स्त्री पर्व · अध्याय 6
विदुर द्वारा वन के दृष्टान्त की व्याख्या
वन में कुएँ में लटके मनुष्य की दशा से द्रवित धृतराष्ट्र पूछते हैं कि ऐसा स्थान कहाँ है और वह मनुष्य उससे कैसे छूट सकता है। विदुर दृष्टान्त की एक-एक बात खोलकर समझाते हैं: वन संसार है, हिंसक पशु रोग हैं, स्त्री वृद्धावस्था है, कुआँ शरीर है, नाग काल है, लता जीने की आशा है, छह मुखों वाला हाथी वर्ष है, चूहे दिन और रात हैं, तथा मधुमक्खियाँ और मधु कामनाएँ और उनके रस हैं। जो बुद्धिमान इस घूमते चक्र को समझ लेते हैं, वे उसके बन्धन काट देते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (11.6.1)
अहो खलु महद्दुःखं कृच्छ्रवासं वसत्यसौ । कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ॥
aho khalu mahadduḥkhaṃ kṛcchravāsaṃ vasatyasau | kathaṃ tasya ratistatra tuṣṭirvā vadatāṃ vara
धृतराष्ट्र ने कहा — अहो, यह तो बड़ा भारी दुःख है! वह कैसे कठिन कष्ट में जी रहा है। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! वहाँ उसे सुख या सन्तोष कैसे मिल सकता है?
श्लोक 2 (11.6.2)
स देशः क्वनु यत्रासौ वसते धर्मसङ्कटे । कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात् ॥
sa deśaḥ kvanu yatrāsau vasate dharmasaṅkaṭe | kathaṃ vā sa vimucyeta narastasmānmahābhayāt
वह स्थान कहाँ है जहाँ वह ऐसे धर्मसंकट में रहता है? अथवा वह मनुष्य उस महान् भय से कैसे छूट सकता है?
श्लोक 3 (11.6.3)
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा । कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ॥
etanme sarvamācakṣva sādhu ceṣṭāmahe tadā | kṛpā me mahatī jātā tasyābhyuddharaṇena hi
यह सब मुझे बताइए, तब हम उचित उपाय करेंगे। मुझे उस पर बड़ी दया आ गई है, क्योंकि मैं उसका उद्धार करना चाहता हूँ।
विदुर उवाच
श्लोक 4 (11.6.4)
उपाख्यानमिदं राजन्मोक्षविद्भिरुदाहृतम् । सुगतिं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ॥
upākhyānamidaṃ rājanmokṣavidbhirudāhṛtam | sugatiṃ vindate yena paralokeṣu mānavaḥ
विदुर ने कहा — हे राजन्! यह उपाख्यान मोक्ष के ज्ञाताओं ने कहा है, जिसके द्वारा मनुष्य परलोकों में उत्तम गति पाता है।
श्लोक 5 (11.6.5)
उच्यते यत्तु कान्तारं महासंसार एव सः । वनं दुर्गं हि यच्चैतत्संसारगहनं हि तत् ॥
ucyate yattu kāntāraṃ mahāsaṃsāra eva saḥ | vanaṃ durgaṃ hi yaccaitatsaṃsāragahanaṃ hi tat
जिसे जंगल कहा गया, वह यही महान् संसार है; और जो दुर्गम वन है, वही संसार का गहन है।
श्लोक 6 (11.6.6)
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः ॥
ye ca te kathitā vyālā vyādhayaste prakīrtitāḥ
जिन हिंसक पशुओं की चर्चा हुई, वे रोग कहे गए हैं।
श्लोक 7 (11.6.7)
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै । तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम् ॥
yā sā nārī bṛhatkāyā adhyatiṣṭhata tatra vai | tāmāhustu jarāṃ prājñā rūpavarṇavināśinīm
वहाँ जो विशाल शरीर वाली स्त्री खड़ी थी, उसे ज्ञानी लोग जरा (बुढ़ापा) कहते हैं, जो रूप और वर्ण का नाश करने वाली है।
श्लोक 8 (11.6.8)
स यस्तु कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम् । यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः । अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां प्राणाहार्यसौ ॥
sa yastu kūpo nṛpate sa tu dehaḥ śarīriṇām | yastatra vasate'dhastānmahāhiḥ kāla eva saḥ | antakaḥ sarvabhūtānāṃ dehināṃ prāṇāhāryasau
हे नरेश! जो कुआँ है, वह देहधारियों का शरीर है। जो महानाग नीचे रहता है, वह काल ही है, जो सब प्राणियों का अन्त करने वाला और सब देहधारियों के प्राण हर लेने वाला है।
श्लोक 9 (11.6.9)
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः । प्रोतो ययाऽभवल्लग्नो जीविताशा शरीरिणाम् ॥
kūpamadhye ca yā jātā vallī yatra sa mānavaḥ | proto yayā'bhavallagno jīvitāśā śarīriṇām
कुएँ के बीच जो लता उगी थी, जिससे वह मनुष्य बँधकर लटका हुआ था, वह देहधारियों की जीने की आशा है।
श्लोक 10 (11.6.10)
स यस्तु कूपपीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति । षड्वक्त्रः कुञ्जरो राजन्स तु संवत्सरः स्मृतः ॥
sa yastu kūpapīnāhe taṃ vṛkṣaṃ parisarpati | ṣaḍvaktraḥ kuñjaro rājansa tu saṃvatsaraḥ smṛtaḥ
हे राजन्! कुएँ के किनारे उस वृक्ष के चारों ओर रेंगने वाला छह मुखों का हाथी संवत्सर (वर्ष) कहा गया है;
श्लोक 11 (11.6.11)
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादश कीर्तिताः । ये तु वृक्षं निकृन्तन्ति मूषिकाः पन्नगास्तथा ॥
mukhāni ṛtavo māsāḥ pādā dvādaśa kīrtitāḥ | ye tu vṛkṣaṃ nikṛntanti mūṣikāḥ pannagāstathā
उसके मुख ऋतुएँ हैं और उसके पाँव बारह महीने कहे गए हैं। जो चूहे और साँप उस वृक्ष को कुतरते हैं,
श्लोक 12 (11.6.12)
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः । ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ॥
rātryahāni tu tānyāhurbhūtānāṃ paricintakāḥ | ye te madhukarāstatra kāmāste parikīrtitāḥ
उन्हें प्राणियों के विषय में चिन्तन करने वाले रात और दिन कहते हैं। जो मधुमक्खियाँ वहाँ थीं, वे कामनाएँ कही गई हैं।
श्लोक 13 (11.6.13)
यास्तु ता बहुशो धाराः स्रवन्ति मधुनिस्रवम् । तांस्तु कामरसान्विन्द्याद्यत्र सज्जन्ति मानवाः ॥
yāstu tā bahuśo dhārāḥ sravanti madhunisravam | tāṃstu kāmarasānvindyādyatra sajjanti mānavāḥ
और जो मधु टपकाती हुई अनेक धाराएँ बहती हैं, उन्हें कामनाओं के रस जानना चाहिए, जिनमें मनुष्य आसक्त हो जाते हैं।
श्लोक 14 (11.6.14)
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं विदुर्बुधाः । येन संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति सर्वथा ॥
evaṃ saṃsāracakrasya parivṛttiṃ vidurbudhāḥ | yena saṃsāracakrasya pāśāṃśchindanti sarvathā
इस प्रकार ज्ञानी लोग संसार-चक्र के घूमने को समझ लेते हैं, जिससे वे संसार-चक्र के बन्धनों को पूरी तरह काट डालते हैं।