स्त्री पर्व · अध्याय 11
धृतराष्ट्र का पाण्डवों से मिलना और लोहे के भीम को चूर करना
युधिष्ठिर अपने भाइयों, कृष्ण, सात्यकि और युयुत्सु के साथ धृतराष्ट्र से मिलने चलते हैं; मार्ग में शोकाकुल स्त्रियाँ उन्हें उलाहना देती हैं। वे वृद्ध राजा को प्रणाम करते हैं; राजा उन्हें गले लगाते हैं, पर फिर क्रोध से जल उठते हैं और भीम को खोजते हैं। कृष्ण पहले ही भीम की लोहे की मूर्ति आगे कर देते हैं और राजा उसे चूर कर डालते हैं, जिससे उनकी अपनी छाती घायल हो जाती है। संजय उन्हें थामते हैं; शोक में वे 'हा भीम!' पुकारते हैं, तब कृष्ण उन्हें सच्चाई बताकर जो हुआ उसे स्वीकार करने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (11.11.1)
हतेषु सर्वसैन्येषु धर्मराजो युधिष्ठिरः । शुश्रुवे पितरं वृद्धं निर्यान्तं गजसाह्वयात् ॥
hateṣu sarvasainyeṣu dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | śuśruve pitaraṃ vṛddhaṃ niryāntaṃ gajasāhvayāt
सब सेनाओं के नष्ट हो जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने सुना कि उनके वृद्ध पिता हस्तिनापुर से बाहर निकल रहे हैं।
श्लोक 2 (11.11.2)
सोऽभ्ययात्पुत्रशोकार्तं पुत्रशोकपरिप्लुतः । शोचमानो महाराज भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥
so'bhyayātputraśokārtaṃ putraśokapariplutaḥ | śocamāno mahārāja bhrātṛbhiḥ sahitastadā
पुत्रों के शोक में डूबे हुए, विलाप करते हुए, हे महाराज, वे भाइयों के साथ उन पुत्रशोक से पीड़ित राजा की ओर गए।
श्लोक 3 (11.11.3)
अन्वीयमानो वीरेण दाशार्हेण महात्मना । युयुधानेन च तथा तथैव च युयुत्सुना ॥
anvīyamāno vīreṇa dāśārheṇa mahātmanā | yuyudhānena ca tathā tathaiva ca yuyutsunā
उनके पीछे महात्मा वीर दाशार्ह कृष्ण, युयुधान (सात्यकि) और उसी प्रकार युयुत्सु चल रहे थे।
श्लोक 4 (11.11.4)
तमन्वगात्सुदुःखार्ता द्रौपदीशोककर्शिता । सह पाञ्चालयोषिद्भिर्यास्तत्रासन्समागताः ॥
tamanvagātsuduḥkhārtā draupadīśokakarśitā | saha pāñcālayoṣidbhiryāstatrāsansamāgatāḥ
अत्यन्त दुखी और शोक से क्षीण द्रौपदी, पाञ्चाल स्त्रियों तथा वहाँ एकत्र हुई अन्य स्त्रियों के साथ उनके पीछे-पीछे गईं।
श्लोक 5 (11.11.5)
सङ्ग्राममनु बृन्दानि स्त्रीणां भरतसत्तम । कुररीणामिवार्तानां क्रोशन्तीनां ददर्श ह ॥
saṅgrāmamanu bṛndāni strīṇāṃ bharatasattama | kurarīṇāmivārtānāṃ krośantīnāṃ dadarśa ha
हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने रणभूमि की ओर कुररी पक्षियों की तरह आर्त स्वर में चीखती हुई स्त्रियों के झुंड देखे।
श्लोक 6 (11.11.6)
ताभिः परिवृतो राजा क्रोशन्तीभिः सहस्रशः । ऊर्ध्वबाहुभिरार्ताभी रुदतीभिः प्रियाप्रियैः ॥
tābhiḥ parivṛto rājā krośantībhiḥ sahasraśaḥ | ūrdhvabāhubhirārtābhī rudatībhiḥ priyāpriyaiḥ
राजा हज़ारों स्त्रियों से घिर गए, जो हाथ ऊपर उठाए चीख रही थीं, दुखी थीं और प्रिय तथा अप्रिय वचन कहती हुई रो रही थीं।
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 7 (11.11.7)
क्व नु धर्मज्ञता राज्ञः क्व नु साद्यानृशंसता । यच्चावधीत्पितॄन्भ्रातॄन्गुरुपुत्रान्सखीनपि ॥
kva nu dharmajñatā rājñaḥ kva nu sādyānṛśaṃsatā | yaccāvadhītpitṝnbhrātṝnguruputrānsakhīnapi
राजा की धर्मज्ञता अब कहाँ गई, और आज उसकी वह दयालुता कहाँ है, जो उसने पिताओं, भाइयों, गुरुपुत्रों और मित्रों तक को मार डाला?
श्लोक 8 (11.11.8)
घातयित्वा कथं द्रोणं भीष्मं चापि पितामहम् । मनस्तेऽभून्महाबाहो हत्वा चापि जयद्रथम् ॥
ghātayitvā kathaṃ droṇaṃ bhīṣmaṃ cāpi pitāmaham | manaste'bhūnmahābāho hatvā cāpi jayadratham
हे महाबाहो, द्रोण और पितामह भीष्म को मरवाकर और जयद्रथ को भी मारकर आपका मन कैसा रहा?
श्लोक 9 (11.11.9)
किं नु राज्येन ते कार्यं पितॄन्भ्रातॄनपश्यतः । अभिमन्युं च दुर्धर्षं द्रौपदेयांश्च भारत ॥
kiṃ nu rājyena te kāryaṃ pitṝnbhrātṝnapaśyataḥ | abhimanyuṃ ca durdharṣaṃ draupadeyāṃśca bhārata
हे भारत, जो अपने पिताओं और भाइयों को, दुर्धर्ष अभिमन्यु को और द्रौपदी के पुत्रों को नहीं देख पाता, उसे राज्य से क्या प्रयोजन?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (11.11.10)
अतीत्य ता महाबाहुः क्रोशन्तीः कुररीरिव । ववन्दे पितरं ज्येष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
atītya tā mahābāhuḥ krośantīḥ kurarīriva | vavande pitaraṃ jyeṣṭhaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
कुररी की तरह चीखती उन स्त्रियों को पार करके महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने ज्येष्ठ पिता को प्रणाम किया।
श्लोक 11 (11.11.11)
ततोऽभिवाद्य पितरं क्रमेणामित्रकर्शनाः । न्यवेदयन्त नामानि पाण्डवास्तेऽपि सर्वशः ॥
tato'bhivādya pitaraṃ krameṇāmitrakarśanāḥ | nyavedayanta nāmāni pāṇḍavāste'pi sarvaśaḥ
तब पिता को प्रणाम करके शत्रुओं का नाश करने वाले पाण्डवों ने भी क्रम से, एक-एक करके, अपने नाम बताए।
श्लोक 12 (11.11.12)
तमात्मजान्तकरणं पिता पुत्रवधार्दितः । अप्रीयमाणः शोकार्तः पाण्डवं परिषस्वजे ॥
tamātmajāntakaraṇaṃ pitā putravadhārditaḥ | aprīyamāṇaḥ śokārtaḥ pāṇḍavaṃ pariṣasvaje
पुत्रों के वध से पीड़ित पिता ने, अप्रसन्न और शोक से व्याकुल होकर, अपने पुत्रों के विनाश का कारण बने उस पाण्डव को गले लगाया।
श्लोक 13 (11.11.13)
धर्मराजं परिष्वज्य सान्त्वयित्वा च भारत । दुष्टात्मा भीममन्वैच्छद्दिधक्षुरिव पावकः ॥
dharmarājaṃ pariṣvajya sāntvayitvā ca bhārata | duṣṭātmā bhīmamanvaicchaddidhakṣuriva pāvakaḥ
हे भारत, धर्मराज को गले लगाकर और सान्त्वना देकर वह दुष्ट-चित्त राजा भीम को ढूँढने लगा, जैसे जलाने को आतुर अग्नि।
श्लोक 14 (11.11.14)
स कोपपावकस्तस्य शोकवायुसमीरितः । भीमसेनमयं दावं दिधक्षुरिव दृश्यते ॥
sa kopapāvakastasya śokavāyusamīritaḥ | bhīmasenamayaṃ dāvaṃ didhakṣuriva dṛśyate
शोक की हवा से भड़की हुई उसकी क्रोधाग्नि मानो भीमसेन रूपी वन को जला डालना चाहती थी।
श्लोक 15 (11.11.15)
तस्य संकल्पमाज्ञाय भीमं प्रत्यशुभं हरिः । भीममाक्षिप्य पाणिभ्यां प्रददौ भीममायसम् ॥
tasya saṃkalpamājñāya bhīmaṃ pratyaśubhaṃ hariḥ | bhīmamākṣipya pāṇibhyāṃ pradadau bhīmamāyasam
भीम के प्रति उसके अशुभ संकल्प को जानकर हरि ने भीम को दोनों हाथों से हटा दिया और उसके सामने लोहे का भीम रख दिया।
श्लोक 16 (11.11.16)
प्रागेव तु महाबुद्धिर्बुद्ध्वा तस्येङ्गितं हरिः । संविधानं महाप्राज्ञस्तत्र चक्रे जनार्दनः ॥
prāgeva tu mahābuddhirbuddhvā tasyeṅgitaṃ hariḥ | saṃvidhānaṃ mahāprājñastatra cakre janārdanaḥ
महाबुद्धिमान और परम प्रज्ञावान जनार्दन ने उसकी चेष्टा को पहले ही भाँपकर वहाँ यह प्रबन्ध कर रखा था।
श्लोक 17 (11.11.17)
उपगुह्यैव पाणिभ्यां भीमसेनमयस्मयम् । बभञ्ज बलवान्राजा मन्यमानो वृकोदरम् ॥
upaguhyaiva pāṇibhyāṃ bhīmasenamayasmayam | babhañja balavānrājā manyamāno vṛkodaram
बलवान राजा ने उस लोहे के भीमसेन को दोनों हाथों से जकड़कर, वृकोदर मानते हुए, तोड़ डाला।
श्लोक 18 (11.11.18)
नागायुतसमप्राणः स राजा भीममायसम् । भङ्क्त्वा विमथितोरस्कः सुस्राव रुधिरं मुखात् ॥
nāgāyutasamaprāṇaḥ sa rājā bhīmamāyasam | bhaṅktvā vimathitoraskaḥ susrāva rudhiraṃ mukhāt
दस हज़ार हाथियों के बल वाले उस राजा ने लोहे के भीम को तोड़ डाला, किन्तु उसकी अपनी छाती कुचल गई और वह मुँह से रक्त उगलने लगा।
श्लोक 19 (11.11.19)
ततः पपात मेदिन्यां तथैव रुधिरोक्षितः । प्रपुष्पिताग्रशिखरः पारिजात इव द्रुमः ॥
tataḥ papāta medinyāṃ tathaiva rudhirokṣitaḥ | prapuṣpitāgraśikharaḥ pārijāta iva drumaḥ
तब वह वैसे ही खून से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा, जैसे फूलों से लदी चोटी वाला पारिजात वृक्ष गिरता है।
श्लोक 20 (11.11.20)
प्रत्यगृह्णाच्च तं विद्वान्सूतो गावल्गणिस्तदा । मैवमित्यब्रवीच्चैनं शमयन्सान्त्वयन्निव ॥
pratyagṛhṇācca taṃ vidvānsūto gāvalgaṇistadā | maivamityabravīccainaṃ śamayansāntvayanniva
तब विद्वान सारथि गवल्गण-पुत्र संजय ने उन्हें थाम लिया और शान्त करते तथा सान्त्वना देते हुए-से कहा, "ऐसा न कीजिए!"
श्लोक 21 (11.11.21)
हतो भीम इति ज्ञात्वा गतमन्युर्महामनाः । हाहाभीमेति चुक्रोश नृपः शोकसमन्वितः ॥
hato bhīma iti jñātvā gatamanyurmahāmanāḥ | hāhābhīmeti cukrośa nṛpaḥ śokasamanvitaḥ
यह जानकर कि भीम मारा गया, क्रोध छोड़ चुके महामना राजा शोक से भरकर "हाय भीम!" कहकर चिल्ला उठे।
श्लोक 22 (11.11.22)
तं विदित्वा गतक्रोधं भीमसेनवधार्दितम् । वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥
taṃ viditvā gatakrodhaṃ bhīmasenavadhārditam | vāsudevo varaḥ puṃsāmidaṃ vacanamabravīt
उन्हें क्रोध छोड़े हुए और भीमसेन के वध से पीड़ित जानकर पुरुषों में श्रेष्ठ वासुदेव ने यह वचन कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 23 (11.11.23)
मा शुचो धृतराष्ट्र त्वं नैव भीमस्त्वया हतः । आयसी प्रतिमा ह्येषा त्वया निष्पातिता विभो ॥
mā śuco dhṛtarāṣṭra tvaṃ naiva bhīmastvayā hataḥ | āyasī pratimā hyeṣā tvayā niṣpātitā vibho
धृतराष्ट्र, आप शोक न कीजिए; भीम आपके हाथ से नहीं मारा गया। हे विभो, यह तो लोहे की प्रतिमा है जिसे आपने गिरा दिया है।
श्लोक 24 (11.11.24)
त्वां क्रोधवशमापन्नं विदित्वा भरतर्षभ । मयाऽपकृष्टः कौन्तेयो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतः ॥
tvāṃ krodhavaśamāpannaṃ viditvā bharatarṣabha | mayā'pakṛṣṭaḥ kaunteyo mṛtyordaṃṣṭrāntaraṃ gataḥ
हे भरतश्रेष्ठ, आपको क्रोध के वश में आया जानकर मैंने कुन्तीपुत्र को खींच लिया; वह मृत्यु की दाढ़ों के बीच पहुँच चुका था।
श्लोक 25 (11.11.25)
न हि ते राजशार्दूल बले तुल्योऽस्ति कश्चन । कः सहेत महाबाहो बाह्वोर्विग्रहणं नरः ॥
na hi te rājaśārdūla bale tulyo'sti kaścana | kaḥ saheta mahābāho bāhvorvigrahaṇaṃ naraḥ
हे राजाओं में सिंह, बल में आपके बराबर कोई नहीं है। हे महाबाहो, आपकी भुजाओं की पकड़ को कौन मनुष्य सह सकता है?
श्लोक 26 (11.11.26)
यथान्तकमनुप्राप्य जीवन्कश्चिन्न मुच्यते । एवं बाह्वन्तरं प्राप्य तव जीवेन्न कश्चन ॥
yathāntakamanuprāpya jīvankaścinna mucyate | evaṃ bāhvantaraṃ prāpya tava jīvenna kaścana
जैसे यमराज के हाथ पड़कर कोई जीता नहीं छूटता, वैसे ही आपकी भुजाओं के बीच आकर कोई जीवित नहीं बच सकता।
श्लोक 27 (11.11.27)
तस्मात्पुत्रेण या तेऽसौ प्रतिमा कारिताऽऽयसी । भीमस्य सेयं कौरव्य तवैवोपहृता मया ॥
tasmātputreṇa yā te'sau pratimā kāritā''yasī | bhīmasya seyaṃ kauravya tavaivopahṛtā mayā
इसलिए आपके पुत्र द्वारा बनवाई गई भीम की वह लोहे की प्रतिमा, हे कौरव्य, मैंने ही आपके सामने रखी थी।
श्लोक 28 (11.11.28)
पुत्रशोकाभिसन्तप्तं धर्मादपकृतं मनः । तव राजेन्द्र तेन त्वं भीमसेनं जिघांससि ॥
putraśokābhisantaptaṃ dharmādapakṛtaṃ manaḥ | tava rājendra tena tvaṃ bhīmasenaṃ jighāṃsasi
हे राजेन्द्र, पुत्रशोक से तपता हुआ आपका मन धर्म से हट गया था; इसीलिए आप भीमसेन को मारना चाहते थे।
श्लोक 29 (11.11.29)
न त्वेतत्ते क्षमं राजन्हन्यास्त्वं यद्वृकोदरम् । न हि पुत्रा महाराज जीवेयुस्ते कथञ्चन ॥
na tvetatte kṣamaṃ rājanhanyāstvaṃ yadvṛkodaram | na hi putrā mahārāja jīveyuste kathañcana
परन्तु हे राजन्, वृकोदर को मार डालना आपके लिए उचित नहीं है; क्योंकि हे महाराज, आपके पुत्र किसी भी प्रकार जीवित नहीं हो सकते।
श्लोक 30 (11.11.30)
तस्माद्यत्कृतमस्माभिर्मन्यमानैः शमं प्रति । अनुमन्यस्व तत्सर्वं मा च शोके मनः कृथाः ॥
tasmādyatkṛtamasmābhirmanyamānaiḥ śamaṃ prati | anumanyasva tatsarvaṃ mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ
इसलिए शान्ति के विचार से हमने जो कुछ किया है, उस सबका अनुमोदन कीजिए और अपने मन को शोक में मत डालिए।