स्त्री पर्व · अध्याय 3
विदुर का उपदेश: शरीर, कर्म और जन्म-मरण का चक्र
विदुर के वचनों से सान्त्वना पाकर धृतराष्ट्र पूछते हैं कि विद्वान् लोग मन के दुःख से कैसे छूटते हैं। विदुर उत्तर देते हैं कि संसार केले के तने की तरह सारहीन है, श्मशान में ज्ञानी-मूर्ख और धनी-निर्धन सब समान सोते हैं, और शरीर घर मात्र हैं जिन्हें पुराने वस्त्र की तरह छोड़ दिया जाता है। प्राणी अपने ही कर्मों से सुख-दुःख पाते हैं और चाक पर चढ़े कच्चे बरतन की तरह हर अवस्था में मर सकते हैं; मूर्ख जन्म-मरण के जल में छटपटाते हैं और ज्ञानी परम गति को पहुँचते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (11.3.1)
सुभाषितं महाप्राज्ञ शोकोऽयं विगतो मम । भूय एव तु वाक्यानि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
subhāṣitaṃ mahāprājña śoko'yaṃ vigato mama | bhūya eva tu vākyāni śrotumicchāmi tattvataḥ
हे महाप्राज्ञ, आपके सुन्दर वचनों से मेरा यह शोक चला गया। मैं सच्ची बातें और भी सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (11.3.2)
अनिष्टानां च संसर्गादिष्टानां च निवर्तनात् । कथं हि मानसं दुःखं विप्रयुज्यन्ति पण्डिताः ॥
aniṣṭānāṃ ca saṃsargādiṣṭānāṃ ca nivartanāt | kathaṃ hi mānasaṃ duḥkhaṃ viprayujyanti paṇḍitāḥ
अप्रिय के संयोग और प्रिय के वियोग से उपजे मानसिक दुःख से विद्वान् कैसे छूटते हैं?
विदुर उवाच
श्लोक 3 (11.3.3)
यतोयतो मनो दुःखात्सुखाद्वा विप्रमुच्यते । ततस्ततः शमं लब्ध्वा सुगतिं विन्दते बुधः ॥
yatoyato mano duḥkhātsukhādvā vipramucyate | tatastataḥ śamaṃ labdhvā sugatiṃ vindate budhaḥ
मन जब-जब दुःख से या सुख से भी छूट जाता है, तब-तब शान्ति पाकर ज्ञानी उत्तम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (11.3.4)
अशाश्वतमिदं सर्वं चिन्त्यमानं नरर्षभ । कदलीसन्निभो लोकः सारो ह्यस्य न विद्यते ॥
aśāśvatamidaṃ sarvaṃ cintyamānaṃ nararṣabha | kadalīsannibho lokaḥ sāro hyasya na vidyate
हे नरश्रेष्ठ, विचार करने पर यह सब अनित्य है; यह संसार केले के पेड़ के समान है, इसमें कोई सार नहीं।
श्लोक 5 (11.3.5)
यदा प्राज्ञाश्च मूढाश्च धनवन्तोऽथ निर्धनाः । सर्वे पितृवनं प्राप्य स्वपन्ति विगतज्वराः ॥
yadā prājñāśca mūḍhāśca dhanavanto'tha nirdhanāḥ | sarve pitṛvanaṃ prāpya svapanti vigatajvarāḥ
जब ज्ञानी और मूर्ख, धनी और निर्धन — सभी पितृवन (श्मशान) में पहुँचकर ज्वर-रहित होकर सो जाते हैं,
श्लोक 6 (11.3.6)
निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धिभिः । किं विशेषं प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः ॥
nirmāṃsairasthibhūyiṣṭhairgātraiḥ snāyunibandhibhiḥ | kiṃ viśeṣaṃ prapaśyanti tatra teṣāṃ pare janāḥ
तब मांसहीन, हड्डियों के ढेर-से और नसों से बँधे हुए उन शरीरों में दूसरे लोग क्या भेद देख सकते हैं,
श्लोक 7 (11.3.7)
येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् । कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति विप्रलब्धधियो नराः ॥
yena pratyavagaccheyuḥ kularūpaviśeṣaṇam | kasmādanyonyamicchanti vipralabdhadhiyo narāḥ
जिससे वे कुल और रूप के भेद को पहचान सकें? फिर बुद्धि से ठगे हुए मनुष्य क्यों एक-दूसरे को ठगना चाहते हैं?
श्लोक 8 (11.3.8)
गृहाण्येव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः । कालेन विनियुज्यन्ते सत्वमेकं तु शोभनम् ॥
gṛhāṇyeva hi martyānāmāhurdehāni paṇḍitāḥ | kālena viniyujyante satvamekaṃ tu śobhanam
विद्वान् मनुष्यों के शरीरों को घर कहते हैं; समय आने पर वे छूट जाते हैं, केवल भीतर का सत्त्व ही शुभ रहता है।
श्लोक 9 (11.3.9)
यथा जीर्णमजीर्णं वा वस्त्रं त्यक्त्वा तु पूरुषः । अन्यद्रोचयते वस्त्रमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥
yathā jīrṇamajīrṇaṃ vā vastraṃ tyaktvā tu pūruṣaḥ | anyadrocayate vastramevaṃ dehāḥ śarīriṇām
जैसे मनुष्य पुराने या नए वस्त्र को छोड़कर दूसरा वस्त्र पसन्द कर लेता है, वैसे ही देहधारियों के शरीर हैं।
श्लोक 10 (11.3.10)
वैचित्रवीर्य सत्यं हि दुःखं वा यदि वा सुखम् । प्राप्नुवन्तीह भूतानि स्वकृतेनैव कर्मणा ॥
vaicitravīrya satyaṃ hi duḥkhaṃ vā yadi vā sukham | prāpnuvantīha bhūtāni svakṛtenaiva karmaṇā
हे विचित्रवीर्य-पुत्र, यह सत्य है कि प्राणी सुख हो या दुःख, अपने ही किए कर्म से पाते हैं।
श्लोक 11 (11.3.11)
कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत । ततो वहति तं भारमवशः स्ववशोऽपि वा ॥
karmaṇā prāpyate svargaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ ca bhārata | tato vahati taṃ bhāramavaśaḥ svavaśo'pi vā
हे भारत, कर्म से ही स्वर्ग, सुख और दुःख मिलते हैं; फिर मनुष्य चाहे विवश हो या स्ववश, उस भार को ढोता है।
श्लोक 12 (11.3.12)
यथा च मृन्मयं भाण्डं चक्रारूढं विपद्यते । किञ्चित्प्रक्रियमाणं वा कृतमात्रमथापि वा ॥
yathā ca mṛnmayaṃ bhāṇḍaṃ cakrārūḍhaṃ vipadyate | kiñcitprakriyamāṇaṃ vā kṛtamātramathāpi vā
जैसे चाक पर चढ़ा मिट्टी का बरतन गढ़े जाते समय या बनते ही टूट जाता है,
श्लोक 13 (11.3.13)
हीनं वाऽप्यवरोप्यं वा अवतीर्णमथापि वा । आर्द्रं वाऽप्यथवा शुष्कं पच्यमानमथापि वा ॥
hīnaṃ vā'pyavaropyaṃ vā avatīrṇamathāpi vā | ārdraṃ vā'pyathavā śuṣkaṃ pacyamānamathāpi vā
या दोषयुक्त निकलने पर, या उतारे-रखे जाते समय, गीला हो या सूखा, या पकते समय;
श्लोक 14 (11.3.14)
अवतार्यन्तमापाकादुद्धृतं चापि भारत । अथवा परिभुज्यन्तमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥
avatāryantamāpākāduddhṛtaṃ cāpi bhārata | athavā paribhujyantamevaṃ dehāḥ śarīriṇām
या आँवे से उतारे जाते समय, निकाल लिए जाने पर, हे भारत, या काम में आते हुए — वैसे ही देहधारियों के शरीर हैं।
श्लोक 15 (11.3.15)
गर्भस्थो वा प्रसूतो वाऽप्यथवा दशरात्रिकः । अर्धमासगतो वाऽपि मासमात्रगतोऽपि वा ॥
garbhastho vā prasūto vā'pyathavā daśarātrikaḥ | ardhamāsagato vā'pi māsamātragato'pi vā
कोई गर्भ में, कोई जन्मते ही, कोई दस रात का, कोई आधे मास का या एक मास का हो,
श्लोक 16 (11.3.16)
संवत्सरगतो वापि द्विसंवत्सर एव वा । यौवनस्थोऽथ मध्यस्थो वृद्धो वापि विपद्यते ॥
saṃvatsaragato vāpi dvisaṃvatsara eva vā | yauvanastho'tha madhyastho vṛddho vāpi vipadyate
कोई एक वर्ष का, कोई दो वर्ष का, कोई युवा, अधेड़ या वृद्ध होकर नष्ट हो जाता है।
श्लोक 17 (11.3.17)
प्राक्कर्मभिस्तु भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । एवं संबर्धिते लोके किमर्थमनुतप्यसे ॥
prākkarmabhistu bhūtāni bhavanti na bhavanti ca | evaṃ saṃbardhite loke kimarthamanutapyase
प्राणी अपने पूर्व कर्मों से होते हैं और नहीं भी होते; जब संसार इस प्रकार चल रहा है तो आप क्यों सन्ताप करते हैं?
श्लोक 18 (11.3.18)
यथा तु सलिलं राजन्क्रीडार्थमनुसञ्चरन् । उन्मज्जेच्च निमज्जेच्च चेष्टते च नराधिप ॥
yathā tu salilaṃ rājankrīḍārthamanusañcaran | unmajjecca nimajjecca ceṣṭate ca narādhipa
हे राजन्, जैसे कोई खेल के लिए जल में विचरता हुआ कभी ऊपर आता है, कभी डूबता है और हाथ-पैर मारता है,
श्लोक 19 (11.3.19)
एवं संसारगहने उन्मज्जननिमज्जने । कर्मयोगेन बध्यन्ते क्लिश्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥
evaṃ saṃsāragahane unmajjananimajjane | karmayogena badhyante kliśyante cālpabuddhayaḥ
वैसे ही संसार के इस गहन वन में ऊपर आने और डूबने के बीच अल्पबुद्धि लोग कर्म के योग से बँधते और क्लेश पाते हैं।
श्लोक 20 (11.3.20)
ये तु प्राज्ञाः स्थिता मध्ये संसारान्तगतैषिणः । समागमज्ञा भूतानां ते यान्ति परमां गतिम् ॥
ye tu prājñāḥ sthitā madhye saṃsārāntagataiṣiṇaḥ | samāgamajñā bhūtānāṃ te yānti paramāṃ gatim
किन्तु जो ज्ञानी बीच में स्थित रहकर संसार का अन्त खोजते हैं और प्राणियों के मिलन-बिछोह को जानते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।