स्त्री पर्व · अध्याय 7
शरीर रूपी रथ और अभयदान
दृष्टान्त से प्रसन्न धृतराष्ट्र और सुनना चाहते हैं। विदुर संसार को एक लम्बे मार्ग के रूप में बताते हैं, जिसके पड़ाव गर्भवास हैं और जिसके हिंसक पशु रोग, बुढ़ापा और बीतता हुआ समय हैं। वे शरीर को रथ और इन्द्रियों को उसके घोड़े बताते हैं; जो बुद्धि से उन्हें थामता है, वही संसार-चक्र में घूमने से बचता है। राज्य, मित्रों और पुत्रों का नाश सबके साथ होता है; उसकी औषधि ज्ञान, दम, त्याग और अप्रमाद है, और सबसे बढ़कर सब प्राणियों को अभय देना, जिसका फल हज़ार यज्ञों से भी बढ़कर है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (11.7.1)
अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना । भूय एव तु मे हर्षः श्रोतुं वागमृतं तव ॥
aho'bhihitamākhyānaṃ bhavatā tattvadarśinā | bhūya eva tu me harṣaḥ śrotuṃ vāgamṛtaṃ tava
धृतराष्ट्र ने कहा — अहो! आप तत्त्वदर्शी ने कैसा आख्यान सुनाया। आपकी अमृतमयी वाणी को सुनने की मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ती जा रही है।
विदुर उवाच
श्लोक 2 (11.7.2)
शृणु भूयः प्रवक्ष्यामि मार्गस्यैतस्य विस्तरम् । यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसाराद्धि विचक्षणाः ॥
śṛṇu bhūyaḥ pravakṣyāmi mārgasyaitasya vistaram | yacchrutvā vipramucyante saṃsārāddhi vicakṣaṇāḥ
विदुर ने कहा — सुनिए, मैं इस मार्ग का और विस्तार से वर्णन करता हूँ, जिसे सुनकर विवेकी लोग संसार से पूरी तरह छूट जाते हैं।
श्लोक 3 (11.7.3)
यथा तु पुरुषो राजन्दीर्घमध्वानमास्थितः । क्वचित्क्वचिच्छ्रमस्थानं कुरुते वासमेव वा ॥
yathā tu puruṣo rājandīrghamadhvānamāsthitaḥ | kvacitkvacicchramasthānaṃ kurute vāsameva vā
हे राजन्! जैसे लम्बे मार्ग पर चला हुआ पुरुष कहीं-कहीं थकान मिटाने के लिए ठहरता है, या वहीं निवास भी कर लेता है,
श्लोक 4 (11.7.4)
एवं संसारपर्याये गर्भवासेषु भारत । कुर्वन्ति दुर्बुधा वासं मुच्यन्ते तत्र पण्डिताः ॥
evaṃ saṃsāraparyāye garbhavāseṣu bhārata | kurvanti durbudhā vāsaṃ mucyante tatra paṇḍitāḥ
वैसे ही, हे भारत! संसार के इस चक्र में गर्भवासों में मूर्ख लोग बस जाते हैं, जबकि पण्डित उनसे छूट जाते हैं।
श्लोक 5 (11.7.5)
तस्मादध्वानमेवैतमाहुः शास्त्रविदो जनाः । यत्तत्संसारगहनं वनमाहुर्मनीषिणः ॥
tasmādadhvānamevaitamāhuḥ śāstravido janāḥ | yattatsaṃsāragahanaṃ vanamāhurmanīṣiṇaḥ
इसीलिए शास्त्र जानने वाले लोग इसे मार्ग कहते हैं, और जो संसार का गहन है, उसे मनीषी वन कहते हैं।
श्लोक 6 (11.7.6)
सोयं लोकसमावर्तो मर्त्यानां भरतर्षभ । चराणां स्थावराणां च न गृध्येत्तत्र पण्डितः ॥
soyaṃ lokasamāvarto martyānāṃ bharatarṣabha | carāṇāṃ sthāvarāṇāṃ ca na gṛdhyettatra paṇḍitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! यही मनुष्यों के लोक का आवर्त है। चर और अचर किसी भी वस्तु में पण्डित को लालच नहीं करना चाहिए।
श्लोक 7 (11.7.7)
शारीरा मानसाश्चैव मर्त्यानां व्याधयश्च ये । प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता बुधैः ॥
śārīrā mānasāścaiva martyānāṃ vyādhayaśca ye | pratyakṣāśca parokṣāśca te vyālāḥ kathitā budhaiḥ
मनुष्यों के जो शारीरिक और मानसिक रोग हैं, प्रत्यक्ष भी और अप्रत्यक्ष भी, उन्हें ज्ञानियों ने हिंसक पशु कहा है।
श्लोक 8 (11.7.8)
क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं मार्यमाणाश्च भारत । स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धयः ॥
kliśyamānāśca tairnityaṃ māryamāṇāśca bhārata | svakarmabhirmahāvyālairnodvijantyalpabuddhayaḥ
अपने कर्मों से बने उन बड़े हिंसक पशुओं द्वारा सदा सताए और मारे जाते हुए भी अल्पबुद्धि लोग घबराते नहीं।
श्लोक 9 (11.7.9)
अथापि तैर्विमुच्येत व्याधिभिः पुरुषो नृप । आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ॥
athāpi tairvimucyeta vyādhibhiḥ puruṣo nṛpa | āvṛṇotyeva taṃ paścājjarā rūpavināśinī
और यदि पुरुष उन रोगों से छूट भी जाए, हे राजन्! तो रूप का नाश करने वाला बुढ़ापा बाद में उसे घेर लेता है।
श्लोक 10 (11.7.10)
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धैश्च विविधैरपि । मज्जमानं महापङ्के निरालम्बे समन्ततः ॥
śabdarūparasasparśagandhaiśca vividhairapi | majjamānaṃ mahāpaṅke nirālambe samantataḥ
शब्द, रूप, रस, स्पर्श और नाना प्रकार के गन्धों के कारण वह एक बड़े कीचड़ में डूबता है, जहाँ चारों ओर कोई सहारा नहीं।
श्लोक 11 (11.7.11)
संवत्सरर्तवो मासाः पक्षाहोरात्रसन्धयः । क्रमेणास्य प्रलुम्पन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥
saṃvatsarartavo māsāḥ pakṣāhorātrasandhayaḥ | krameṇāsya pralumpanti rūpamāyustathaiva ca
वर्ष, ऋतुएँ, मास, पक्ष, दिन-रात और उनकी सन्धियाँ क्रम से उसका रूप और उसकी आयु छीनती जाती हैं।
श्लोक 12 (11.7.12)
एते कालस्य विधयो नैताञ्जानन्ति दुर्बुधाः । धात्राऽभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ॥
ete kālasya vidhayo naitāñjānanti durbudhāḥ | dhātrā'bhilikhitānyāhuḥ sarvabhūtāni karmaṇā
ये काल की व्यवस्थाएँ हैं; मूर्ख लोग इन्हें नहीं जानते। कहते हैं कि सब प्राणी अपने कर्म के अनुसार विधाता द्वारा यहाँ लिख दिए गए हैं।
श्लोक 13 (11.7.13)
रथः शरीरं भूतानां सत्वमाहुस्तु सारथिम् । इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्मबुद्धिस्तु रश्मयः ॥
rathaḥ śarīraṃ bhūtānāṃ satvamāhustu sārathim | indriyāṇi hayānāhuḥ karmabuddhistu raśmayaḥ
कहते हैं कि प्राणियों का शरीर रथ है, मन सारथी है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, और कर्म की ओर ले जाने वाली बुद्धि लगाम है।
श्लोक 14 (11.7.14)
तेषां हयानां यो वेगं धावतामनु धावति । सतु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत्परिवर्तते ॥
teṣāṃ hayānāṃ yo vegaṃ dhāvatāmanu dhāvati | satu saṃsāracakre'smiṃścakravatparivartate
जो उन दौड़ते हुए घोड़ों के वेग के पीछे दौड़ता है, वह इस संसार-चक्र में चक्र की तरह घूमता रहता है।
श्लोक 15 (11.7.15)
यस्तान्संयमते बुद्ध्या संयतो न निवर्तते । यस्तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत्परिवर्तते ॥
yastānsaṃyamate buddhyā saṃyato na nivartate | yastu saṃsāracakre'smiṃścakravatparivartate
जो बुद्धि से उन्हें वश में रखता है, वह संयमी लौटकर नहीं आता; पर दूसरा इस संसार-चक्र में चक्र की तरह घूमता ही रहता है।
श्लोक 16 (11.7.16)
भ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते । संसारे भ्रमतां राजन्दुःखमेतद्धि जायते ॥
bhramamāṇā na muhyanti saṃsāre na bhramanti te | saṃsāre bhramatāṃ rājanduḥkhametaddhi jāyate
जो घूमते हुए भी मोहित नहीं होते, वे संसार में सचमुच नहीं घूमते। हे राजन्! संसार में भटकने वालों को ही यह दुःख होता है।
श्लोक 17 (11.7.17)
तस्मादस्य निवृत्त्यर्थं यत्नमेवाचरेद्बुधः । उपेक्षा नात्र कर्तव्या शतशाखः प्रवर्धते ॥
tasmādasya nivṛttyarthaṃ yatnamevācaredbudhaḥ | upekṣā nātra kartavyā śataśākhaḥ pravardhate
इसलिए बुद्धिमान को उससे निवृत्त होने के लिए प्रयत्न ही करना चाहिए। इसमें उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह सैकड़ों शाखाओं में बढ़ता है।
श्लोक 18 (11.7.18)
यतेन्द्रियो नरो राजन्क्रोधलोभनिराकृतः । सन्तुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ॥
yatendriyo naro rājankrodhalobhanirākṛtaḥ | santuṣṭaḥ satyavādī yaḥ sa śāntimadhigacchati
हे राजन्! जो पुरुष इन्द्रियों को जीत चुका है, क्रोध और लोभ से रहित है, सन्तुष्ट और सत्यवादी है, वह शान्ति पाता है।
श्लोक 19 (11.7.19)
याम्यमाहू रथं ह्येनं मुह्यन्ते येन दुर्बुधाः । स चैतत्प्राप्नुयाद्राजन्यत्त्वं प्राप्तो नराधिप ॥
yāmyamāhū rathaṃ hyenaṃ muhyante yena durbudhāḥ | sa caitatprāpnuyādrājanyattvaṃ prāpto narādhipa
इसे यम का रथ कहा गया है, जिससे मूर्ख लोग मोहित होते हैं; और हे राजन्, हे नराधिप! उस पर चलने वाला वही पाता है जो आपने पाया है:
श्लोक 20 (11.7.20)
अनुतर्षुलमेवैतद्दुःखं भवति मारिष । राज्यनाशः सुहृन्नाशः सुतनाशश्च भारत । साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमारभेत् ॥
anutarṣulamevaitadduḥkhaṃ bhavati māriṣa | rājyanāśaḥ suhṛnnāśaḥ sutanāśaśca bhārata | sādhuḥ paramaduḥkhānāṃ duḥkhabhaiṣajyamārabhet
हे आर्य! यह दुःख तृष्णा को बढ़ाने वाला ही है: राज्य का नाश, मित्रों का नाश और पुत्रों का नाश, हे भारत! सज्जन को अपने सबसे बड़े दुःखों की औषधि का आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 21 (11.7.21)
ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् । छिन्द्याद्दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ॥
jñānauṣadhamavāpyeha dūrapāraṃ mahauṣadham | chindyādduḥkhamahāvyādhiṃ naraḥ saṃyatamānasaḥ
यहाँ ज्ञान रूपी औषधि को पाकर, जो दूर तक पार ले जाने वाली महान् औषधि है, संयत मन वाला मनुष्य दुःख रूपी महारोग को काट डाले।
श्लोक 22 (11.7.22)
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः । तस्मान्मोचयते दुःखाद्यथात्मा स्थिरनिश्चयः ॥
na vikramo na cāpyartho na mitraṃ na suhṛjjanaḥ | tasmānmocayate duḥkhādyathātmā sthiraniścayaḥ
न पराक्रम, न धन, न मित्र, न बन्धु-जन ही मनुष्य को दुःख से उस प्रकार छुड़ाते हैं, जैसे दृढ़ निश्चय वाला अपना आत्मा छुड़ाता है।
श्लोक 23 (11.7.23)
तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापदि भारत । दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥
tasmānmaitraṃ samāsthāya śīlamāpadi bhārata | damastyāgo'pramādaśca te trayo brahmaṇo hayāḥ
इसलिए, हे भारत! मित्रता का और आपत्ति में शील का आश्रय लेकर चलो; दम, त्याग और अप्रमाद, ये तीन ब्रह्म के घोड़े हैं।
श्लोक 24 (11.7.24)
शीलरश्मिसमायुक्ते स्थितो यो मानसे रथे । त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन्ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥
śīlaraśmisamāyukte sthito yo mānase rathe | tyaktvā mṛtyubhayaṃ rājanbrahmalokaṃ sa gacchati
जो शील की लगामों से जुते मन रूपी रथ पर स्थित है, वह मृत्यु का भय छोड़कर, हे राजन्! ब्रह्मलोक को जाता है।
श्लोक 25 (11.7.25)
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति महीपते । स गच्छति परं स्थानं विष्णोः पदमनामयम् ॥
abhayaṃ sarvabhūtebhyo yo dadāti mahīpate | sa gacchati paraṃ sthānaṃ viṣṇoḥ padamanāmayam
हे महीपते! जो सब प्राणियों को अभय देता है, वह परम स्थान को, विष्णु के निर्मल पद को जाता है।
श्लोक 26 (11.7.26)
न तत्क्रतुसहस्रेण नोपवासैश्च नित्यशः । अभयस्य च दानेन यत्फलं प्राप्नुयान्नरः ॥
na tatkratusahasreṇa nopavāsaiśca nityaśaḥ | abhayasya ca dānena yatphalaṃ prāpnuyānnaraḥ
हज़ार यज्ञों से भी नहीं, और निरन्तर उपवासों से भी नहीं, मनुष्य को वह फल मिलता है जो अभय के दान से मिलता है।
श्लोक 27 (11.7.27)
न ह्यात्मनः प्रियतरं किञ्चिद्भूतेषु निश्चितम् । अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत ॥
na hyātmanaḥ priyataraṃ kiñcidbhūteṣu niścitam | aniṣṭaṃ sarvabhūtānāṃ maraṇaṃ nāma bhārata
प्राणियों में अपने आत्मा से बढ़कर प्रिय कुछ भी निश्चित नहीं है; और हे भारत! मृत्यु सब प्राणियों को सबसे अप्रिय है।
श्लोक 28 (11.7.28)
तस्मात्सर्वेषु भूतेषु दया कार्या विपश्चिता ॥
tasmātsarveṣu bhūteṣu dayā kāryā vipaścitā
इसलिए विद्वान् को सब प्राणियों पर दया करनी चाहिए।
श्लोक 29 (11.7.29)
नानायोगसमायुक्ता बुद्धिजालेन संवृताः । असूक्ष्मदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्रतत्र ह । सुसूक्ष्मदृष्टयो राजन्व्रजन्ति ब्रह्मसाम्यताम् ॥
nānāyogasamāyuktā buddhijālena saṃvṛtāḥ | asūkṣmadṛṣṭayo mandā bhrāmyante tatratatra ha | susūkṣmadṛṣṭayo rājanvrajanti brahmasāmyatām
नाना प्रकार के योगों में लगे, बुद्धि के जाल में लिपटे, सूक्ष्म दृष्टि से रहित मूढ़ लोग इधर-उधर भटकते हैं; पर हे राजन्! अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि वाले ब्रह्म की समानता को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 30 (11.7.30)
एवं ज्ञात्वा महाप्राज्ञ स तेषामौर्ध्वदैहिकम् । कर्तुमर्हति तेनैव फलं प्राप्स्यति वै भवान् ॥
evaṃ jñātvā mahāprājña sa teṣāmaurdhvadaihikam | kartumarhati tenaiva phalaṃ prāpsyati vai bhavān
हे महाप्राज्ञ! यह जानकर आपको उनके लिए उत्तर-कर्म (और्ध्वदैहिक) करना चाहिए; उसी से आपको फल प्राप्त होगा।