो महीपतिः । विललाप चिरं कालं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥
atha dīrghasya kālasya labdhasañjño mahīpatiḥ | vilalāpa ciraṃ kālaṃ putrādhibhirabhiplutaḥ
बहुत समय बाद राजा को होश आया और वे पुत्रों की चिन्ताओं से घिरे हुए देर तक विलाप करते रहे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 6 (11.8.6)
धिगस्तु खलु मानुष्यं मानुष्ये च परिग्रहम् । यतोमूलानि दुःखानि सम्भवन्ति पुनःपुनः ॥
dhigastu khalu mānuṣyaṃ mānuṣye ca parigraham | yatomūlāni duḥkhāni sambhavanti punaḥpunaḥ
धृतराष्ट्र ने कहा — धिक्कार है मनुष्य-जीवन को, और मनुष्य-जीवन के इस मोह-बन्धन को, जिसकी जड़ से दुःख बार-बार उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 7 (11.8.7)
मित्रनाशेऽर्थनाशे च ज्ञातिसम्बन्धिनामपि । प्राप्यते सुमहद्दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो ॥
mitranāśe'rthanāśe ca jñātisambandhināmapi | prāpyate sumahadduḥkhaṃ viṣāgnipratimaṃ vibho
मित्रों के नाश, धन के नाश और जाति-बन्धुओं तथा सम्बन्धियों के नाश में विष और अग्नि के समान अत्यन्त भारी दुःख प्राप्त होता है, हे विभो,
श्लोक 8 (11.8.8)
येन दह्यन्ति गात्राणि येन प्रज्ञा विनश्यति । येनाभिभूतः पुरुषो मरणं प्रतिपद्यते ॥
yena dahyanti gātrāṇi yena prajñā vinaśyati | yenābhibhūtaḥ puruṣo maraṇaṃ pratipadyate
जिससे अंग जलते हैं, जिससे बुद्धि नष्ट हो जाती है, और जिससे अभिभूत हुआ पुरुष मृत्यु को प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (11.8.9)
तदिदं मरणं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात् । तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥
tadidaṃ maraṇaṃ prāptaṃ mayā bhāgyaviparyayāt | tasyāntaṃ nādhigacchāmi ṛte prāṇavimokṣaṇāt
भाग्य के उलटे पड़ जाने से यही मृत्यु जैसा संकट मुझ पर आ पड़ा है। प्राणों के छूट जाने के सिवा मुझे इसका कोई अन्त नहीं दिखता।
श्लोक 10 (11.8.10)
तच्चैवाहं करिष्यामि अद्यैव द्विजसत्तम । इत्युक्त्वा तु महात्मानं पितरं ब्रह्मवित्तमम् ॥
taccaivāhaṃ kariṣyāmi adyaiva dvijasattama | ityuktvā tu mahātmānaṃ pitaraṃ brahmavittamam
"और वही मैं आज ही करूँगा, हे द्विजश्रेष्ठ।" अपने महात्मा पिता, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ व्यास से यह कहकर
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (11.8.11)
धृतराष्ट्रोऽभवन्मूढः स शोकं परमं गतः । अभूच्च तूष्णीं राजाऽसौ ध्यायमानो महीपतिः ॥
dhṛtarāṣṭro'bhavanmūḍhaḥ sa śokaṃ paramaṃ gataḥ | abhūcca tūṣṇīṃ rājā'sau dhyāyamāno mahīpatiḥ
धृतराष्ट्र मूढ़ से हो गए, परम शोक में डूब गए; और राजा चुप होकर चिन्ता में लीन हो गए।
श्लोक 12 (11.8.12)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । पुत्रशोकाभिसन्तप्तं पुत्रं वचनमब्रवीत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā kṛṣṇadvaipāyanaḥ prabhuḥ | putraśokābhisantaptaṃ putraṃ vacanamabravīt
उनकी वह बात सुनकर प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने पुत्र-शोक से सन्तप्त अपने पुत्र से यह वचन कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 13 (11.8.13)
धृतराष्ट्र महाबाहो शृणु वक्ष्यामि पुत्रक । श्रुतवानसि मेधावी धर्मार्थकुशलः प्रभो ॥
dhṛtarāṣṭra mahābāho śṛṇu vakṣyāmi putraka | śrutavānasi medhāvī dharmārthakuśalaḥ prabho
व्यास ने कहा — महाबाहु धृतराष्ट्र! पुत्र! सुनो, मैं कहता हूँ। तुमने बहुत सुना है, तुम बुद्धिमान हो, धर्म और अर्थ में कुशल हो, प्रभो।
श्लोक 14 (11.8.14)
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्वेदितव्यं परन्तप । अनित्यतां हि भूतानां विजानासि न संशयः ॥
na te'styaviditaṃ kiñcidveditavyaṃ parantapa | anityatāṃ hi bhūtānāṃ vijānāsi na saṃśayaḥ
हे परन्तप! तुम्हारे लिए ऐसा कुछ नहीं जो जानने योग्य हो और तुमने न जाना हो। प्राणियों की अनित्यता को तुम निस्सन्देह जानते हो।
श्लोक 15 (11.8.15)
अध्रुवे जीवलोके च स्थाने वा शाश्वते सति । जीविते मरणान्ते च कस्माच्छोचसि पुत्रक ॥
adhruve jīvaloke ca sthāne vā śāśvate sati | jīvite maraṇānte ca kasmācchocasi putraka
जब जीव-लोक अनित्य है, और यहाँ की स्थिति शाश्वत नहीं है, तथा जीवन का अन्त मरण में होता है, तब हे पुत्र! तुम शोक क्यों करते हो?
श्लोक 16 (11.8.16)
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र वैरस्यास्य समुद्भवः । पुत्रं ते कारणं कृत्वा कालयोगेन निर्मितः ॥
pratyakṣaṃ tava rājendra vairasyāsya samudbhavaḥ | putraṃ te kāraṇaṃ kṛtvā kālayogena nirmitaḥ
हे राजेन्द्र! इस वैर की उत्पत्ति तुम्हारी आँखों के सामने हुई; काल के योग से तुम्हारे पुत्र को निमित्त बनाकर यह रचा गया।
श्लोक 17 (11.8.17)
अवश्यं भवितव्ये च कुरूणां सङ्क्षये नृप । कस्माच्छोचसि ताञ्शूरान्गतान्परमिकां गतिम् ॥
avaśyaṃ bhavitavye ca kurūṇāṃ saṅkṣaye nṛpa | kasmācchocasi tāñśūrāngatānparamikāṃ gatim
जब कुरुओं का संहार अवश्य होने वाला था, हे राजन्! तब परम गति को गए उन शूरों के लिए तुम क्यों शोक करते हो?
श्लोक 18 (11.8.18)
जानता च महाबाहो विदुरेण महात्मना । यतितं सर्वयत्नेन शमं प्रति जनेश्वर ॥
jānatā ca mahābāho vidureṇa mahātmanā | yatitaṃ sarvayatnena śamaṃ prati janeśvara
हे जनेश्वर! महात्मा विदुर ने यह जानते हुए भी शान्ति के लिए पूरा प्रयत्न किया।
श्लोक 19 (11.8.19)
न च दैवकृतो मार्गः शक्यो भूतेन केनचित् । घटताऽपि चिरं कालं नियन्तुमिति मे मतिः ॥
na ca daivakṛto mārgaḥ śakyo bhūtena kenacit | ghaṭatā'pi ciraṃ kālaṃ niyantumiti me matiḥ
फिर भी मेरा मत है कि दैव से बने मार्ग को कोई भी प्राणी, चाहे वह बहुत समय तक यत्न करे, रोक नहीं सकता।
श्लोक 20 (11.8.20)
देवतानां हि यत्कार्यं मया प्रत्यक्षतः श्रुतम् । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा स्थैर्यं भवेत्तव ॥
devatānāṃ hi yatkāryaṃ mayā pratyakṣataḥ śrutam | tatte'haṃ sampravakṣyāmi yathā sthairyaṃ bhavettava
देवताओं का जो कार्य था, वह मैंने स्वयं प्रत्यक्ष सुना था; वही तुम्हें बताता हूँ, जिससे तुम्हें स्थिरता प्राप्त हो।
श्लोक 21 (11.8.21)
पुराऽहं परितो यातः सभामैन्द्रीं जितक्लमः । अपश्यं तत्र च सदा समवेतान्दिवौकसः ॥
purā'haṃ parito yātaḥ sabhāmaindrīṃ jitaklamaḥ | apaśyaṃ tatra ca sadā samavetāndivaukasaḥ
बहुत पहले मैं घूमता हुआ, थकान से रहित होकर इन्द्र की सभा में गया, और वहाँ मैंने एकत्र हुए देवताओं को देखा,
श्लोक 22 (11.8.22)
नारदप्रमुखांश्चापि सर्वान्देवर्षिसत्तमान् । तत्र चापि मया दृष्टा पृथिवी पृथिवीपते ॥
nāradapramukhāṃścāpi sarvāndevarṣisattamān | tatra cāpi mayā dṛṣṭā pṛthivī pṛthivīpate
और नारद को आगे रखे सब श्रेष्ठ देवर्षियों को भी; और हे पृथ्वीपते! वहाँ मैंने पृथ्वी को भी देखा,
श्लोक 23 (11.8.23)
कार्यार्थमुपसम्पन्ना देवतानां समीपतः । उपगम्य तदा धात्री देवानाह समागतान् ॥
kāryārthamupasampannā devatānāṃ samīpataḥ | upagamya tadā dhātrī devānāha samāgatān
जो किसी कार्य के लिए देवताओं के समीप आई हुई थी। पास जाकर उस धात्री (पृथ्वी) ने तब एकत्र हुए देवताओं से कहा:
पृथिव्युवाच
श्लोक 24 (11.8.24)
यत्कार्यं मम युष्माभिर्ब्रह्मणः सदने तदा । प्रतिज्ञातं महाभागास्तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥
yatkāryaṃ mama yuṣmābhirbrahmaṇaḥ sadane tadā | pratijñātaṃ mahābhāgāstacchīghraṃ saṃvidhīyatām
"हे महाभाग देवताओ! उस समय ब्रह्मा के भवन में आप लोगों ने मेरा जो कार्य करने की प्रतिज्ञा की थी, उसे शीघ्र पूरा कीजिए।"
व्यास उवाच
श्लोक 25 (11.8.25)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुर्लोकनमस्कृतः । उवाच वाक्यं प्रहसन्प्रभुस्तां देवसंसदि ॥
tasyāstadvacanaṃ śrutvā viṣṇurlokanamaskṛtaḥ | uvāca vākyaṃ prahasanprabhustāṃ devasaṃsadi
उसकी वह बात सुनकर लोकवन्दित भगवान् विष्णु ने देवसभा में हँसते हुए उससे कहा:
विष्णुरुवाच
श्लोक 26 (11.8.26)
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां यस्तु ज्येष्ठः शतस्य वै । दुर्योधन इति ख्यातः स ते कार्यं करिष्यति ॥
dhṛtarāṣṭrasya putrāṇāṃ yastu jyeṣṭhaḥ śatasya vai | duryodhana iti khyātaḥ sa te kāryaṃ kariṣyati
"धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में जो सबसे बड़ा है और दुर्योधन नाम से प्रसिद्ध है, वह तुम्हारा कार्य करेगा।
श्लोक 27 (11.8.27)
तं च प्राप्य महीपालं कृतकृत्या भविष्यसि । तस्यार्थे पृथिवीपालाः कुरुक्षेत्रं समागताः ॥
taṃ ca prāpya mahīpālaṃ kṛtakṛtyā bhaviṣyasi | tasyārthe pṛthivīpālāḥ kurukṣetraṃ samāgatāḥ
उस राजा को पाकर तुम कृतकृत्य हो जाओगी। उसी के लिए पृथ्वी के राजा कुरुक्षेत्र में एकत्र होंगे,
श्लोक 28 (11.8.28)
अन्योन्यं घातयिष्यन्ति दृढैः शस्त्रैः प्रहारिणः । ततस्ते भविता देवि भारस्य युधि नाशनम् ॥
anyonyaṃ ghātayiṣyanti dṛḍhaiḥ śastraiḥ prahāriṇaḥ | tataste bhavitā devi bhārasya yudhi nāśanam
और दृढ़ शस्त्रों से प्रहार करते हुए वे एक-दूसरे को मार डालेंगे। इस प्रकार, हे देवी! युद्ध में तुम्हारे भार का नाश हो जाएगा।
श्लोक 29 (11.8.29)
गच्छ शीघ्रं स्वकं स्थानं लोकान्धारय शोभने ॥
gaccha śīghraṃ svakaṃ sthānaṃ lokāndhāraya śobhane
अब तुम शीघ्र अपने स्थान को जाओ और हे शोभने! लोकों को धारण करो।"
व्यास उवाच
श्लोक 30 (11.8.30)
स एष ते सुतो राजँल्लोकसंहारकारणात् ॥
sa eṣa te suto rājam̐llokasaṃhārakāraṇāt
हे राजन्! वही यह तुम्हारा पुत्र है, जो लोकों के संहार के कारण रूप में उत्पन्न हुआ है —
श्लोक 31 (11.8.31)
कलेरंशः समुत्पन्नो गान्धार्या जठरे नृप । अमर्षी बलवाञ्शूरः क्रोधनो दुष्प्रसाधनः ॥
kaleraṃśaḥ samutpanno gāndhāryā jaṭhare nṛpa | amarṣī balavāñśūraḥ krodhano duṣprasādhanaḥ
गान्धारी के गर्भ से उत्पन्न कलि का अंश, हे राजन्! जो असहनशील, बलवान्, शूर, क्रोधी और कठिनाई से मनाया जाने वाला है।
श्लोक 32 (11.8.32)
दैवयोगात्समुत्पन्ना भ्रातरस्तस्य तादृशाः । शकुनिर्मातुलश्चैव कर्णश्च परमः सखा ॥
daivayogātsamutpannā bhrātarastasya tādṛśāḥ | śakunirmātulaścaiva karṇaśca paramaḥ sakhā
दैव के योग से उसके वैसे ही भाई उत्पन्न हुए, और उसका मामा शकुनि तथा परम मित्र कर्ण भी।
श्लोक 33 (11.8.33)
समुत्पन्ना विनाशार्थं पृथिव्यां सहिता नृपाः । यादृशो जायते राजा तादृशोऽस्य जनो भवेत् ॥
samutpannā vināśārthaṃ pṛthivyāṃ sahitā nṛpāḥ | yādṛśo jāyate rājā tādṛśo'sya jano bhavet
पृथ्वी पर राजा लोग एक साथ उसके विनाश के लिए उत्पन्न हुए हैं। जैसा राजा उत्पन्न होता है, वैसी ही उसकी प्रजा होती है।
श्लोक 34 (11.8.34)
अधर्मो धर्मतां याति स्वामी चेद्धार्मिको भवेत् । स्वामिनो गुणदोषाभ्यां भृत्याः स्युर्नात्र संशयः ॥
adharmo dharmatāṃ yāti svāmī ceddhārmiko bhavet | svāmino guṇadoṣābhyāṃ bhṛtyāḥ syurnātra saṃśayaḥ
यदि स्वामी धार्मिक हो तो अधर्म भी धर्म बन जाता है; सेवक स्वामी के गुण-दोषों के अनुसार ही होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 35 (11.8.35)
दुष्टं राजानमासाद्य गतास्ते तनया नृप । एतमर्थं महाबाहो नारदो वेद तत्त्ववित् ॥
duṣṭaṃ rājānamāsādya gatāste tanayā nṛpa | etamarthaṃ mahābāho nārado veda tattvavit
एक दुष्ट राजा के आश्रय में जाकर तुम्हारे पुत्र नष्ट हो गए, हे राजन्! हे महाबाहो! तत्त्व को जानने वाले नारद इस बात को जानते हैं।
श्लोक 36 (11.8.36)
आत्मापराधात्पुत्रास्ते विनष्टाः पृथिवीपते । मा ताञ्शोचस्व राजेन्द्र न हि शोकेऽस्ति कारणम् ॥
ātmāparādhātputrāste vinaṣṭāḥ pṛthivīpate | mā tāñśocasva rājendra na hi śoke'sti kāraṇam
हे पृथ्वीपते! तुम्हारे पुत्र अपने ही अपराध से नष्ट हुए। हे राजेन्द्र! उनके लिए शोक मत करो, शोक का कोई कारण नहीं है।
श्लोक 37 (11.8.37)
न हि ते पाण्डवाः स्वल्पमपराध्यन्ति भारत । पुत्रास्तव दुरात्मानो यैरियं घातिता मही ॥
na hi te pāṇḍavāḥ svalpamaparādhyanti bhārata | putrāstava durātmāno yairiyaṃ ghātitā mahī
हे भारत! पाण्डवों ने थोड़ा-सा भी अपराध नहीं किया; तुम्हारे दुरात्मा पुत्रों ने ही इस पृथ्वी का संहार करवाया है।
श्लोक 38 (11.8.38)
नारदेन च भद्रं ते पूर्वमेव न संशयः । युधिष्ठिरस्य समितौ राजसूये निवेदितम् ॥
nāradena ca bhadraṃ te pūrvameva na saṃśayaḥ | yudhiṣṭhirasya samitau rājasūye niveditam
तुम्हारा कल्याण हो! नारद ने यह बात बहुत पहले, निस्सन्देह, युधिष्ठिर की सभा में राजसूय यज्ञ के समय कह दी थी।
श्लोक 39 (11.8.39)
पाण्डवाः कौरवाः सर्वे समासाद्य परस्परम् । न भविष्यन्ति कौन्तेय यत्ते कृत्यं तदाचर ॥
pāṇḍavāḥ kauravāḥ sarve samāsādya parasparam | na bhaviṣyanti kaunteya yatte kṛtyaṃ tadācara
"पाण्डव और कौरव सब एक-दूसरे से भिड़कर नहीं रहेंगे, हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारा जो कर्तव्य हो, वह करो।"
श्लोक 40 (11.8.40)
नारदस्य वचः श्रुत्वा तथाऽकुर्वत पाण्डवाः । एतत्ते सर्वमाख्यातं देवगुह्यं सनातनम् ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā tathā'kurvata pāṇḍavāḥ | etatte sarvamākhyātaṃ devaguhyaṃ sanātanam
नारद की बात सुनकर पाण्डवों ने वैसा ही किया। देवताओं का यह सनातन रहस्य मैंने तुम्हें पूरा बता दिया।
श्लोक 41 (11.8.41)
कथं ते शोकनाशः स्यात्प्राणेषु च दया प्रभो । स्नेहश्च पाण्डुपुत्रेषु ज्ञात्वा दैवकृतं विधिम् ॥
kathaṃ te śokanāśaḥ syātprāṇeṣu ca dayā prabho | snehaśca pāṇḍuputreṣu jñātvā daivakṛtaṃ vidhim
अब दैव द्वारा रचे इस विधान को जानकर तुम्हारा शोक कैसे मिटे, और अपने प्राणों पर दया तथा पाण्डुपुत्रों पर स्नेह कैसे जगे, प्रभो?
श्लोक 42 (11.8.42)
एष चार्थो महाबाहो पूर्वमेव मया श्रुतः । कथितो धर्मराजस्य राजसूये कुरूत्तम ॥
eṣa cārtho mahābāho pūrvameva mayā śrutaḥ | kathito dharmarājasya rājasūye kurūttama
हे महाबाहो, कुरुश्रेष्ठ! यह बात मैंने भी पहले ही सुनी थी; राजसूय के समय यह धर्मराज को बताई गई थी।
श्लोक 43 (11.8.43)
यतितं धर्मपुत्रेण मया गुह्ये निवेदिते । अविग्रहे कौरवाणां दैवं तु बलवत्तरम् ॥
yatitaṃ dharmaputreṇa mayā guhye nivedite | avigrahe kauravāṇāṃ daivaṃ tu balavattaram
यह गुप्त बात कहे जाने पर धर्मपुत्र ने कौरवों में कलह न हो, इसका यत्न किया; किन्तु दैव अधिक बलवान् है।
श्लोक 44 (11.8.44)
अनतिक्रमणीयो हि विधी राजन्कथञ्चन । कृतान्तस्य तु भूतेन स्थावरेण चरेण च ॥
anatikramaṇīyo hi vidhī rājankathañcana | kṛtāntasya tu bhūtena sthāvareṇa careṇa ca
हे राजन्! कृतान्त (काल) का विधान किसी भी प्राणी से, चाहे वह स्थावर हो या चर, किसी प्रकार लाँघा नहीं जा सकता।
श्लोक 45 (11.8.45)
भवान्धर्मपरो यत्र बुद्धिश्रेष्ठश्च भारत । मुह्यते प्राणिनां ज्ञात्वा गतिं चागतिमेव च ॥
bhavāndharmaparo yatra buddhiśreṣṭhaśca bhārata | muhyate prāṇināṃ jñātvā gatiṃ cāgatimeva ca
हे भारत! तुम धर्म में तत्पर और बुद्धि में श्रेष्ठ हो, फिर भी प्राणियों के आने-जाने की गति को जानकर भी मोहित हो रहे हो।
श्लोक 46 (11.8.46)
त्वां तु शोकेन सन्तप्तं मुह्यमानं मुहुर्मुहुः । ज्ञात्वा युधिष्ठिरो राजा प्राणानपि परित्यजेत् ॥
tvāṃ tu śokena santaptaṃ muhyamānaṃ muhurmuhuḥ | jñātvā yudhiṣṭhiro rājā prāṇānapi parityajet
तुम्हें शोक से सन्तप्त और बार-बार मोहित होते जानकर राजा युधिष्ठिर अपने प्राण भी त्याग सकते हैं।
श्लोक 47 (11.8.47)
कृपालुर्नित्यशो वीरस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि । स कथं त्वयि राजेन्द्र कृपां नैव करिष्यति ॥
kṛpālurnityaśo vīrastiryagyonigateṣvapi | sa kathaṃ tvayi rājendra kṛpāṃ naiva kariṣyati
वे वीर सदा दयालु हैं, पशु-पक्षी आदि योनियों में गए प्राणियों पर भी। हे राजेन्द्र! वे तुम पर दया क्यों न करेंगे?
श्लोक 48 (11.8.48)
मम चैव नियोगेन विधेश्चाप्यनिवर्तनात् । पाण्डवानां च कारुण्यात्प्राणान्धारय भारत ॥
mama caiva niyogena vidheścāpyanivartanāt | pāṇḍavānāṃ ca kāruṇyātprāṇāndhāraya bhārata
मेरी आज्ञा से, विधि के अटल होने से और पाण्डवों पर करुणा करके, हे भारत! तुम अपने प्राणों को धारण करो।
श्लोक 49 (11.8.49)
एवं ते वर्तमानस्य लोके कीर्तिर्भविष्यति । धर्मार्थः सुमहांस्तात तप्तं स्याच्च तपश्चिरात् ॥
evaṃ te vartamānasya loke kīrtirbhaviṣyati | dharmārthaḥ sumahāṃstāta taptaṃ syācca tapaścirāt
इस प्रकार रहने से संसार में तुम्हारी कीर्ति होगी; हे तात! तुम्हें महान् धर्म और लाभ मिलेगा, और मानो तुमने बहुत समय तक तप किया हो।
श्लोक 50 (11.8.50)
पुत्रशोकं समुत्पन्नं हुताशं ज्वलितं यथा । प्रज्ञाम्भसा महाराज निर्वापय सदा सता ॥
putraśokaṃ samutpannaṃ hutāśaṃ jvalitaṃ yathā | prajñāmbhasā mahārāja nirvāpaya sadā satā
हे महाराज! पुत्र-शोक रूपी जो अग्नि प्रज्वलित हो उठी है, उसे प्रज्ञा रूपी जल से सदा सज्जन की भाँति बुझा दो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (11.8.51)
तच्छ्रुत्वा तस्य वचनं व्यासस्यामिततेजसः । मुहूर्तं समनुध्यायन्धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत ॥
tacchrutvā tasya vacanaṃ vyāsasyāmitatejasaḥ | muhūrtaṃ samanudhyāyandhṛtarāṣṭro'bhyabhāṣata
वैशम्पायन ने कहा — अपरिमित तेज वाले व्यास की वह बात सुनकर धृतराष्ट्र ने एक क्षण विचार करके कहा:
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 52 (11.8.52)
महता शोकजालेन प्रणुन्नोऽस्मि द्विजोत्तम । नात्मानमवबुध्यामि मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ॥
mahatā śokajālena praṇunno'smi dvijottama | nātmānamavabudhyāmi muhyamāno muhurmuhuḥ
धृतराष्ट्र ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! मैं शोक के विशाल जाल में बह गया हूँ। बार-बार मोहित होकर मैं अपने आपको भी नहीं पहचान पाता।
श्लोक 53 (11.8.53)
इदं तु वचनं श्रुत्वा तव देवनियोगजम् । धारयिष्याम्यहं प्राणान्यतिष्ये च न शोचितुं ॥
idaṃ tu vacanaṃ śrutvā tava devaniyogajam | dhārayiṣyāmyahaṃ prāṇānyatiṣye ca na śocituṃ
किन्तु देवताओं के विधान से उत्पन्न आपकी यह बात सुनकर मैं अपने प्राण धारण करूँगा और शोक न करने का यत्न करूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (11.8.54)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः सत्यवतीसुतः । धृतराष्ट्रस्य राजेन्द्र तत्रैवान्तरधीयत ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ vyāsaḥ satyavatīsutaḥ | dhṛtarāṣṭrasya rājendra tatraivāntaradhīyata
ये वचन सुनकर सत्यवती के पुत्र व्यास, हे राजेन्द्र! धृतराष्ट्र के सामने ही वहीं अन्तर्धान हो गए।