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स्त्री पर्व · अध्याय 5

विदुर का दृष्टान्त: वन के कुएँ में लटका मनुष्य

धृतराष्ट्र विदुर से कहते हैं कि बुद्धि जिस धर्म-गहन को समझती है, उसका विस्तार से वर्णन करें। विदुर एक दृष्टान्त सुनाते हैं: हिंसक पशुओं से भरे विशाल वन में भटकता एक ब्राह्मण, जिसे एक भयंकर स्त्री ने बाँहों में जकड़ रखा है, एक छिपे कुएँ में गिरकर लता से उलटा लटक जाता है। नीचे महानाग है, कुएँ के किनारे छह मुखों वाला विशाल हाथी है, और जिस वृक्ष को वह थामे है उसे चूहे कुतर रहे हैं; ऊपर से मधुमक्खियों के छत्ते की मधुधारा गिरती है, जिसे पीते हुए वह कभी तृप्त नहीं होता और जीवन से विरक्त भी नहीं होता।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (11.5.1)

यदिदं धर्मगहनं बुद्ध्या समनुबुध्यते । एतद्विस्तरतः सर्वं बुद्धिमार्गं प्रशंस मे ॥

yadidaṃ dharmagahanaṃ buddhyā samanubudhyate | etadvistarataḥ sarvaṃ buddhimārgaṃ praśaṃsa me

धृतराष्ट्र ने कहा — बुद्धि जिस धर्म-गहन को समझ पाती है, उस सबको बुद्धि के मार्ग से मुझे विस्तारपूर्वक बताइए।

विदुर उवाच

श्लोक 2 (11.5.2)

अत्र ते वर्तयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । यथा संसारगहनं वदन्ति परमर्षयः ॥

atra te vartayiṣyāmi namaskṛtvā svayambhuve | yathā saṃsāragahanaṃ vadanti paramarṣayaḥ

विदुर ने कहा — स्वयम्भू को प्रणाम करके मैं आपको वह सब सुनाता हूँ, जैसा परम ऋषि संसार रूपी गहन वन का वर्णन करते हैं।

श्लोक 3 (11.5.3)

कश्चिन्महति कान्तारे वर्तमानो द्विजः किल । महद्दुर्गमनुप्राप्तो वनं क्रव्यादसङ्कुलम् ॥

kaścinmahati kāntāre vartamāno dvijaḥ kila | mahaddurgamanuprāpto vanaṃ kravyādasaṅkulam

कहते हैं, किसी विशाल जंगल में भटकता हुआ एक ब्राह्मण मांसभक्षी जीवों से भरे एक विशाल, दुर्गम वन में जा पहुँचा।

श्लोक 4 (11.5.4)

सिंहव्याघ्रगजर्क्षौघैरतिघोरमहास्वनैः । पिशितादैरतिभयैर्महोग्राकृतिभिस्तथा ॥

siṃhavyāghragajarkṣaughairatighoramahāsvanaiḥ | piśitādairatibhayairmahogrākṛtibhistathā

जहाँ सिंहों, बाघों, हाथियों और रीछों के झुंड अत्यन्त भयानक गर्जना कर रहे थे, और वैसे ही अतिभयंकर तथा उग्र आकार वाले मांसभक्षी जीव भी थे।

श्लोक 5 (11.5.5)

समन्तात्सम्परिक्षिप्तं यस्माद्द्रष्टुर्महद्भयम् । तदस्य दृष्ट्वा हृदयमुद्वेगमगमत्परम् ॥

samantātsamparikṣiptaṃ yasmāddraṣṭurmahadbhayam | tadasya dṛṣṭvā hṛdayamudvegamagamatparam

वह वन चारों ओर से उनसे घिरा हुआ था, इसलिए देखने वाले को भारी भय होता था; उसे देखकर उस ब्राह्मण का हृदय अत्यन्त घबरा उठा।

श्लोक 6 (11.5.6)

अभ्युच्छ्रयन्ति रोमाणि विक्रियाश्च परन्तप । स तद्वनं व्यनुसरन्सम्प्रधावन्नितस्ततः ॥

abhyucchrayanti romāṇi vikriyāśca parantapa | sa tadvanaṃ vyanusaransampradhāvannitastataḥ

हे परन्तप! उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसके शरीर में विकार उठ आए। वह उस वन में इधर-उधर दौड़ता भटकने लगा।

श्लोक 7 (11.5.7)

वीक्षमाणो दिशः सर्वाः शरणं क्व भवेदिति । स तेषां नाशमन्विच्छन्प्रद्रुतो भयपीडितः । न च निर्याति वै दूरं न वा तैर्विप्रयुज्यते ॥

vīkṣamāṇo diśaḥ sarvāḥ śaraṇaṃ kva bhavediti | sa teṣāṃ nāśamanvicchanpradruto bhayapīḍitaḥ | na ca niryāti vai dūraṃ na vā tairviprayujyate

सब दिशाओं में देखता हुआ कि "शरण कहाँ मिलेगी?" वह उन्हें नष्ट करने की इच्छा से भय से पीड़ित होकर भागा; फिर भी न वह उनसे बहुत दूर निकल पाया, न उनसे अलग हो सका।

श्लोक 8 (11.5.8)

अथापश्यद्वनं गूढं समन्ताद्वागुरावृतम् । बाहुभ्यां सम्परिष्वक्तः स्त्रिया परमघोरया ॥

athāpaśyadvanaṃ gūḍhaṃ samantādvāgurāvṛtam | bāhubhyāṃ sampariṣvaktaḥ striyā paramaghorayā

तभी उसने देखा कि वह वन छिपा हुआ है और चारों ओर जालों से घिरा है, और एक अत्यन्त भयंकर स्त्री ने उसे अपनी बाँहों में जकड़ रखा है।

श्लोक 9 (11.5.9)

पञ्चशीर्षधरैर्नागैः शैलैरिव समुन्नतैः । नभःस्पृशैर्महावृक्षैः परिक्षिप्तं महावनम् ॥

pañcaśīrṣadharairnāgaiḥ śailairiva samunnataiḥ | nabhaḥspṛśairmahāvṛkṣaiḥ parikṣiptaṃ mahāvanam

वह महावन पाँच फनों वाले, पर्वतों जैसे ऊँचे नागों से और आकाश को छूने वाले विशाल वृक्षों से घिरा हुआ था।

श्लोक 10 (11.5.10)

वनमध्ये च तत्राभूदुदपानः समावृतः । वल्लीभिस्तृणनद्धाभिर्गूढाभिरभिसंवृतः ॥

vanamadhye ca tatrābhūdudapānaḥ samāvṛtaḥ | vallībhistṛṇanaddhābhirgūḍhābhirabhisaṃvṛtaḥ

उस वन के बीच एक कुआँ था, जो तिनकों से बँधी छिपी हुई लताओं से चारों ओर ढका हुआ था।

श्लोक 11 (11.5.11)

पपात स द्विजस्तत्र निगूढे सलिलाशये । विलग्नश्चाभवत्तस्मिँल्लतासन्तानसङ्कुले ॥

papāta sa dvijastatra nigūḍhe salilāśaye | vilagnaścābhavattasmim̐llatāsantānasaṅkule

वह ब्राह्मण उस छिपे हुए जल में गिर पड़ा और लताओं के घने जाल में उलझकर वहीं अटक गया।

श्लोक 12 (11.5.12)

पनसस्य यथा जातं वृन्तबद्धं महाफलम् । स तथा लम्बते तत्र ह्यूर्ध्वपादो ह्यधः शिराः ॥

panasasya yathā jātaṃ vṛntabaddhaṃ mahāphalam | sa tathā lambate tatra hyūrdhvapādo hyadhaḥ śirāḥ

जैसे डंठल से बँधा कटहल का बड़ा फल लटकता है, वैसे ही वह वहाँ पैर ऊपर और सिर नीचे किए लटका रहा।

श्लोक 13 (11.5.13)

अथ तत्रापि चान्योऽस्य भूयो जात उपद्रवः । कूपमध्ये महानागमपश्यत महाबलम् ॥

atha tatrāpi cānyo'sya bhūyo jāta upadravaḥ | kūpamadhye mahānāgamapaśyata mahābalam

वहाँ उस पर एक और विपत्ति आ पड़ी: उसने कुएँ के बीच एक विशाल और महाबली नाग देखा,

श्लोक 14 (11.5.14)

कूपपीनाहवेलायामपश्यत् महागजम् ॥

kūpapīnāhavelāyāmapaśyat mahāgajam

और कुएँ के किनारे पर एक विशाल हाथी।

श्लोक 15 (11.5.15)

षड्वक्त्रं कृष्णशबलं द्विषट्कपदचारिणम् । क्रमेण परिसर्पन्तं वल्लीवृक्षसमावृतम् ॥

ṣaḍvaktraṃ kṛṣṇaśabalaṃ dviṣaṭkapadacāriṇam | krameṇa parisarpantaṃ vallīvṛkṣasamāvṛtam

वह हाथी छह मुखों वाला, काला-चितकबरा और बारह पैरों से चलने वाला था; वह लताओं और वृक्षों से घिरा हुआ धीरे-धीरे आगे रेंग रहा था।

श्लोक 16 (11.5.16)

तस्य शाखाप्रशाखासु वृक्षशाखावलम्बिनः । नानारूपा मधुकरा घोररूपा भयावहाः ॥

tasya śākhāpraśākhāsu vṛkṣaśākhāvalambinaḥ | nānārūpā madhukarā ghorarūpā bhayāvahāḥ

उस वृक्ष की डालियों और टहनियों पर, जिनसे वह लटका था, नाना रूपों वाली, भयंकर आकृति की और भय उत्पन्न करने वाली मधुमक्खियाँ बैठी थीं।

श्लोक 17 (11.5.17)

आसते मधु संवृत्य पूर्वमेव निकेतजाः । भूयोभूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ ॥

āsate madhu saṃvṛtya pūrvameva niketajāḥ | bhūyobhūyaḥ samīhante madhūni bharatarṣabha

जो पहले ही मधु जमा करके अपने छत्तों में बैठी थीं; हे भरतश्रेष्ठ! वे बार-बार और मधु पाने का यत्न करती थीं,

श्लोक 18 (11.5.18)

स्वादनीयानि भूतानां यैर्बालो न वितृप्यते । तेषां मधूनां बहुधा धारा प्रस्रवते तदा ॥

svādanīyāni bhūtānāṃ yairbālo na vitṛpyate | teṣāṃ madhūnāṃ bahudhā dhārā prasravate tadā

वह मधु सब प्राणियों को स्वादिष्ट लगता है और उससे बालक भी तृप्त नहीं होता। उस मधु की धारा उस समय अनेक रूपों में बह रही थी।

श्लोक 19 (11.5.19)

आलम्बमानः स पुमान्धारां पिबति सर्वदा । न चास्य तृष्णा विरता पिबमानस्य सङ्कटे ॥

ālambamānaḥ sa pumāndhārāṃ pibati sarvadā | na cāsya tṛṣṇā viratā pibamānasya saṅkaṭe

लटका हुआ वह मनुष्य उस धारा को निरन्तर पीता रहता था; संकट में पड़े पीते हुए भी उसकी प्यास कभी नहीं बुझी।

श्लोक 20 (11.5.20)

अभीप्सति च तां नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः । न चास्य जीविते राजन्निर्वेदः समजायत ॥

abhīpsati ca tāṃ nityamatṛptaḥ sa punaḥ punaḥ | na cāsya jīvite rājannirvedaḥ samajāyata

अतृप्त रहकर वह उसे बार-बार चाहता रहा; हे राजन्! उसके मन में अपने जीवन से कभी वैराग्य नहीं हुआ।

श्लोक 21 (11.5.21)

तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता । कृष्णाः श्वेताश्च तं वृक्षं निकृन्तन्ति स्म मूषिकाः ॥

tatraiva ca manuṣyasya jīvitāśā pratiṣṭhitā | kṛṣṇāḥ śvetāśca taṃ vṛkṣaṃ nikṛntanti sma mūṣikāḥ

उसी अवस्था में उस मनुष्य की जीने की आशा टिकी रही। काले और सफेद चूहे उस वृक्ष को कुतरते रहे।

श्लोक 22 (11.5.22)

व्यालैश्च तद्वनं दुर्गं स्त्रिया च परमोग्रया । कूपाधस्ताच्च नागेन पीनाहे कुञ्जरेण च ॥

vyālaiśca tadvanaṃ durgaṃ striyā ca paramograyā | kūpādhastācca nāgena pīnāhe kuñjareṇa ca

वह वन हिंसक पशुओं से और अत्यन्त उग्र स्त्री से दुर्गम था; कुएँ के नीचे नाग था और किनारे पर हाथी;

श्लोक 23 (11.5.23)

वृक्षप्रपाताच्च भयं मूषिकेभ्यश्च पञ्चमम् । मधुलोभान्मधुकरैः षष्ठमाहुर्महद्भयम् ॥

vṛkṣaprapātācca bhayaṃ mūṣikebhyaśca pañcamam | madhulobhānmadhukaraiḥ ṣaṣṭhamāhurmahadbhayam

फिर वृक्ष के गिरने का भय, और चूहों से पाँचवाँ भय; और मधु के लोभ से मधुमक्खियों का छठा महान् भय बताया जाता है।

श्लोक 24 (11.5.24)

एवं स वसते तत्र क्षिप्तः संसारसागरे । न चैव जीविताशायां निर्वेदमुपगच्छति ॥

evaṃ sa vasate tatra kṣiptaḥ saṃsārasāgare | na caiva jīvitāśāyāṃ nirvedamupagacchati

इस प्रकार वह संसार-सागर में फेंका हुआ वहाँ रहता है और जीवन की आशा से फिर भी विरक्त नहीं होता।

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